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रुद्रावतार हनुमान द्वारा भक्ति (सीतामाता) की खोज

- दयाधर जोशी

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रुद्रावतार हनुमान द्वारा भक्ति (सीतामाता) की खोज

 

यो विष्णुः स महादेवः शिवो नारायणः स्वयम्। नानयोर्विद्यते भेदः कदाचिदपि कुत्रचित्।।

जो विष्णु हैं, वे ही महादेव हैं, और जो शिव हैं, वे ही साक्षात् नारायण हैं। इन दोनों में कहीं

भी कभी भी कोई भेद नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं-

गुर पितु मातु महेस भवानी। प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी।।

सेवक स्वामि सखा सिय पी के। हित निरुपधि सब बिधि तुलसी के।।

रा.च.मा. १/१५/३.४

श्री महेश और पार्वती को मैं प्रणाम् करता हूँ, जो मेरे  गुरु और माता-पिता हैं, जो दीनबंधु और नित्य दान करने वाले हैं, जो सीतापति श्रीरामचन्द्रजी के सेवक, स्वामी और सखा हैं तथा मुझ तुलसीदास का सब प्रकार से कपटरहित (सच्चा) हित करने वाले हैं। राम और शिव दोनों एक दूसरे के स्वामी सखा और सेवक हैं। इन दोनों में एक दूसरे के प्रति इतना प्रेम है कि शिव का चिन्तन करते-करते श्रीराम श्याम वर्ण हो गये और श्रीराम का चिन्तन करते -करते शिव श्वेतवर्ण हो गये। भक्ति चाहे हरि की हो, चाहे हर की, हरि और हर में कहां कोई भेद है। रामचरितमानस गोस्वामी तुलसीदासजी की लेखन विशेषताओं से परिपूर्ण ग्रन्थ है। बाल-काण्ड से अरण्य काण्ड तक सबसे पहले भगवान शिव की वंदना के श्लोक और शिव वंदना के बाद श्रीरघुनाथजी की वंदना के श्लोक लिखे गये हैं। वहीं दूसरी ओर किष्किंधाकाण्ड, लंकाकाण्ड और उत्तरकाण्ड में पहले श्रीरघुनाथजी की वंदना के श्लोक और फिर भगवान शिव की वंदना के श्लोक लिखे गये हैं। लेकिन सुन्दरकाण्ड में रघुनाथजी की वंदना के बाद सीधे ही हनुमानजी की वंदना का श्लोक लिखा गया है। इससे तो यही प्रतीत हो रहा है कि किष्किंधाकाण्ड से ही भगवान शिव, श्रीरघुनाथजी के दास बन गये हैं। उन्होंने अपना रुद्रदेह त्याग दिया है। वे रुद्रावतार हनुमान बन गये हैं, और दास्यभावानुसार ही भगवान शिव की वंदना श्रीरघुनाथजी की वंदना के बाद की गई है। सुन्दरकाण्ड में तो भगवान शिव का स्थान पूर्णतः रुद्रावतार हनुमान ने ले लिया है। जेहि सरीर रति राम सों सोई आदरहिं सुजान। रुद्रदेह तजि नेह बस बानर भे हनुमान।। दोहावली-१४२ रामचरितमानस के अनुसार हनुमानजी का बल, पराक्रम, बुद्धि और विद्या एवं उनके द्वारा किये गये आश्चर्यजनक कार्य भी यही संकते देते हैं कि हनुमान लौकिक वानरों से सर्वथा भिन्न हैं। हनुमानजी प्राकृत कपि नहीं, रुद्रावतार हैं।

आगें चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक पर्बत निअराया।।

तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा। आवत देखि अतुल बल सींवा।। रा.च.मा. ४/१/१-२

ऋष्यमूक पर्वत निकट आ गया है। जहां अपने सचिव हनुमान के साथ सुग्रीव रहते हैं। सुग्रीव के सचिव पद से ही शुरु होती है हनुमान-चरित्र की यात्रा।

श्रीराम-लक्ष्मण ऋष्यमूक पर्वत के निकट पहुंच गये हैं। बाली के डर से इस पर्वत पर निवास कर रहे भयभीत सुग्रीव अपने सचिव हनुमान से कहते हैं, ये दोनों पुरुष बल और रुप के निधान हैं। तुम विप्ररुप धारण कर उनसे मिलो और यथार्थ जानकर मुझे इशारे से समझा देना, ताकि मैं पर्वत छोड़ कर भाग जाऊं।

हनुमान विप्ररुप धारण कर जा रहे हैं। यहां से शुरु होता है हनुमानजी का अपने प्रभु से मिलन

का प्रसंग। हनुमान श्रीराम-लक्ष्मण को शीश नवा कर पूछते हैं-

को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रुप फिरहु बन बीरा।।

कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी।।

रा.च.मा. ४/१/७-८ सांवले और गोरे शरीर वाले आप कौन हैं, जो क्षत्रियरुप में वन में फिर रहे हैं? कठोर भूमि पर

कोमल चरणों से चलने वाले आप किस कारण वन में विचर रहे हैं?

की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ। नर नारायन की तुम्ह दोऊ।।

रा.च.मा. ४/१/१0

क्या आप ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन तीनों दवे ताओं में से कोई हैं, या आप दोनों नर और नारायण

हैं?

'कठिन भूमि कोमल पद गामी'-कठिन भूमि, सुन्दर कोमल अंग, कोमल चरण वन-वन भटक रहे हैं, लगता है हनुमान जैसे परमज्ञानी और अनन्य भक्त को इन कोमल चरणों से विशेष प्रेम है। दास्य प्रेम के आदर्श हनुमान को आभास हो गया है कि तपस्वीरुप में ये मेरे स्वामी के चरण हो सकते हैं। मन में ऐसा विचार आते ही वो पूछते हैं -

जग कारन तारन भाव भजन धरनी भार ।

की तुम्ह अखिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार।। रा.च.मा. ४/१

क्या आप सम्पूर्ण लोकों के स्वामी स्वयं भगवान हैं, जिन्होंने लोगों को भवसागर पार उतारने तथा पृथ्वी का भार नष्ट करने के लिये मनुष्यरुप में अवतार लिया है? पूछे गये सभी प्रश्न स्पष्टतः

यही संकेत दे रहे हैं कि इन्होंने अपने स्वामी को पहचान लिया है। जनकजी ने जब पहली बार राम-लक्ष्मण को ऋषि विश्वामित्र के साथ देखा तो श्रीराम की

मधुर मनोहर मूर्ति को देख कर विदेह (जनक) विशेषरुप से विदेह (देह की सुध-बुध रहित) हो  गये तो उन्होंने भी ऋषि विश्वामित्र से ऐसा ही प्रश्न पूछा था - कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक।। ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि की सोइ आवा।।

रा.च.मा. १/२१६/१-२

हे नाथ! कहिये, ये दोनों बालक मुनिकुल के आभूषण हैं या फिर किसी राजवंश के पालक? अथवा जिनका वेदों ने 'नेति' कह कर गान किया है कहीं वह ब्रह्म तो युगल रुप धर कर नहीं

आया है?

