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कांचन मृग

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- दयाधर जोशी

असम्भवं हेममृगस्य जन्म

तथापि रामो लुलुभे मृगाय।

.... धियोऽपि पुंसां मलिना भवन्ति।।

श्रीराम जानते हैं कि कांचन मृग का होना असम्भव है फिर भी उन्हें ऐसे मृग के लिये लोभ हो गया। प्रायः विपत्ति के समय बुद्धिमानों की भी बुद्धि मलिन हो जाती है। हजारों वर्ष पूर्व त्रेता युग में लंका के राजा रावण ने सीता हरण के उद्देश्य से मारीच को कपट मृग बनने के लिये कहा। इस कपट मृग का शरीर सोने में मणियों को जड़ कर बनाया गया था। इस कांचन मृग को श्रीराम ने मार दिया। अन्यथा कांचन मृग की सृष्टि न कभी हुई थी और न कभी होगी। लेकिन इस युग में विश्व का हर देश व मनुष्य कांचन मृग के लिये व्यग्रतिव्यग्र है।

भारत की अर्थ व्यवस्था में मानित कांचन मृग एक विशेष प्रकार के चौकोर कागज पर मुद्रित है। इस पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का आकर्षक हास्य मुद्रा युक्त मुख छपा रहता है। इस पर भारतीय रिजर्व बैंक के आर्थिक अधिकारी (गवर्नर) के हस्ताक्षर व मूल्य भी छपा रहता है। इसे मुद्रा, रुपया व Currency Note भी कहते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अपने देशवासियों की दयनीय आर्थिक स्थिति को देख कर बहुत दुःखी हो गये थे। इसे ध्यान में रखते हुए वे पूरे कपड़े तक नहीं पहनते थे एवं भोजन भी आवश्यक न्यूनतम ही करते थे।

महात्मा गांधी एक ऐसे फकीर थे जिन्होंने कभी संन्यास ग्रहण नहीं किया। एक कपड़े से ही अपना तन ढका। यह कपड़ा भी उनके घुटनों तक ही दिखायी देता था। सन्यासी भी पूरे कपड़े पहनते हैं। 'सादा जीवन उच्च विचार' देश के गरीबों की चिन्ता, उनके प्रति करुणाभाव के कारण ही उनके जीवन में अपरिग्रह की भावाना जागृत हुई। कांचन मृग के पीछे भागने वाले लोगों को गांधीजी के विचारों से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये। पौराणिक राक्षस रक्तबीज के शरीर से शस्त्रघात होने पर रक्त की जितनी बूँदें गिरती थी, उनसे उतने ही रक्तबीज पैदा हो जाते थे। ठीक इसी तरह रावणकृत कांचन मृग ने भी आज विभिन्न नामों से अवतार ले लिया है, और विश्व के हर देश में रुपया, डॉलर, रुबल, यूरो, येन, दिरहम, लीरा आदि नामों से भागने वाला मुद्रानोट (Currency Note) बन गया है। यह विडंबना ही है मानव इन नोटों को नहीं नचा रहा है, ये नोट मानव को नचा रहे हैं। अर्थ को सभी अनर्थों का मूल बताते हुए भगवान कहते हैं-

अर्थानामार्जने दुःखमार्जितानां तु रक्षणे।

नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थं दुःखभाजनम्।।

 

धन उपार्जन में दुःख, उपार्जित धन की रक्षा में दुःख, नाश और व्यय होने में दुःख, इस प्रकार दुःख-भाजन बने हुए धन को धिक्कार है। धर्म विरुद्ध अर्थ अर्जन के मूल में पंद्रह अनर्थ छिपे हुए हैं -

(1) चोरी

(2) हिंसा

(3) झूठ बोलना

(4) दम्भ

(5) काम

(6) क्रोध

(7) गर्व

(8) अहंकार

(9) भेदबुद्धि

(10) वैर

(11) अविश्वास

(12) स्पर्द्धा

(13) लम्पटता

(14) जुआ

(15) शराब

कहा जाता है धन की शुद्धि दान से, शरीर की शुद्धि स्नान से, और आत्मा की शुद्धि ईश्वर का भजन करने से हो जाती है। दानं दुर्गतिनाशनम्- धर्मानुकूल अर्जित धन यदि उचित पात्र को दान में दिया जाए तो वह दुर्गति को दूर करता है। लेकिन धर्मविरुद्ध अर्जित धन का दान करने से पुण्य अर्जित नहीं होता, दुर्गति यथावत बनी रहती है।

इस शिक्षा का आदर कोई नहीं करता। सभी देश, प्रदेशों में जनता द्वारा सेवा, व्यापार, उद्योग, कृषि व अन्य साधनों द्वारा जो धन कमाया जाता है और व्यय किया जाता है, सरकार अपने कार्यकलापों के प्रबंधन के लिये उस पर अपना हाथ धर देती है, अर्थात् कर लगा देती है। कर, हाथ को भी कहते हैं और टैक्स (Tax) को भी। इस प्रकार जनता की आय के कुछ निर्धारित प्रतिशत को कर के रुप में प्राप्त कर सरकार अपने शासन-प्रबंध पर व्यय करती है। कांचन मृग कमाने वाले अपनी आय और व्यय के विवरण में हेराफेरी कर न्यूनतम राशि ही सरकार के हाथ में जाने देते हैं। अधिकतम कर चोरी करने के लिये सरकार के साथ धोखा-धड़ी करते हैं और बहुत बड़ी मुद्रा राशियों पर कर नहीं देते हैं। इस प्रकार सरकारी विधि-विधान व प्रक्रिया में गड़बड़ी कर बचायी गई धनराशि को 'कालाधन' (Black Money) कहते हैं। इस उपार्जित धन को कई प्रकार के पर्दों के पीछे छिपा कर रखा जाता है। यहां तक कि आधिक्य हो जाने पर हजारों मील दूर समुद्र पार के देशों के बैंको में सुरक्षित रख कर व अन्य तरीकों से इसे सरकार के हाथों (कर) में जाने से बचाया जाता है। बाद में इसी कांचन-मृग को बहुत ही गुप्त तरीकों से व्यापार आदि में ठेला जाता है। इस प्रक्रिया को 'धुलाई' (Laundering) कहते हैं।

