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काटने दौड़ते हैं ये आदमी

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डॉ. दीपक आचार्य

 

आदमी का नाम लेते ही हमारी आँखों में शालीन, सभ्य, सुसंस्कृत और धीर-गंभीर व्यक्ति की कल्पना साकार हो उठती है। आदमी होने का मतलब ही यह है कि जो उससे मिलता है उसे प्रसन्नता होती है, अपनत्व का भाव दिखता है और बार-बार मिलने की इच्छा होती है।

आदमी के रूप में इस प्रकार की कल्पना कुछ वर्ष पहले जरूर की जा सकती थी, अब नहीं। अब आदमी का नाम लेते ही कई सारी शंकाएँ उभर कर सामने आ जाती हैं। पता नहीं आदमी कैसा होगा। आदमी होने पर भी आदमियत होगी भी कि नहीं।

कहीं ऎसा तो नहीं कि आदमी मिलना चाहे ही नहीं, मिलने पर तवज्जो दे या नहीं, कहीं मुँह फिरा या फुला न ले, कुत्ते की तरह भौंकना और गुर्राना शुरू न कर दे, चिल्ला कर भगा न दे, घण्टों बैठे रहो, तब भी मिलने ही न बुलाये, प्रतीक्षा ही कराता रहे, कुछ अनाप-शनाप न बक दे, क्रूर और हिंसक जानवरों की तरह बर्ताव न करने लगे ..... आदि-आदि।

पता नहीं हाल के दशकों में आदमी में ये जाने कैसा बदलाव आ गया है कि कोई आदमी को आदमी मानने तक को तैयार नहीं है, कोई आदमी को आधा-अधूरा या दस-पचास ग्राम आदमी मानने लगा है। आदमी के बारे में हाल के वर्षों में जो शंकाएं घिर गई हैं वैसा अब तक नहीं हुआ है।

पहले आदमी के हाव-भाव और शक्ल-सूरत को देख कर भाँपा जा सकता था कि कौन कैसा है। अब आदमी इतना अधिक दोहरा-तिहरा और कई गुणा चरित्र वाला बहुरूपिया हो गया है कि किसी के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता कि कौन आदमी कैसा है, उसका स्वभाव, कर्म और व्यवहार कैसा है। 

अब तो एक जगह और एक ही बाड़ों में काम करने वाले आदमियों में भी रात-दिन का अंतर देखा जाता है। एक ही परिवार के आदमियों में फर्क दिखता है। एक ही बिरादरी के आदमियों के चरित्र और व्यवहार में इतना अधिक अंतर होता है कि कुछ कहा नहीं जा सकता।

आदमी अब आदमी के रूप में नहीं बल्कि उसके विचित्र और अमानवीय स्वभाव तथा कुकर्म से पहचाना जाने लगा है।  एक जमाना था जब जंगली जानवरों के भय से आदमी अपने साथ आदमी को रखता था, आदमी को आदमी से संरक्षित होने का पक्का अहसास था।

जब से आदमियों ने आदमियों छोड़ दिया है, आदमियों के भय से जानवरों को अपने साथ रखना शुरू कर दिया है, अधिकांश समय कुत्ते-बिल्लियों और दूसरे जानवरों के साथ रहने का आनंद पाने लगा है, तब से हालात और भी अधिक खराब हो गए हैं। जानवरों के तकरीबन सारे स्वभाव, हिंसक व्यवहार और आदतें हम आदमियों ने ले ली हैं और आदमियत को धीरे-धीरे भुला दिया है।

इंसानियत का हाल के वर्षों में जो हश्र हुआ है उसने पूरी दुनिया में आदमियों की पूरी की पूरी जात को शंकाओं के घेरों में डालकर संदिग्ध घोषित कर दिया है। संसार भर में इन दिनों आदमियों की जमातें जो कुछ कर रही हैं उसे देख नहीं लगता है कि इन लोगों को आदमी की श्रेणी में रखा जा सकता है।

