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स्मृति लेख : प्रोफेसर डॉ. नज़ीर मुहम्मद

प्रोफेसर डॉ. नज़ीर मुहम्मद

(जन्म 31 जुलाई, 1930 – निधन 25 जुलाई, 2015)

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प्रोफेसर डॉ. नज़ीर मुहम्मद

(जन्म 31 जुलाई, 1930 – निधन 25 जुलाई, 2015)

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक पद से लेकर प्रोफेसर तथा विभागाध्यक्ष तक के विभिन्न पदों पर लगभग 40 वर्षों तक प्रशंसनीय सेवा करने वाले तथा बाद में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मनोनीत राष्ट्रीय व्याख्याता के पद पर कार्य करने वाले मेरे परम आत्मीय प्रोफेसर डॉ. नज़ीर मुहम्मद का आज दिनांक 25 जुलाई को निधन हो गया। मेरे मन में उनसे जुड़ी हुई यादों की लम्बी फेहरिस्त है जिसके कारण अतीत की अनेक घटनाओं के बिम्ब साकार हो रहे हैं। वर्ष 1996 में हमने उनको राष्ट्रपति भवन में महामहिम राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा जी के कर-कमलों से भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के "सुब्रह्मण्यम् भारती" जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित होते देखा। डॉ. नज़ीर केन्द्रीय हिन्दी संस्थान की शासी-परिषद् के दस वर्षों तक सदस्य रहे। परिषद् की मीटिंग्स में उनकी सहभागिता और प्रत्येक मुद्दे पर बेबाक और निर्णायक मत के मूल्य को आँकना सम्भव नहीं है। वे मुझको हमेशा उचित, संगत और करणीय सलाह देते थे। मेरे कार्यकाल में मुझको उनका जो सहयोग प्राप्त हुआ, वह किसी अमूल्य निधि की प्राप्ति से कम नहीं है।

जबलपुर के विश्वविद्यालय में जाने से पहले मैंने सन् 1963 ईस्वी में आगरा के उसी संस्थान में अध्यापन-कार्य किया जहाँ बाद में निदेशक के रूप में कार्य करने का मुझे अवसर प्राप्त हुआ। आगरा में प्रतिदिन शाम को हम सात-आठ व्यक्ति स्वदेशी बीमा नगर स्थित डॉ. हरि हर नाथ टंडन जी की कोठी से चलकर हरि पर्वत चौराहा तथा वापिसी में हरि पर्वत चौराहा से स्वदेशी बीमा नगर तक मुख्य मार्ग पर उस तरह से पद यात्रा करते थे जैसे किसी बाग में टहल रहे हों। मेरे तथा डॉ. हरि हर नाथ टंडन जी के अतिरिक्त घूमने वालों के समूह में आगरा कॉलेज के हिन्दी विभाग के सेवा निवृत्त प्रोफेसर डॉ. जगन्नाथ प्रसाद तिवारी जी भी होते थे। उन दिनों डॉ. हरि हर नाथ टंडन जी और पंडित जगन्नाथ प्रसाद तिवारी जी में मैत्री हो गई थी।

डॉ. जगन्नाथ प्रसाद तिवारी जी अपने जिन शिष्यों की भूरि-भूरि प्रशंसा करते थे, उनमें नज़ीर मुहम्मद का नाम भी शामिल था। मुस्लिम होते हुए एक विद्यार्थी समर्पण और निष्ठा भाव से न केवल हिन्दी अपितु संस्कृत पर भी अधिकार जमाने में समर्थ सिद्ध हो जाए, यह तिवारी जी की प्रशंसा का आधारभूत कारण था। सबसे पहले मैंने नज़ीर मुहम्मद जी का नाम आगरा में सन् 1963 में डॉ. जगन्नाथ प्रसाद तिवारी जी से सुना। बाद में यह नाम अलीगढ़ के डॉ. हरवंश लाल शर्मा जी से सुनने को मिला। फिर ऐसा संयोग हुआ कि जबलपुर में ही डॉ. नज़ीर मुहम्मद केवल मेरे ही नहीं अपितु मेरे परिवार के सभी सदस्यों के आत्मीय हो गए। एक बार नज़ीर जी ने ईद का त्यौहार हमारे परिवार के सदस्यों के साथ मनाया। यह उनका बड़प्पन था कि उसके बाद प्रतिवर्ष जब मैं उनको ईद मुबारकबाद देता था तो वे जबलपुर में मेरे परिवार में मनाई गई ईद के पर्व के उल्लास को बहुत संवेदित होकर याद करते थे। इस बार भी वे उस प्रसंग की चर्चा करना नहीं भूले। ईद की मुबारकबाद का मेरे द्वारा भेजा गया कार्ड उनको ईद के त्यौहार के बाद मिला। दो-तीन दिन पहले ही उन्होंने मुझसे उस कार्ड के सम्बंध में बातें कीं। वे जब भी बात करते थे, उनके एक एक शब्द में स्वजन भावना का रस उमड़ता था।