इस तरह की गड़बड़ी करने वालों को पकड़ने और उन्हें कड़ा दण्ड देने के लिये सरकार द्वारा अलग से आर्थिक अपराध शाखा बनाई जाती है। हेरा-फेरी के ऐसे मामले समय-समय पर उजागर होते रहते हैं। फलतः सच्चाई, सचरित्रता, सात्विकता आदि गुणों का, सीताजी की तरह अपहरण होता रहता है। बुद्धि विचार के बिना कांचनमृग का पीछा करने वाला मनुष्य कितना सुखी है और कितना दुःखी है, इसका उत्तर तो धन उपार्जन करने वाला व्यक्ति ही दे सकता है। जब सभी अधिकतम कांचन मृग अर्जित करने और उसकी रक्षा के उपायों में लग जाते हैं तो देश व विदेश के बाजारों में मुद्रा अधिक और मुद्रा की तुलना में आम जनता के लिये अतिआवश्यक दैनिक उपयोग की वस्तुओं व खाने-पीने की चीजों की बहुत कमी हो जाती है। परिणामस्वरुप चीजों के मूल्य बहुत बढ़ जाते हैं। वर्तमान में विगत चार-पांच वर्षों से यही हो रहा है। पदार्थों के दाम बढ़ते जाते हैं। इस स्थिति को मुद्रा स्फीति (Inflation) कहते हैं। यह निम्न आय वर्ग के लोगों के लिये चिन्ता का कारण बन जाती है। इस विकट परिस्थिति में भोजन, कपड़ा, आवास व बच्चों की शिक्षा के लिये धनराशि जुटाना दुस्तर हो जाता है।

इस विकट स्थिति को आप लोभ-लालच के राजा काल्पनिक कांचन मृग की विजय कह सकते हैं। राष्ट्र के वित्त सलाहकारों व प्रबंधन में संलग्न कर्णधारों का कर्तव्य है कि यथासमय यथायोग्य कार्रवाई कर इसे रोकें। परम आश्चर्य की बात है कि 'लालच बुरी बलाय', संतोषम् परम सुखम्, त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्, अपरिग्रह परमो धर्मः आदि कहावतें बन कर रह गई हैं। इन पर चलने की शिक्षा व प्रेरणास्त्रोत दिखायी नहीं देते । कुछ वर्षों से बेहद कष्टकारी व शक्तिशाली कांचन मृग पैदा हो गये हैं। लॉटरी, जुआ, घुड़दौड़, सिनेमा, खेलों के विश्वकप, सौंदर्य प्रतियोगिताएँ, मॉडलिंग-विज्ञापन, नशीले पदार्थों, अस्त्र-शस्त्र, पशु-पक्षी व मानवों की तस्करी, प्राचीन ऐतिहासिक प्रतीकों व कलाकृतियों की तस्करी आदि कांचन मृग के विकट रुप हैं। इन विकट रुपों के कारण अनुशंसा और उत्कोच के स्त्रोत भी दिनों दिन बढ़ रहे हैं। महान संत कबीर कहते हैं -

साईं इतना दीजिये जा में कुटम्ब समाय। मैं भी भूखा ना रहूँ साधु भूखा न जाय।।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रसिद्ध परम श्रेष्ठ इच्छा थी - 'सबको सन्मति दे भगवान'। पाठक अपनी भावी पीढ़ी को यही सिखाएं, सभी से यही प्रार्थना है। कहते हैं, जिस व्यक्ति के जीवन में संतुष्टि नहीं होती उसका लोक-परलोक बिगड़ जाता है। मनुष्य के लिये सबसे अमूल्य निधि संतोष ही है, और संतोषी ही इस संसार का सबसे सम्पन्न व्यक्ति है। कांचन मृग के पीछे भागने वाले व्यक्ति को जीवन में संतोष नहीं मिल सकता है। यदि संतोष नहीं है तो सब सुख बेकार हैं। 'संतुष्टं सततम् योगी'-गीता में श्रीकृष्ण ने संतोषी को योगी कहा है। कांचन मृग के पीछे भाग कर धनार्जन करने वाले अपने लाभ के लिये गरीब और निम्न आय वर्ग के लोगों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। गास्े वामी तुलसीदासजी ने कहा है -

पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ।।

रा.च.मा. ७/४१/१

दूसरों का हित ही सबसे बड़ा धर्म है और दूसरों को कष्ट पहुँचाने से बड़ा कोई पाप नहीं है। ईमानदारी ही सही धर्म है जो जीवन को खुशहाल बनाती है। बेईमानी से धन उपार्जन किसी काम का नहीं, ऐसा धन अन्ततः दुःख का कारण बन जाता है। मनुष्य धनवान है, लेकिन गुण सम्पन्न नहीं है तो उसे गरीब कहने में संकोच नहीं होना चाहिये। विनय, शील, सदाचार, शौच और संतोष जैसे गुणों से परिपूर्ण व्यक्ति के पास धन नहीं है लेकिन सद्गुणों के कारण वह महान है, धनवान है। अतः प्रत्येक व्यक्ति जीवन में धन की अपेक्षा गुणों को अधिक महत्व देने का प्रयास अवश्य करे।

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