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तेरा-मेरा करते रहो, साथ कुछ न जाएगा

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डॉ. दीपक आचार्य

 

वो जमाना चला गया जब पहले तुम-पहले तुम जैसी बातें तरन्नुम में गायी भी जाती थीं और इसका लोक जीवन में अनुसरण भी होता था।  कोई सा कर्म हो, कोई सा लाभ या पाने का अवसर हो, जो दूसरे के लिए पहल करता है वही इंसान है, खुद के लिए जो कुछ करता है वह निचले दर्जे का प्राणी कहा जाता है।

समय के साथ नैतिक मूल्य और मानदण्ड सब कुछ बदलता ही जा रहा है। बात किसी लाभ को पाने की हो, कुछ पाने के लिए प्रतीक्षा में खड़े हों या फिर और कोई सा विषय हो। मानवता यही कहती है कि जो औरों की चिन्ता करता है वही मनुष्य है, जो खुद की ही चिन्ता में भटकता रहता है वह इंसान का जिस्म भले ही चुरा कर आ गया हो, इंसान हो नहीं सकता।

हमने अपने आपको स्थापित करने, स्वार्थों को पूरा करने के लिए सब कुछ दाँव पर लगा दिया है। यहाँ तक कि इंसानयित को भी। मिल-बाँट कर खाने और वैकुण्ठ जाने की सारी बातें बेमानी हो गई हैं, पहले औरों के लिए सोचने और करने की परंपराओं का तकरीबन खात्मा ही हो चुका है।

न हमें अपने आस-पास वालों की चिन्ता रही है, न औरों की। हममें से अधिकतर लोगों को यह तक नहीं मालूम होगा कि अपने पड़ोस में कौन रह रहा है, क्या हो रहा है। अपने ही अपने आप में सिमटे हुए हम लोग दुनिया जहान की बातें करते हैं और सोच के मामले में दड़बों और अपने दो-चार लोगों से ज्यादा सोचने की फुर्सत तक नहीं है।

कुछ दशकों पहले की ही बात है जब फिल्मी गाना ‘ पहले तुम-पहले तुम’ खूब गुनगुनाया जाता था और इसमें भावनाओं का सुस्पष्ट प्राकट्य भी था जो कि सम सामयिक मानवीय मनोवृत्ति का भी परिचायक था। चाहे इसे किसी भी संदर्भ में फिल्माया क्यों न गया हो। आज पहले आप या पहले तुम वाली स्थितियां समाप्त हो चुकी हैं।

हम में से कोई भी  दूसरे के लिए नहीं सोचता। हमारे लिए सब पराये हैं। अब हालात ठीक उलट हैं। पहले मैं और मेरा का कंसेप्ट इंसान पर हावी है। जब से आदमी ने संबंधों और औदार्य पूर्ण परंपराओं को छोड़ कर बाकी सारों को पराया मानने का चलन अपना लिया है तब से इंसानियत का गला घोंट देने वाला इंसान अब कहीं का नहीं रहा है। न घर का, न घाट का। 

पुरुषार्थ चतुष्टय की बजाय सिर्फ अर्थ को ही प्रधानता देने का मंत्र हम सभी ने अपना लिया है और यही कारण है कि हम लोग या तो खुद बिकने को तैयार रहते हैं या दूसरे हमें बेच देने का भरपूर सामथ्र्य रखते हैं।  कौन किस कीमत पर कब बिक जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता।

अब इंसान के बारे में यकीनी तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि वह जैसा दिखता है वैसा ही होगा। हर तरफ मैं और मेरे का बोलबाला है। किसी और के बारे में कोई सोचना चाहता ही नहीं, सबको अपनी ही पड़ी है। यही कारण है कि हर इंसान अपने आपमें दुनिया के किसी द्वीप या ग्रह की तरह बर्ताव करता है।

