रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

भाषण न झाड़ें, पेड़ लगाएँ

  image

डॉ. दीपक आचार्य

 

धरती के प्रति हमारी सबसे बड़ी सेवा यही है कि जीवन में कम से कम एक पेड़ जरूर लगाएँ।

हममें से हर इंसान भीषण गर्मी, लू के थपेड़ों और प्राकृतिक आपदाओं से त्रस्त रहता ही है लेकिन एयरकण्डीशण्ड और कूलरों-पंखों की वजह से हमें अहसास नहीं होता।

पेड़ों की सृष्टि के लिए कितनी अहमियत है इसे जानना हो तो कुछ घण्टे बिजली ठप्प कर दें, अपने आप सभी जगह हायतौबा मचने लगेगा।

वनों के प्रति हमारी उदासीनता और वैयक्तिक फर्ज तक न मानने की भूल की वजह से हमारे सामने संकट व्याप्त हो गया है। और यह संकट भी ऎसा-वैसा नहीं है बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों तक के लिए भीषण कष्टदायक हो सकता है।

आजकल सभी स्थानों पर पर्यावरण चेतना और रक्षा के लिए बहुआयामी प्रयास चल रहे हैं। इन सभी में पेड़ लगाने, पेड़ बचाने और वनों के संरक्षण -संवद्र्धन की बातें अर्से से होती रही हैं।

हममें से खूब सारे लोग हैं जो साल में कई बार पर्यावरण के नाम पर रचनात्मक गतिविधियों का आयोजन करते हैं, लोक जागरण की बातें करते हैं, पुरस्कार और सम्मानों की ओर निगाह दौड़ाते रहते हैं और बहुत सारा ऎसा करते हैं जिसमें हमारा नाम हो, प्रतिष्ठा मिले और हमें जन-जन में जाना-पहचाना जाए।

बरसों से हम यही सब करते चले आ रहे हैं। इसके बावजूद पेड़ लगाने की यह एक ही रट हर साल लगती रहती है। वरना अब तक तो इसकी बजाय कोई दूसरा अभियान हमारे सामने होना चाहिए था। क्यों न हम अब यह संकल्प ले लें कि पर्यावरण चेतना की गतिविधियों में  वे ही लोग भाग ले सकते हैं जिन्होंने उस वर्ष में कहीं कोई पेड़ लगाया हो अथवा पेड़ लगाने की दिली इच्छा रखते हों।

वृक्षारोपण के सभी आयोजनों को भाषणों के व्यामोह से दूर रखकर हम पेड़ लगाने के लिए अधिक से अधिक समय निकाल सकते हैं।  कुछ सालों के लिए तय कर लें कि पौधारोपण के आयोजनों में न कोई मंच होगा, न किसी का भाषण। जो लोग आएं वे सारे के सारे कम से कम एक पेड़ लगाएं और उसकी परवरिश का जिम्मा लें। जो संस्थाएं भाग लें, उनके हरेक सदस्य के नाम पर पेड़ लगाए जाएं। इस दृष्टि से स्मृति वनों और प्रतीक वनों के कसेंप्ट को धरातल पर लाने की आवश्यकता है।

जिस हिसाब से प्राकृतिक विषमताएं बढ़ रही हैं, भौगोलिक और वायुमण्डलीय परिवर्तनों का घातक और मारक असर सामने आ रहा है। उससे आज हम सबक नहीं लेंगे तो आने वाला समय हमारे किसी काम का नहीं रहने वाला। बाद में हमारे भाग्य में पछतावा ही बदा रहेगा।

वो समय चला गया जब उपदेशों और भाषणों से लोगों का पेट भर जाया करता था और तालियों की बौछारें न्यूट्रीन्स-विटामिन का काम करती थीं। परिवर्तन का दौर सब तरफ कुछ नयापन लाना चाहता है और वह भी ऎसा कि उपलब्धिमूलक हो, न कि ढर्रेदार।

पेड़ों के नाम पर हम जितना कुछ कह जाते हैं, उसमें शुचिता और यथार्थ होता तो आज किसी को भी पेड़ लगाने के लिए प्रेरित करने की कोई जरूरत नहीं पड़ती। अपने आप सब कुछ होता, चारों तरफ हरियाली का मंजर होता और सुकूनदायी आबोहवा का इतना अधिक प्रभाव होता कि एयरकण्डीशण्ड और कूलरों को हम ठेंगा बता डालने की स्थिति में होते।

पर ऎसा नहीं हो पाया। कुछ परिवर्तन समय  के साथ होते हैं। आज भारतवर्ष नूतन और बेहतर  परिवर्तन के दौर में है जहाँ सब कुछ अच्छा ही अच्छा होने लगा है। समूचा विश्व भी इस बात को स्वीकार कर चुका है कि भारत विश्व को नेतृत्व देने की भरपूर क्षमता रखता है।

वर्षा ऋतु दस्तक दे ही चुकी है। अब समय आ गया है जब धरती अपने श्रृंगार के लिए हमसे कुछ मांग रही है। बहुत कुछ नहीं पर सिर्फ इतना ही कि देश का प्रत्येक आदमी कम से कम एक पेड़ जरूर लगाए। हममें से काफी लोग पेड़ लगाने में शायद शर्म महसूस करते होंगे, झुक कर पेड़ लगाने की स्थिति में नहीं होंगे।

इन सभी को चाहिए कि पेड़ भले न लगा सकें।  कम से कम इतना ही तय कर लें कि अपने घर में तुलसी का पौधा लगा लें। जो फल खाते हैं उसके बीज निकाल कर घर में सुखा कर संग्रहित कर लें। फिर जब भी भ्रमण के लिए बाहर निकलें, जंगलों के रास्ते जाते समय रास्ते के दोनों तरफ इन बीजों को दूर तक उछाल दें।

बरसात और अनुकूल आबोहवा पाकर ये भी एक न एक दिन पेड़ बन ही जाएंगे।  पेड़ की दुआओं का कोई मुकाबला नहीं। जिन्हें पेड़ खुश होकर वरदान देते हैं उनकी जिन्दगी से हरियाली कोई छीन नहीं सकता।

जब एक दूर्वा का तिनका शत-सहस्र वर्ष तक अपनी पीढ़ियों की श्रृंखला को निरन्तर सिंच सकता है तो फिर पेड़ तो इससे भी हजार गुना बहुत कुछ कर सकता है।

 

---000---

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

विषय:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

रचनाकार में ढूंढें...

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

randompost

कहानियाँ

[कहानी][column1]

हास्य-व्यंग्य

[व्यंग्य][column1]

लघुकथाएँ

[लघुकथा][column1]

कविताएँ

[कविता][column1]

बाल कथाएँ

[बाल कथा][column1]

उपन्यास

[उपन्यास][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][column1][http://raviratlami.blogspot.com]

वर्ग पहेलियाँ

[आसान][column1][http://vargapaheli.blogspot.com]
[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget