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साधना को लेकर दुविधा त्यागें

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डॉ. दीपक आचार्य

 

साधना जीवन का वह पक्ष है जिसके बगैर कोई भी इंसान अपने व्यक्तित्व की पूर्णता को नहीं पा सकता है। उसे अपने जीवन में किसी न किसी की साधना करनी अनिवार्य है ही।

यह साधना ही है जो उसके भीतर समाहित लेकिन सुप्त पड़ी हुई असीम शक्तियों और अपार ऊर्जाओं का जागरण कर दैहिक, दैविक और भौतिक रूप से संतृप्ति और आनंद की चरमावस्था को प्राप्त कराती है जहाँ जाकर इंसान के लिए कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता बल्कि जो कुछ प्राप्त किया है उसका चरम उपयोग और उपभोग करते हुए इनका आनंद पाना ही आत्म आनंद को बहुगुणित करता रहता है।

यह सब प्राप्त करने के लिए आत्म आनंद और अन्तर्मुखी क्रियाकलापों का होना जरूरी है। इसमें जो कुछ किया जाता है वह आत्म जागरण के लिए ही होता है और इसका लोक से कोई संबंध नहीं होता। संबंध है तो सिर्फ आत्मा के आलोक के लिए ही।

यह आनंद पाना हर किसी के बस में नहीं। जिनकी दृष्टि संसार और पदार्थों की ओर बनी रहती है, जिनकी निगाहें बाहर ही बाहर तकती रहती हैं और जिनके लिए बाहरी व्यक्ति, हवाएं और संसाधन ही निर्णायक होते हैं उन लोगों के लिए आत्म जागरण जीवन भर में कभी नहीं हो सकता।

मरने के बाद अगले जन्मों में भी यही दशा बनी रहने पर तो कदापि संभव नहीं। सभी लोग लौकिक और अलौकिक सुख पाना चाहते हैं बहुत कम लोग ही ऎसे होते हैं जो आत्म आनंद या ईश्वर को पाने के लिए प्रयत्न करते दिखें।

संसार में रहने की वजह से सांसारिक व्यापार में हम चाहे कितने लगे रहते हैं, इन सांसारिक सफलताओं को पाने और अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हम सभी लोग अपने किसी न किसी भगवान या ईष्ट देव की पूजा-आराधना और स्मरण करते ही हैं।

इससे हमारे भीतर का यह विश्वास दृढ़ होता है कि कोई ऎसी अदृश्य शक्ति है जरूर जो हमारी सहायता करती है और हमारे सोचे हुए कामों को पूरा करने-कराने में किसी न किसी तरह से मदद जरूर करती है।

वस्तुतः यह सब जीवात्मा का अपना आत्मबल, आत्मिक शक्तियां और आभामण्डल करता है लेकिन विश्वास जमता है साधना से ही। इसीलिए साधना को आत्म जागरण का माध्यम कहा जाता है। यही साधना आगे चलकर ‘अहं ब्रह्मास्मि ’ का भान तक करा डालती है।

  होता यह है कि साधना से हमारा अपना ही जागरण होता है, इसमें किसी भी प्रकार की कोई बाहरी शक्ति या तत्व कोई काम नहीं करता। हर जीवात्मा ईश्वर का अंश है और इस नाते  हम जो भी साधना करते हैं वह अपने आप में अपने भीतर विद्यमान परमात्मा की ही साधना है जिसका कि दर्शन और अनुभव करने के लिए जागरण जरूरी है। जागरण नहीं होने तक यह ईश्वरीय तत्व सुप्तावस्था में ही पड़ा रहता है। कई बार जन्म जन्मान्तरों की साधना के बाद इसके जागरण का मार्ग प्रशस्त होता है। 

इस परम ईश्वरीय तत्व के जागरण के लिए मूलाधार से लेकर सहस्रार तक विद्यमान सभी चक्रों का भेदन जरूरी है ।  इसके लिए कई परंपराएं प्रचलित रही हैं। इनमें सर्वाधिक प्रचलित और सहज-सरल पद्धति है नित्यकर्म और वंश परंपरा के अनुरूप निर्धारित पूजा क्रम का पालन करते हुए निरन्तर नाम स्मरण और जपसाधना।