आदमी को न कोई सगा संबंधी चाहिए, न समाज या देश। उसे पैसों पर भरोसा है और पक्का यकीन है कि पैसा ही है जो उसके लिए चुटकी बजाते ही सारे प्रबन्ध अपने आप कर लेगा। इसके बूते वह हर किसी को खरीदने का मंत्र सिद्ध कर चुका है। यही कारण है कि इंसानों की तमाम प्रकार की प्रजातियों में पूंजीपतियों और पूंजीवादियों की पूछ है भले ही ये समाज या देश के किसी काम न आएं।

एक पूरी की पूरी पीढ़ी अब ऎसी तैयार हो गई है जो पैसों के पीछे पागल है या पैसों ने जिन्हें पागल बना डाला है। सब तरफ मैं-मैं-मैं-मैं का शोर गूंज रहा है, हर कोई तेरा-मेरा करने पर तुला हुआ है, किसी को दूसरों की नहीं पड़ी है। 

यह भावना समाप्त हो गई है कि जो समाज और क्षेत्र का वह हम सभी का है, सभी के बराबर काम आने वाला है। अब सब कुछ समाप्त हो गया है। अब परिभाषाएं बदल गई हैं। जो अपने नाम है वही अपना है, और जो दूसरों का है उसे भी अपना बना लेंगे।

अपने पास खूब सारा होने के बावजूद दूसरों का सब कुछ हड़प कर अपने खाते में दर्ज कर लेने की कुत्सित मानसिकता ने हमें कहीं का नहीं रहने दिया है। अब आदमी पर कोई आसानी से विश्वास नहीं कर पाता। पता नहीं कौन है जो आदमी के भेस में खूंखार दरिन्दा या लुटेरा निकल जाए।

बहुत सारे लोग हर तरफ मैं और मेरा वाले हैं जिनके लिए पूरी जिन्दगी मजूरों की तरह कमाना और चौकीदारों की तरह इनकी रक्षा करना ही रह गया है। न रातों की नींद है, न दिन का चैन। मारामारी मची है। सभी चाहते हैं कि उनके पास इतना कुछ हो कि जो दूसरों के पास नहीं हो। जड़ पदार्थों को जमा करते हुए हम अपने आपको सदैव चैतन्य और अमर बनाए रखने के भ्रम में जी रहे हैं। सादा जीवन उच्च विचार की परिकल्पनाएं ध्वस्त हो गई हैं। अब तो विलासी जीवन तुच्छ विचार वाली स्थिति आ गई है। 

संसार को छोड़ बैठे बड़े-बड़े वैरागी बाबाओं, महंतों, योगियों, मुनियों और ध्यानयोगियों से लेकर टुच्चे भिखारियों और समाज की सेवा के नाम पर कमा खा रहे लोगों की रईसी भी इस कदर बढ़ती जा रही है जैसी कि कुख्यात दस्युओं के पास भी नहीं होगी। फिर ऎशो आराम, उन्मुक्त भोग-विलासिता के साथ शौहरत भी जुड़ जाती है।

शहद के छत्तों के आस-पास मण्डराना, चाशनी की कड़ाही के चक्कर काटना  अब सिर्फ मक्खियों का धर्म ही नहीं रह गया है। बेईमानों का बेईमानों से रिश्ता खून के रिश्तों से भी अधिक प्रगाढ़ है, और पारस्परिक सहयोग, समन्वय और सहकारिता के मामले में तो इनका कोई मुकाबला है ही नहीं।

मैं मैं के चक्कर में मिमियाते रहने वाले लोगों से भरा पड़ा यह संसार जाने कहाँ जा रहा है, कुछ पता ही नहीं चलता। इतना अवश्य है कि घनचक्करों में फँसे रहने वाले लोग जिन्दगी में उस समय अकेले पड़ जाते हैं जब उन्हें वास्तविक रूप में किसी की आवश्यकता होती है। बहुत सारे लोग धन-वैभव भरे गलियारों में श्वानों और बेबस प्राणियों जैसी जिन्दगी जीने को विवश हैं। इन्हें देख कर भी हम सबक न लें तो गलती किसी और की नहीं, हमारी ही है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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