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कहानी - परथन...

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असित कुमार मिश्र

अक्सर लोग सवाल करते हैं-असित आपकी कहानियाँ सच हैं या झूठ? यथार्थ हैं या कल्पना? मैं कुछ कह नहीं पाता। ऐसा नहीं कि कहानी की परिभाषा या उसके तत्वों से अनभिज्ञ हूँ। पर सच या झूठ में मुझे कोई अन्तर नहीं लगता। कल मेरे गाँव में कच्ची सड़क थी। कल का सच यही था। आज ईंट की सड़क है। आज का सच यही है। कल का सच आज झूठ हो गया। कल जैसे ही सड़क पक्की हुई आज का सच भी परिवर्तित हो ही जाएगा। यही हाल कहानियों का भी हो सकता है। कल कोई असित किसी बुढ़िया से ऐसे ही टकरा जाए जैसे आज मैं टकरा गया तो तो आज की मेरी यह 'झूठी कहानी' सच में बदल जाएगी न!

हाँ,तो आज बहुत से काम थे मुझे। साढ़े दस बजे एक कालेज पर जाना था। बाज़ार से कुछ सामान लेकर जैसे ही एक गली टाईप मोड़ में दाखिल हुआ अचानक एक बुढ़िया सामने प्रकट हो गई। टकराते टकराते बचा मैं। एकदम से ब्रेक लगाया,पीछे साईकिल वाला लड़का मेरा इन्डीकेटर तोड़ गया। गुस्सा तो बहुत आया। बुढ़िया को डाँटने ही जा रहा था कि उसके हाथ में कटोरे और कटोरे में थोड़े से आटे(परथन) को देखकर चौंक गया। बाईक किनारे खड़ी की और आवाज़ देनी चाही कि-ए बुढ़िया सुनो!!पर मुँह से आवाज़ आई-दाई जी सुनिए!!

हाँ इसी नाम से जानता हूँ मैं इस बुढ़िया को। ये जब भी मुझसे मिली है, मुझे आँसू ही दिए इसने।

कक्षा तीन में था जब मेरे सरस्वती शिशु मंदिर में 15अगस्त मनाया जा रहा था। मैंने नई ड्रेस पहनी थी सफेद शर्ट और हाफ नीली पैंट। इतनी खुशी आज 'किलर' और 'इटली ब्रांड' कपड़ों में भी नहीं मिलती। लेकिन उस खुशी में थोड़ा दुख इस बात का था कि पैंट में चेन की जगह बटन लगे थे। और तीन बार शौचालय से मैं बैरंग आ चुका था, क्योंकि बटन खुल ही नहीं रहे थे मुझसे। न चेन की जगह वाले न कमर वाले। नया पैंट था, अम्मा ने बंद करके स्कूल भेज दिया था। आचार्य जी लोग भाषण देते जा रहे थे। बच्चों का ध्यान लड्डुओं पर और मेरा ध्यान बस इस पर कि कहीं पैंट में ही शू-शू न हो जाए। लड़कियों की कतार में सबसे पीछे बैठी दाई जी के पास मैं गया और धीरे से बोला-दाई जी! मेरा बटन खुल नहीं रहा है। पीछे बैठी बड़ी दीदियाँ हँस पड़ी थीं। दाई जी मुझे लेकर शौचालय में गई। बटन खोल ही रही थीं कि अचानक उनका ध्यान मेरे दाँतों पर गया। और बोलीं-सुनो! ब्रश करते हो? मैंने कहा-जी रोज.... आगे के वाक्य को उनके थप्पड़ ने पूरा किया था। आँखों में आँसू आ गए थे मेरे। हाँलाकि वो बहुत स्नेह करती थीं हम बच्चों से। इस थप्पड़ को तो मैं कब का भूल चुका था।