इन आदमियों ने राक्षसों, नर पिशाचों और सभी किस्मों के असुरों को पीछे छोड़ दिया है।  स्थिति इतने तक ही भयावह नहीं है। आदमियों की जात में बहुत सारी श्रेणियां बन गई हैं। आदमी और आदमी के बीच संबंधों की खाई इतनी अधिक बढ़ती चली जा रही है कि एक श्रेणी का आदमी दूसरे को इंसान तक मानने को तैयार नहीं है। न पारिवारिक माहौल रहा है, न माधुर्य भरी कोई आत्मीयता या लगाव।

आदमियों में अधिकांशतः दो-तीन श्रेणियां साफ-साफ बन चली हैं।  जो कुछ बन गए हैं, कहीं जम गए हैं, शक्ति सम्पन्न हो चुके हैं अथवा पूंजीवादी परंपरा का हिस्सा बन चुके हैं, वे और उनके इर्द-गिर्द अर्दली और छत्र लेकर चलने वाले, दिन-रात उनकी परिक्रमा और जयगान करने वाले लोग अपने आपको संप्रभु मान चुके हैं।

वे आदमी को आदमी मानना तक स्वीकार नहीं करते। इन लोगों का मानना है कि दुनिया भर के आदमी उनकी गुलामी के लिए पैदा हुए हैं इसलिए जितना अधिक शोषण किया जाए, वह सब जायज है, जितना अधिक सुनाया जाए, वह अपना अधिकार है, जितना अधिक नुकसान किया जाए, बेगार लिया जाए, शोषण किया जाए, वह सब उनके अधिकारों का ही हिस्सा है।

विभिन्न प्रकार के मार्का वाले शोषकों का बाहुल्य है जो शोषण को अपना एकमेव हथियार मानकर बेखौफ होकर इस्तेमाल कर रहे हैं। इन्हें न ईश्वर का भय है, न किसी और का। सारे के सारे अपनी चवन्नियां चला रहे हैं। बहुसंख्य शोषितों पर चंद शोषकों का आधिपत्य दिखने और मुँह बोलने लगा है।

पता नहीं आदमी जात का अब क्या होने वाला है। खूब सारे आदमी तो हमारे आस-पास से लेकर सर्वत्र ऎसे हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वे हैं ही ऎसे कि कुछ कहा नहीं जा सकता। हमेशा नाक पर गुस्सा चढ़ाए रखते हैं। कोई इनसे मानवीय व्यवहार की उम्मीद नहीं कर सकता। ये लोग हमेशा अपने आपको स्वयंभू घोषित किए रखते हैं। जो इनके पास जाता है उसे काटने दौड़ते हैं।

कुत्ते और साँप भी उन्हीं को काटने दौड़ते हैं जिनसे कोई दुश्मनी हो। पर ये अजीब किस्म के तथाकथित आदमी तो अपने आप में इतने विचित्र हैं कि कभी भी कुछ कर सकते हैं। कभी पागलों की तरह व्यवहार करने लगते हैं, कभी छीना-झपटी करते हैं, श्वानों की तरह बेवजह गुर्राने और भौंकने लगते है। पता नहीं इनके घर वाले इन्हें कैसे बर्दाश्त करते होंगे। ये लोग न अपने घर वालों के हैं न अपने माँप-बाप या कुटुम्बियों के। इन्हें लगता है कि आदमी होने का अर्थ ही है औरों को अपने काबू में रखकर मनमाना शोषण करना और उनके कंधों पर चढ़ कर सवारी का मजा लेना।

आदमियों के स्वभाव में आमूलचूल परिवर्तन के वर्तमान दौर को देखकर यह कहने को विवश होना पड़ रहा है कि हम कहीं अजायबघर की संस्कृति को तो नहीं अपना रहे हैं जहाँ बस्तियों और किसम-किसम के बाड़ों में रहते हुए स्वच्छन्द और उन्मुक्त होकर ऎसे विचरण कर रहे हैं जैसे कि सभी सुविधाओं से सम्पन्न अभयारण्यों में मेहमान के रूप में हमें पाला जा रहा हो। ईश्वर आदमियत को संरक्षित रखे, यही प्रार्थना है।

 

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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