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हास्य-व्यंग्य : वैधानिक चेतावनी

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- प्रमोद यादव

‘ क्या बात है यार ? एक हफ्ते से तुम पी.एम. की तरह चुप्पी साधे बैठी हो ? जिंदगी में यूँ छोटी-छोटी बातें होती रहती है..हर बात पर यूं गुस्सा या गंभीर होना ठीक नहीं...’ पति ने पत्नी की बेरुखी पर कहा.

‘ इसे छोटी-छोटी बात कहते हैं ? ‘ पत्नी एकाएक फूट पड़ी- ‘ इतनी बड़ी बात आपने मुझसे छिपाई और इसे छोटी बात कहते हैं ? वो तो मैं फोन न उठाती तो मालुम भी न पड़ता..’

‘ अरे भागवान..मैं उसी दिन बताने वाला था पर न जाने कैसे दिमाग से उतर गया..उसके बाद रूटीन के काम में ऐसे बिजी रहा कि तुम्हें बताने का ख्याल ही नहीं आया..’ पति ने समझाते हुए कहा.

‘ अब रहने भी दीजिये..सफाई मत दीजिये.. सब जानती हूँ ..मुझे बताने का ख्याल भला क्यूँ आएगा जब ख्यालों में कोई “हंगामा” बसी हो ? आप सारे मर्द एक ही थैली के चट्टे-बट्टे होते हैं...’ पत्नी बडबडाई.

‘ अरे..खुदा कसम यार..यकीन करो..मैं वैसा नहीं...वैसा होता तो “उसे” बाहर ही बाहर निपटा चलता न कर देता...अपने स्वीट होम का एड्रेस क्यों देता ?..अब कोई हमवतन-हमजोली अचानक दशकों बाद मिल जाए और घर का पता या फोन नंबर मांगे तो इनकार करना बदतमीजी होती ना ? ‘ पति ने एटीकेट - मैनर की बात कही.

‘ हाँ.. हसीन हमजोली कुम्भ के मेले में जो बिछुडी तो कानपुर में मिली .. वो मिली या आप मिले ?’ पत्नी उलाहना देते आँखें ततेरते बोली..

‘ तुम भी अजीब हो यार..कई बार बता चुका कि वो मिली..मैं तो रोज की तरह काफी-हाउस में काफी पीने बैठा था.. अचानक प्रगट हो वो मुझे पहचान गई तो मैं क्या करता ? मैं तो उसे पहचान ही नहीं सका..पच्चीस साल में क्या-कुछ नहीं बदल जाता..मैं तो उसे देख हैरान हो गया पर यकीन मानों.. उससे मेरा कोई लेना-देना नहीं..बस.. हाई स्कूल में साथ पढ़ती थी..पढ़ाई के सिलसिले में मिलना-बतियाना होता था और उसके भाई से अच्छी दोस्ती थी...’ पति ने सफाई दी.

‘ भाई से दोस्ती तो आपने बाद में की होगी..जैसा कि सारे मजनू करते हैं..’ पत्नी ने टिप्पणी की.

‘ तुम बड़ी शक्की हो यार..अब शक की दवा तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं तो मैं क्या कहूँ ? पर सच्चाई यही है कि मेरे उसके सम्बन्ध जैसा तुम समझती हो...न कभी थे न अभी है..वो तो इंसानियत के नाते मैंने उन्हें न्यौत दिया..मालूम होता कि तुम छोटी दिलवाली मोहतरमा यूं हंगामा करोगी तो नंबर ही नहीं देता..मैं ही उसके घर जाकर मिल आता..’ पति ने ताना देते कहा.

‘ हाँ..तो मिल आओ न बड़े दिलवाली से ..अभी भी क्या बिगड़ा है ? और भगवान जाने चुपके -चुपके मिल भी आये होंगे तो मुझे भला थोड़ी बताएँगे..’ पत्नी संदेह जताते बोली.

‘ अरे भई..तुम तो नाहक ही बात का बतंगड़ बना रही हो..जब कह रहा हूँ कि ऐसे-वैसे सम्बन्ध नहीं थे तो नहीं थे..’ पति गरजा.

‘ तो फिर कैसे सम्बन्ध थे ? ‘ पत्नी भी थोडा गरम अंदाज में गरजी.

