बुधवार, 22 जुलाई 2015

समीक्षा - सतरंगी “बचपन”

 clip_image002

बचपन - A, B, 1, 2, 3, 4, 5 (7 पुस्तकों का संकलन)

रुद्र प्रकाश “सरस”

समीक्षक - गोवर्धन यादव

चिंता रहित खेलना खाना वह फिरना निर्भय स्वछंद?
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?” (सुभद्राकुमारी चौहान.)

बालसाहित्यकार रूद्र प्रकाश “सरस” द्वारा रचित सप्तवर्णी इन्द्रधनु‍ष “बचपन” का एक साथ प्रकाशित होकर आना, इस बात का प्रमाण है कि उसकी रचनाधर्मिता नित-नए सोपानों को केवल छू ही नहीं रही है, बल्कि सक्रीयता के साथ रचनाक्रम निरन्तर जारी रखे हुए हैं. सात खण्डॊं के इस प्रकाशन में “विनायक विद्यापीठ” विनायकपुरम, भूणास, भीलवाडा (राजस्थान), तथा विद्यापीठ के निदेशक डा.श्री देवेन्द्र कुमावतजी को साधुवाद देना चाहिए कि आपके सबल आर्थिक सहयोग से इनका प्रकाशन संभव हो पाया.

बचपन-A में रचनाकार के आत्म निवेदन को पढकर इस बात के साफ़ संकेत मिलते हैं कि उनके द्वारा वर्ष 2003 में प्रकाशित कृति “बच्चों तुमको बात बताऊँ” की प्रतियाँ, जिला हरदोई के सारे विद्यालयों तक नहीं पहुँच पायी,जिसकी सघन पीडा, आज दिन तक उनको सालती रहती है. समूचे विश्व-पटल पर छा जाने का जज्बा और बच्चों तक पहुँच बनाने का रचनाकार का मन तो होता है, लेकिन अर्थाभाव के कारण, ऎसा कर पाना, उनके लिए दिवास्वपन देखने जैसा हो सकता है. खैर जो भी हो उनके मन में यह उत्साह तो बना हुआ ही है कि वे अपने जीवन का जितना भी सर्वश्रे‍ष्ठ हो सकता है, बच्चों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए वह कटिबद्ध देखाई देता हैं. उसके इस अदम्य साहस और विश्वास को रेखांकित करते हुए उसे साधुवाद दिया ही जाना चाहिए.

इस बात को कहते हुए अतिरिक्त प्रमाण जुटाए जाने की आवश्यकता नहीं है कि बालमन में रोपित संस्कार के बीज, जीवन पर्यन्त तक साथ बने रहते है. हमारे महान चितकों ने समूचे मानव-जीवन को सोलह संस्कारों से आवि‍‍ष्ठित होने का सूत्र दिया था,जिसका परिपालन न करते हुए आज के तथाकथित बुद्धिजीवी उसे हेय दृ‍ष्टि से देखते है और अंग्रेजियत ओढ़कर बच्चे के जन्म-दिन पर दीप जलाकर बुझाने का कुत्सित प्रयास करते हैं, जिसके घातक परिणाम प्रत्यक्ष-अप्रत्यरुप से दिखाई भी पडने लगे हैं.

बालसाहित्यकार ने इस बात को ध्यान में रखते हुए ईश-प्रार्थना से अपनी लेखनी को आगे बढाते हुए,ज्ञानार्जन से लेकर भाईचारा, देश प्रेम जैसे वि‍षयों से बालमन को जोड़ने का प्रयास किया है. दो-दो लाइनों के क्रम को आगे बढाते हुए वे अन्य छॊटी-बडी बातों का समावेश भी अपनी रचनाओं में करते हैं, जिसको देख –सुनकर बालमन उससे अपना तादात्म कौतुहलता के साथ जोडता चलता है सूरज, बादल,घोडा, चिडिया, गायें, तोता, चांद-सितारे, आदि विविध चित्र, अपनी विशे‍षताओं का स्वतः परिचय देते हुए सामने आते हैं.

वर्ड्सवर्थ ने बच्चे को मनुष्य का पिता कहा है. उनका तो यह भी कहना है कि बच्चा मन का राजा होता है और उसके मन को जाने बिना, टटोले बिना किया गया लेखन उसके मन माफ़िक कतई नहीं होता. रचनाकार श्री रुद्रजी को पढ़ते हुए इस बात की पुष्टि होती है कि वे अपने स्व को बचपन की ओर मोड़कर ले जाते हैं और तदानुसार उन्हें शब्दों में व्यक्त कर देते हैं.

इसी तरह मुंशी प्रेमचन्द ने लिखा है कि “बुढापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है”.बात में सत्यता परिलक्षित होती है. तभी तो साठ की उम्र में भी रुद्रजी का बचपना झलक-झलक जाता है.

भा‍षा अत्यन्त सरल और सरस है, जिसका प्रभाव बालमन पर पडना लाजमी है..रचना का सरलीकृत होना ही इस बात का प्रमाण है कि इस तरह की रचनाएं ही सच्ची बाल-कविता हो सकती है, जिसे पढकर-सुनकर बालक, कविता के साथ बहने लगता है, थिरकने लगता है और कभी झूम-झूमकर नाच भी उठता है.

यह सच है कि कविता की लय से ही बालक का आन्तरिक संबंध स्थापित होता है. फ़िर बालकाव्य का उद्देश्य ही तो उसका मनोरंजन करना होता है. जब उसका मन इसमें रस लेने लगता है तो वह संवेदना के स्तर पर आकर स्वतः अंकुरित होने लगता है और शनैः-शनैः वह उसे एक सुयोग्य नागरिक के रूप में प्रतिस्थापित होने की तैयारी के लिए जमीन भी तैयार कराता चलता है.

रचनाकार ने रचनाओं का शिल्पगत ढांचा, उनका वस्तु-विधान, और आंतरिक तत्त्व जो उसे सुरुचि-पूर्ण बनाने और उसे अर्थपूर्ण बनाने में मददगार होता है, के विधान में पूरी ईमानदारी से, लगन के साथ मेहनत की है.

रचनाकार श्री रूद्र प्रकाश “सरस” ने अपनी रचनाओं के माध्यम से न सिर्फ़ बालमन को छूने का सफ़ल प्रयास किया है, बल्कि बाल प्रतिभा विकास मंच की स्थापना कर उन्होंने अपने दृढ निश्चय को भी रेखांकित किया है. निश्चय ही वे साधुवाद के पात्र हैं.

मेरा अपना मानना है कि बाल साहित्य जगत में इस सप्तवर्णी “बचपन” का पुरजोत स्वागत किया जाना चाहिए, साथ ही यह भी कामना है कि अन्य क्षेत्र के बच्चॊं तक इसकी पहुँच बने और वह अपने पारसीय स्पर्ष से बालमनों में नयी चेतना और नये उत्साह का संचार करने में अपनी अहम भूमिका का निर्वहन करने में सफ़ल हो.

इन्हीं शुभकामनाओं के साथ

--

गोवर्धन यादव

103, कावेरी नगर, छिन्दवाडा(म.प्र.) 480-001

 संयोजक राष्ट्रभाषा प्रचार समिति

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------