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अलका तिवारी की मानसूनी प्रेम कविताएँ

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•    1. उसका होना

.........................................
रही मुझमें शामिल तुम
बस हाल ही में गुजरे इस सफर में
और अब देखना तुम्हें
साँस लेते हुए 
अपने वजूद के साथ
जैसे उग आई है, पेड़ों पे नई कोंपल
और दिन व दिन
बढने लगी है तिनका तिनका
अपना उजला सा रंग लिए
आने वाली वसंत के साथ
जैसे चहकती है चिड़िया
सिमटती हुई अंधेरे की चादर के साथ
तो मिठास सी घुल जाती है कानों में
हर सुबह हो जाती है
थोड़ी और गुलाबी सी
जैसे बारिश के बाद
और भी आसमानी हो जाता है
आसमान
जैसे ठंडी हवा
एक संगीत भर जाती है मुझमें 
धीरे से गुनगुनाने को
जैसे उकेरा हो एक चित्र पन्ने पे, किसी चित्रकार ने
और फैलने लगी हो खुशबुएं
उसके विचारों की
हर ओर
जैसे घंटे की धुन
ठहर जाती है कानों में
देर तक गहरे से
और बहता है कुछ
मेरे भीतर
नर्म गीले रुई के फाये के
के स्पर्श सा
बस तुम्हारे होने भर से

 

•    2. अब भी कुछ बाकी है

........

फिर से
चहचाते हुए चिड़िया का
बस करीब से गुजर जाना
ठंडी हवा का, यूँ जोर से छूकर जाना
उसे एहसास करता है
कि शायद अब भी
कुछ बाकी है उसमें,
वरना दरों – दीवारों को देखकर
देर तक,
अब अपने ही आस पास
खोजती सी नजर आती थी वो
शायद खुद के होने को    

 

•    3. घर

...............

कुछ टूटी दरकी दीवारों का वो छोटा सा घर
जिसमें खुलते थे दरवाजे दोनों तरफ 
अन्दर आती बूंदों की बौछार से
सट – सट कर बैठना
तैर जाता है अब भी कई बार
उसकी सपनीली आँखों में
वो माँ का घर हो चला है अब भाई का
धीरे धीरे जानने लगी थी
कि वो नहीं है उसका घर
सबके बार बार
किसी न किसी जिक्र में, पराये होने की
एक हल्की सी याद भर दिलाते रहने से
आँखों ही में चित्र बनता और मिटाता रहता बार - बार
तो फिर कैसा होगा मेरा घर
गुजरते दौर के साथ अब 
बदल गया है वो घर
और घर के साथ
उसके मालिक और उसके नाम की चिप्पी भी
अब लगने लगा है उसे
ये घर भी तो
मेरा नहीं तो फिर कौन-सा है मेरा घर
पहले सा जिक्र भी अब तो
नहीं आता किसी की बातों मैं
जानने लगी थी वो अब,
वो सब कुछ, जिसे उसके जेहन का हिस्सा बना देने की मशक्कत
जारी रही थी उसके होश सम्हालने के पहले के अरसे से ही
पर उसकी आंखों में वो कोना
अब भी खाली खाली है

 

•    4. कहना

उसने ही तो कहा था
कि जब जब लगने लगे कुछ
तो तुम कह देना मुझे बस
कितना सरल लगा था
सब कुछ पर
बिना कहे ही, वो ऊँची आवाज
जिसकी गूँज अब भी रह गई है मेरे कानों में
सिखा दिया है उसने,
उसे ये तय करना
कि क्या क्या नहीं है कहना अब से

 

•    5.   एक कोना     
     
      ढूंढना चाहती हूँ एक कोना
अपने ही घर में
चुपचाप देर तक पड़े रहकर
ठंडी हवा और खुद से बातें करने के लिए 
पर शायद मुमकिन नहीं है मेरे लिए ये 
लगता है कुछ ऐसा चाह लिया है मैंने
जो शायद नहीं है उतना जायज

 

•    6. सब कुछ टूटता चला जा रहा है धीरे धीरे
मुझमें बिन किसी खड-खड़ाहट के
नहीं तो जान ही जाते, शायद तुम भी 
चाहती हूँ रोक लूं खुद को
इस धार में बह जाने से
पर कठिन है अब, ये मेरे लिए ये सब
बहुत ही झीना कर गया है मुझे 
तुम्हारे जीवन में, बार - बार
मेरे होने का बिन कहा
अस्वीकार

 

•    7. जोर से चिपट कर, सर रख लू काँधे पे
थोड़ी देर तक ताकि बह जाए
वो पानी सारा 
जो मुस्कराने की कोशिश में तैर जाता है बार बार
आंखों की किनार पर तुम्हारे होने भर से
और तुम्हारी दोस्ती की गरमाहट से
पिघल कर आ जाए बाहर वो सब कुछ
जो घोल रहा है मुझे जाने कब से 
और हो जाए सब कुछ
मुझमें, फिर से सब गुलाबी गुलाबी सा
     अँधेरी चादर को उघाडती हुई
     भोर की तरह

 


8.उठाती हूँ बार बार फोन, उगलियाँ दबा देना चाहती है
उन बटनों को जल्दी से
जो मिला देंगी तुम्हें मुझसे
पर कुछ है, जो रोक लेता है आकर
धीरे से मेरी उँगलियों को
और रह जाता है मुझमें
कुछ तुम्हारा
रेशमी तकिए सा

 

9. वो बह जाना चाहती थी 
    बहुत दूर तक, पर जानती थी  
  आईना कहाँ है सामने जो समेट पाए
  उसे वैसे ही प्रतिबिंबित होने के लिए 

 

10. आँखों की वो तहजीब
          खींच जाती है चार दीवारी उसकी ओर
          और तयशुदा हो जाता है हवा - पानी भी
          सांसें चलती रहती है फिर भी अविरल सी 
          मुंदने लगती है वो सारी दरारें
          जिससे जा पाते भीतर चंद टुकड़े रौशनी के
          पनप जाती वो बेल, थोडा सहारा भर पाकर
          जिसे कब से रोप रही थी वो तिनका – तिनका
          अपनी आंखों की कोर में
          सराबोर हो जाती है वो क्षण भर को
          जैसे कोई माँग रहा हो इजाजत उसकी आँखों के भीतर
          हवा में बिखर जाने की

                      
11.              हर तरफ फैले हुए हैं कुछ पन्ने रंग बिरंगे से
                        हर पन्ना जैसे एक अलग रंग का है
          हर पन्ने में कुछ खास से शेड है
          समेटना चाहा जैसे ही मैंने इन पन्नों को
          तो धीरे धीरे मुस्कुराने उठे सब के सब मुझ पर
          जैसे नहीं चाहता हो आना कोई भी मेरे पास उनमें से
          किसी दुसरे के नीचे दब जाने के लिए
          फिर छोड़ दिया मैंने उन्हें यूं ही पड़े रहने को उन्हें बस बिखरे हुए से
                      और झांक रहे थे वे सब कनखियों से मेरी और
          बस बैठकर मेरे सिराहने देर तक
                      जैसे चाह रहे हों कहना वो सब कहानी
                      अपने - अपने होने की

--

(ऊपर का चित्र - डॉ. रेखा श्रीवास्तव की कलाकृति)

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