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मौलिकता ही देती है खास पहचान

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डॉ. दीपक आचार्य

 

हम सभी की सबसे बड़ी दुविधा यही है कि हम अपनी नैसर्गिक मौलिकता को बरकरार नहीं रख पाते हैं। कभी मन की कल्पनाओं के अनुरूप कर्म और व्यवहार बनाना चाहते हैं, कभी दूसरों की देखा-देखी अपने आपको इतना अधिक बदल डालते हैं कि हमारी मौलिकता पूरी तरह नष्ट हो जाती है।

और अधिकांशतया हम जमाने की अभिरुचि और मांग के अनुरूप खुद को ढाल लेने के जतन में लगे रहते हैं। हम जमाने को वो नहीं दे पा रहे हैं जो हमारे पास है, जिनमें हमें महारत हासिल है या जिसके लिए भगवान ने हमें धरती पर भेजा हुआ है। 

हम अपने आपको आत्महीन और हमारे पास विद्यमान सामथ्र्य या शक्तियों को कमजोर मानने की भूल करने लगे हैं और इसी का नतीजा है कि हमारे भीतर से जमाने को बदल डालने की शक्ति खत्म हो गई है और इसका उल्टा हो गया है।

हम अपने आपको अब जमाने के अनुरूप ढालने की हरचंद कोशिशों में लगे हुए हैं। हर इंसान की अपनी विशिष्ट मौलिकता होती है जिसके आधार पर दूसरों से अपने आपको अलग ही स्थापित करता है और जमाने के लिए नवीन सृष्टि के प्रयासों में भागीदारी निभाता है।

दुनिया में हर इंसान के पास अपना एक खास हुनर जरूर होता है लेकिन हम लोग अपने हुनर या सामथ्र्य की अक्सर अनदेखी करते रहने के आदी हो गए हैं। हममें से अधिकतर लोगों को अपने भीतर समाहित परमाण्वीय ऊर्जाओं और परिवर्तनकारी शक्ति का अहसास नहीं है अथवा भुला चुके हैं।

इसमें हमारा ही पूरा दोष नहीं माना जा सकता। कुछ बीते कालखण्ड का भी दोष है जिसमें हमें अपनी परंपराओं, संस्कृति, विलक्षणताओं और वैश्विक स्तर की घनीभूत ऊर्जाओं के बारे में कभी कुछ नहीं बताया गया बल्कि इस महानतम और विलक्षण ज्ञान से किनारे रखने की कोशिशें की गई।

फिर पुरानों में भी खूब सारे लोग ऎसे रहे हैं जिन्होंने हमें जड़ों से जुड़ने की बजाय पाश्चात्यों के करीब ला खड़ा कर दिया जहां कर्मवाद गौण हो गया और भोगवादी दृष्टिकोण इतना हावी हो गया कि हमने भौतिक विकास को ही असली विकास मान लिया। इंसानियत काफी पीछे चली गई।

यही कारण रहा कि हम उन जड़ों से कट गए जो धरती से लेकर आसमान तक की खबर रखती थीं और प्रकृति में परिवर्तन की भूमिका रचने में समर्थ थीं।

वह समय आ गया है जब हमें अपनी आत्महीनता को त्यागने की दिशा में गंभीरता से कुछ सोचना होगा। हममें से हर इंसान में दुनिया बदल डालने की शक्ति विद्यमान है लेकिन हमारी आत्महीनता का दौर तब शुरू हो जाता है जब हम अपनी मौलिकता, अपने हुनर और ज्ञान को कमजोर मानकर दूसरों की शिक्षा-दीक्षा और चकाचौंध को दुनिया का महान सत्य मानकर अपनी दिशा-दृष्टि को त्यागकर औरों के चश्मे से संसार को देखना आरंभ कर दिया करते हैं।

जब तक हम अपनी मौलिकता के दायरों में रहते हैं तब तक हम अनन्य भाव से जीते हैं और पूरी मस्ती के साथ अपने भीतर समाहित अन्यतम मेधा-प्रज्ञा और प्रतिभा को अच्छी तरह जानते-पहचानते हैं। यह वह समय होता है जबकि हम जैसे हैं, वैसे ही दिखते हैं, और वैसा ही व्यवहार करते हैं। और ऎसा होना भी चाहिए। परायों को प्रभावित करने खुद को बदल डालने और उनकी लकीरों पर घसीटते रहना कहाँ ही बुद्धिमानी है।