यहां भी यही प्रतीत हो रहा है कि जनकजी ने श्रीराम में सच्चिदानन्द स्वरुप को देख लिया है।

श्रीराम, परम भक्त हनुमान के प्रश्नों का उत्तर कुछ इस तरह दे रहे हैं।

कोसलेस दसरथ के जाए। हम पितु बचन मानि बन आए।। नाम राम लछिमन दोउ भाई। संग नारि सुकुमारि सुहाई।।

इहाँ हरी निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम ख़ोजत तेही।। रा.च.मा. ४/२/१-२-३

हमारा नाम राम-लक्ष्मण है। हम कोसलराज दशरथ के पुत्र हैं। पिता के वचन मान कर वन आये हैं। हमारे साथ सुन्दर सुकुमारी स्त्री थी। यहां वन में राक्षस ने जानकी को हर लिया। हम उसे ही खोजते फिरते हैं। अपना परिचय देने के बाद श्रीराम, हनुमान से कहते हैं - 

आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई।।

रा.च.मा. ४/२/४

हमने तो अपना परिचय दे दिया। अब विप्रवर! आप कौन हैं, हमें बताइये?  ''प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना''

रा.च.मा. ४/२/५ परस्पर वार्तालाप द्वारा हनुमान ने अपने प्रभु को पहचान लिया है। वे तुरन्त उनके चरणों में गिर गये। अपने नाथ को पहचानने से हृदय में हर्ष हो रहा है। खुशी के कारण आँखों से अश्रु बह रहे हैं। उन्होंने हृदय में धैर्य धारण कर अपने प्रभु की स्तुति की-

मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं।।

तव माया बस फिरउँ भुलाना। ताते मैं नहिं प्रभु पहिचाना।।

रा.च.मा. ४/२/८-९ हे स्वामी! मैंने जो पूछा वह मेरा पूछना तो न्याय था। वर्षों के बाद आपको देखा, वह भी तपस्वी वेश में और मेरी वानरी बुद्धि, इससे मैं तो आपको पहचान न सका और अपनी परिस्थिति अनुसार मैंने आपसे पूछा, (जीव स्वरुप) का बोध कराता है। परन्तु आप मनुष्य की तरह कैसे पूछ रहे हैं? मैं तो आपकी माया के वश भूला फिरता हूँ। इसी

से मैंने अपने स्वामी को नहीं पहचाना।

एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान। पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान।।

रा.च.मा. ४/२

एक तो मैं यों ही मंद हूँ, दूसरे मोह के वश में हूँ, तीसरे हृदय  का कुटिल और अज्ञान हूँ, फिर हे दीनबंधु भगवान! आपने भी मुझे 

भुला दिया!

जदपि नाथ बहु अवगुण मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भारे े।।

नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा।।

रा.च.मा.४/३/१-२ हे नाथ! यद्यपि मुझमें बहुत से अवगुण हैं तथापि आप सवे क को न भूल जाएँ। हे नाथ! जीव

आपकी माया से मोहित है। वह आपही की कृपा से निस्तार पा सकता है। प्रभु और सेवक के बीच यह वार्तालाप 'ईश्वर स्वरुप और 'विरोध स्वरुप' का बोध कराता है। यहां 'नाथ जीव तव मायाँ मोहा' जीव आपकी माया से मोहित है 'विरोध स्वरुप का बोध कराता है,

क्योंकि यह माया ही भक्ति में बाधा उत्पन्न करती है।

ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई।।

सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें।। रा.च.मा. ४/३/३-४ उस पर हे रघुवीर! मैं आपकी शपथ करके कहता हूँ कि मैं भजन-साधन कुछ नहीं जानता-

भक्त की 'दीनता स्वरुप' का बोध कराता है। सेवक स्वामी के और पुत्र माता के भरोसे निश्चिन्त रहता है। प्रभु को सेवक का पालन-पोषण

करना ही पड़ता है-'उपाय स्वरुप' का बोध कराता है।

अस कहि परेउ चरन अकुलाई। निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई।।

तब रघुपति उठाइ उर लावा। निज लोचन जल सींचि जुड़ावा।।

रा.च.मा. ४/३/५-६ ऐसा कह कर हनुमानजी अकुलाकर प्रभु के चरणों पर गिर पड़े, उन्होंने अपना असली शरीर प्रकट कर दिया। तब श्रीरघुनाथजी ने उन्हें उठा कर हृदय से लगा लिया और अपने नेत्रों के जल से सींच कर शीतल किया- 'फलस्वरुप' का बोध कराता है। हनुमानजी को भगवत-चरणों की प्राप्ति हो गई है। उन्हें प्रेमाभक्तिरुपी परमफल प्राप्त हो गया है। सच्चे भक्त का जीवन अहंकार से मुक्त होता है। उसके हृदय में 'अहं' 'मम' के लिये स्थान ही नहीं होता। कर्मयोगी किसी भी अवस्था में अपने लिये कुछ नहीं चाहता और जो मिला है उसे भी अपना नहीं मानता।

गोस्वामी तुलसीदासजी ने हनुमानजी और प्रभु श्रीराम के बीच हुए वार्तालाप द्वारा जीवस्वरुप, ईश्वरस्वरुप (परस्वरुप), विरोधस्वरुप, उपायस्वरुप और फलस्वरुप के साथ ही भक्त के दीनता स्वरुप को अपनी लेखनी के माध्यम से बहुत ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है। संसारी जीव मनुष्य को जब तक इन स्वरुपों का बोध नहीं होता तब तक वह इस भवसागर से पार नहीं हो सकता है। हनुमानजी इस मधुर-मिलन से कृतार्थ हो गये हैं। अस कहि (वचन), परेउ चरन अकुलाई (तन), निज तनु (अपना शरीर) प्रगटि प्रीति उर लाई (मन) द्वारा उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे मन, वचन, तन और कर्म से अपने प्रभु के प्रति समर्पित हैं।

