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सब को है हाथियों की तलाश

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डॉ. दीपक आचार्य

 

सब जगह सारी की सारी पुरानी परंपराएँ नए रूप-रंग में हमारे सामने आ रही है। कहा भी गया है कि प्रकृति के सारे के सारे चक्र और घटनाएँ किसी न किसी तरह आती-जाती रहती हैं। पुनरावृत्ति संसार का नियम है और यह अवश्यंभावी है। इससे कोई इंकार नहीं कर सकता।

आवर्तन, विवर्तन, परिवर्तन और परावर्तन से भरा यह संसार अपने आप में ढेरों विचित्रताओं और अजब-गजब हालातों का दिग्दर्शन अर्वाचीन काल से कराता रहा है। हालांकि हर युग में पैदा होने वालों को यह सब कुछ नया-नया ही महसूस होता है।

प्रकृति और सम सामयिक लोक से संघर्ष करते हुए अपने आपको अहम् स्थान पर बनाए रखने के साथ खुद के वजूद को स्थापित  करने से जुड़ा हर प्राणी का अपना वैयक्तिक संघर्ष सदियों से रहा है और रहने वाला है।

हमारा देश परिश्रम और कर्मयोग के मामले में दुनिया भर में आदर्श रहा है जहाँ पुरुषार्थ की कमाई और मेहनत से पूर्वजों ने जो कुछ पाया है वह हमारे सामने है। पर बीच के कालखण्ड में जाने ऎसा क्या हो गया कि हम कर्म, परिश्रम और मानसिक-शारीरिक मेहनत से जी चुराने लगे और पुरुषार्थहीन होकर उन माध्यमों की तलाश में जुट गए जहाँ बिना कुछ किए-धराए जमीन-जायदाद और प्रतिष्ठा मिल जाए, परायी सम्पत्ति पर जमकर मौज उड़ा सकने के अवसर प्राप्त होते रहें और हम इतने अधिक प्रतिष्ठित हो जाएं कि लोगों की भीड़ हमारे पीछे लगी रहे, हमारी वाहवाही करती रहे।

अभी बहुत अधिक समय नहीं बीता है जबकि हाथियों को साथ लेकर महावतों और चेले-चपाटों के समूह गाँव-कस्बों और शहरों में भ्रमण किया करते थे और धर्म के नाम पर दान-पुण्य करने की नसीहतें देते हुए हाथी के नाम पर बहुत कुछ कर लिया करते थे।

कालान्तर में जंगल घटे, वन्यप्राणियों की संख्या में कमी आ गई तो उसी अनुपात में हाथी भी घटते चले गए। आज भी कहीं-कहीं हाथियों के साथ चलते हुए हाथी के नाम पर दान-पुण्य और धरम करने की अपीलें करते हुए हर किसी को प्रभावित करने वाली बातों और आकर्षक वेशभूषा  धारण किए हुए महावतों और बाबाओं के समूह नज़र आ ही जाते हैं।

आगे-आगे घण्टे बजाते हुए हाथी और पीछे-पीछे जमात। यही क्रम पहले से चला आ रहा है। बड़ी-बड़ी घण्टियों की आवाज से ही घरों में दुबके हुए लोगों को पता चल जाता है कि हाथी आया है। फिर यदि बुधवार का दिन हो तो हम सभी परम धार्मिक लोग गणेशजी की आराधना और भक्तिभाव में जुट जाया करते हैं। हाथी को भगवान गणेश का प्रतिरूप या प्रतीक मानकर हम फल, मोदक और गुड़ खिलाते हैं और महावतों व बाबाओं को भी दान-दक्षिणा कर लिया करते हैं।

पहले हाथी बहुसंख्यक हुआ करते थे इसलिए उसी अनुपात में महावतों, बाबाओं और चेले-चपाटों की भारी भीड़ उमड़ आया करती थी। अब हाथी कम हो गए हैं तो इस परंपरा का आमूलचूल बदलाव सामने आ गया है।  हाथियों का स्थान ले लिया है बहुत सारे बड़े-बड़े लोगों ने। इनमें कुछ अपने आपको ऎरावत और सफेद हाथी मानने समझने लगे हैं और दूसरे ऎसे हैं जो काले हाथी बने हुए फिर रहे हैं।

परंपरा वही की वही है। हर तरफ आगे-आगे हाथी चलते हैं, पर अब इन हाथियों का अपना कोई महावत नहीं होता, इनके महावत अदृश्य रहा करते हैं और समय आने पर इन महावतों में बदलाव भी आता रहता है।  हर तरफ लोग अपने आपको बड़ा  घोषित कर अपने आपको हाथी की तरह प्रतिष्ठित कर लिया करते हैं और फिर अंधानुचरों की भीड़ भी जुटा ही लिया करते हैं।

