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क़ैस जौनपुरी की हास्य-व्यंग्य कविता - नई-नवेली दुल्हन

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कविता                                         

क़ैस जौनपुरी
नई-नवेली दुल्हन

नई-नवेली दुल्हन को घर में काम बहुत सा था
लेकिन उसका पति जो था पति के नाम पे धब्बा था


काम-धाम कुछ नहीं बस लुंगी पहन के रहता था
उसके बाप की पेंशन पे घर का खर्चा चलता था


सास-ससुर तो खुश थे निकम्मा बेटा सुधर जायेगा
किसे पता था बीवी पाकर और आलसी हो जायेगा


भैंस जैसी सास घर का सभी काम करवाती है
और उसके बाद अपने हाथ-पाँव दबवाती है


धूप में अपनी बहू से मालिश भी करवाती है
दुल्हन पहले सास-ससुर फिर पति के पाँव दबाती है


नई-नवेली दुल्हन घुट-घुट के सहती जाती है
दिन भर मेहनत के बाद थक-हार के सोने जाती है


फिर रात में उसका पतिदेव उसे सारी रात रुलाता है
जो दो ही मिनट में दुल्हन पे मेंढ़क सा मर जाता है


जो आदमी दिन में कुछ न करे उससे रात को क्या होगा
दुल्हन तो बेचारी सहम गयी अब उसका जाने क्या होगा


दुल्हन की पूरी ज़िन्दगी तो हो चुकी थी नरक
मग़र कसम से पड़ा नहीं किसी एक को भी फ़रक


दुल्हन ने कही सब मायके रो-रो और चीख-पुकार,

“देखो तो क्या हुई हालत मेरी इधर है”
मग़र मायके वालों ने हाथ जोड़कर कह दिया,

“बेटी! अब वही तुम्हारा घर है.”
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