भक्त कहे मैं सेवक हूँ और यह चराचर जगत मरे े स्वामी भगवान का रुप है। भगवान को सेवक प्रिय है, क्योंकि मुझे छोड़ कर उसको कोई दूसरा सहारा नहीं होता है। हनुमानजी को अपने भगवान का सहारा प्राप्त हो गया है। वे प्रभु के चरण सेवक हैं। प्रभु के कोमल चरण वन-वन भटक रहे हैं, यह देख कर बहुत दुःखी हैं। उन्होंने श्रीराम-लक्ष्मण को अपने   कंधों पर बैठाया और सुग्रीव की ओर बढ़े।

भयभीत सुग्रीव, सेवक और प्रभु के इस गूढ़ प्रेम को दूर से देख रहे थे। प्रभु श्रीराम और सेवक हनुमान बीच यह प्रगाढ़ता सुग्रीव के लिये बहुत ही शुभ और सुखद संदेश था। बालि जैसे महाबली के होते हुए भी हनुमानजी सुग्रीव के सचिव बन कर हमेशा उसकी सेवा में संलग्न रहे। यहाँ श्रीराम-सुग्रीव मिलन हनुमानजी जैसे योग्य सचिव के प्रयास से ही सम्भव हुआ। वास्तव में यह ब्रह्म और जीव का मिलन है। हनुमान प्रभु श्रीराम से कहते हैं, सुग्रीव दीन हैं, आपके दास हैं, इन्हें निर्भय कर दें। इसके तुरन्त बाद प्रभु से कहते हैं, सुग्रीव राजा हैं, इन्हें अपना मित्र बना लें। यहाँ एक कुशल सचिव ने प्रभु और सुग्रीव के बीच सखा-भक्ति स्थापित करा कर दीन और भयभीत सुग्रीव का उद्धार किया है। मैत्री-धर्म का पालन करते हुए प्रभु श्रीराम ने बालि का संहार कर सुग्रीव को किष्किंधा का राज्य सौंप दिया और इस राजा को अपना परम मित्र बना लिया। राज सुख प्राप्त होते ही वासना के वशीभूत होकर सुग्रीव सीता माता की खोज जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य को भूल गये। प्रभु के प्रति इस अकृतज्ञता का सीधा सा अर्थ है अनर्थ। क्योंकि इस भवसागर को पार कराने वाले प्रभु श्रीराम के कार्य को एक संसारी जीव (सुग्रीव) ने वैभव पाते ही भुला दिया है। हनुमानजी इस बात को समझ गये हैं, लेकिन विषय-भोगों में संलिप्त सुग्रीव सब कुछ भूल कर निश्चिन्त हैं। सुग्रीव सीतामाता की खोज जैसे महत्वपूर्ण कार्य को भूल गये! सुग्रीव धीर गम्भीर धैर्यवान सचिव के साथ विश्वासघात और प्रभु श्रीराम के करुणामय व्यवहार का दुरुपयोग करते नजर आ रहे हैं। सीतामाता की खोज में हो रहे विलम्ब के कारण श्रीराम का धैर्य टूट रहा है। प्रभु कह रहे हैं, जिस बाण से मैंने बालि को मारा था उसी बाण से कल उस मूढ़ को मारूँ! इस क्रोध को लक्ष्मण समझ गये हैं। प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण से कहते हैं 'भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव'

-मित्र सुग्रीव को केवल भय दिखा कर यहाँ ले आओ। सुग्रीव किष्किंधा पर राज्य करते रहें और प्रभु की चिन्ता भी मिट जाए, इस दोहरे दायित्व का निर्वाह करने के लिये हनुमानजी को साम, दान, दण्ड, भेद की नीति का सहारा लेना पड़ा। समस्याओं को सुलझाने में निपुण हनुमानजी ने इस नीतिशास्त्र के माध्यम से सुग्रीव को श्रीराम के पौरुष-पराक्रम और लक्ष्मण के भयंकर क्रोध से भलीभाँति अवगत करा दिया। हनुमानजी के प्रयास से भयमुक्त जीवन बिता रहा सुग्रीव पुनः भय से काँप उठा। सुग्रीव ने सोचा पहले नरक भुगता अब मृत्यु निश्चित है। विषय भोगी जीव मृत्यु से बहुत डरता है। इसलिये भय की भाषा को ही समझ पाता है। हनुमानजी ने सुग्रीव को प्रभु श्रीराम के कार्य के प्रति सचेत कराया। हनुमानजी के उचित परामर्श और भय ने सुग्रीव को कर्तव्य बोध करा दिया। निडर, स्वाभिमानी और नीतियों का पालन करने वाला स्त्री का सहारा नहीं लेता, लेकिन डरपोक सुग्रीव ने लक्ष्मण के क्रोध को देख कर मृत्यु भय के कारण अपने घर की प्रतिष्ठा तारा को आगे कर दिया। सुग्रीव का यह निर्णय हनुमानजी और लक्ष्मण को निश्चितरुप से अनुचित ही लगा होगा। पुनः असहाय होकर दुःख पाने या फिर मृत्यु के भय के कारण ही सुग्रीव हनुमानजी से कहते हैं, 'तारा को साथ ले जाओ और किसी भी तरह लक्ष्मण के क्रोध को शान्त करो।'