दिनांक 25 जून, 1993 को नज़ीर जी आगरा मेरे निवास पर आए और उन्होंने मुझे कविवर नज़ीर अकबराबादी की रचनाओं का सम्पादित संग्रह भेट किया। प्रोफेसर नज़ीर मुहम्मद ने नज़ीर अकबराबादी की रचनाओं का संग्रह "नज़ीर ग्रन्थावली" शीर्षक से किया है तथा इसका प्रकाशन उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने किया है। इस संग्रह को सम्पादित करने में नज़ीर मुहम्मद ने जो श्रम किया, वह इस ग्रन्थ के पारायण से स्पष्ट है। मगर इस संग्रह को सम्पादित करने की प्रेरणा नज़ीर जी को किस प्रकार प्राप्त हुई और उस प्रेरक प्रसंग ने उनके मन में इसको सम्पादित करने की कैसी ललक पैदा कर दी, इसको जानना अधिक महत्व रखता है। प्रोफेसर नज़ीर मुहम्मद के शब्दों में ही इसको सहज समझा जा सकता है।

"नज़ीर की रचनाओं से मेरा परिचय बचपन से ही अनजाने हुआ। यों तो वृन्दावन के भक्तिमय वातावरण में भक्तों के पद मुझे लोरी की भाँति सुनने को मिले परन्तु बचपन में एक दिन एक युवा, रमता-फक्कड़, जोगी जैसा अलमस्त फकीर, जिसके हाथ में एक छोटा डंडा था, जो उसकी कलाई में पड़े लोहे के कड़े के साथ ताल के साथ बजता और वह जैसे देह की सुध भूलकर लावनी की तर्ज में गाता –

क्या-क्या कहूँ मैं कृष्ण कन्हैया का बालपन। ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन।।

वह गीत गाता जाता और चलता जाता और मेरे जैसे छोटे वय के बालक और बड़े लोग जो उसके गीतों के बोल, वाणी की मिठास और उसके मनमौजी ढब से आकर्षित हो, उसके पीछे-पीछे खिंचे चले जाते। वह चलता-चलता गाता, बैठकर गाता, आँखें बंद कर गाता। कभी इस बालपन के गीत को गाता, कभी - ‘सब सुनने वाले कह उठे जय-जय हरी-हरी, ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बाँसुरी’ – कभी लीला-गीत गाता –

यह लीला है उस नन्द-ललन, मनमोहन जसुमत मैया की। रख ध्यान सुनो, दंडौत करो, जय बोलो किशन कन्हैया की।।

उसके पास बहुत से गीत थे। कृष्ण के ही गीत वह गाता था। हम समझते वह खुद बनाकर गाता है। बड़े अच्छे और लुभावने लगते थे ये गीत। बड़ी कशिश थी इनमें। ब्रजभाषा के गहरे भाव-भरे पदों के बीच बहती खड़ी बोली कहिये या ब्रज और उर्दू-मिश्रित भाषा कहिये, इसका रवा ही कुछ और था, रवानगी ही और थी। बड़ी हल्की और लहरीली चाल, सुरताल के साथ, लोक गीत की धुन और भावों का प्रवाह। "कन्हैया का बालपन" कविता तो जैसे पूरी की पूरी याद हो गई। उसी सुर में बार-बार गाते। बाद में फकीर तो चला गया परन्तु वे कविताएँ, वे धुनें, गाने की मस्ती, फक्कड़पन – मेरे जैसे न जाने कितनों के पास छोड़ गया।

बहुत बाद में मालूम हुआ कि ये कविताएँ नज़ीर मियाँ की हैं। कविताएँ संस्कार में बस गई थीं तो ‘नज़ीर’ भी मन में बस गये।" (नज़ीर ग्रन्थावली, दो शब्द, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, प्रथम संस्करण, 1992)

इन थोड़े से शब्दों से जहाँ एक ओर रचनाकार की भाव-भूमि का साक्षात्कार हो पाता है वहीं रचनाकार के आलोचक की दीवानगी का रहस्य भी अनावृत्त हो जाता है। मैं जब-जब "नज़ीर ग्रन्थावली" के पन्ने पलटता हूँ मुझे जहाँ एक ओर नज़ीर अकबराबादी की लोक-धर्मिता का रंग बहुत गहरे डुबा जाता है वहीं दूसरी ओर नज़ीर मुहम्मद की कृष्ण कन्हैया के प्रति गहरे अनुराग और कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्धता और समर्पणशीलता का सहज अहसास करा जाता है।

