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ससुराल

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डॉ० श्रीमती तारा सिंह, नवी मुम्बई

ससुरालनाम का मुँह में लड्डू फ़ूटनेवाला यह शब्द कितना मीठा होता है, आप इसका अंदाज़ा इसी से लगा सकते हैं, जब लड़कियाँ छोटी उम्र की होती हैं, तभी से माँ की साड़ियों को पहनकर, शीशे में खुद को दुलहन के रूप में देख-देखकर , ससुराल की कल्पना अर्थात पिया के घर जाने के सपने को सहेजने लगती हैं । लड़के भी, इस कथित लड्डू को खाने की कल्पना में पीछे नहीं होते । वे भी होश संभलते ही घोड़ी पर चढ़कर , ससुराल अर्थात जिंदगी के रंगीन सपनों का घर जाने की तमन्ना लिये बड़े होते हैं, लेकिन यह लड्डू किसके भाग्य में कितना खट्टा और किसकी तकदीर में कितना मीठा पड़ता है, ये तो खाने के बाद ही पता चलता है । कभी- कभी तो यह ससुराल रूपी लड्डू जानलेवा भी होता है; फ़िर भी आदमी बचपन, के कुछ वर्ष गुजारने के बाद, जवानी में प्रवेश करते ही , कैसा होगा, कहाँ होगा, यह सोच-सोचकर, मुँह में पानी भर आता है । तब संसार के सभी रिश्तों की मिठास फ़ीकी पड़ने लगती है और हद तो तब हो जाती है, जब जन्म देने वाले माता-पिता की अहमियत भी, मात्र पुकारू बनकर रह जाती है । माफ़ करेंगे, आज बहू पर जितना अत्याचार ससुराल पक्ष वाले कर रहे हैं , बहू भी ससुराल वाले को कम यंत्रणा नहीं दे रही है । आये दिन हमें पढ़ने और सुनने मिलता है, भले ही इसकी संख्या अभी कम हो, लेकिन हमारा समाज जिस ओर जा रहा है, एक दिन, दोनों ही पक्ष बराबरी पर आ जायेंगे ; वो दिन अब दूर नहीं ।

आप श्रीमती किरण वेदी की सीरियल, आपकी कचहरीअगर देखते हैं , तो और अधिक मुझे बताने की जरूरत नहीं होगी । कैसे एक बूढी विधवा, सात-सात बच्चों की माँ, तन ढ़ंकने के लिए गमछे को लपेटे खड़ी थी और इधर बेटा- बहू , शान –शौकत से बैठी, माँ के विरुद्ध शिकायत लगा रही थी । क्या यह ससुराल की देन नहीं है ? अभी भले ही थोड़े में हो, कल बहुत में नहीं होगा: इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ।

मैं अपनी आँखों देखी, एक वाकया आपके समक्ष रखने की कोशिश कर रही हूँ । अमीरों के लिए हो सकता है, यह मजाक की बात बने, लेकिन मध्यम वर्ग की यह सच्ची घटना है । विश्वास न हो तो आप सोनपुरा गाँव की विधवा , बूढ़ी शांति को जाकर देख सकते हैं , आपको अंदाज़ा आ जायेगा । उस पर इस ससुराल ने क्या-क्या गज़ब ढ़ाया है ? बेटे की शादी देने के पहले शांति कभी इस दिन की कल्पना नहीं की थी । वह तो सोची थी,घर की आर्थिक तंगी जिंदगी को कोल्हू का बैल बना रखी है । बहू जब आ जायगी, सारी चिंता उस पर लादकर मुक्त हो जाऊँगी । माँ- बाप ने छोटी उम्र में शादी दे दी । सास-श्वसुर ने कभी बेटी का दर्जा नहीं दिया; बहू-बेटे के प्यार में स्वच्छंद होकर जीऊँगी, लेकिन क्या हुआ ? शादी के बाद , बहू तो घर आई नहीं, उल्टा बेटा घर- जामाई बनकर ससुराल रहने चला गया । जैसे-तैसे अपना दिन काटती हुई शांति का एकमात्र सहारा, उसका पति भी उसे छोड़कर दुनिया से चला गया । पति की मृत्यु की खबर शांति ने अपने बेटे दीपक को भिजवाई,’ कहीं तुझे पिता का मुखवाती करना है,सो जल्दी चले आओ ।’ बेटा पत्नी के साथ घर तो आया; लेकिन श्राद्ध के तेरहवें दिन ही, पत्नी के साथ ससुराल लौट गया । शांति का समझा- बुझाकर बेटे को रोकने की सभी कोशिशें नाकाम रहीं । कारण, बहू नहीं चाहती थी कि वह मैकेवालों को छोड़कर यहाँ रहे । सो बेटा लौटकर ससुराल चला गया । साथ श्राद्ध में रिश्तेदारों से दान में मिले, बचे-खुचे सामान, थाली-बरतन, चीनी, साड़ी ,सब कुछ समेटता चला गया । बूढ़ी शांति, बेटे की इस करतूत को डबडबाई आँखों से निहारती रही ; दर्द इतना ,लेकिन मुँह से एक आवाज तक नहीं निकली ।

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(ऊपर का चित्र - कृषि ताम्रकार की कलाकृति का डिटेल)

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