स्त्री का सम्मान करने वाले लक्ष्मण ने जब हनुमानजी के साथ तारा को देखा तो वे अपना क्रोध भूल गये। हनुमानजी ने लक्ष्मण का स्वागत किया और ''करि बिनती मंदिर लै आए। चरन पखारि पलंग बैठाये।।'' राज महल में ले आये, चरण धोकर उन्हें पलंग पर बैठाया और नतमस्तक होकर प्रभु श्रीराम का गुणगान करने लगे। लक्ष्मण ने उन्हें गले लगा लिया। हनुमानजी की परम भक्ति, शालीनता और विनम्रता ने लक्ष्मण का क्रोध शांत कर दिया। लक्ष्मण भूल गये कि प्रभु श्रीराम ने उन्हें यहां किसलिये भेजा है। सुग्रीव को कर्तव्य-बोध हो गया है। उन्हें लक्ष्मण ने गले से लगा लिया। सुग्रीव कह रहे हैं, 'विषयों ने मेरा ज्ञान हर लिया था', वहीं हनुमान कह रहे हैं, 'सभी दिशाओं में दूत भेजे जा चुके हैं'। यह जानकर लक्ष्मण प्रसन्न हैं और सुग्रीव इनके कोप से बच गये हैं। हनुमानजी जैसे स्वामिभक्त सचिव ने जीव को ब्रह्म से मिलाया और ब्रह्म से विमुख होने से भी बचाया। सचिव कैसा होना चाहिये, इसका उत्कृष्ट उदाहरण हनुमानजी ने सबके सामने प्रस्तुत किया है। प्रतिकूल को अनुकूल बनाने की कला में प्रवीण हैं, सुग्रीव के सचिव हनुमान। आगे लक्ष्मण, उनके पीछे अंगद व अन्य वानरों के साथ सुग्रीव श्रीरघुनाथजी से मिलने जा रहे हैं। प्रभु श्रीराम से विचार विमर्श के बाद प्रारम्भ होता है सीतामाता की खोज का महत्वपूर्ण कार्य-जो हनुमानजी के बिना पूर्ण नहीं हो सकता है।

वानर यूथ इकट्ठे हो गये हैं, और सुग्रीव का आदेश पाकर सभी दिशाओं में सीता माता की खोज करने के लिये प्रस्थान कर रहे हैं। हनुमानजी का दल दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान कर चुका है। उन्होंने श्रीराम को प्रणाम किया तो प्रभु ने अपने कर-कमल से उनके सिर का स्पर्श किया तथा अपना सेवक जानकर अपने हाथ की अंगूठी उतार कर उन्हें देते हुए कहा, 'यह सहिदानी सीता को दे देना और बहुत प्रकार से समझाना, मेरा बल और विरह कह कर तुम शीघ्र लौट आना।' हनुमान धन्य हो गये, उन्होंने अपना जन्म सफल समझा और कृपानिधान को अपने हृदय में धारण कर आगे बढ़ गये। यह जान कर मन ही मन बहुत प्रसन्न हैं कि प्रभु ने पाप, ताप और माया को मिटा देने वाले अपने कर-कमल मेरे मस्तक पर रख दिये हैं। समुद्र के किनारे जामवंत, अंगद, हनुमान अन्य वानरों के साथ बैठे हैं। हनुमान चुपचाप बैठे प्रभु नाम-स्मरण कर रहे हैं। फिलहाल उनकी सभी शक्तियाँ सुप्तावस्था में हैं। यहां जामवंत उनके पथ प्रदर्शक बनते हैं। हनुमान से कह रहे हैं, 'चुप क्यों बैठे हो, अपने आप को पहचानो, अपने कुल के गौरव को याद करो, श्रीराम के कार्य के लिये ही तुम्हारा जन्म हुआ है, जगत में ऐसा कौन सा कठिन काम है जो तुमसे नहीं हो सके।' इतना सुनते ही उनकी सभी शक्तियाँ पूर्णतः जाग्रत हो गयीं। वे पर्वताकार हो गये। उन्होंने तीव्र गर्जना की लेकिन अपना संयम नहीं खोया। सच्चे बलवान हैं, इसलिये निर्भीक हैं, बल का तो उन्हें अभिमान ही नहीं है। विनम्रता उनका प्रमुख आभूषण है। जामवन्त के मार्गदर्शन ने निरभिमान हनुमान की लघुता (सुप्तावस्था) को प्रभुता (जाग्रत अवस्था) में परिवर्तित कर दिया। हनुमान समुद्र के किनारे एक सुन्दर पर्वत पर चढ़ गये हैं, और बार-बार श्रीरघुवीर का स्मरण कर रहे हैं। गोस्वामी तुलसीदासजी उनकी वंदना कर रहे हैं। हनुमानजी पर्वत पर बड़े वेग से उछले तो तुलसीदासजी ने बिना दोहा लिखे ही अपने इष्ट को समुद्र लांघने के लिये विदा कर दिया। क्या वे दोहा लिखना भूल गये? प्रस्थान निर्विघ्न होना चाहिये। इसलिये वे दोहा या सोरठा लिख कर उनके कर्तव्य-पथ में बाधा उत्पन्न नहीं करना चाहते हैं। हनुमान समुद्र लांघ रहे हैं, लगातार प्रभु श्रीराम के नाम का स्मरण कर रहे हैं। दृढ़ संकल्प के

साथ लक्ष्यानुगामी बन कर आगे बढ़ रहे हैं। रास्ते में मैनाक पर्वत कुछ देर विश्राम करने की बात कहते हैं। आलस्य, विश्राम व विश्राम के बाद नींद, एकाग्रता को भंग करते हैं। इस बात पर विचार कर वे मैनाक को प्रणाम कर आगे बढ़ जाते हैं। हनुमान को कार्य पूर्ण किये बिना विश्राम कहां!

हनुमान यात्रा पथ पर आगे बढ़े तो इनके बल और बुद्धि की परीक्षा लेने के लिये देव लोक से सुरसा नाम की राक्षसी आई। उन्होंने राम-नाम का स्मरण किया-सुरसा मार्ग से नहीं हटी, सीतामाता की खबर प्रभु श्रीराम को बताने की बात कही-सुरसा ने रास्ता नहीं छोड़ा, स्त्री पर स्त्री ने किसी भी तरह की सहानुभूति नहीं दिखायी। उन्होंने सीतामाता की खबर श्रीराम को सुनाने के बाद मुझे खा लेना की प्रतिज्ञा की-सुरसा फिर भी बाधक बनी रही। सुरसा को माता कह कर सम्बोधित किया -सुरसा में ममता नहीं जागी। हनुमान ने कहा, 'तुम मुझे खा क्यों नहीं लेती।' यह सुनकर सुरसा ने एक योजन मुंह फैलाया। उनके पास दो अक्षर 'रा' व 'म' का सहारा है, इसलिये उन्होंने दो योजन मुँह फैलाया। सुरसा ने मुंह का विस्तार सोलह योजन किया तो उन्होंने बत्तीस योजन मुँह फैलाया। सुरसा ने जब सौ योजन मुंह फैलाया तो उन्होंने सोचा मुझे सौ योजन का समुद्र पार करना है। पहले मुझे इस समुद्ररुपी मुंह को पार कर लेना चाहिये। इसके लिये उन्होंने अतिलघुरुप धारण कर सुरसा के मुंह में प्रवेश किया और बाहर निकल गये। सुरसा हनुमानजी के बुद्धि-चातुर्य से संतुष्ट हो गई और उन्हें, 'प्रभु का कार्य अवश्य पूरा करोगे' का आशीर्वाद देकर चली गई। सुरसा ने हनुमानजी के प्रत्येक प्रस्ताव और निवेदन को

