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न भूले भारत अपने आत्म सम्मान को

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- दयाधर जोशी

 

कुछ ही वर्षों पूर्व फिल्म जगत के एक कवि ने बहुत सुन्दर गीत लिखा था, जिसका मुखड़ा है

-

जहाँ दिल में सफाई रहती है, होठों पर सच्चाई रहती है, हम उस देश के वासी हैं,

जिस देश में गंगा बहती है।

कितना उदात्त आत्म-सम्मान! इसीलिये हमारे प्राचीन पुराणरत्न श्रीमद्भागवत् का वचन है कि

पूर्णतः पुण्यात्मा जीव का ही जन्म भारत देश में होता है। सच है -

बिस्व भरन पोषन कर जोई-ताकर नाम भरत अस होई ।

रा.च.मा. १/१९७/७

भारत विश्व का आध्यात्मिक भरण-पोषण सदा से करता आया है। हजारों वर्षों से हमारे पूर्वज प्रार्थना करते आये हैं-

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवते ्।। सर्वजन रहें सुखी, निडर हों सभी, देखें सब अच्छा शुभ, प्राप्त न हो दुःख को कोई भी। विश्व का यही भरण-पोषण करता हुआ भारत अपने नाम को सार्थक करता है। हमारे नीति शास्त्र का कहना है -

मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत्।

आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पश्यति।।

जो दूसरे की स्त्री को माता के समान, दूसरे के धन को मिट्टी के ढेले के समान और सब प्राणियों को अपने समान देखता है, वास्तव में वही देखता है, इससे विपरीत देखने वालों को आसुरी प्रकृति का बिना सींग और पूंछ वाला साक्षात् पशु ही समझना चाहिये। संस्कृत में एक मंत्र है, 'यथा नाम तथा गुणः' अर्थात् जैसा नाम वैसा गुण। पूज्या मुम्बा माता के नाम पर आधारित नाम है मुम्बई। अब एक नाम और सुनने में आता है 'बॉलीवुड', निरर्थक सा नाम, कदाचित बौरा (बावला) पर आधारित हो। यही नाम आज देशवासियों की शारीरिक और मानसिक शुचिता का नाश कर रहा है। अश्लील चलचित्र व दृश्य छापे जा रहे हैं, जिसे हमारे बच्चे व युवा वर्ग शौक से पढ़ते हैं। इस बॉलीवुड का अनुसरण छोटे पर्दे ने भी कर लिया है। अपने घर बैठे सभी बड़े शौक से देख रहे हैं इस अश्लीलता को। यह सब देख कर हमारा आध्यात्मिक, धार्मिक, नैतिक और समाजिक पतन हो रहा है। हमारा नीति-शास्त्र महत्त्वहीन हो गया है। हर व्यक्ति का पहनावा स्वयं उसे एवं देखने मिलने वालों को भी प्रभावित करता है।

शरीर को धूल-धुंए, गर्म ठंडी हवा, कीड़े-मकौडा़े से बचाने तथा शालीनता के उद्देश्य से कपड़े पहने जाते हैं। किन्तु आजकल जो वस्त्र पहने जा रहे हैं मात्र अंग प्रदर्शन के उद्देश्य से पहने जा रहे हैं। कपड़ों के रंग भी भड़कीले होते हैं, जो अधिक गर्मी एवं प्रकाश किरणों से रसायन सोख कर शरीर को नुकसान पहुँचाते हैं। ऐसे वस्त्रों से हमारा व्यक्तित्व शोभन लगता है या नहीं, इस पर बुद्धि विचार का समय किसी के पास नहीं है। इन कपड़ों को पहन कर युवक-युवतियाँ एक दूसरे पर पाप दृष्टि करते हैं। यहाँ तक कि प्रौढ़ भी जवान युवतियों पर पाप दृष्टि करते नजर आ रहे हैं। कामुक चल चित्र, गंदा साहित्य व कामुक पहनावे के कारण बच्चों व युवक-युवतियों के मन में विकार उत्पन्न हो रहे हैं, बल, बुद्धि व आयु का नाश हो रहा है। देश में एड्स जैसा भयंकर रोग तेजी से पाँव पसार रहा है। हमारे तरुण समाज का पतन हो रहा है। राष्ट्र का भविष्य अंधकारमय हो रहा है। सरकार कुछ नहीं करेगी। देश के सभी अभिभावकों, नर-नारियों को इस पर विशेष ध्यान देना चाहिये।