हमारे जीवन कर्म में जब तक कहीं भी किसी भी प्रकार का कोई आडम्बर नहीं होता तब तक हमारे व्यक्तित्व की चरम पारदर्शिता बनी रहती है।  यही पारदर्शिता हमारे व्यक्तित्व के सुनहरे पक्षों का दिग्दर्शन हमारे चेहरे, दिव्य ओज-तेज और शारीरिक सौष्ठव से भी परिलक्षित होती है। 

लेकिन जैसे ही हम अपने मौलिक हुनर और अपनी खासियतों को भुलाना आरंभ कर दिया करते हैं तब हम वो नहीं रहते जो हम हैं। हम उस सीमा तक ही अपने आपको अद्वितीय और विलक्षण महसूस कर पाते हैं जब तक हम अपनी मौलिकता को बनाए रखते हैं। इसे छोड़ देने के बाद हमारे जीवन के सारे रंग-ढंग बदलकर पराये और बनावटी होने लगते हैं।

जब तक हम मौलिकता लिए हुए होते हैं तभी तक हमारा आकर्षण, व्यक्तित्व की ऊँचाइयां और सुगंध बरकरार रहती है। दूसरे लोग भी इस बात का पक्का अनुभव करते हैं कि हममें कुछ ऎसा खास जरूर है जो औरों में नज़र नहीं आता।

अपनी मौलिकता और हुनर के प्रति पूर्ण शुचिता और समर्पण बरकरार रखने में जो लोग सफल हो जाते हैं वे दुनिया में परिवर्तन लाने में भागीदार बनने का श्रेय पा लेते हैं लेकिन मौलिक स्वरूप व स्वभाव खो देने वाले लोग भेड़ों की रेवड़ की तरह इनके पीछे-पीछे चलते शुरू हो जाते हैं। 

हर भेड़ यह सोचती जरूर है कि वह आगे से आगे निकल जाए लेकिन आत्महीनता और अपने आपको सिर्फ गर्दन झुकाये चलने वाला निरीह पशु मानने की आत्महीनता उसे ऎसा नहीं करने देती बल्कि पीछे-पीछे चलते हुए अंधानुकरण को अपनाने के सिवा उसके पास और कोई चारा नहीं होता।

सभी लोग अपनी मौलिकता और हुनर को बरकरार रखें तो आने वाले समय में दुनिया को ऎसा कुछ दे सकने की स्थिति में अपने आप को पा सकते हैं जैसी कि न उन्होंने कभी कल्पना की होगी, न उनके पुरखों ने।

हम जिस किसी क्षेत्र या हुनर में अपने आपको दक्ष मानते हैं उसी में आगे बढ़ने का प्रयास करें, दुनिया की देखादेखी और सम सामयिक चकाचौंध से परे रहकर समाज के लिए ऎसा कुछ करें कि जो दूसरे नहीं कर पा रहे हैं।

हमारे मौलिक हुनर का एक बीज पूरी दुनिया को आनंद पाने की नई फसलें दे सकता है। वस्तुतः मौलिकता वही है जो हमें पूर्वजन्मों और आनुवंशिक रूप से प्राप्त होती है।  और इन्हीं तानो-बानों को अपना कर आगे बढ़ने पर हमें आशातीत सफलताएं निरन्तर प्राप्त होती रहती हैं।

मौलिकता अपने आप में वह सूत्र है जो पुरातन ज्ञान, अनुभवों और विलक्षण हुनर का समन्वित और घनीभूत तात्विक प्राकट्य का सशक्त माध्यम है।

जैसे हैं वे वैसे ही रहें, दिखें। दोहरा-तिहरा चरित्र न अपनाएं, आडम्बरों से दूर रहें। जमाने की चकाचौंध से बचें, जमाने को नई चकाचौंध से नहलाने लायक बनाएं अपने आपको।

मौलिकता इंसान की सफलता का पहला अध्याय है जो पारदर्शिता, सहजता और प्रगतिशीलता के साथ व्यक्तित्व विकास की सारी ऊँचाइयां प्रदान कराता है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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