रविवार, 19 जुलाई 2015

कहानी - विस्थापन से सृजन तक......

- असित कुमार मिश्र

 

बलिया मुख्यालय से छत्तीस किलोमीटर दूर मिश्रचक गाँव.... जहाँ के बारे में प्रसिद्ध है कि-'मास्टर और मिस्त्री घर-घर में हैं'। कस्बे के पास होने से यह संक्रमित हो गया है अब। मतलब न कस्बा बन पाया है न गाँव ही रह गया है। इसी गाँव में मेरी सुबह होती है। हर सुबह की अपनी अदा,अपनी रंगत, अपनी अलग पहचान।

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किसी दिन छोटेलाल बाबा के शंख बजाने पर मेरी नींद टूटती है, तो किसी दिन दो-चार औरतों के वाक् युद्ध पर कि-"तू रे! तोके हम जानते नइखीं,बड़ी सती-साबित्री बनतरे तूं"। कोई सुबह किसी दिलजले के चाईनीज मोबाइल की दहाड़ से कि-"तुम तो ठहरे परदेसी साथ क्या निभाओगे"। इसी तरह कोई सुबह बंदरों की उछल-कूद से होती है, तो कोई सुबह पण्डुक, गिलहरियों और कोयल के तृतीय,चतुर्थ और पञ्चम स्वर से....

दो दिन से बारिश का मौसम बन गया है। रुक-रुक के बारिश हो रही है। ऐसे में बिजली किसी मानिनी नायिका की तरह नखरे दिखाती है। रात को ठीक से सो नहीं पाया। सुबह साढ़े पांच बजे घर के पीछे से एक गीत के बोल सुनाई पड़े-

जहिया से अइलीं पिया तोरी महलिया में,

राति दिन कइलीं टहलिया रे पियवा।।

करत रोपनियां मोरा गोड़वा पिरइले,

रुपिया के मुँहवा नाहीं देखलीं रे पियवा।।

अचानक से नींद गायब हो गई। यह तो 'धान-रोपाई' का गीत है। और इसी गीत को सुनाते हुए साहित्य और फिल्म जगत के मजबूत स्तम्भ Uday Narayan Singh सर ने कहा था कि- 'असित जिस दिन ये लोक-गीत मर गए, समझ लेना कि साहित्य मर गया।'मैं झटके से उठकर खिड़की खोल के देखता हूँ। पियरी साड़ी पहने एक नई दुलहिन धान रोप रही है। घूंघट की ओट से उसका चेहरा पूरा नहीं दिख रहा है। पर बालों की एक लट बार बार उसके आगे गिर रही है, और बड़ी अदा से वह कलाईयों के सहारे उसे हटा देती है। इस बीच गीत रुकता भी नहीं है। लगता है दो तीन महीने पहले ही शादी हुई है इसकी। एक आकर्षण है इसके गीत में। धान के ये हरे हरे बीज एक क्षण को इसकी उँगलियों में आते हैं और दूसरे ही क्षण खेत में शान से खड़े हो जाते हैं। इन पौधों से गहरा लगाव लग रहा है इसका।

अच्छा ये धान की फसल भी बड़ी अजीब है। बीज किसी दूसरे खेत में पड़ते हैं। और फिर उन्हें उखाड़कर दूसरे खेत में रोप दिए जाते हैं। विस्थापन का दंश झेलते हुए धान का पौधा सात-आठ दिन आँसू बहाते बहाते पीला पड़ जाता है। फिर धीरे धीरे नई जमीन पर अपनी जड़े जमाता हुआ थोड़ा सा मुस्कुराता है और हरा-भरा हो जाता है। फिर समयानुसार उसमें बालियाँ लगती हैं। बालियों से धान निकलते हैं और ये धान फिर किसी खेत में बीज रुप में छीट दिए जाते हैं। और फिर वही विस्थापन....

गीत की अगली कड़ी गा रही है वह दुलहिन-

घर के करत काम सूखल देंही के चाम,

सुखवा सपनवाँ होई गइले रे पियवा।।

ओह!बड़ा मीठा-मीठा दर्द है इसकी स्वर लहरी में। मैं अब इसके बारे में सोचता हूँ-कहीं की लड़की रही होगी ये। कोई खेत इसका भी रहा होगा। जहाँ ये अपनी मौज में, अपनी ही धुन में गाती होगी, झरने की तरह। पर एक विस्थापन.... और यह मेरे गाँव में लाकर रोप दी गई। अभी इसका मन नैहर की जमीन वहाँ के रीति-रिवाज़, फूल पौधों, घर-दुआर में अटका हुआ है। इसलिये एक अनजाना दर्द है इसकी लय में। एक पीलापन है इसकी गात में। फिर धीरे धीरे यह दुलहिन भी इसी धान की तरह अपनी जड़ें जमा लेगी और हरी-भरी हो जाएगी। फिर समयानुसार 'सृजन' का सुख भी आएगा इसके हिस्से में। अचानक दिल ने कहा-और अगर लड़की हुई तो ....तो फिर विस्थापन? यही न! नहीं नहीं। यह विस्थापन नहीं, यह तो सृजन की यात्रा है। अगर धान के बीज उसी खेत में छोड़ दिए जाएं तो धान की फसल अच्छी उगेगी ही नहीं।यह विस्थापन हर दुलहिन इसीलिये तो हँस कर झेल जाती है कि उसे सृजन करना है। ओह!सुबह सुबह ही भावुक कर दिया इस नई नवेली दुलहिन ने।

गीत के बोल अब बंद हो गए हैं। मैं व्याकुलता से उसे ढ़ूंढ रहा हूँ। पर शायद रोपनी खत्म हो गई है। मैं घर से बाहर निकल कर उसके खेत में आ गया हूँ। जिधर वो धान रोप रही थी। जिस आखिरी पौधे को वो दो मिनट पहले ही रोप गयी है, उसे प्यार से सहलाता हूँ। अब मैं संतुष्ट हूँ कि धान की फसल के साथ साथ लोकगीत भी तब तक सुरक्षित रहेंगे जब तक एक स्त्री 'विस्थापन से सृजन तक' की इस अद्भुत यात्रा की मुसाफ़िर बनती रहेगी।

 

 

असित कुमार मिश्र
सिकन्दरपुर
बलिया

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