रविवार, 19 जुलाई 2015

हम सब हैं तमाशबीन

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डॉ. दीपक आचार्य

 

काम करने वाले लोग कम होते जा रहे हैं और काम करने का दिखावा करने वाले लोगों की बेतहाशा भीड़ हर तरफ बढ़ती जा रही है। घर-परिवार से लेकर समाज और क्षेत्र के काम हों या फिर देश का ही कोई सा काम हो, सब तरफ काम का दिखावा करने वालों की जबर्दस्त भीड़ छायी हुई है।

 

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बहुत सारी भीड़ तो सिर्फ दिखावा करने भर के लिए आती है। उसे काम से कोई सरोकार नहीं है। जहाँ लग जाता है कि काम करने की बजाय देखने वालों का ही जमावड़ा लगता है तब काम के नाम पर दिखावा करने वाले लोग उमड़ पड़ते हैं। फिर दिखावों के दिखावे होने लगें तब तो भीड़ का कुंभ ही जुट जाता है। इस भीड़ को पक्का भरोसा होता है कि आज के तमाशेबाज और तमाशबीनों को कल तमाशबीनों की दूसरी भीड़ देखेगी। यही कारण है कि तमाशों का वजूद बढ़ता ही चला जा रहा है अब केवल स्वरूप बदला हुआ है।

दिखावा करने और देखने वालों सभी का जमघट हर तरफ बढ़ता जा रहा है। पहले लोगों का काम दिखता था अब काम तो गायब हो गया है और काम का दिखावा करने वाले लोग दिखने लगे हैं। गांव के गलियारों से लेकर महानगरों तक यही हालत है।

बहुत सारे काम सिर्फ इसलिए हो रहे हैं ताकि कुछ न कुछ हो रहा दिखाया जा सके। और ऎसा करना उन लोगों की सेहत और जीवन को लम्बे समय तक बनाए रखने के लिए जरूरी है जो काम का दिखावा करने मात्र के लिए धरा पर अवतरित हुए हैं।

जितना काम का दिखावा होता रहा है उसका आधा भी काम अब तक हो गया होता तो हम कहां से कहां पहुंच जाते। हमें विकासशील नहीं मानकर विकसित मानने की विवशता दुनिया के सामने उत्पन्न हो जाती। पर कहाँ हो पाया है यह सब। कभी जनसंख्या बढ़ने का रोना रोते रहते हैं, कभी धन के अभाव का परंपरागत अलाप करने लगते हैं और कभी दूसरे बहुत सारे बहाने बना दिया करते हैं।

अपने पास बहानों और झूठ की कौनसी कमी कब रही है, सौ बहाने और हजार झूठ हमारे तरकश में हमेशा भरे ही रहते हैं।  फिर इनका उदारतापूर्वक उपयोग करने में हम किसी से पीछे नहीं हैं। भ्रम फैलाना और लम्बे समय तक बनाए रखना तो कोई हमसे सीखे।

काम करने वालों की पुरानी जमातों को भूल जाने को जी करता है। अब दो ही तरह के लोग अपने यहाँ हैं। एक तमाशा करने और दिखाने वाले और दूसरे तमाशबीन होकर हर कहीं जमा हो जाने को आतुर रहने वाले। हर तरफ की हरकतों, हलचलों और रहस्यों को जानने की तीव्र आकांक्षा और आतुरता के मारे हम न अपने घरों के रहे हैं, न घाटों के।

हमें अपने ही घर-आँगन और गांव पराये लगने लगे हैं और दूसरों के घर-आँगन से लेकर बैड रूम्स और बाथरूम्स तक की टोह लेने के लिए दिन-रात में हमेशा उतावले बने रहते हैं। हमें अपने कामों और अपने आपके और अपनों के बारे में सोचने से अधिक चिन्ता दूसरों के बारे में हैं जिन्हें हम पराये ही मानते हैं।

अपनों को पराया बना डालने और परायों को अपना बनाने के फेर में न हम इस पार के रहे हैं, न उस पार के। जब भी वैचारिक संघर्षों या स्वार्थों की तेज बाढ़ आती है, जोर की लहरें कभी इस पार के शैवालों भरे चिकने तटों पर लाकर गुदगुदाता आनंद दे डालती हैं और कभी रेतीले गरम तटों की चुभन।

