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लौट के बुद्धू घर को ही आने हैं

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डॉ. दीपक आचार्य

 

बहुत पुरानी कहावत है - लौट के बुद्धू घर को आए। सुबह का भुला शाम को घर लौट आए तो भुला नहीं कहा जाता।

तकरीबन इसी तरह की बुद्धूगिरि हर इंसान के जीवन में एकाधिक बार तो आती ही आती है। यह अलग बात है कि हम लोग कभी यह स्वीकारते नहीं कि हम भी कभी बुद्धू थे, रहे हैं या हैं अथवा हमारी बुद्धू बनने की स्थिति भी कभी आ सकती है।

संसार का यह शाश्वत सत्य है कि जिनमें बौद्धिकता लेश मात्र भी है वे कभी न कभी बुद्धू बनते ही हैं। खुद न बनें तो दूसरे लोग उन्हें बुद्धू बना ही जाते हैं।

बुद्धू बनने और बनाने का संसार का यह बहुत पुराना शगल रहा है। हर कोई अपने काम निकलवाने और दूसरों को हर प्रकार की प्रतिस्पर्धा में पछाड़ने के लिए बुद्धू बनाने के धंधे में माहिर होना चाहता है।

कुछ लोग सिद्ध हो जाते हैं, बहुत सारे जिन्दगी भर नौसिखिये ही रहते हैं और हम जैसे लोगों की तो इतनी अधिक और अपार भीड़ है कि औरों को बुद्धू बनाने की बजाय हर  बार खुद ही हद दर्जे के बुद्धू बनते रहे हैं और वह भी इतनी बार कि हर कोई इस मामले में हमारा स्मरण करना नहीं भूलता।

लोग आते हैं हमें बुद्धू बना कर अपना काम निकलवा कर चले जाते हैं। फिर नए-नए लोग नई-नई शक्ल सूरत और आकर्षक अदाओं से लक-दक कर आते हैं, भरमा कर चले जाते हैं और हर बार हम लोग अपने आपको ठगा सा महसूस करते हुए कभी भाग्य को कोसते हैं कभी हमारी बौद्धिक क्षमताओं को। और कभी कभार यह सोचकर ही सुकून पा लिया करते हैं कि चलो अच्छा हुआ, खुद ही बन गए, वरना भगवान के घर जाकर क्या जवाब देते।

तरह-तरह के बुद्धूओं के बनने और बनाने के मामले में मशहूर मौजूदा दौर में हममें से कोई भी शायद ही ऎसा छूटा होगा कि जो कभी न कभी बूद्धू न बना हो। कुछ लोग एकाध बार में ही जबर्दस्त बुद्धू बन जाते हैं। हम जैसे बहुत सारे लोग जिन्दगी भर किश्तों-किश्तों में बुद्धू बनते रहते हैं।

लोग भी इतने बड़े शातिर हैं कि एक बार में ही उनका पेट नहीं भरता। वे जिन्दगी भर हमें बुद्धू बनाने के अवसरों की तलाश में लगे रहते हैं और जहाँ मौका मिलता है बड़े ही प्रेम से हमें बुद्धू बनाकर चले जाते हैं।

तिस पर जमाने भर में डंका यों बजाते हैं कि हम जैसे सीधे और निहायत सरल लोगों को बुद्धू बनाकर उन्होंने कोई बहुत बड़ा ऎसा रण  जीत लिया हो जो कि बीतें युगों में बड़े-बड़े सम्राट भी नहीं जीत पाए हों।

बुद्धूओं के मामले में कोई भी निश्चित नहीं है कि वे गए हैं तो कब पटरी पर या घर लौटेंगे। पर इतना गहरा और पक्का विश्वास सभी को है कि ये बुद्धू चाहे कितने फिसल गए हों, कहीं भी फिसल गए हों, किसी के भी हो लिए हों, किसी भी मोह या आकर्षण के आगोश में खो गए हों, एक न एक दिन लौटेंगे जरूर। इसके बगैर इन बुद्धूओं का स्वाभाविक और आसान मरण संभव है ही नहीं। मृत्यु से पूर्व एक बार तो हर जीवात्मा को सद्बुद्धि आनी ही आनी है।

इन बुद्धूओं का लौटना ही समाज और संसार में आशाओं का संचार करता रहा है। बुद्धूओं की एक बहुत बड़ी प्रजाति उन लोगों की है जो कि बसी-बसायी गृहस्थी और सब कुछ सामान्य होते हुए भी न जाने किस घड़ी में किसी आकर्षक मोहपाश में ऎसे फंस जाते हैं कि वहाँ से निकलना इनके लिए संभव नहीं दिखता।

इन्हें निकालने के भी सारे प्रयास नाकारा ही साबित होते हैं।  पर बुद्धू लोग वहाँ भी पूरे समय टिक नहीं पाते। एक न एक दिन आकर्षण, चकाचौंध और मोहपाश के सारे ताने-बाने टूट कर बिखर जाते हैं। मोह, काम और वासना के सारे के सारे स्वप्न महलों को एक न एक दिन ढहना ही है। कहीं जल्दी ढह जाते हैं, कहीं बहुत देर से।

तब इन बुद्धूओं का संसार के सनातन सत्य का अहसास होता है और वे फिर उसी दिशा में लौटने लगते हैं जहाँ से निकल भागे थे। अधिकांश लोगों की दशा यही है। दिन-महीने और साल गुजर जाने के बाद माया-मोह भरे दैहिक और भौतिक आकर्षणों के संजालों की असलियत सामने आती है,

ये भगौड़े परायी दुनियादारी निभाने में पिट जाया करते हैं, जिनके भरोसे  ये भाग आए होते हैं वे लोग इनका भरोसा तोड़कर किसी और के हो जाते हैं या कि भगवान को प्यारे हो जाते है। और कुछ न हो पाए तो खुद मोहपाश में फंस चुके लोगों को जमाने की हकीकत का पता चल जाता है और वे फिर अपने-अपने ठिकानों को ही संसार का सच मानकर लौट पड़ते हैं।

लेकिन लौटते-लौटते उजाला मद्धिम होने लगता है और उसकी जगह ले लेती है संध्या या निशा।  बावजूद इन सबके लौटने वाले तमाम किस्मों के इन बुद्धूओं को अन्ततोगत्वा अपने घर पहुँचने का अनिवर्चनीय आनंद प्राप्त हो जाता है और घर वालों को इनके लौट आने का सुकून।

हर घरवाले और घरवाली को पक्का भरोसा होता है इस कहावत पर। आखिर लौट के बुद्धू को घर ही आना है, उसका और न कहीं ठिकाना है, न कोई ठौर।

जीवन में ऎसा कुछ करें कि मोहमाया और सारे आकर्षणों को दूर से देखकर दर्शन का भरपूर आनंद पाने के बाद वहीं ठिठक जाएं, आगे न बढ़ें। दर्शनीय को वरेण्य न बनाएं। अपने कदमों को घर के आस-पास ही बनाए रखें ताकि मर्यादाओं के इन्द्रधनुष हमारी लक्ष्मण रेखाओं का हर बार अहसास कराते रहें। न हमारी विवेकहीनता का खतरा सामने आए, न हमें बुद्धू स्वीकार करते हुए जीवन में किसी को कभी हमारे लौटने का इंतजार न करना पड़े।

हम जहाँ हैं, जिसके हैं उसके प्रति पूरी और पक्की वफादारी जीवन भर निभाएं। जगत भर से भरपूर प्रेम करें मगर आसक्ति और विश्वास हो सिर्फ उनके प्रति जिनके हम कहे जाते हैं अथवा जो हमारे अपने हैं।

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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