‘ तुम कुल मिलाकर उससे सम्बन्ध गाठने में लगी हो जो न थे न हैं..पर तुम्हारी तसल्ली के लिए चलो बता दूँ.. उन दिनों स्कूल के अन्य लड़कों की तरह मुझे भी वो अच्छी लगती थी.. बस..इतनी सी बात है..जहां अधिकाँश लड़के उसे देख केवल आहें भर-भर रह जाते वहीँ मेरा सौभाग्य था कि मेरी उससे बातचीत भी हो जाती..पर केवल पढ़ाई-लिखाई के विषय में.. इससे इतर कुछ भी नहीं..’

‘ हिम्मत नहीं हुई होगी पढ़ाई से इतर कुछ कहने-बोलने की.. डरपोक जो ठहरे..पर मन में कसक तो रही ही होगी तभी तो अरसे बाद राधा मिली तो खिल गए मोहन बाबू..मैं इधर रुआंसी हो-होकर पूछती हूँ और आप हैं कि हंस-हंसकर जवाब देते हैं.. आप तो उसके जिक्र से ही लाल हो जाते हैं..’

‘ अभी तक तो लाल ही हो रहा हूँ.. ज्यादा देर तक इसी टॉपिक पर अड़ी रही तो लाल-पीला भी हो सकता हूँ..कुछ समझो यार..अब दो दिन बाद तो घर आ ही रही है..सारी बातें जो मुझसे पूछ रही हो उसी से पूछ लेना..पर उसके पति के सामने मत पूछना..नहीं तो बेवजह ही महाभारत छिड़ जाएगा..’ पति ने कहा.

‘ आप ही मिलो..मुझे नहीं मिलना अपनी सौतन से..मैं परसों अपने लकड़गंज वाले मामा के घर चली जाऊँगी..आप दोनों “पिया-मिलन” करो इत्मीनान से..’ पत्नी गुस्से से बोली.

‘ अरे कैसी गंवार जैसी बातें करती हो..घर बुलाया है तो घरवाली से मिलाने ही बुलाया है..और फिर एकाएक तुम गायब हो जाओगी तो वे क्या सोचेंगे ? तुम कहीं मत जाओ..तुम चाहती हो कि मैं उससे न मिलू तो ऐसा करता हूँ ज़रूरी काम का बहाना कर मैं आफिस में ही रुक जाऊँगा..वे चल देंगे तभी आऊंगा..बोलो..ठीक है ? वैसे मेरा दावा है कि उसे देखने के बाद तुम मुझे बाइज्जत बरी कर दोगी..’

‘ ठीक है..’ कहते पत्नी ने समझौते पर मौन हस्ताक्षर कर दी.

दो दिन बाद

‘ सुनोजी..मिली आई है अपने मिस्टर के साथ..मिलने आ जाओ..ये लोग जरा जल्दी में है,..आप भी जल्दी आओ..मैं इंतज़ार कर रही हूँ..’ फोन पर पत्नी की खुशमिजाज आवाज सुन पति अचंभित रह गया.

‘ पर तय तो ये हुआ था कि तुम अकेली ही..’ पति की बात पूरी भी नहीं हुई कि कि पत्नी बोल पड़ी-

‘ हाँ..अकेली नहीं झेल पा रही इसलिए आपको बुला रही हूँ..तुरंत आओ..बाकी बातें बाद में..’ इतना कह उसने फोन काट दी.

पति घर आया तो पत्नी को मिली और उसके पति के साथ बेहद ही बेतकल्लुफ माहौल में देख दंग रह गया..दोनों से हंस-हंस कर बतिया रही थी..अच्छी खातिरदारी भी कर रही थी..आधा घंटा कैसे बीता पता ही न चला..जब दोनों बिदा हो गए तब पत्नी हँसते हुए बोली-

‘ चलिए.. बाइज्जत बरी करती हूँ आपको.. पहले ही बता देते कि मिली टूटे-फूटे , टेढ़े-मेढ़े छब्बीस दांतों वाली..धंसे गालों वाली बुड्ढी भूतनी है..तो हफ्ता ख़राब तो न होता.. समझ नहीं आया कि इतनी विकराल मिली से आप कैसे मिलते रहे होंगे ?..’