हम सभी को अब हमेशा किसी न किसी तमाशे की तलब उठती ही है। इसे पूरा करने कभी हम खुद तमाशा खड़ा कर देते हैं और कभी बाहर तलाशने लगते हैं। अपने घरों-मोहल्लों और गलियों से लेकर तमाम बस्तियों और पॉश कॉलोनियों में जहाँ कहीं कुछ नया होता है हम तमाशबीन की तरह घण्टों खडे़ रहकर तमाशे को देखते-सुनते और आनंद लेते है।

तमाशा खत्म होने के बाद भी कई घण्टों और दिनों तक तमाशा हमारे दिमाग में बना रहता है। इसे हम किश्तों-किश्तों में नमक-मिर्च और कभी शक्कर का बुरादा मिलाकर उन लोगों को परोसने का आनंद पाते हैं जो लोग हमारी ही तरह तमाशा पसन्द होते हैं।

कहीं कुछ भी हो रहा हो, उसकी सफलता, सकारात्मक सोच और सीधे-सीधे उपलब्धियां पाने के लिए दुआएं करने की बजाय हमारे मस्तिष्क में खुराफातों का समन्दर लहराने लगता है और हम किसी नए तमाशे की प्रतीक्षा करने लगते हैं और बेसब्री से बाट जोहते हैं।

कभी सहज ही कोई तमाशा न भी हो रहा हो तो हम इसके लिए खुद ही खुराफात कर तमाशे का सृजन कर लेते हैं। हमारे पास बहुत सारे लोग होते हैं जो मन्दबुद्धि, जड़बुद्धि और परबुद्धि हैं। ये लोग न तो किसी की खुराफात को समझ पाते हैं, न अपनी अक्ल लगाते हैं।  ये आसानी से बिक भी जाते हैं और इन्हें खरीदना भी सबसे आसान है।

कुछ लोग झोली भर देने और खिलाने या पिला देने से खुश हो जाते हैं, कुछ लोगों को भ्रमित या भयभीत कर इनसे मनचाहा काम करा लिया जा सकता है। बहुत से लोग हर जगह उपलब्ध होते हैं जो अपने नहीं कहे जाते। इनका इस्तेमाल कोई भी तोप की तरह कर सकता है। 

शातिर लोग इनके जरिये कोई न कोई तमाशा रच दिया करते हैं और तमाशबीनों की भीड़ में एक तरफ दुबक कर अपनी रचनाधर्मिता के विध्वंस को देखकर आनंद पाते रहते हैं। आजकल तमाशबीनों का मजमा हर तरफ लग जाता है। इसके लिए न कोई मुनादी करनी पड़ती है न लड्डू बाँटने की जरूरत।

आदमी के लिए तमाशों से अधिक सस्ता और सर्वसुलभ मनोरंजन दुनिया में आज की तारीख में कोई और हो ही नहीं सकता। तभी तो हम तमाशोें के इर्द-गिर्द पूरी जिन्दगी गुजार दिया करते हैं। तमाशा खड़ा कर देने और दिखाने में सिद्ध जादूगरों और तमाशबीनों की सहज उपलब्ध मुफतिया भीड़ ही है जिसकी वजह से हमें लगता है कि देश जीवंत है, चल रहा है और निरन्तर गतिमान है। अन्यथा सारे के सारे लोग अपने-अपने काम-धंधों में लगे रहें तो हमारी तीव्रतर तरक्की की पब्लिसिटी कौन करेगा। 

हममें से अधिकांश लोग या तो तमाशची है या तमाशबीन।  जो कुछ हो रहा है उसे चुपचाप देखते रहते हैं, न कोई भागीदारी न मतलब। जो हो रहा है उसे देखो और आनंद लो, आज यह तमाशा है, कल इसकी जगह दूसरा आ जाएगा।

तमाशा करने-दिखाने वाले भी बदल जाएंगे और तमाशबीन भी दूसरे डेरों पर जाकर तमाशे देखने में व्यस्त हो जाएंगे। ऎसे ही टाईमपास होता चला जाएगा और तमाशों की दुनिया में नया इतिहास रचकर हम सभी आने वाली पीढ़ियों के लिए तमाशों का वजूद कायम रखते हुए चले जाएंगे। तमाशे चलते रहें, तमाशबीन अमर रहें।

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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