ठुकरा दिया था, लेकिन वह प्रतिकूल नहीं थी। हनुमानजी की परीक्षा के लिये उसने प्रतिकूल आचरण प्रदर्शित किया था। उन्होंने अपनी बुद्धि कौशल से इस बाधक को साधक बना दिया। मुंह का निरन्तर विस्तार सुरसा का अहंकार था। उन्होंने अहंकार से टकराना उचित नहीं समझा। इसलिये वे अतिलघुरुप धारण कर पूरी तरह से निरभिमान हो गये। सुरसा उनके सामने भय बन कर आयी थी, इसलिये उन्होंने अपने शरीर का विस्तार कर भय को भयभीत कर दिया, और अन्त में अपने को बहुत छोटा बना कर उससे छुटकारा पा लिया।

यात्रा के दौरान सुरसा बाधा तो थी लेकिन घातक नहीं थी। अतः उसके स्वभाव के अनुसार ही उन्होंने व्यवहार किया। इस सत्वगुणी माया को उन्होंने कोई नुकसान नहीं पहुँचाया। सत्वगुणी अवरोध से छुटकारा पाने के लिये अपने को छोटा बनाना ही उचित समझा। आगे बढ़ने पर उन्हें सिंहिका राक्षसी मिली, जिसमें जीव की छाया को पकड़ कर उसके जीवन को समाप्त करने की क्षमता थी। छल की प्रतीक इस घातक तमोगुणी माया को उन्होंने तरु न्त पहचान लिया और उसका अन्त कर दिया। तमोगुणी माया से हमेशा सचेत रहना चाहिये और उसके स्वभाव के अनुसार ही उसे पुरस्कृत भी करना चाहिये। तमोगुणी माया जीवन में किसी को भी उन्नति करते नहीं देख सकती है। जीवन में एसी बाधा आने पर धैर्य और धीरबुद्धि का उपयोग कर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहिये। हनुमानजी ने समुद्र पार कर लिया है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने हनुमानबाहुक में इन्हें 'सिन्धु

तरन' कहा है। तमोगुणी माया सिंहिका को उचित पुरस्कार देने के बाद हनुमान आगे बढ़े तो उन्हें लंकिनी राक्षसी मिलती है। उन्होंने उसे एक घूँसा मारा जो उसके लिये सत्संग बन गया। भय के कारण लंकिनी में भक्ति भाव जाग्रत हो गया। भय से उत्पन्न इस भक्ति को उन्होंने कोई महत्त्व नहीं दिया। यह माया भी बाधक से साधक बन गयी, लेकिन उन्होंने उसे धन्यवाद तक नहीं दिया। उन्होंने इस रजोगुणी माया को पहचान कर उसे मारना उचित नहीं समझा। रजोगुणी माया को न तो प्रबल रहने देना चाहिये और न ही उसे नष्ट करना चाहिये। उसके स्वभाव के अनुसार ही उसे पुरस्कृत कर, कमजोर बना कर अपने वश में करना चाहिये। तीन प्रकार की गुणमयी माया से छुटकारा पाने के बाद लंका में एक घर के बाहर तुलसी का पौधा और राम-नाम देख कर वे सोचते हैं, यह भी माया हो सकती है। इस बाहरी स्वरुप को देखकर यह कैसे समझ लिया जाए कि घर के अन्दर निवास करने वाला खरा है। वह खोटा भी तो हो सकता है। लंका राक्षसों का निवास स्थल है, क्या यहां सज्जन पुरुष भी हो सकता है? ऐसा घर तो किसी को धोखा देने के लिये भी बनाया जा सकता है। तभी घर के अन्दर से राम-नाम सुमिरन सुनाई देता है। सुबह उठते ही राम-नाम सुमिरन करने वाला निश्चितरुप से रामचरणानुरागी ही होगा, ऐसा सोच कर उन्होंने इस व्यक्ति से परिचय करना उचित समझा। वे ब्राह्मण वेश में उसके पास पहुँचे। परिचय के अनुसार राम-नाम जपने वाले का नाम विभीषण है और ये रावण के छोटे भाई हैं। प्रभु श्रीराम के कर-कमलों के प्रताप से तीन प्रकार की गुणमयी माया से छुटकारा पाते ही दो संतों के सत्संग की प्रबल सम्भावना एक सुखद सकते हैं। विभीषण ने ब्राह्मण को प्रणाम किया और पूछा-

की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।

रा.च.मा. ५/६/७

'क्या आप हरिभक्तों में से कोई हैं? आपको देख कर मेरे हृदय में अत्यन्त प्रेम उमड़ रहा है।'

की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।

रा.च.मा. ५/६/८

'क्या आप दीनों से प्रेम करने वाले स्वयं श्रीराम ही हैं, जो मुझे बड़भागी करने आये हैं?' विभीषण के मन में इनके प्रति अपार प्रेम उमड़ रहा है। वे इन्हें श्रीराम समझ कर अपने को बड़भागी समझ रहे हैं। रामचरणानुरागी विभीषण को देखकर हनुमानजी भी गद्गद् हो रहे हैं। किष्किंधा काण्ड में जब हनुमान विप्ररुपधारण कर प्रभु श्रीराम से मिले थे तो इन्होंने भी अपने प्रभु से ऐसे ही प्रश्न पूछे थे जैसे प्रश्न विभीषण इनसे पूछ रहे हैं। ये विभीषण को अपना परिचय देने से पहले राम-कथा सुनाते हैं। विभीषण पूछते हैं, 'क्या अनाथ जान कर श्रीराम कभी मुझ पर भी कृपा करेंगे?' साथ ही यह

भी कह रहे हैं कि, 'मुझे भरोसा है प्रभु मिलेंगे। क्योंकि बिना हरिकृपा के संत नहीं मिलते।' बिनु सतसंग बिबेक न होई। रामकृपा बिनु सुलभ न सोई।।