‘ अरे भई.. तुमने तो कुछ बताने का अवसर ही नहीं दिया और मुंह फुला बैठ गई..वैसे पच्चीस साल पहले ऐसी नहीं थी..औसतन सुन्दर ही थी..अब कोई इमारत जल्दी ही ढह जाए किसे पता होता है..मैं भी जब उस दिन उसे देखा तो अवाक रह गया था..वो हंसी तो मैं धंसते- धंसते रह गया..ऊपर के तीन और नीचे के तीन दांत उसके नदारद देख लगा कि कहीं रामसे ब्रदर्स की फिल्म तो नहीं देख रहा...मेरे मन में जो उसकी तस्वीर थी वो एकदम से चकनाचूर हो गई..अब जो नई तस्वीर दिलो-दिमाग में है वह बड़ी ही भयावह और परेशान करने वाली है..लाख डिलीट करने की कोशिश करता हूँ.डिलीट ही नहीं होता..बल्कि अब तो पुराना चेहरा भी डिलीट हो गया है..’

‘देखिये..कहीं उसके चक्कर में मेरा चेहरा भी डिलीट न कर देना..आपकी पत्नी हूँ..प्रियतमा नहीं..वैसे हर बिछुड़े हुए आशिक को चाहिए कि दो दशक के बाद अपनी प्रियतमा के दीदार का इरादा छोड़ ही दे तो अच्छा..अधिकाँश मिली की तरह ही पिचके गालों के साथ आधे-अधूरे दांतों के मिलेगी..कोशिश करें कि उनसे कभी न टकराएँ और मन में बसी सुन्दर छवि को खंडित होने से बचाएं..’

‘ ये मुझे कह रही हो या आम आशिकों को “ वैधानिक चेतावनी ” दे रही हो ? ‘ पति ने पूछा.

‘ जो समझना है समझ लीजिये..पर हकीकत यही है..’ पत्नी बोली.

तभी अचानक फोन की घंटी घनघनाने लगी.दोनों ने एक-दूसरे को देखा.पत्नी उठी और हौले से रिसीवर उठा बोली-

‘ हेलो..हाँ जी.. हाँ जी..मोहन बाबू का ही घर है.. मैं उनकी मोहिनी बोल रही हूँ...आप कौन ?... राधा..? कौन राधा... ? नहीं जी.. रांग नंबर..’ और उसने रिसीवर पटक कर रख दी.

‘ अब ये राधा कौन है भई ? ‘ पति ने पूछा.

‘ये तो हमें पूछना चाहिए आपसे..और आप हमीं से पूछ रहे..चलिए..दोबारा काल आये तो आप ही उठाकर पूछ लीजिये कि कौन है राधा..वैसे अब हमें आपके किसी हमजोली से जलन नहीं..आपके जमाने के सारे पीस तो पुरातत्व विभाग में रखने की चीज हो गए..’ इतना कह पत्नी खिलखिलाकर हंस पड़ी.

दो हफ्ते बीत गए पर काल नहीं आया..राधा के नाम ने मोहन बाबू को आधा कर दिया ..दिमाग में काफी जोर देने पर भी याद नहीं आया कि कौन है राधा ? आखिरकर एक दिन पत्नी से पूछ ही बैठा- ‘ यार.. वो राधा का काल दोबारा कभी आया क्या ? ’

‘ कैसे आएगा भई..जब कोई है ही नहीं राधा..वो तो टेलीफोन वालों का काल था जो उठाते ही कट गया था..मैंने तो यूं ही अनाप-शनाप बोलकर मजाक किया था..लगता है.. आपको भारी पड गया..? पत्नी हंसते हुए बोली.

‘यूं जानलेवा मजाक मत किया करो यार..’ पति ने संजीदगी से कहा.

‘ वाह जी..आपने मिली से मिलाके जो किया वो क्या कुछ कम जानलेवा था ? चलिए..हिसाब बराबर हो गया..अब जाइए भी आफिस.. समय हो रहा है..और हाँ..काफी हाउस जाना बंद कर दें..कहीं कोई और आदिम युगीन डरावनी मिली न मिल जाए..मैं टिफिन लाती हूँ..’

पत्नी हंसती हुई किचन की ओर दौड़ गई और पति ठगा सा उसे जाते देखता रहा.

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प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

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