इसका समानान्तर फायदा यह होता है कि एक तरफ तो नित्यकर्म के अनुकरण से शरीर, मन और मस्तिष्क की नियमित शुद्धि होती रहती है और पापों का शमन होता रहता है। दूसरा नित्यकर्म के साथ ही जप या नाम स्मरण से मन निरन्तर ईश्वर में लगा रहता है और इस कारण से स्वभावतः सांसारिक ऎषणाओं, फालतू के विचारों और हीन सोच से दूर रहता है।

इसका दोतरफा फायदा जीवात्मा को प्राप्त होता है। साधना की इन तमाम स्थितियों से गुजरते हुए अधिकांश लोगों को अपने साधनाकाल के दौरान कुछ प्राप्त न होने अथवा साधना के आशानुकूल परिणाम प्राप्त नहीं होने का अंदेशा या मलाल हमेशा बना रहता है और इस वजह से लोग अपनी साधनाओं को कुछ-कुछ समय बाद बदलते रहते हैं। कुछ लोग परिणाम नहीं दिख पाने की स्थिति में हताश और निराश होकर साधना का परित्याग कर देते हैं और काफी सारे लोग दुःखी, उदासीन और आत्महीन जीवन जीने लगते हैं।

यह स्थिति इसलिए आती है जब हम साधना को लेकर सभी प्रकार के ज्ञान और ऋषियों के अनुभवों से सीख नहीं लेते बल्कि जो मन में आए वैसा करने  लगते हैं अथवा किसी ढोंगी पण्डित, लालची और धूर्त बाबा या किसी अधकचरे मांत्रिक, तांत्रिक या ज्योतिषी के कहने में आकर कर लिया करते हैं।

हम सबसे पहले यह तय कर लें कि हमें कौनसे देवी या देवता दिल से पसंद हैंं। इसका जो उत्तर आए उन्हीं की साधना जीवन में अपनानी चाहिए क्योंकि आम तौर पर इंसान उसी देवी या देवता की साधना करता है जो उसने पूर्व जन्म में कर रखी हो अथवा आत्मा की आवाज से पता चले। अपनी पसंद के देवी या देवता की साधना-आराधना शीघ्र फलदायी होती है।

हममें से कई लोगों की इच्छाएं अलग-अलग होती हैं और उन्हीं के अनुसार हम पृथक-पृथक देवी-देवताओं की साधना-आराधना आदि करते हैं, उनके लिए अलग-अलग दीये-अगरबत्ती जलाते हैं और दिन में काफी कुछ समय बहुत सारे देवी-देवताओं के नाम भेंट चढ़ा दिया करते हैं। बावजूद इसके हम अपनी साधना में न सफल हो सकते हैं , न सफलता मिल ही सकती है।

सभी देवी-देवता एक ही परम सत्ता से जुड़े हुए हैं और केवल स्वरूप भिन्नता है। इनमें अन्तर करना ही साधना की विफलता का पहला अवरोध है। इसलिए अपने ईष्ट और अन्य देवी-देवताओं में किसी भी प्रकार का भेद न रखें बल्कि सभी को एक ही मानें। यह अनन्य भाव आ जाना सिद्धि का प्राथमिक लक्षण है। सभी को मानें, दर्शन व स्मरण करें व पूजें मगर ईष्ट का सर्वाधिक स्मरण करते रहें।

हर देवी-देवता हर कार्य करने में समर्थ हैं। इसलिए अलग-अलग कामों के लिए अलग-अलग देवी-देवताओं को परेशान न करें बल्कि एक से ही सारे काम साधें। देवी या देवता वही काम करते हैं जो साधक के मन-मस्तिष्क में संकल्प उठते हैं। जिसका जैसा संकल्प होगा वैसा काम होगा।

एक ही रास्ते को पकड़ें और उसके सहारे साधना में सफलता प्राप्त करते रहें। यह भी स्मरण रखें कि अपने ईष्ट देव या ईष्ट देवी की साधना मात्र से सभी देवी-देवताओं की साधना हो जाती है।  साधना में सफलता का इससे बड़ा और कोई सूत्र है ही नहीं।

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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दीपक जी आपके इस लेख से बहुत बड़ी दुविधा दूर हो गयी !
बहुत बहुत धन्यवाद
जयश्रीराम

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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