शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

पहले खाली करें, फिर भरें

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डॉ. दीपक आचार्य

 

 

पात्र सब होते हैं। लेकिन पात्रता का प्रतिशत न्यूनाधिक देखा जाता है। इसका मूल कारण यह है कि पात्र कोई से हों, सभी में क्षमता पूर्ण होती है। पात्रता दर्शाने और होने का सामथ्र्य कम-ज्यादा होने का सीधा संबंध शुचिता और सान्द्रता से होता है।

जड़ या चेतन जो भी पात्र जितना अधिक शुद्ध, विजातीय द्रव्यों से मुक्त होगा? उतना अधिक अपना ठोस और पूर्ण प्रभाव छोड़ता है।  शुचिता अर्थात पवित्रता के अभाव की स्थिति में कोई भी पात्र अपनी सम्पूर्ण पात्रता परिलक्षित नहीं कर पाता है बल्कि पात्रता में अशुद्धि और कुप्रभावों का खतरा हमेशा बना रहता है। और कई बार इसी अशुद्धि और अनुपयोग या दुरुपयोग की वजह से कोई सा पात्र कितने ही दिनों तक बिना किसी उपयोग के यों ही पड़ा रहता है और दशकों तक कोई इस बारे में पूछने वाला तक नहीं होता।

बात किसी जड़ पात्र की हो या चेतन की। सभी का पूरा-पूरा और बेहतर उपयोग तथा उपयोगिता तभी सामने आ सकती है कि जब वह पात्र शुद्ध हो, पूर्ण रिक्त हो ताकि जो कुछ उसमें परिपूरित किया जाए वह पूर्णतः तात्ति्वक और परिशुद्ध रह तथा इसकी उपयोगिता और महत्त्व में किसी भी प्रकार का कोई संदेह न हो।

आधे-अधूरे लोग या पात्र ‘अधजल गगरी छलकत जाए’ वाली कहावत को ही सिद्ध करते रहते हैं। किसी को भी किसी आदर्श साँचे में ढालना हो या फिर मनोविकारों और उद्विग्नताओं, मन-मस्तिष्क के अंधकार और भ्रमों, शंकाओं, आशंकाओं की कालिख का उन्मूलन करना हो तो सबसे पहले पात्र की साफ-सफाई जरूरी है और वह भी इस स्तर तक कि इसमें न कोई कचरा रहे, न बैक्टीरिया या कोई वायरस।

पूरा का पूरा इस प्रकार साफ हो जाए कि इसमें अंश मात्र भी  पुराना, प्रदूषित, विजातीय या अनुपयोगी न बचा रह जाए। जड़ को साफ करने के तरीकों से हम सभी वाकिफ हैं लेकिन जिसे सर्वाधिक शुद्ध करने की आवश्यकता है वह है चेतन।

जिनमें जीवन है उन्हें शुद्ध कर अधिकाधिक उपयोगी बनाते हुए इनकी उपयोगिता सिद्ध करना अपने आप में बड़ा काम है।  संसार में जो जैसा है उसे स्वीकारना हमारी मजबूरी है और स्वीकारना भी पड़ता ही है।

इसके सिवाय हमारे पास और कोई चारा है ही नहीं। लेकिन जिसे सहज या असहज किसी भी तरीके से स्वीकारा गया है उसे सुधारना और खुद के लिए तथा जमाने भर के लिए उपयोगी बनाना भी हमारी ही जिम्मेदारी है जिससे हम मुकर नहीं सकते।

पलायन कोई सामान्य से सामान्य इंसान भी कर सकता है लेकिन रणक्षेत्र में डटे रहकर नकारात्मक शक्तियों का खात्मा करते हुए सकारात्मक ऊर्जाओं के प्रवाह को तीव्रतर बनार रखने का साहस बिरले ही रख पाते हैं।

इसके लिए मनोविज्ञान के साथ मानवीय ज्ञान-विज्ञान, पुरातन संस्कारों और आदर्शों तथा श्रेष्ठ परंपराओं की जानकारी का होना तथा इनके अवलम्बन का अनुभव होना भी मायने रखता है।

संसार में श्रेष्ठ तत्वों और व्यक्तित्वों की कहीं कोई कमी नहीं है बल्कि समस्या यह है कि इनमें से अधिकांश के दिमाग में जाने कुछ ऎसा भरा हुआ है कि जो बार-बार इनकी स्मृतियों में आ आकर द्वन्द्व में डाल देता है और यही द्वन्द्व कभी उद्विग्नताओं को जन्म देते हुए तनावों का सृजन कर लिया करते हैं और कभी इंसान को गलत रास्तों की ओर मोड़ दिया करते हैं।

कभी हम आत्महीनता के दौर में धँसे रहकर खुद की जिन्दगी को खराब बताते रहते हैं और कभी जमाने को। हम सभी लोग जीवन में कभी न कभी या फिर अक्सर ही इस प्रकार के द्वन्द्वों से घिर जाया करते हैं जिनका कोई आधार नहीं होता।

सिर्फ धारणाओं और आशंकाओं के बूते हम अपने रास्तों को बदलते रहते हैं और जितनी अधिक बार हमारा मानस परिवर्तित होता है उतनी ही बार हम लक्ष्य मार्ग से छिटक कर कहीं दूर जा गिरते हैं। 

बार-बार ऎसी विषम स्थितियां सामने आने पर इंसानी स्वभाव में परिवर्तन आना और जमाने को देखने की निगाह या वृत्ति विचलित होने जैसे कारण भी सामने आ सकते हैं। इन सभी हालातों में किसी भी इंसान के जीवन में निरसता से लेकर अभावों और तनावों का आना स्वाभाविक है। 

इंसान को इन सम सामयिक विपदाओं, विषमताओं और तनावों से मुक्त कराने के हमारे सारे प्रयासों की विफलता का मूल कारण यही है कि हम  पहले से जमा कचरे पर परफ्यूम छिड़क रहे हैं, पुराने मलबे और दूषित विचारों पर चंदन और पुष्प चढ़ा रहे हैं। और ये कुछ समय बाद मुरझा जाते हैं, गंध गायब हो जाती है और फिर वहीं पहुंच जाते हैं जहाँ थे।

किसी में सुधार लाना हो, मनोविकारों और तनावों से मुक्ति दिलानी हो और पूर्ण बदलाव लाना हो, तब सबसे पहले यह तय करें कि  वह पूरी तरह खाली हो। पहला प्रयास यही होना चाहिए कि रिक्तता आए और वह भी इस चरम स्तर की कि कोई भी पुराना विचार या अंश बचा न रह जाए।

एक बार पूरी तरह खाली कर दिए जाने के बाद मन-मस्तिष्क को जो कुछ भरा जाता है वह हमेशा शुद्ध रहकर आनंद देता है, तनावों से दूर रखता है और जीवन में सशक्त बदलाव ले आता है।  हर पात्र को सुपात्र बनाने का यही एकमात्र आधार है कि उसे पहले खाली करें।

आजकल इसे ब्रैन वॉश भी कहा जाता है। इसके बाद जो कुछ शुद्ध-बुद्ध और श्रेष्ठ विचार भरे जाते हैं वे जीवन के आनंद को हजार गुना बढ़ा देते हैं और हमारा पूरा जीवन महा आनंद पाकर दिव्यता से इतना भर उठता है कि जो हमारे करीब आता है वह निहाल हो जाता है।

 

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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