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बाल-कहानी - बिल्लियों की बारात

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बिल्लियों की बारात
वैंडा गैग

MILLIONS OF CATS
Wanda Gag

अनुवाद : अरविन्द गुप्ता


एक बूढ़ा आदमी था और एक बूढ़ी औरत थी। वो एक बहुत साफ-सुथरे घर में रहते थे। दरवाजे की जगह को छोड़कर घर के चारों ओर फूलों की एक क्यारी थी। परंतु फिर भी वे खुश न थे। वे बहुत अकेलापन महसूस करते थे।

‘काश हमारे पास अपनी एक बिल्ली होती,’ बूढ़ी औरत ने आह भरते हुए कहा।
‘बिल्ली?’ बूढ़े आदमी ने पूछा।
‘हां, एक प्यारी छोटी और रोएंदार बिल्ली,’ बूढ़ी औरत ने कहा।
‘मैं तुम्हारे लिए जरूर एक बिल्ली लाऊंगा,’ बूढ़े आदमी ने कहा।

फिर वो बिल्ली तलाशने निकल पड़ा।
उसने धूप से ढकी पहाड़ियां पार करीं। वो ठंडी घाटियों में से होकर गुजरा।
वो लगातार चलता रहा। अंत में वो एक ऐसी पहाड़ी पर पहुंचा जो बिल्लियों से एकदम लदी हुई थी।

यहां भी बिल्ली, वहां भी बिल्ली
जहां भी देखो, वहां पे बिल्ली
चीं-चीं, पों-पों, चिल्ला-पिल्ली
लाखों-करोड़ों, बिल्ला-बिल्ली


‘वाह!’ खुशी से बूढ़ा आदमी चिल्लाया।
‘अब मैं सबसे सुंदर बिल्ली को चुनकर घर ले जा सकूंगा!’
फिर उसने एक बिल्ली चुनी। उसका रंग सफेद था।
परंतु जैसे ही वो चलने को हुआ उसे एक काली-सफेद बिल्ली दिखाई दी।
वो भी पहली बिल्ली के समान ही सुंदर थी।
उसने इस बिल्ली को भी साथ ले लिया।


फिर उसे एक रोएंदार, सिलेटी बिल्ली दिखाई दी।
वो भी रंग-रूप में औरों से कोई कम न थी।
इसलिए उसने उसे भी अपने साथ ले लिया।
फिर उसे कोने में एक और बिल्ली दिखाई पड़ी।
उसे इस खूबसूरत बिल्ली को छोड़ कर जाना कुछ ठीक नहीं लगा।
उसने उसे भी साथ ले लिया।


बस तभी उस बूढ़े को एक बिल्ली का बच्चा दिखा
जो काला और बेहद सुंदर था।
‘इसे छोड़ कर जाना तो बहुत शर्म की बात होगी,’
बूढ़े आदमी ने कहा।
उसने उसे भी साथ ले लिया।


फिर उसे एक बिल्ली दिखी जिसकी पीठ पर चीते के
बच्चे जैसी पीली और भूरी धारियां थीं।
‘इसे तो लेकर जाना ही चाहिए,’ बूढ़ा आदमी चिल्लाया
और उसने उस बिल्ली को भी साथ ले लिया।


कुछ ऐसा हुआ कि हर बार जब भी बूढ़ा आदमी अपना सिर उठाता,
तो उसे एक और सुंदर सी बिल्ली दिख जाती।
वो उस बिल्ली को भी साथ में ले लेता।
इसका नतीजा यह हुआ कि अंत में उसने सभी बिल्लियों को साथ में ले लिया।


अब वो वापस घर चला।
वो धूप से ढकी पहाड़ियों ओर ठंडी घाटियों को पार करता घर चला,
जिससे कि वो बूढ़ी औरत को ढेरों सुंदर बिल्लियां दिखा सके।
उन हजारों, लाखों, करोड़ों बिल्लियों को उसके पीछे-पीछे चलते देख बड़ा अजीब सा लग रहा था।


वो एक तालाब के पास पहुंचे।
‘म्याऊं-म्याऊं! हमें प्यास लगी है,’
हजारों, लाखों, करोड़ों बिल्लियां
एक-साथ चिल्लायीं।


‘फिक्र की कोई बात नहीं है, यहां ढेर सारा पानी है,’ बूढ़े आदमी ने कहा।
हरेक बिल्ली ने एक-एक घूंट ही पानी पिया कि पूरा तालाब ही खाली हो गया।


‘म्याऊं-म्याऊं! हमें भूख लगी है,’
हजारों, लाखों, करोड़ों बिल्लियां
एक-साथ चिल्लायीं।


‘इस पहाड़ी पर खूब घास है,’ बूढ़े आदमी ने कहा।
हरेक बिल्ली घास का केवल एक तिनका ही चख पाई कि पहाड़ी की
सारी घास एकदम सफाचट्ट हो गई।


थोड़ी देर में बूढ़ी औरत ने उन्हें आते हुए देखा।
‘अरे!’ वह चिल्लाई, ‘यह तुमने क्या किया?
मैंने तो सिर्फ एक बिल्ली मांगी थी।
पर मुझे तो यहां बिल्लियों की बारात नजर आ रही है।’


यहां भी बिल्ली, वहां भी बिल्ली
जहां भी देखो, वहां पे बिल्ली
चीं-चीं, पों-पों, चिल्ला-पिल्ली
लाखों-करोड़ों, बिल्ला-बिल्ली