संस्कृत साहित्य, प्राचीन मध्यकालीन साहित्य, संत तथा सूफी साहित्य, कृष्ण-भक्ति और राम-भक्ति परक साहित्य, भारतीय सभ्यता और संस्कृति तथा हिन्दी एवं उर्दू साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन आदि विषयों से सम्बंधित आपके प्रामाणिक ग्रंथ एवं 160 से अधिक शोध-लेख इस बात का प्रमाण है कि आपने अनवरत पूरी निष्ठा और लग्न से हिन्दी की सेवा की। आपकी राष्ट्र-भक्ति परक कविताओं का भी सम्यक् मूल्यांकन होना चाहिए।

प्रोफेसर नज़ीर मुहम्मद और हमारे बीच सन् 1970 से सन् 2015 की अब तक की लगभग 45 वर्षों की कालावधि में पत्राचार होता रहा। मैंने उनको जो पत्र लिखे, वे मेरे पास अब उपलब्ध नहीं हैं। मगर प्रोफेसर नज़ीर मुहम्मद ने मुझको जो पत्र लिखे, उनमें से कुछ पत्र पाठकों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं।

 

(पत्र संख्या – एक)

डॉ. नज़ीर मुहम्मद

पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष राहत कदा

अलीगढ़ विश्वविद्यालय डिग्गी रोड, अलीगढ़

अलीगढ़ दिनांक 22-08-1975

आरदणीय डाक्टर साहब,

सादर नमस्कार।

आपका पत्र प्राप्त कर बेहद प्रसन्नता हुई। विभागों का एकीकरण अत्यावश्यक था, अध्यक्ष पद तो सीनियर होने के नाते आपको मिलेगा ही। आशा है वह भी शीघ्र ही हो लेगा। बहुत-बहुत बधाइयाँ।

आ. भाई साहब (डॉ. विजयपाल सिंह जी) यहाँ पधारे थे वह भी यही सूचना दे रहे थे। अलीगढ़ में फ्रलू और मलेरिया का प्रकोप हो रहा है। मेरे यहाँ सभी बच्चे बीमार पड़े हुए हैं। मेरी पत्नी भी नौकरी में है। इस कारण बड़ी कठिनाई रहती है। शोध-प्रबन्ध में दो अध्यायों के आधे-आधे भाग टंकण के लिए शेष हैं। कागज समाप्त हो जाने के कारण कुछ बिलम्ब हो गया। प्रस्तावना, उपसंहार, पुस्तक-सूची आदि और हैं। बहुत दिन का कार्य नहीं है।

इस समय विभाग को भी अधिक दिनों के लिए छोड़ना उचित नहीं होगा।

इन परिस्थितियों में टंकण कार्य समाप्त होने पर ही आपकी सेवा में उपस्थित होना चाहता हूँ।

मैंने पं. परशुराम जी चतुर्वेदी को पत्रा लिखा है। कार्य तो आपकी सहायता और कृपा से हो ही लेगा। परीक्षकों की नियुक्ति के सम्बन्ध में आप स्वयं सजग होंगे। हमारे यहाँ तो वर्ष में दो बार ही नियुक्तियाँ होती हैं। यदि ऐसा ही हो तो आप परीक्षक नियुक्त करा लेने की कृपा करें।

मैं विनम्रता पूर्वक यही निवेदन करूँगा कि यदि इन दोनों विद्वानों में से किन्ही एक भी सज्जन के स्थान पर अपने परिकर के किन्हीं व्यक्ति को रख लें तो अच्छा रहेगा। वैसे मैं तो पूर्णतः आपके ही भरोसे पर हूँ। आप जो उचित समझें करें। आशा है किसी प्रकार अन्यथा न लेंगे।

आदरणीय भाभी जी को सादर नमस्कार, बच्चों को प्यार व आशीर्वाद। आशा है सब सानन्द होंगे।

आपका

नजीर मुहम्मद

 

(पत्र संख्या – दो)

अलीगढ़

दिनांक 10-09-1975

आदरणीय डॉ. साहब,

सादर नमस्कार।

मैंने 15.09.1975 से वि.वि. से छुट्टी ली है। 15 के बाद दो, तीन दिन में चलकर मैं आपकी सेवा में उपस्थित हूँगा।