बहुत सारे बड़े-बड़े हाथी मनुष्य रूप में हमारे सामने आने लगे हैं। धर्म-अध्यात्म, संन्यास, मठों-मन्दिरों, आश्रमों, डेरों, सामाजिक सेवा क्षेत्रों से लेकर हर काम-धंधे में कोई न कोई हाथी रमा हुआ है जिसके पीछे चेले-चपाटों की पूरी की पूरी फौज चलती है।

फौज को खिलाने-पिलाने और मौज उड़वाने के जतन करने के लिए हर किस्म का हाथी भिड़ा हुआ है। बहुत सारे लोगों को हमेशा ऎसे हाथी चाहिएं जो कि जिन्दगी भर उनके लिए काम आ सकें, उनकी परवरिश कर सकें और छत्र छाया दे सकें।

हाथियों को चेलोें और भीड़ की तलाश है और लोगों को हाथियों की। दोनों पक्षों का काम एक-दूसरे से ही चलने वाला है। खूब सारे लोगों और उनकी हरकतों, जीवनयात्रा तथा काम-धाम को देखकर साफ-साफ प्रतीत भी होता है कि ये पिछले जनम में कहीं न कहीं महावतों के  हाथी रहे होंगे।

यही स्थिति उन चेलों-अनुचरों की है जिन्हें देखकर लगता है कि ये सारे पूर्वजन्मों के बाबा लोग ही हैं जो हाथियों के पीछे-पीछे घूमते हुए हर युग में धर्म और दान-पुण्य की डुगडुगियां बजाकर लोगों को पुण्य का लाभ बाँटते रहे हैं।

हम सभी को जीवन में हमेशा तलाश बनी रहती है उनकी जो हमारे लिए ही जीयें, हमारे काम करें, हमें प्रश्रय और संरक्षण दें तथा हमारे लिए अभेद्य सुरक्षा कवच अथवा ढाल के रूप में बने रहें। हर हाथी अपने आप में उस बड़े आदमी का प्रतीक ही है जो आम लोगों से अलग हैं और अपने आपको आम में नहीं गिनता।

हाथियों और उनके अनुचरों की माया के आगे सारे बेबस हैं। अब हाथियों से अछूता कोई क्षेत्र नहीं रहा। हर इलाके में हाथियों का दबदबा है। किसी न किसी फन को आजमा कर हर हाथी कमाल ढा रहा है और चेलों की फौज भी ऎसी ही है कि जो अपने-अपने हाथी को कल्कि अवतार मानकर उनके चमत्कारों, प्रभावों को ईश्वरीय मानकर महिमा मण्डन करने में न रात देखती है, न दिन।

प्रशंसा से भरी घण्टियां हर तरफ हवाओं के साथ झूलकर बज रही हैं, गलियों-चौराहों से लेकर सारे महापथों तक हाथियों की आवाजाही  बढ़ी हुई है। दुनिया कहाँ जा रही है, क्या कुछ हो रहा है, इससे न हाथियों को कोई मतलब है, न इनके पीछे-पीछे कतारों में चलने वाली चेलों और अंधानुचरों की भीड़ को।

इनका एकमेव मकसद यही रह गया है - घण्टे-घण्टियां बजाओ और जो कुछ सायास-अनायास मिलता चला जाए, उसे लेते चलो। जो दे रहा है उसे सौ-सौ बार भगवान का नाम लेकर पुण्य बाँटते जाओ, जो नहीं दे पा रहे हैं उनके लिए भी समृद्धि की दुआएं इसलिए करते चलो ताकि अगले फेरे तक ये बहुत कुछ दे पाने की स्थिति में आ जाएं और निराश नहीं होना पड़े।

जो अपने आपको सक्षम मानते हैं उन्हें और अधिक सक्षम बनने और समृद्धि पाने की भूख है और इसलिए कोई न कोई हाथी उन्हें हमेशा चाहिए जो उनकी भूख मिटा सके। जो कुछ नहीं करना जानते है।, जिनके पास न बुद्धि है, न कोई हुनर। इन लोगों के लिए हाथियों की तलाश और किसी न किसी जमात में बने रहना जीवन की वह सबसे बड़ी और अनिवार्य मजबूरी है जिसके बगैर उनकी जिन्दगी की कोई कल्पना नहीं की जा सकती।

जिन लोगों को किसी से कोई अपेक्षा नहीं है वे लोग भी हाथियों को सलाम ठोंकने में पीछे नहीं रहते। इन सभी को हाथियों की ताकत का पता है इसलिए सारे सच को जानते-बूझते हुए भी कोई हाथियों का न निरादर करना चाहता है, न हाथियों के बारे में जान लिए शाश्वत सत्य को उजागर करना।

सबकी चल रही है। हाथियों की भी चल रही है और अनुचरों की भी। सारे के सारे अपने आप में खुश हैं। हाथियों की ताकत को समझें, इन्हें आदर-सम्मान दें और मंगलमूर्ति भगवान श्री गणेशजी का स्मरण करते हुए आगे बढ़ जाएं। विघ्नराज का स्मरण करने वाले लोग कभी दुःखी नहीं होते।

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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