सतसंगत मुद मंगल मूला। सोइ फल सिधि सब साधन फूला।। रा.च.मा. १/३/७-८

सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और श्रीरामजी की कृपा के बिना वह सत्संग सहज में मिलता नहीं। सत्संगति आनन्द और कल्याण की जड़ है। सत्संग की प्राप्ति ही फल है और सब साधन तो फूल हैं।

यहां हरिकथा सुनने वाले और सुनाने वाले संतों के तन मन वचन प्रभु के गुण-समूहों के वर्णन में तल्लीन हो गये हैं। हनुमान, विभीषण से कहते हैं - 'प्रभु सवे क पर प्रीति रखते हैं, यही प्रभु की रीति है। मैं ऐसा अधम हूँ पर प्रभु मुझे भी बहुत प्यार करते हैं।' किष्किंधाकाण्ड में इन्होंने सुग्रीव को प्रभु श्रीराम का सखा बनाया था। यहां ये विभीषण को अपना सखा बना कर बराबरी की मित्रता सम्बन्धों को प्रगाढ़ कर रहे हैं। उन्होंने विभीषण को यह बात बहुत अच्छी तरह समझा दी है कि प्रभु श्रीराम

शरणागतवत्सल हैं। विभीषण, हनुमानजी को अपना गुरु मान कर उन्हें गुरु-दक्षिणा के रुप में भक्तिमाता सीता की पूरी जानकारी दे देते हैं। हनुमानजी भक्तिमाता की खोज में सहयेागी बने विभीषण को सद्गुरु के रुप में स्वीकार करते हैं। लंका में दो संतों का सत्संग और इस संत समागम के फलस्वरुप यथार्थ भक्ति की प्राप्ति ही सबसे बड़ी उपलब्धि है। अपने सद्गुरु विभीषण के सहयोग से साधक हनुमान अशोक-वाटिका पहँुच गये, जहां भक्तिमाता (सीताजी) को रखा गया है। अशोक वाटिका में सीता माता बहुत दुःखी हैं। त्रिजटा उन्हें प्रभु श्रीराम का प्रताप, बल और सुयश समझाते हुए धैर्य धारण करने की सलाह दे रही है। हनुमानजी वृक्ष के पत्तों में छिप कर सब कुछ देख रहे हैं। त्रिजटा, सीतामाता को धैर्य धारण करा कर अपने घर जा रही है। प्रभु का सुयश सीतामाता के लिये बहुत बड़ा सहारा ह,ै यह बात हनुमानजी भी समझ गये हैं।

यहां त्रिजटा को अपना गुरु मान कर हनुमानजी ने सीतामाता को श्रीराम-यशरुपी पुष्पांजलि चढ़ानी शुरु कर दी और प्रभु द्वारा दी गई सहिदानी (मुद्रिका) माता को समर्पित कर दी। माता ने मुद्रिका को पहचान लिया। वे बोली, 'अमृतरुपी कथा सुनाने वाला सामने प्रकट क्यों नहीं होता?' हनुमान उनके सामने गये तो वे मुँह फेर कर बैठ गईं। उनके मन में आश्चर्य हुआ। कैसा आश्चर्य? हालांकि माया से ऐसी मुद्रिका नहीं बन सकती है पर मेरे सामने बैठा हुआ मायावी भी हो सकता है। भक्ति माता ने सत्य की परीक्षा लेने के लिये ही अपना मुंह फेर लिया था। हनुमान कह रहे है, ''रामदूत मैं मातु जानकी'' यहां रामदूत की विशेषताओ का उल्लेख करना उचित होगा। विनम्रता, निरभिमानता, निष्कामता, पूर्णसमर्पण, प्रभुसेवा-भक्ति, कर्म कुशलता, विविध ज्ञान, नीतिमत्ता एवं प्रचण्ड कर्मठता की साधनामूर्ति हैं रामदूत-हनुमान।

''सत्य सपथ करुणानिधान की''- मुद्रिका की तरफ इशारा करते हुए, 'हे माता जानकी! मैं करुणानिधान की शपथ खाकर कहता हूँ कि मैं रामदूत हूँ और मेरे प्रभु श्रीराम ने यह मुद्रिका आपके लिये सहिदानी दी है।' दूत के मुंह से 'माता' शब्द सुन कर सीताजी को यह विश्वास हो गया है कि यह मायावी नहीं है। भक्ति माता ने यह भी जान लिया है कि यह मन, कर्म और वचन से कृपासिंधु का दास है। दूत के मुख से 'करुणानिधान' सुनकर सीतामाता को सुखद आश्चर्य होता है क्योंकि वे प्रभु श्रीराम को हमेशा "करुणानिधान" कह कर ही सम्बोधित करती थीं। दूत की परीक्षा पूर्ण हुई।

जिस राम दूत की विशेषताओं का उल्लेख यहां किया गया है उसके प्रति भक्ति माता के मन में कुछ शंका अभी भी बनी हुई है। वे दूत से पूछती हैं, 'हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे समान ही होंगे? लेकिन राक्षस तो बड़े बलवान हैं, योद्धा हैं।' इतना सुनते ही रामदूत ने सोने के पर्वत सुमेरु के समान के आकार का अत्यन्त विशाल शरीर प्रकट कर दिया।

श्रीराम ने जो मुद्रिका साधक हनुमान को भक्तिमाता के लिये दी थी, क्या वह केवल सहिदानी थी? यह मुद्रिका केवल सहिदानी नहीं थी, इसमें भक्ति माता के लिये एक संदेश था। मुद्रिका के माध्यम से प्रभु श्रीराम ने सीता को आश्वस्त किया कि तुम जहां भी हो मेरे अभयहस्त के आश्रय में पूर्णतः अभय हो। तुम्हें किसी भी तरह की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। पूरी तरह संतुष्ट एवं शंकामुक्त भक्ति माता ने प्रसन्नचित्त होकर रामदूत को आशीर्वाद दिये तो वे धन्य हो गये। माता से विमल वरदान पाकर अपने तन मन की सुधि भूल गये।

'हनुमानबाहुक' में गोस्वामी तुलसीदासजी ने भक्तिमाता सीता के शोक को हरने वाले हनुमान को 'सिय-सोच-हरन' कह कर सम्बोधित किया है।