इध्रर पूरे क्षेत्र में बहुत बारिश हो रही है। कई जगह बाढ़ें आई हुई हैं। बुलन्दशहर में बाढ़ का बहुत प्रकोप है। कई मुहल्ले पानी में डूबे हुए हैं। आप भी बुलन्दशहर के ही निवासी हैं। ईश्वर सब पर कृपा करें, घर की रक्षा करें। डॉ. भाटिया साहब ने आपका बुलन्दशहर का पता बताया था। इस समय वह मेरे पास नहीं। याद भी नहीं रहा कि आपका मकान किस मुहल्ले में है। समाचार पत्रों के आधार पर छत्ता, देवीपुरा, भवन, मुहल्लों में कमर या उससे ऊपर तक पानी है। कृष्णनगर, कचहरी रोड घुटनों पानी में हैं। काली नदी अपने किनारों से ऊपर बह रही है। शहर का पानी उसमें जा नहीं रहा। काफी नुकसान है। गांव के इलाके सब जल-मग्न हैं। चारों और से सहायता भेजी जा रही हैं पर बारिश ओर बाढ़ ने सबको असफल बना रखा है। आप अपना मुहल्ला लिखें। भगवान सब तरह से कुशल रखे।

थोड़ा बारिश का जोर कम होने पर ही चलूँगा, इध्र बहुत परेशानी है। आशा है सानंद होंगे।

बच्चों को प्यार व आशीर्वाद।

सादर

नजीर मुहम्मद

 

(पत्र संख्या – तीन)

दिनांक 06-07-1976

आदरणीय डॉ. साहब,

सादर नमस्कार।

बहुत दिनों से कुशल समाचार नहीं मिले। क्या हालात हैं?

मैं तो तभी से ईंट-पत्थर-रोड़ी के काम कराने में लगा हुआ हूँ। दोनों मंजिल पर लैंटर पड़ चुका है। प्लास्टर चल रहा है। फर्श बाकी हैं। काफी काम है। एक महीना और इसी तरह ठेकेदारी और देख-रेख करनी पड़ेगी। खैर काम कराना था, हो जाये तो व्यथा कटे।

डॉ. भाटिया साहब की नियुक्ति डॉ. हरवंशलाल जी वाले विभाग में असिस्टेण्ट डायरैक्टर के रूप में हो गई है। अभी ज्वॉइन नहीं किया, करने को प्रयत्न शील हैं।

मौखिकी के सम्बन्ध में क्या रहा? कोई तिथि आई है या नहीं? डा. भाटिया साहब ने लिखा है कि डॉ. जैन साहब यदि जल्दी-जल्दी लिखें और लिखवाएँ तो पंडित जी झुंझलाकर स्वयं लिख देंगे कि परीक्षार्थी और निर्देशक महोदय यहीं आ जायें। खैर, जो आप उचित समझें करें। जल्दी हो जाय तो अच्छा है। चिन्ता से मुक्ति मिले।

विश्वविद्यालय कब से खुल रहा है?

बच्चों को प्यार व आशीर्वाद।

बच्चे नमस्कार निवेदन करते हैं। आशा है सानन्द होंगे।

सादर

नजीर मुहम्मद

 

(पत्र संख्या – चार)

दिनांक 19-03-1997

आदरणीय डाक्टर साहब,

सादर नमस्कार।

अत्रा कुशलम् तत्रास्तु। आपकी कृपा से मुझे बहुत मान-सम्मान मिला, शब्दों में आभार व्यक्त कर पाना कठिन है। मैं दिनांक 31 मार्च को आपके केन्द्र पर उपस्थित हूँगा।

अन्य निवेदन यह है कि मैंने ‘ब्रज-संस्कृति-शतक’, ‘रस-सिद्धांत-शतक’, ‘एकता-शतक’, ‘गांधी-बलिदान-शतक’ आदि लगभग 100-105 दोहों के काव्य लिखे हैं। मैं इनको प्रकाशित कराना चाहता हूँ। - - - आप इसे प्रकाशित कराने में सहायता करने की कृपा करें। जो भी व्यय आएगा मैं भुगतान कर दूँगा। यहाँ कोई ठीक मिल नहीं रहा।

श्रीमती डॉ. जैन जी को सादर नमस्कार। बच्चे नमस्कार निवेदन करते हैं।

आशा है सकुशल सानन्द हैं।

सादर

नजीर मुहम्मद

आज मुझे अहसास हो रहा है कि जिन्दगी से कोई अपना अंश अलग हो गया है। मन कितना अशान्त, दुखी और व्यथित है – इसको शब्दों में कहाँ व्यक्त किया जा सकता है। इस स्थिति में, मैं उनकी आत्मा की शान्ति की परम सत्ता से कामना करता हूँ। हम सब आत्म चैतन्य ही तो हैं। शरीर तो आवरण है। परम सत्ता भी तो एक ही हैं। आज न जाने क्यों, यह अनुभूति बहुत गहरे पैठ रही है।

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान

123, हरि एन्कलेव, बुलन्दशहर

mahavirsaranjain@gmail.com

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