समय बदलते देर नहीं लगती। कुछ प्रतिष्ठित अध्यापकों में मेरा भी नाम लिया जाने लगा। कुछेक अध्यापकीय पुरस्कार भी मिले। सन्2011 में मैं श्री Ravish Srivastava जी के साथ पढ़ाता था। हिन्दी को वैज्ञानिक तरीके से पढ़ाना मैंने इन्हीं से सीखा। सच,'नागमती वियोग वर्णन' रो-रो कर पढ़ाने वाले आचार्यों से बहुत कोफ्त होती है मुझे। एक दिन रवीश सर ने कहा-असित जी! सरस्वती शिशु मंदिर का वार्षिकोत्सव है आप विशिष्ट अतिथि होंगे उसमें। शिशु मंदिर समिति के पदाधिकारी और शिक्षा क्षेत्र के सम्मानित लोग भी होंगे। मैं थोड़ा नर्वस हुआ और बोला-सर मैं उसी विद्यालय का छात्र हूँ। विशिष्ट रुप में मेरा जाना उचित नहीं होगा। कहिए तो पुरातन छात्र के रुप में चलूँ। उन्होंने कहा कि-नहीं यह तो और भी अच्छी बात है। इसी रुप में चलिये।

वार्षिकोत्सव समारोह में बड़ी भीड़ थी। कुछ अध्यापकों और राजनेताओं की भाषा-शैली और उतार-चढ़ाव में गजब की समानता होती है मैं इन्हें समझ नहीं पाता कि ये नेता हैं या अध्यापक? खैर! जब मेरा नंबर आया तो मैंने संबोधन शुरु किया-"प्रज्ञा, ज्ञान,चेतना और संस्कार प्रदायिनी वाग्देवी माँ सरस्वती के इस पवित्र प्रांगण में, मैं असित कुमार मिश्र आप समस्त अतिथियों, आचार्यों, अभिभावकों,विद्यार्थियों और दाई जी को हार्दिक नमन करता हूँ....। लड़कियों के कतार में सबसे पीछे बैठी दाई जी ने साड़ी के आँचल से अपने आँख पोछे थे। मैं कैसे भूल सकता था दाई जी को। स्कूल में बच्चों की माँ वही तो होती है। कितनी देर तक तालियाँ बजती रहीं, मैंने ध्यान नहीं दिया। कितने पदाधिकारियों को नागवार गुजरा होगा उनके साथ किसी अश्पृश्य दाई का नाम जोड़ा जाना, इस पर भी ध्यान नहीं दिया मैंने। मैं बस ये जानता हूँ कि मेरी भी आँखों में आँसू थे।

सिकन्दरपुर की कुछ गलियां बनारस की गलियों की तरह ही हैं। जैसे एक ही कारीगर ने बनाए हों। ऐसी ही एक गली से पिछले साल गुजरते हुए एक दिन मैंने एक खण्डहरनुमा कमरे में एक बूढ़ी औरत को मिट्टी के चूल्हे पर रोटियाँ बनाते देखा था। धुएं के कारण बुरी तरह खाँसने पर ही मेरा ध्यान उधर गया था। मेरे मुँह से निकला था-दाई जी नमस्ते! दाई जी अब थोड़ी संभल गई थीं। बाल सफेद और चेहरा झुर्रियों की कहानी। मैंने कहा था-दाई जी आपके लड़के आपके साथ नहीं रहते?

दाई जी ने थाली में रखे थोड़े से परथन की ओर इशारा करके कहा था-बेटे! हम औरतों की जिन्दगी 'परथन' की तरह ही होती है। जब तक रोटियाँ बन रही हैं तब तक परथन की कीमत है। जैसे ही आखिरी रोटी बनी,बचा हुआ परथन जूठ की हाँड़ी में...। मैंने बहुत तो नहीं पढ़ा,पर आज तक ऐसी करुणा मार्मिकता और शायद नंगा सच कहीं देख नहीं पाया। मेरी आँख में आँसू थे और बाकी के सवाल व्यर्थ।

-क्या है? बुढ़िया मुझसे पूछ रही है। ओह! नहीं नहीं। दाई जी मुझसे पूछ रही हैं। मैं अचानक वर्तमान में आ गया हूँ। कहता हूँ-दाई जी नमस्ते। पहचाना मुझे? मैं असित आपका.... नहीं। मैं नहीं पहचानती तुम्हें। दाई जी चलीं गई हैं। बगल वाला दुकानदार मुझसे कह रहा है-माट्साब ई पागल है।

मैं देख रहा हूँ दाई जी के कटोरे में किसी औरत ने भीख में 'परथन' ही डाला है....

असित कुमार मिश्र

सिकन्दरपुर

बलिया

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(ऊपर का चित्र - मीना दुबे की कलाकृति - ब्रेक)

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