बुधवार, 8 जुलाई 2015

जीवन उसी का जो सीख जाए शांत रहना

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डॉ. दीपक आचार्य

 

जीवन और जगत के बारे में मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना वाली स्थिति है। भोगवादी लोगों के लिए संसार स्वर्ग है और कर्मवादी लोगों के लिए कर्मयोग का रणक्षेत्र।

सबके लिए दुनिया अलग-अलग रंगों और रसों वाली है। जिसकी जैसी भावना, जैसा लक्ष्य, वैसा ही संसार है यह। सदियों से कहा जाता रहा है -ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, असारे खलु संसारे.. आदि-आदि। ऎसे बहुत सारे जुमले पीढ़ियों से प्रचलित रहे हैं।

जीवन और जगत की इन सभी प्रकार की परिभाषाओं और मिथकों के बीच इस तथ्य को स्वीकार करना ही पड़ेगा कि यह संसार असंतोष,  अशांति, अतृप्ति और अभावों से इस कदर भरा हुआ है कि यहाँ कोई शांत नहीं है। सारे के सारे किसी न किसी चक्कर में फंंसे हुए जाने कहाँ से कहाँ भाग रहे हैं, कोई स्थिर नहीं है।

शारीरिक रूप से चलायमान होने की स्थिति में नहीं रहने वाले दिमागी घोड़े दौड़ा रहे हैं। किसी को चैन नहीं है, किसी के बारे में कहा नहीं जा सकता कि वह संतृप्त और संतुष्ट है। जगत के इसी बहुआयामी और बहुरूपिया व्यवहार तथा नित नवीन आकस्मिक और अप्रत्याशित परिवर्तनों के कारण ही संसार को अशांत कहा जाता है।

यह इस बात से भी सिद्ध होता है कि जब कोई भी इंसान देह त्याग देता है तो उसके बारे में स्पष्ट तौर पर कहा जाता है कि वह शांत हो गया है। प्राण त्याग देने के बाद सभी के लिए यही कहा जाता है। इसका साफ संकेत है कि जब तक वह संसार में था तब तक अशांत था, तभी तो मृत्यु उपरान्त ‘शांत हो गया’ कहा जाता है।

इसी प्रकार कोई बीमार या आप्तजन मृत्यु को प्राप्त हो जाता है तब लोग यही कहते हैं आज उसके सारे दुःख और पीड़ाएं ठण्डी पड़ गई हैं, त्रास से मुक्ति मिल गई आदि। मन-मस्तिष्क और शरीर के संयोग भरी यह मानव देह कभी शांत नहीं रह सकती। वह हमेशा किसी न किसी सोच-विचार में लगा रहता है।

आदमी कभी भी चुपचाप नहीं बैठ सकता। दुनिया में कोई सा स्त्री-पुरुष ऎसा देखने में नहीं  आएगा जो कहीं भी बिना किसी हरकत के बैठा हो। हर क्षण वह कुछ न कुछ करते ही रहते हैं। जाने वाला तो सारे दुःखों और पीड़ाओं को बिसरा कर चला जाता है, शांत हो जाता है। लेकिन उसके दस-पन्द्रह दिन तक उन सभी परिजनों को सान्त्वना दी जाती है जो उसके दुःख के क्षणों में या अशांत जीवन के दिनों में साथ निभाते हैं।

कुल मिलाकर संसार की स्थिति यही है कि जो रहता है वह अशांत रहता है, जाने वाला ही शांत होता है। शांत और अशांत शब्दों के पेण्डुलम से अलग हटकर हम सभी गंभीरतापूर्वक यह सोचें कि आखिर क्यों नहीं हम ऎसा कुछ करें कि जीवन और जगत के रहते हुए अपने आपको सदैव शांत रखने का प्रयास करें ताकि हमारे जाने के बाद यह जुमला निरर्थक हो जाए कि शांत हो गए।

शांति की प्राप्ति जीवन का परम ध्येय बना लिए जाने पर हम इस शाश्वत सत्य और यथार्थ को प्राप्त कर सकते हैं लेकिन इसके लिए हमें जीवन में रहते हुए बहुत कुछ ऎसा करना होगा कि जिससे हमारा मन-मस्तिष्क अशांति, असंतोष और उद्विग्नताओं से दूर रहे।

इनसे दूर रहने का एकमात्र उपाय यही है कि हम संसार के स्वामी बनने का कुत्सित विचार त्यागें, संसार के दास न बनें और पूरा जीवन उस ट्रस्टी की तरह बिताएं जो कि किसी सम्पत्ति या सँरचना का मालिक  नहीं मानता बल्कि सेवाव्रती के रूप में समर्पित होकर काम करता है, उसे किसी भी द्रव्य या भवनादि के अपने होने का कोई बोध नहीं होता बल्कि उसके सामने अपने कत्र्तव्य कर्म का निर्वाह ही लक्ष्य होता है, किसी भी प्रकार का संचय करने या कुछ भी अपने नाम करने का तनिक भी कोई दुर्विचार नहीं।

जो इस पारमार्थिक वृत्ति के साथ काम करता रहता है, चुपचाप अपने कर्म में लगा रहता है उसे संसार की ओर से उसके लिए जरूरी हर वस्तु, यश और सम्मान अपने आप मिलता रहता है जो प्राप्य है।

इसके विपरीत बहुसंख्य लोग संसार को अपनी मुट्ठी और तिजोरी में कैद करने के स्वप्न देखते हैं, कम समय में अधिक से अधिक जमीन-जायदाद अपने नाम कर लेने के लिए गोरखधंधों में रमे रहते हैं, बिना कुछ किए रातों-रात प्रतिष्ठित और लोकप्रिय हो जाने के ख्वाब देखते रहते हैं वे लोग अपने जीवन में ठोस और मूल कर्म को त्यागकर हर मामले में शोर्ट कट तलाशने के अभ्यस्त हो जाते हैं और दिन-रात इसी उधेड़बुन तथा निन्यानवें के फेर में लगे रहते हैं।

ऎसे में इन लोगों के लिए शांति पाना अपने आप में दुर्लभ है। ये लोग स्वप्न में भी अशांत और उद्विग्न रहते हैं। असंतोष, अतृप्ति और उद्विग्नताओं के चलते किसी भी इंसान का शांत रहना नितान्त असंभव ही है। इसके लिए ईश्वरीय इच्छा का आदर करते हुए भगवदीय प्रवाह मेंं बहने की आदत बना लेना तथा अपने कर्मयोग में पूरी मस्ती के साथ रमे रहने के सिवा और कोई उपाय है ही नहीं।

संसार से उसी की अपेक्षा रखें जो हमारे लिए जरूरी है, उससे अधिक की अपेक्षा रखना ही अशांति का मूल कारण है। फिर यह भी तय मानकर चलें कि जो हमारे लिए प्राप्य है, वह प्राप्त होकर रहेगा। उसे कोई छीन नहीं सकता। और जो हमारे लिए उपयुक्त नहीं है उससे हमारी दूरी बनी ही रहेगी, चाहे लाख कोशिश क्यों न कर ली जाए।

हर स्थिति को ईश्वरीय विधान मानकर अपने कत्र्तव्य कर्म में लगे रहना ही असीम शांति का एकमात्र स्रोत है। वस्तुतः यही जीते जी जीवन्मुक्ति है। जो इसे अपना लेता है उसे मृत्यु से पूर्व ही चरम शांति और आनंद का अहसास होता है, उसे मृत्यु का भय भी नहीं रहता, वह मृत्यु के लिए सहर्ष तैयार रहता है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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