भक्तिमाता से मिलने के बाद इन्होंने अशोक वाटिका उजाड़ दी, हजारों राक्षसों का संहार किया। रावण-पुत्र अक्षय कुमार को मार दिया। प्रभु के कार्य के लिये स्वयं अपने को नागपाश में बांध लिया। रावण के दुर्वचन सुने। रावण को अपने पवित्र कुल का विचार कर भक्तभयहारी भगवान् को भजने की सलाह दी। 'हे रावण! राम विमुख की रक्षा कोई नहीं कर सकता। ऋषि पुलस्त्यजी का यश निर्मल चन्द्रमा के समान है। उस चंद्रमा में तुम कलंक मत बनो।' हनुमानजी ने कुमति निवारण का बहुत प्रयास किया, लेकिन अभिमानी रावण व्यंग्यात्मक हँसी हँसता रहा। मतिभ्रष्ट रावण ने अंततः इनकी पूंछ में तेल में डूबा कपड़ा बाँध कर आग लगाने का आदेश दे दिया। नगर निवासी तमाशा देख रहे हैं, अपने पैरों से इन्हें ठोकर मार रहे हैं। लंकावासियों ने एक रोमधारी वानर की पूंछ में आग लगा दी। रावण और लंकावासियों ने जिसे एक साधारण सा वानर समझा वह एक महल से दूसरे महल में कूद-कूद कर पूरी लंका को तप्त कर रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे काल लाल-लाल लपटों को साथ लेकर इधर से उधर घूम रहा है। मूसलाधार वर्षात् घी बन कर अग्नि की लपटों को और अधिक प्रचंड कर रही है। पूँछ को लपेटने में इतना कपड़ा, तेल और घी लगा कि नगर में कपड़ा, तेल और घी नहीं रह गया। वानर के शरीर का एक भी रोम नहीं जला, पूंछ का बाल भी बांका नहीं हुआ। होता भी कैसे! जिन रामचंद्रजी के प्रताप से समुद्र गाय के खुर के बराबर हो जाता है, अग्नि में शीतलता आ जाती है उनका दूत भला 'ताप' से कैसे जल सकता है? ऐसे प्रभुता सम्पन्न प्रभु के अभयहस्त का आश्रय जिसे प्राप्त हो, उसके लिये ताप, पाप और माया की सम्भावना ही नहीं रहती। हनुमानजी ने लंकारुपी गम्भीर वन को, जो जलने योग्य नहीं था को निःशंक जलाया। 'हनुमानबाहुक' में तुलसीदास ने हनुमानजी की इस विशेषता को 'गहन-दहन-निरदहन-लंक' कहा है। राक्षस मारे, लंका दहन किया, अग्नि में असंख्य जीव भस्म हो गये, सिंहिनी को मार दिया, लंकिनी को अधमरा कर दिया, भयंकर गर्जना से राक्षस स्त्रियों के गर्भ गिर गये। हनुमानजी ने जो किया है क्या उसे पाप कर्म कहना उचित होगा? परमार्थ की राह में जो बाधा उत्पन्न करता है उसके साथ ऐसा ही व्यवहार होना चाहिये। जिसके सिर पर प्रभु श्रीराम के कर-कमलों का प्रताप हो, भक्त भयहारी अभयहस्त का आश्रय हो, आशीर्वाद हो, उसे कैसा पाप!

'हनुमानबाहुक' में भयंकर राक्षसों के मान और गर्व का नाश करने वाले हनुमान को

'जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन' कहा गया है। लंका-दहन के बाद पुनः लघुरुप धारण कर हनुमानजी भक्ति माता के पास गये और हाथ जोड़ कर उन्हें प्रणाम किया। उन्हें समझा कर बहुत प्रकार से धीरज दिया और पहचान के लिये सहिदानी मांगी। माता ने अपनी चूड़ामणि उतार कर उन्हें दे दी तो पुनः उनके चरण-कमलों में सिर नवाकर प्रभु श्रीराम के पास गमन किया। सीतामाता द्वारा दी गई चूड़ामणि में भी एक संदेश छिपा हुआ है। सीतामाता अपनी शिरोमणि भेज कर प्रभु श्रीराम को अवगत करा रही हैं कि मरे ा शीश आपके हस्तारविंद की छाया को छोड़ कर और कोई दूसरा आश्रय नहीं रखता, दूसरा आश्रय स्वीकार नहीं कर सकता। आपके कमल-पाणि की छाया ही मेरे जीवन का आधार है।

हनुमान धैर्य की प्रतिमूर्ति बन कर भक्ति माता से मिले और उन्हें

धैर्य प्रदान कर वापस लौट आये। लंका से वापस लौटने के बाद हनुमान सीधे ही प्रभु श्रीराम से नहीं मिले। बिना आज्ञा राक्षसों का वध व लंका-दहन से प्रभु नाराज हो सकते हैं यह सोच कर उनसे नहीं मिले हों, ऐसा हो ही नहीं सकता। विनम्र एवं निरभिमान हनुमान ऐसे सोच ही नहीं सकते। क्योंकि उन्होंने परिस्थितियों के अनुसार ही सौंपे गये दायित्व में परिवर्तन किया था। विनम्रता की मूर्ति ने सुग्रीव, अंगद और जामवंतजी को शीश नवाकर लंका के लिये प्रस्थान किया था। रामदल के इन वरिष्ठों को पूर्ण सम्मान प्रदान करने के लिये वे सबसे पहले इन्हीं से मिले और सारी जानकारी इन्हें दे दी। हनुमानजी ने अपनी यात्रा का जो विवरण इन्हें सुनाया था वही विवरण जामवंतजी ने प्रभु श्रीराम को सुना दिया। हनुमान प्रभु श्रीराम से मिलते हैं। भक्ति माता से सम्बन्धित सम्पूर्ण जानकारी देने के बाद उन्हें

माता द्वारा दी गई सहिदानी (चूड़ामणि) सौंप देते हैं।

श्रीराम हनुमान से पूछते हैं, 'तुमने इतना महान कार्य कैसे किया?' हनुमान कहते हैं 'यह सब आपका ही प्रताप है। इसमें मेरी प्रभुता कुछ भी नहीं, यही परम सत्य है।' प्रभु कह रहे हैं, 'हे हनुमान! तुमने मुझ पर जो उपकार किया है उससे मैं कभी उऋण नहीं हो सकता।' प्रभु के वचन सुन कर निरभिमान हनुमान उनके चरणों में गिर गये। जब विभीषण प्रभु श्रीराम के पास आये तो रावण ने भेद लेने के लिये उनके पीछे दूत भेजे। लंका पहुँच कर दूत रावण से कहते हैं, कि श्रीराम की सेना का सौ करोड़ मुखों से भी वर्णन नहीं किया जा सकता है। साथ ही यह भी बताते हैं कि - 

जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थारे ा।। रा.च.मा. ५/५४/७

जिसने लंका नगर को जलाया और आपके पुत्र अक्षय कुमार को मारा, उसका बल तो सब

वानरों में थोड़ा है।

रावण-अंगद संवाद हो रहा है। रावण श्रीराम की सेना के सभी वीरों की निन्दा कर रहा है, लेकिन जो वानर यहाँ पहले आया था, जिसने लंका-दहन किया था वह महान बलवान है। इस पर अंगद कहता है-

सत्य नगरु कपि जारेउ बिनु प्रभु आयसु पाइ।

फिरि न गयउ सुग्रीव पहिं तेहिं भय रहा लुकाइ।। रा.च.मा. ६/२३क

क्या सचमुच ही उस वानर ने प्रभु की आज्ञा के बिना ही तुम्हारा नगर जला डाला? उसी डर से वह लौट कर सुग्रीव के पास नहीं गया और कहीं छिप गया। तुम जिसे बलवान कह रहे हो, योद्धा कह कर सराह रहे हो वह तो सुग्रीव का छोटा सा हरकारा है। उसको तो हमने केवल खबर लेने के लिये भेजा था। भला वह छोटा सा, सीधे-सरल स्वभाव का वानर क्या इतनी बड़ी लंका जला सकता है?

हनुमान ने कभी अपने मुंह से खुद की बड़ाई नहीं की, सबकी सेवा करते रहे। प्रभु श्रीराम के कार्य के लिये हमेशा तत्पर रहे, दूसरे वानरों की तरह गर्जन-तर्जन में सम्मिलित नहीं हुए। बहुत ही सीधे-साधे, अत्यन्त विनम्र और निरभिमान स्वभाव के कारण अंगद ने भी इन्हें इतना महान कार्य करने वाला नहीं समझा। सभी मेरी तारीफ करें, चारों ओर मेरा डंका बजे, विनम्र हनुमान ऐसा कभी सोच भी नहीं सकते। हनुमान हमेशा मान की अवज्ञा करते रहे हैं। मान की उपेक्षा करने वाले हनुमान के साथ 'मान' का रहना शायद गोस्वामी तुलसीदास जी को भी बहुत कचोट रहा है- उभयभाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।

जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समते ।। रा.च.मा. ५/४४

भयभीत विभीषण प्रभु श्रीराम की शरण में आये हैं। कृपा के धाम श्रीराम ने हंस कर कहा-'दोनों ही स्थितियों में उन्हें ले आओ।' तब हनुमान सहित सुग्रीव जी कृपालु श्रीराम की जय हो कहते हुए चले।

यह समय सत्संग का है। एक रामचरणानुरागी संत को दूसरे रामचरणानुरागी संत से पुनः मिलने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। इस सत्संग के समय निरभिमान हनुमान 'मान' लेकर क्या करते। गोस्वामी तुलसीदासजी ने यहां अपने उत्कृष्ट लेखन द्वारा हनुमान नाम को सिर्फ 'हनू' लिख कर, उन्हें गौरवान्वित किया है। कहते हैं, संसार में सबसे अधिक शक्तिशाली हनुमान ही हैं। क्या यह कथन सत्य पर आधारित है? कथन तो सत्य है, लेकिन हनुमानजी की शक्ति महान नहीं है। उनकी भक्ति और विनम्रता के कारण शक्ति को महानता प्राप्त है। सच्चे बलवान का प्रमुख आभूषण विनम्रता ही है। शक्तिशाली विनम्रता त्याग दे और उसे दर्प हो जाय तो वह रावण बन जाता है, अन्यायी अत्याचारी बन जाता है। सच्चा बलशाली निर्भीक होता है। अपने इन गुणों के कारण ही वे रावण के दरबार में निःशंक प्रवेश करते हैं। अपने स्वामी के कार्य को पूर्ण करने के लिये बंधन स्वीकार करते हैं। रावण और अन्य राक्षसों द्वारा किया गया अपमान, अनादर, गाली-गलौज, दुत्कार, लात-घूँसे सहन करते हैं। लेकिन उन्हें देहाभिमान नहीं है। बाँधे गये, अपमानित हुए, बुरा नहीं माना। उनके लिये तो स्वामी का कार्य ही सर्वोपरि है। प्रभु श्रीराम की छोटी से छोटी सेवा करने में भी किंचित्मात्र संकोच नहीं, हमेशा उत्साह से भरे, कर्तव्यच्युत होना तो जानते ही नहीं। जीवन में कर्तव्य पालन ही उनका मुख्य ध्येय है। रावण ने भी कहा है, बंदर में भी यह बड़ा गुण है कि जो उसे पालता है उसका वह अनेक उपायों से भला करने की चेष्टा करता है। बंदर तो धन्य है जो अपने मालिक के लिये लाज छोड़ कर जहां-तहाँ नाचता है। नाच कूद कर, रिझा कर, मालिक का हित करता है। यह उसके धर्म की निपुणता है। इस व्यंगात्मक भाषा का उपयोग रावण ने लौकिक बंदर के लिये किया है। बंदर की जिस धर्म निपुणता की बात रावण ने कही है, उसे ध्यान में रख कर प्रभु की आदर्श सेवा करने के लिये ही शायद भगवान रुद्र ने कपियोनि में रुद्रावतार हनुमान बनना उचित समझा होगा। गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं, महापुरुष उसी शरीर का आदर करते हैं जिससे भगवान की सेवा और भक्ति हो सके। सभी विद्याओं के निधान, महातपस्वी, महाप्रतापी, महापराक्रमी, कामरुप, कामचारी, नीति तेजस्वी एवं शौर्य, दक्षता, प्रज्ञा, धैर्यनीति, प्रभाव एवं भक्ति से सम्पन्न हैं हनुमान, जिनका जन्म राम कार्य-साधन के लिये ही हुआ है। प्रभु श्रीराम, हनुमान को गले लगाकर कहते हैं, 'मैं मुक्ति, भुक्ति और भक्ति भी देता हूँ किन्तु

हृदय किसी को नहीं देता, सो वह मैं तुम्हें देता हूँ।'

धन्य हैं सेवा-भावी हनुमान!

दास्य भक्ति का आदर्श हैं हनुमान!

सेवक और सैनिक का संयोग है हनुमान!

भक्ति और शक्ति का सुभग संगम है हनुमान!

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