भविष्य के दुष्परिणामों के बारे में सोच कर अभी से संभल जाना चाहिये। गंगा, यमुना जैसी नदियों को मोक्षदायिनी कहा जाता है। इनका जल धर्ममय है, अमृतमय है। इन नदियों में स्नान करने से मनुष्य पाप मुक्त हो जाता है। आज इन पवित्र नदियों में लगभग सभी शहरों की गंदगी को डाल कर प्रदूषित कर दिया गया है। क्या आज भी इन नदियों का जल धर्ममय है, अमृतमय है? इन नदियों के प्रदूषित जल में आज भी करोड़ों लोग स्नान करते हैं। इनके लिये ये नदियाँ आज भी मोक्षदायिनी हैं और आगे भी मोक्ष प्राप्ति के लिये इन नदियों के प्रदूषित जल में लोग स्नान करते रहेंगे। इनकी श्रेष्ठता, पवित्रता और स्वच्छता को बनाये रखने के बारे में कोई नहीं सोच रहा है।

लगभग 50-60 वर्ष पूर्व चांदनी चौक दिल्ली के प्राचीन घराने के हमारे एक सहकर्मी ने बताया था कि उनकी बिरादरी के एक सज्जन दिल्ली नगर पालिका में ड्राफ्टमैन थे। उस समय दिल्ली छोटा शहर था। नई दिल्ली तब निर्माणाधीन थी। बंगाली मार्केट व दरियागंज का विकास हो रहा था। इन क्षेत्रो के गंदे नालों के निकास के सम्बन्ध में उनसे कहा गया कि नक्शे में इस गंदे पानी को यमुना नदी में गिराना दिखाया जाए। उन्हें यह बात अच्छी नहीं लगी। अधिकारी ने उन्हें समझाया, आपको तो इसे केवल नक्शे में दिखाना है। ड्राफ्टमैन महोदय को अधिकारी का सुझाव अनुचित लगा। उन्होंने अपनी श्रद्धा-आन पर अपने पद से त्याग पत्र दे दिया।

आज हर तरह की गंदगी को इन मोक्षदायनी नदियों में डाला जा रहा है। लोग दूषित जल में नहा रहे हैं, दूषित जल को पी भी रहे हैं। अब कुछ खान-पान की भी बात कर लें। कहावत है - 'सहज पके सो मीठा होय'। अभिप्राय है, धीरे-धीरे स्वाभाविकरुप से भोजन, फल, अनाज आदि पकें तो मीठे होते हैं। लेकिन सब लोग कांचन मृग (धनार्जन) के पीछे इतनी तेजी से भाग रहे हैं कि उन्हें खाना, फल आदि पकने-खाने का न समय है न समायोजन। इस संदर्भ में एक कथा याद आती है-एक सेठजी यथेष्ट सम्पन्न थे। उन्हें रात्रि भोज में अपने क्षेत्र के दस-बीस जनों को निमंत्रित कर गपशप करते हुए भोजन करने का शौक था। कुछ वर्ष बीत जाने के बाद सेठजी की पाचन क्रिया बिगड़ गई। चिकित्सा के बाद भी पाचन क्रिया ठीक नहीं हुई तो क्षेत्र के ख्यातिनाम वैद्यजी को बुलाया गया। वैद्यजी ने सबसे पहले उनके भोजन करने के तरीके की जानकारी ली। शाम को उनका भोज-जलसा देख कर उन्हें सुझाव दिया कि जनसमुदाय के बीच भोजन करना छोड़ दो। अपने घर परिवार के साथ या फिर अकेले भोजन करो, शीघ्र ही स्वस्थ हो जाओगे। सेठजी ने सलाह मानी और कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो गये।

कच्चे फलों को हानिकारक रसायनों में पका कर बेचा जा रहा है। ये देखने में तो आकर्षक लगते हैं, लेकिन बेस्वाद व हानिकारक साबित हो रहे हैं। बाजार में पीजा, बर्गर जैसे जंक फूड्स की तरफ सबका आकर्षण बढ़ गया है। छोटे-बड़े सभी सड़कों, मैदानों, बस अड्डों पर धूल मिट्टी, गंदगी व मक्खी-मच्छर वाले स्थानों पर बन रहे खाने, चाट-पकौड़ी आदि को वहीं खड़े-खड़े बड़े चाव से खाते हैं। धर्म नियम में यह सब वर्जित है। क्योंकि 'जैसा खाये अन्न वैसा बने मन'। 