‘हम इतनी बिल्लियों को कैसे खाना खिला पाएंगे? बूढ़ी औरत ने पूछा। ‘यह तो हमारा पूरा घर ही खा जाएंगी।’
‘मैंने इस बारे में तो सोचा ही नहीं, बूढ़ा बोला, ‘अब हम क्या करें?’
बूढ़ी औरत कुछ देर सोचती रही। फिर उसने कहा, ‘मुझे मालूम है! हम बिल्लियों को ही निर्णय लेने देंगे कि उनमें से कौन हमारे पास रहेगी।’
‘ठीक है,’ बूढ़े आदमी ने कहा और उसने सारी बिल्लियों को बुलाकर पूछा, ‘तुममें से सबसे सुंदर कौन है?’
‘मैं हूं!’ ‘मैं हूं!’ ‘नहीं, मैं सबसे सुंदर हूं! ‘मैं हूं!’
‘नहीं, मैं हूं! मैं हूं!’ हजारों, लाखों, करोड़ों बिल्लियां एक-साथ चिल्लायीं।
क्योंकि हरेक बिल्ली अपने आपको सबसे सुंदर समझती थी।
फिर सभी बिल्लियां आपस में लड़ने लगीं।


बिल्लियां एक-दूसरे को नोचने-खरोंचने लगीं।
उन्होंने इतनी जोर का शोर मचाया कि बेचारा बूढ़ा आदमी और बेचारी बूढ़ी औरत जल्दी से दौड़कर घर में घुस गए। उन्हें यह सब लड़ाई-झगड़ा बिल्कुल अच्छा न लगा।
परंतु कुछ देर बाद बाहर से आवाज आना बंद हो गई।
तब बूढ़े आदमी और बूढ़ी औरत ने खिड़की से बाहर झांक कर देखा।
उन्हें एक भी बिल्ली नजर नहीं आई!

‘मुझे लगता है कि सारी बिल्लियां एक-दूसरे को खा गई हैं,’ बूढ़ी औरत ने कहा। ‘यह बहुत खराब बात है।’
‘जरा इधर देखो,’ बूढ़े आदमी ने ऊंची घास की ओर इशारा करते हुए कहा। वहां छोटी सी, घबराई हुई बिल्ली की एक बच्ची बैठी थी। उन्होंने वहां जाकर उसे गोद में उठा लिया। वह एकदम दुबली-पतली और देखने में मरियल सी थी।


‘बेचारी, बिल्ली की बच्ची,’ बूढ़ी औरत ने कहा।
‘प्यारी, बिल्ली की बच्ची,’ बूढ़े आदमी ने कहा।
‘यह कैसे हुआ कि उन हजारों, लाखों, करोड़ों बिल्लियों ने तुम्हें नहीं खाया?’
‘मैं तो बस एक छोटी सी घरेलू बिल्ली हूं,’ बिल्ली की बच्ची बोली।
‘जब आपने पूछा कि कौन सी बिल्ली सबसे सुंदर है, तब मैं चुप रही और कुछ नहीं बोली।
इसलिए मुझ पर किसी ने कुछ ध्यान ही नहीं दिया।’


वह उस बिल्ली की बच्ची को घर के अंदर ले गए।
वहां बूढ़ी औरत ने उसे गर्म पानी से नहलाया और ब्रुश से उसके मुलायम और चमकीले बाल संवारे।


हरेक रोज वो बिल्ली को खूब सारा दूध पीने को देते।


जल्दी ही वह अच्छी और मोटी-ताजी हो गई।


‘आखिर में हमें एक प्यारी सी बिल्ली मिल ही गई,’ बूढ़ी औरत ने कहा।
‘यह दुनिया की सबसे सुंदर बिल्ली है,’ उस बूढ़े आदमी ने कहा।
‘मुझे इसके बारे में पता है क्योंकि मैंने हजारों, लाखों, करोड़ों बिल्लियां देखी हैं।
परंतु उनमें से कोई भी बिल्ली इस जैसी सुंदर नहीं थी 

--

अरविन्‍द गुप्‍ता ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्‍था (आई.आई.टी.) कानपुर से 1975 में बी.टेक. की डिग्री हासिल की। उन्‍होंने विज्ञान की गतिविधियों पर 20 पुस्‍तकें लिखी हैं, 150 पुस्‍तकों का हिन्‍दी में अनुवाद किया है और दूरदर्शन पर 125 विज्ञान फिल्‍में पेश की हैं। उनकी पहली पुस्‍तक मैचस्‍टिक मॉड्‌ल्‍स एंड अदर साइन्‍स एक्‍सपेरीमेन्‍टस का 12 भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ और उसकी पांच लाख से अधिक प्रतियां बिकीं।
उन्‍हें कई पुरस्‍कार मिले हैं जिनमें बच्‍चों में विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए भारत सरकार का सर्वप्रथम राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार (1988) और आई.आई.टी. कानपुर का डिस्‍टिंगुइश्‍ड एलुम्‍नस अवॉर्ड (2000), विज्ञान के लोकप्रियकरण के लिए इंदिरा गांधी पुरस्‍कार (2008) और थर्ड वर्ल्ड एकैडमी ऑफ साइंसिस का अवॉर्ड (2010) शामिल हैं।
उन्होंने पुणे स्‍थित आयुका मुक्‍तांगन बाल विज्ञान केन्‍द्र में भी काम किया है।

(अनुमति से साभार प्रकाशित)

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