गुरुवार, 2 जुलाई 2015

कहानी - सजा

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डॉ० श्रीमती तारा सिंह

उस रोज भी रेनू ठीक दस बजे , अपनी सहेलियों के साथ, होस्टल से स्कूल पहुँची थी ;बड़ा, विशाल , आसमान से बातें करने वाला स्कूल भवन, नाम था ’नौलक्खा “ । मुख्य द्वार पर चौबीसो घन्टे दो दरवान खड़े रहते थे । पहली मंजिल पर ऑफ़िस और मुलाकाती कमरा था । दूसरी मंजिल पर तीन बड़े आँगन और आँगन के चारो ओर क्लास-रूम थे । लगभग आठ सौ लड़कियाँ विभिन्न राज्यों से यहाँ पढ़ने आती थीं । स्कूल के हाते में विशालकाय फ़ुलवारी था, जिसमें नीबू ,चीकू और नाना प्रकार के फ़ूल लगे हुए थे । सब मिलाकर स्कूल ,स्वर्ग का प्रतिरूप था ।

रोज की तरह, उस रोज भी रेनू ,प्रार्थना में शामिल होने हॉल में गई, जहाँ कभी नौलक्खा राजा अपनी मीटिंग किया करते थे । प्रर्थना खतम हुआ, सभी लड़कियाँ अपने-अपने क्लास-रूम की ओर भागीं । रेनू जातीं, उसके पहले ही प्रिंसिपल ने उसे आठ सहेलियों के साथ, वहीं रूके रहने का फ़रमान सुना दी । रेनू भयभीत , अपनी सहेलियों के साथ वहीं रूक गई । लगभग दश मिनट के बाद एक चपरासी आकर ,एक नोटिस पढ़कर सुनाया , लिखा था ---’ तुम सबों को छुट्टी तक के लिए सजा मिली है । तुमलोग सभी यहीं दिनभर खड़ी रहोगी ।’ यह सुनकर सब सन्न रह गईं । मगर रेनू या रेनू की किसी सहेलियों में इतनी हिम्मत नहीं थी कि जाकर पूछे---’ यह सजा , किस खता पर सुनाई गई है ?’

सजा की खबर स्कूल में आग की तरह फ़ैल गई । लड़कियाँ व टीचिंग स्टाफ़ , सभी आपस में कानाफ़ूसी करने लगे ; लेकिन प्रिंसिपल का फ़ैसला था, कारण जानने की हिम्मत किसी ने नहीं जुटा पाई ।’ रेनू के आत्मसम्मान को चोट लगी । उसने सहेलियों से कहा—’ कभी-कभी बिना किसी गलती की भी सजा मिलती है । जैसा कि गाँधी जी ने कहा था, कि उन्हें भी एक बार बिना गलती की सजा भुगतनी पड़ी थी । यह सुनकर सुधा ( रेनू की सहेली ) हँस पड़ी, बोली --- ’हमलोग गाँधी जी नहीं हैं । इसलिए अपनी सजा की तुलना उनसे कर, जी बहलाने की कोशिश न करें, बल्कि सोचें---’ यह सजा हमें क्यों मिलीं ? रेनू मूर्तिवत सुधा को देखती रही, फ़िर सर झुका ली, मानो जूते पड़ गये हों !

रेनू के आत्म-समर्पण ने सुधा के जीवन को जैसे कोई आधार प्रदान कर दिया । अब तक उसके पढ़ने-लिखने का कोई लक्ष्य न था, न आदर्श था, न कोई व्रत था । लेकिन रेनू का आत्म-समर्पण , सुधा की आत्मा में प्रकाश डाल दिया । वह अपने भविष्य पर नये ढंग से विचार करना शुरू कर दी और उसने मन ही मन तय किया ---’ मुझे पढ़-लिखकर वकील बनना है, जिससे कि मेरी तरह किसी और निर्दोष को सजा नहीं भुगतनी पड़े । ’ सुधा के मुख पर , मैडम की निष्ठुरता को देखकर रेनू सहम गई, उसने दबी आवाज में पूछा----- ’ गोल-गप्पे सा तेरा मुँह क्यों फ़ूल गया ?’