ऐसे ही प्रत्येक घर में बच्चों के नाम तो अच्छे-अच्छे ही रखे जाते हैं, लेकिन बचपन में प्यार से उन्हें बंटी, शंटी, टॉनी जैसे निरर्थक शब्द नामों से पुकारा जाता है। ऐसा हमने भी किया। कोई भी इस गलती पर बुद्धि विचार नहीं करता कि इससे भारत की दैवी संतानों के गुणों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उनके व्यक्तित्व-व्यवहार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ऐसा तो नहीं कि इसी कारण उनकी दिल की सफाई, होठों की सच्चाई फीकी पड़ती जा रही है। प्रतिदिन समाचार पत्रों में असत् अमानुषिक कर्मों के समाचार ही अधिक दिखायी देते हैं। कारण स्पष्ट हैं, लेकिन कारणों का निवारण करने की चिन्ता किसी को भी नहीं है।

आज हमारा देश पश्चिमी भौतिकवाद ‘Eat, drink and be merry’ को अपना रहा है। खाओ, पीओ, मौज करो, की संस्कृति भी बॉलीवुड की ही देन है, अश्लील साहित्य, अश्लील चलचित्र और पहनावे की देन है। पश्चिमी भौतिकवाद शराब पीने की बात कहता है। इस भौतिकवाद में नैतिकता नहीं है। इसमें निर्लज्जता, स्वच्छंदता और उद्दंडता है। फिर भी आज का समाज व आज की युवा पीढ़ी इसे सहर्ष स्वीकार कर रही है। पूरे समाज में नास्तिकता दिनों दिन बढ़ रही है। लोग अपनी संस्कृति, सदाचार और सद्गुणों का त्याग करते दिखायी दे रहे हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की आदर्श मर्यादा युवा वर्ग को आडम्बर लगने लगी है। परिणाम सभी के सामने है। चारों ओर अराजकता, उच्छृंखलता में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। देर रात तक होटलों में शराब, नृत्य आदि होते रहते हैं। सड़कों पर झड़पें, बलात्कार, वाहन दुर्घटनाएं, व्यभिचार व भ्रष्टाचार की घटनाएँ लगभग नित्य ही पढ़ने, सुनने व देखने में आती हैं। बृहस्पति के शिष्य चार्वाक ने वर्षों पहले कहा था-

यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत्

भस्मी भूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः

जब तक जीवो सुख से जीओ। कर्जा करके घी पीओ। चिता में जलने के बाद कुछ नहीं बचता, इसलिये जन्म-जन्मान्तरों की यात्रा का प्रश्न ही नहीं उठता। यह था भारतीय भौतिकवाद एवं नास्तिकवाद, जिसके प्रचालक ऋषि चार्वाक इहलोक को मानते थे। इनके मतानुसार स्वर्ग, नरक (परलोक) व पुनर्जन्म जैसा कुछ भी नहीं है। यहाँ चार्वाक ने ऋण लेकर घी पीने की बात कही है, शराब पीने की नहीं। चार्वाक के भौतिकवाद में मर्यादा है। इसमें धृष्टता, लज्जाहीनता, स्वेच्छाचार एवं अदम्यता को कोई महत्त्व नहीं दिया गया है। यह था चार्वाक का नैतिकता से परिपूर्ण नास्तिकवाद। वहीं पश्चिमी भौतिकवाद नैतिकता से परे है। हमारे देश के लोगों ने इस नैतिकता से परिपूर्ण भौतिकवाद को भी नहीं अपनाया। सभ्य समाज ने एक ही बात कही, अच्छा आचरण ही मोक्ष का मार्ग है

'उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्'-उदार चिंतन करने वाले अच्छे चरित्र के लोगों के लिये ये पूरा संसार कुटुम्ब की तरह है। यत्र विश्वं भवत्येक नीडं-भारतवासियों का देश अपने उदार चरित्र से पूरे विश्व को एक नीड़ (घोंसले) की तरह मानते हैं। ऐसे में हम मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम की आदर्श मर्यादा को आडम्बर कहने का दुःस्साहस क्यों कर रहे हैं? आंखें खोलिये, पश्चिमी भौतिकवाद, नास्तिकवाद को छोड़िये, बुद्धि विवेक से काम कीजिये। जीवन में हनुमानजी की तरह इन्द्रिय-जयी बनने का प्रयास कीजिये। प्रभु श्रीराम की आदर्श मर्यादा का पालन कीजिये। इसी में हमारी व हमारे राष्ट्र की भलाई है। महात्मा गांधी हमें एक प्रार्थना सिखा गये हैं- 'सबको सन्मति दे भगवान्', इस पर मनन कीजिये। तथास्तु, आमीन, इत्यलम्-ऐसा ही हो। 'यतो धर्मस्तो जय':- जहां धर्म है वहीं विजय है। 'धर्मो रक्षति रक्षितः' यदि हम धर्म की रक्षा करेंगे तो धर्म भी हमारी रक्षा करेगा।

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