बुधवार, 22 जुलाई 2015

रुठी प्रकृति अब नहीं मानने वाली

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डॉ. दीपक आचार्य

 

कहीं भीषण सूखा, तपन, उमस और उफ ये कैसी गर्मी ! बिना पंखे, कूलर और एयरकण्डीशण्ड के जीना हराम। दुनिया अब दो तरह के लोगों में विभक्त हो चुकी है। एक एसी वाले हैं और दूसरे बिना एसी के।

एसी वालों को पता ही नहीं है कि बाहर क्या हो रहा है, कितनी कुछ गर्मी है, कितने अभावों का ताण्डव है।

इन्हें यह भी नहीं पता कि आम लोग कैसे हैरान-परेशान हैं।

इन लोगों की दुनिया सबसे निराली है। घर में एसी, दफ्तर, दुकान और प्रतिष्ठान में एसी, वाहन में एसी। ऎसे में गर्मी से इनका पाला पड़े तो जानेंं कि जमाने भर में क्या कुछ हो रहा है।

प्रकृति भी कितनी अजीब होती जा रही है। कहीं भीषण गर्मी का कहर है। कहीं बादल फट रहे हैं, भयानक बाढ़ की त्रासदी ने जनजीवन को अस्तव्यस्त कर दिया है और कहीं तबाही का मंजर सामने आ रहा है।

कभी नदियाँ उफन आती हैं, कभी समन्दर अपनी सारी मर्यादाओं को जानें कहाँ छिपा कर रौद्र रूप धारण कर सामने आ जाता है।

गर्मी और बारिश के कहर के साथ सर्दी का भी महा प्रकोप दुनिया के कई हिस्से झेल रहे हैं। फिर रह रहकर आने वाले भूकंपों ने जीना हराम कर दिया है।

प्रकृति पहले भी इतनी ही विकराल हो जाया करती थी लेकिन वह भी अन्तराल में।

अब सब तरफ प्रकृति ने इंसानों और इंसानी दुनिया से मोह तोड़ लिया है और अपनी पर उतर आयी है। पिछले कुछ बरस से तो प्रकृति महाकाल का काम करने लगी है।

हाल के वर्षों में प्रकृति का हमसे जो मोह भंग हुआ है उसका कारण जानने की कोशिश हमने कभी नहीं की बल्कि हम अपने स्वार्थों के लिए धरा को रौंदने लगे हैं, शोषण करने लगे हैं और मनमाने तरीके से उपयोग और उपभोग करने लगे हैं। 

धरती हम सभी धरतीवासियों के लिए है और मातृस्वरूप में हम सभी का पालन करती रही है। लेकिन जब से हमने मर्यादाएं छोड़ दी, मातृ महिमा को भुला दिया तभी से प्रकृति का यह क्रूर रूप हमारे सामने है।

पृथ्वी धर्म, सत्य और न्याय पर टिकी हुई होती है लेकिन जैसे ही इनमें कमी आने लगती है, पृथ्वी का भार बढ़ जाता है और उसका डगमगाना शुरू हो जाता है। 

आज सभी लोग गर्मी, सर्दी और बारिश के बगैर जी भी नहीं सकते, और थोड़ी सी अधिकता हो जाए तो उसे कोसने भी लगते हैं।

बहुत सारे लोग यज्ञ-यागादि करते हैं मगर उसका भी कोई फल सामने नहीं आ पा रहा है। आए भी कैसे, हम जो कुछ कर रहे है। वह भगवान के लिए नहीं, बल्कि लोगों को दिखाने, तस्वीरों और खबरों में बने रहने के लिए कर रहे हैं और अपने आपको विश्व कल्याण का प्रहरी सिद्ध करने पर तुले हुए हैं।

धरती का कर्ज चुकाए बिना धरती से हम सभी यह अपेक्षा करें कि धरती मैया हमारा निर्बाध और सुकूनदायी पालन करेंगी, यह नहीं हो सकता।

धरती सहनशीलता और सहिष्णुता का दूसरा नाम है, यह एक सीमा तक सब कुछ सहती है लेकिन हम तो इससे भी आगे बढ़ गए हैं। और अब हम प्रार्थना करें कि बारिश, सर्दी या गर्मी दे या रोके, यह किसी काम की नहीं।

धरती पुरुषार्थ चाहती है। आज वह पुरुषार्थ रहा नहीं। हम पसीना बहाना नहीं चाहते, हम बिना कुछ मेहनत किए पाना और जमा करना चाहते हैं।  धरती को इस रौद्र रूप में लाने के लिए हम सभी लोग जिम्मेदार हैं जो अपने स्वार्थ के लिए झूठ बोलते हैं, पाप करते हैं, धर्महीन आचरण करते हैं, हिंसा और क्रूरता से पेश आते हैं और वे सारे काम पूरी बेशर्मी के साथ करते हैं जिन्हें मानवता की हत्या ही कहा जा सकता है।

अपनी साम्राज्यवादी और पाशविक सोच को सामने रखकर हम रोजाना कितने सारे लोगों को दुःखी करते हैं, ठगते हैं और शोषण करते हैं। 

हममें से बहुत सारे लोग रोजाना मानसिक और प्रत्यक्ष हिंसा करते हैं। आखिरकार इतने भीषणतम पापों के भार से दबने वाली धरा अब क्यों छोड़ेगी हमें।

हमने प्रकृति की दया,कृपा, सहनशीलता और स्नेह का जितना दुरुपयोग हाल के वर्षों में किया है उतना पिछली सदियों में नहीं हुआ। यह दुस्साहस हमारे पुरखों ने भी कभी नहीं किया जितना हम कर रहे हैं।

प्रकृति और पंच तत्वों के प्रति हमारे मन में जब तक आदर-सम्मान का भाव बना रहा, तत्वों की पूजा करते रहे, सूर्य और चन्द्र को प्रत्यक्ष देव के रूप में स्वीकार कर उनका आराधन करते रहे, तब तक प्रकृति ने हमें पुत्र की तरह पाला-पोसा और पीढ़ियों के रूप में हमारे अस्तित्व और आनुवंशिक थातियों को बनाए रखा।  जहां नीति, धर्म और सत्य का आश्रय छीन जाएगा, अपूज्यों की पूजा होगी, पूजने योग्य लोगों का अनादर होगा, वहाँ इस प्रकार की स्थितियां सामने आएंगी ही।

साफ कहा गया है - अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूज्यानां तु व्यतिक्रमः। त्रीणि तत्र प्रवर्तन्ते दुर्भिक्षं मरणं भयम्।

प्रकृति को दोष न दें, अपने आपको सुधारें, खुद के भीतर झाँकें। क्योंकि जैसा पिण्ड में परिवर्तन होगा वैसा ही ब्रह्माण्ड में परिवर्तन दिखने लगेगा। दोष प्रकृति का नहीं, हमारा अपना है। एक बार थोड़ी सी फुरसत निकाल कर गंभीरता से सोच लें, अपने आप दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।  पर जो कुछ सोचे ईमानदारी के साथ।

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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