सुधा ने कठोर स्वर में कहा ---- ’ अधिकार की प्रभुता न जाने कितने ही निर्दोष को बंदी बनाते आया । सच---झूठ की छानबीन किये बिना सजा सुना देना , यह कहाँ का कानून है ?’

रेनू खिन्न होकर बोली ---’ हाँ, यह चंगेजी फ़रमान हुआ , लेकिन हमारे बश में है ही क्या ? हम कुछ नहीं बोल सकते, बोलने से ही स्कूल और हॉस्टल दोनों से निकाले जायेंगे ।’

सुधा ---’ रेनू का समर्थन करती हुई बोली ---’ हाँ, चुप रहने में ही भलाई है । फ़िर अपने पैरों को दिखाती हुई बोली ---’ पर ये कितने सूज गये हैं, देखो !’

रेनू आर्द्र होकर बोली --- ’सारा स्कूल मैडम के हुक्म का गुलाम है, हमारा दुख-दर्द कौन सुनेगा ?’

इस प्रकार आग की तरह जलता हुआ भाव, सहानुभूति और सहृदयता से भरे शब्दों से सुधा थोड़ी शीतल होती दिखी । तब रेनू सजल नेत्र होती हुई कही---’ अभी तो टिफ़ीन आवर ही हुआ है, हमलोगों को तीन घंटे और इसी तरह खड़े रहने होंगे ।

ठीक साढ़े चार बजे मैडम का फ़रमान लेकर फ़िर वही चपरासी आया और बताया---’ आपलोगों की सजा खतम हुई । आप लोग जा सकती हैं ।’

हमलोग किसी तरह होस्टल पहुँचे । हमें देखकर मेट्रोन ( जो कि बंगालिन थी ) , को बड़ी दया आई । उसने कहा---’ जाओ ,किचेन में वहाँ से गर्म पानी लेकर पैर धोओ , वरना यह और फ़ूल जायगा । हमलोग गरम पानी से पैर धोकर अपने रूम में जाने लगे, तब उन्होंने रोककर कहा---’कल जब सिनेमा जाने के लिए तुमलोग बस में चढ़ रही थीं, तब अर्चना के माँ-बाप का अपमान क्यों करने गई ? तुमलोगों को पता नहीं कि अर्चना की माँ, मैडम की सहेली है । हमलोग मेट्रोन की बात सुनकर सन्न रह गये । हमलोग, और अपमान---’हमलोग गाँव से आये हैं । डर-डर से जीते हैं, बल्कि अर्चना दीदी कभी कहती है---’ मेरे बेड का चादर बदलो, मेरे बालों में तेल लगाओ, जूते पॉलिश करो । हमलोग रोज कर दिया करते हैं, लेकिन कल स्कूल जाने में देरी हो जाती, लड़कियाँ कतार में खड़ी हो चुकी थीं । इसलिए हमलोग उनसे

बोले ---’दीदी शाम में आकर पॉलिश कर देते हैं ।’ इस पर वे नाराज हो गईं ।

मेट्रोन हमारा वृतान्त सुनने के बाद हम दोनों को रूम में जाने बोलीं और आप ही आप से कही –’जरूरत से ज्यादा खिदमत और खुशामद ने तुम्हारी लियाकत का यह हाल बनाया । यह केवल हुकूमत ही नहीं, हैरानी भी है । उसकी हुकूमत में रोब और गद्दारी भी है ।’

यह घटना 1965 की है । शायद मैडम इस दुनिया में नहीं भी होंगी, लेकिन उनकी तरफ़ से दी गई सजा को याद कर मैं आज भी बेताब हूँ , मैडम के मुख से यह जानने के लिए कि हमें किस बात की सजा मिली ? सोचती हूँ----’ अर्चना दीदी ने तो अपनी तृष्णा शांत करने के लिए हमलोगों के प्रति मैडम के मन में आग लगाई , लेकिन मैडम, अपनी तुच्छ भावनाओं में दबकर ऐसा क्यों किया, इस बात का अफ़सोस मुझे उम्र भर रहेगा ।’

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(ऊपर का चित्र - विजयलक्ष्मी डी. की कलाकृति)

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