रविवार, 26 जुलाई 2015

हर उपलब्धि त्याग माँगती है

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डॉ. दीपक आचार्य

 

उपलब्धियाँ, विलासिता और आशातीत सफलताएँ पाना हर कोई चाहता है लेकिन साथ में यह भी तमन्ना रहती हैं कि ये सब अपने आप प्राप्त हो जाएं, इनके लिए कोई खास मेहनत नहीं करनी पड़े या कहीं से कोई ऎसा शोर्ट कट हाथ लग जाए कि सब कुछ बहुत थोड़े में निपट जाए और ढेर सारा प्राप्त हो जाए। 

बहुत से लोग यह सब पाने के लिए किसी तिलस्म या चमत्कार के लिए कई सारे डेरों पर भटकते रहते हैं और खूब सारे ऎसे भी हैं जो इन्हें पाने के लिए जब कोई और चारा नहीं दिखता तब उन गलत रास्तों को थाम कर अंधे होकर आगे बढ़ने लगते हैं।

स्व परिश्रम या पुरुषार्थ और आनंद की प्राप्ति का ग्राफ हमेशा बराबर रहता है। जब तक यह संतुलन बना रहता है तब तक उसी के अनुपात में आनंद प्राप्त होता रहता है। इसे जीवनानन्द भी कहा जा सकता है। इस संतुलन के बिगड़ जाने पर सब कुछ गड़बड़ हो जाता है।

आजकल सभी जगह यह संतुलन चरमरा गया है और इसी वजह से सब कुछ होते हुए भी हम आनंद से कोसों दूर जा रहे हैं। किसी भी मुद्रा, संसाधन और सेवा की प्राप्ति के लिए यदि पसीना नहीं बहा है तो यह जिन्दगी भर के लिए तय मानकर चलियें कि इस वैभव का कोई उपयोग अपने लिए नहीं होगा। हम इसमें से उतना मात्र आनंद प्राप्त कर पाएंगे, जितना कि हमने परिश्रम किया है।

सीधे शब्दों में कहें तो पुरुषार्थ से जो कुछ अर्जित किया गया है वही आनंद दे सकता है, बाकी तो हम सारे के सारे मूर्ख लोग बेगारी करते हुए औरों के लिए कमा रहे हैं। परिश्रमहीन प्राप्ति का कोई मूल्य नहीं होता, वह परायों के लिए हमारे बेगार से अधिक कुछ भी नहीं है। आज जो लोग कामचोरी कर रहे हैं उनके द्वारा कमाये पैसे में से उतना ही खुद के काम आने वाला है जितना मेहनत से कमाया हुआ है।

जीवन के सच्चे सुख, परम शांति और शाश्वत आनंद को पाने की पहली शर्त यही है कि हम लोग परिश्रम से प्राप्त करना सीखें। उन वस्तुओं, रुपये-पैसों और संसाधनों, सेवाओं आदि को त्यागें जिन्हें पाने के लिए हमारे द्वारा कोई मेहनत नहीं की गई है, एक बूँद भी पसीना नहीं बहाया है और जो दूसरों की मेहनत या कमाई का है। पराये अन्न का एक-एक दाना और पराये पानी की एक-एक बूँद हर जीवात्मा से हिसाब करती है इसलिए इस मामले में सर्वाधिक सतर्क रहने की जरूरत है।

सारी बातों का एकमेव सार यही है कि पुरुषार्थ से होने वाली प्राप्ति ही असली है, शेष जो भी है वह केवल दिखावटी और आभासी है, इसका स्थूल रूप में कोई अस्तित्व है ही नहीं। पुरुषार्थ हमेशा त्याग मांगता है। जिजीविषा की पूर्णता का दिग्दर्शन त्याग और तपस्या में ही है।

हमारा शरीर हो या फिर मन, अथवा विभिन्न प्रकार की परिस्थितियां, इनके साथ अनुकूलन करना और किसी भी पदार्थ या अनुकूल परिस्थिति की कमी के दौर में बिना किसी विषाद, अप्रसन्नता, खिन्नता या पीड़ा के समय गुजारने की कला जो सीख जाता है वही त्यागी है और उसी के तप का परिणाम देर सबेर सामने आता ही आता है।

आजकल वह तप-त्याग, धैर्य और गांभीर्य रहा ही नहीं। हर हरफ हड़बड़ाहट और कुछ न कुछ पा जाने का दौर बना हुआ है। पहले आदमी घण्टों भूखा, प्यासा और चुपचाप रह पाने का आदि था। आज थोड़ी सी सर्दी या गर्मी लगे, थोड़ी बरसात ज्यादा हो जाए, प्यास लगे और कुछ देर तक पानी नहीं मिले, भूख लगी हो और खाने में देरी हो जाए, किसी से मिलने गया हो और सामने वाला कुछ देर व्यस्त हो, लाईन में लगे हों और दो-पाँच मिनट ज्यादा हो जाएं, बस-रेल या सफर मेंं हो और कहीं जगह नहीं मिल पाए, कुछ पाने की तमन्ना हो और हाथ से फिसल जाए, या फिर किसी भी प्रकार की अधीरता से भरा हुआ माहौल हो।

आदमी को हर चीज तत्काल अपने सामने हाजिर चाहिए।  इस मायने में हमने राजाओं और रानियों को भी पीछे छोड़ दिया है। जरा सी भी देरी बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। किसी भी मामले में थोड़ी सी भी देर  हो जाए तो आसमान ऊँचा उठा लेते हैं, गुस्से से तरबतर हो भौंकने-गुर्राने और हायतौबा मचाने लगते हैं। और देरी से कुछ प्राप्त होने ही वाला हो और सामने से कोई और आकर चाहना करने लगे तब तो हम अपनी सारी इंसानियत को छोड़कर कर जैसी हरकतें करने लगते हैं वह अपने आपमें किसी हैवानियत से कम नहीं होती।

त्याग और तपस्या को छोड़कर हमने अपने शरीर को इतना विलासी, आरामतलबी बना डाला है कि वह सोये-सोये खाना-पीना चाहने लग गया है,  हमसे कुछ फीट पैदल नहीं चला जाता, जमीन पर बैठा नहीं जाता, घुटने मोड़ कर शौच कर पाने या बैठने तक की हमारी स्थिति नहीं है, दवाओं के बिना हमारा जीवन चलने लायक नहीं रहा, हमें अपने हर काम के लिए नौकर-चाकर चाहिएं जो हर क्षण हमारे सामने हाजिर रहें और किसी बेताल या जिन्न की तरह चुटकी बजाते ही हमारे हर काम कर दिया करें।

हम न बाहर जाना चाहते हैं, न बाहर वालों को बर्दाश्त कर पा रहे हैं। हमें न घर वाले अच्छे लगते हैं न हमारे यहाँ आने वाले मेहमान।  चंद फीट के अपने-अपने दड़बों में पूरी की पूरी जिन्दगी गुजार देने में हमें जो मजा आता है वह प्रकृति और परिवेश में कहाँ। फिर एयरकण्डीशण्ड कमरों में सोये-सोये लैपटॉप, टेबलेट, मोबाइल चलाने, गाने सुनने, फिल्म और दूसरे वज्र्य दृश्यों को देखने और आँखों पर मोटे काँच के चश्मे चढ़ाये स्क्रीन को ही संसार मान कर घण्टों देखते रहने जैसी हमारी आदतों ने हमारी दशा उस बिगड़ैल शिशु की तरह कर दी है जो खिलौनों के बिना चुपचाप नहीं रह सकता।

अन्तर सिर्फ यही है कि शिशु निर्मल चित्त होता है और हम संसार भर के सारे प्रदूषणों, कुटिलताओं से भरी विकृत मानसिकता और वैचारिक गंदगी के भण्डारों से भरा दिमाग लिए हुए अपने आपको संप्रभु मानते हुए दुनिया भर को अपनी मानने और मनवाने के भ्रमों में जीने के आदी हो चले हैं।

शरीर को चलाने और तपाने से ही यह चलता रहता है, इसे आरामतलबी बना दिए जाने पर यह ढीठ होकर स्थूलता ओढ़ लेता है। और यही वजह है कि हममें से अधिकांश के शरीर किसी बेड़ौल बोरियों-थैलों की तरह लगते हैं जिन्हें एक से दूसरी जगह लाने ले जाने तक के लिए भी किसी कुली की आवश्यकता पड़ने लगी है। हम चलते भी हैं तो ऎसे कि जैसे एक बोरे की धीमी यात्रा का कोई अवसर हो।  जीवन में त्याग और तपस्या अपनाकर व्यक्तित्व को निखारें वरना आने वाला समय हमारा साथ नहीं देने वाला।

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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