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मनुष्य शरीर

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डॉ. बिपिन चन्द्र जोशी

चौरासी लाख योनियों की जीवन-यात्रा पूर्ण करने के बाद हमें मनुष्य शरीर प्राप्त होता है। इसीलिये मनुष्य शरीर को अतिदुर्लभ माना गया है। देव योनि को भोग योनि भी कहते हैं, जिसमें कोई नया शुभ कार्य सम्भव नहीं है। लेकिन मनुष्य योनि में व्यक्ति अपने पूर्वजन्म के संचित कर्मों का भोग करने के साथ ही नये शुभ-अशुभ कार्य भी करता रहता है। शुभ कर्मों के आधार पर मोक्ष पा लेता हैं। इन सभी सम्भावनाओं के कारण ही दवे ता भी मनुष्य शरीर के लिये ललचाते रहते हैं। गर्भ में पल रहा बच्चा गन्दगी में पडा़ रहता है। मां का गर्भ भी नरक के समान ही है।

इस नरक में पल रहा जीव भगवान से यही प्रार्थना करता रहता है कि मुझे इस नरक से मुक्ति प्रदान करो। गर्भ में पल रहा बच्चा नौ महीने पूर्ण होते  ही जन्म लेकर गर्भरुपी नरक से मुक्ति पा लेता है। धीरे-धीरे बच्चा बड़ा होता है। उसका बचपन खेलने में व्यतीत हो जाता है। जवानी आती है और सांसारिक विषय भोगों में बीत जाती है। बुढ़ापा सामने आता देख मनुष्य चिन्ताओं में घिर जाता है। अब उसे ईश्वर याद आने लगता है। बुढ़ापे में शरीर त्रिदोष-वायु, पित्त, कफ से पीड़ित है। जवानी में भौतिक सुख-समृद्धि, धनार्जन, परिवार से मोह, पुत्रमोह, स्वयं अपने व स्वजनों के शरीर से मोह, मनुष्य को प्रेय मार्ग की ओर अग्रसर करता रहता है। बुढ़ापा आते ही त्रिदोष के कारण शरीर में कमजोरी आ जाती है। जवानी में किये गये सभी खरे-खोटे कर्म याद आने लगते हैं। मनुष्य सोचने लग जाता है कि मृत्यु का समय निकट आ रहा ह। मेरी तो सारी उम्र पारिवारिक दायित्वों का निर्वाह करने में ही निकल गयी।

अब इस उम्र में जब शरीर साथ नहीं दे रहा, मनुष्य इस भवसागर से पार उतरने के लिये श्रेयमार्ग को अपनाने की बात सोचने लगता है। सोचता है, संसार में अच्छा-बुरा सब देख लिया, भोग लिया, अब ईश्वर के भजन कर लिये जाऐं। मृत्यु निश्चित है, इस बात को सभी जानते हैं। मुख्य प्रश्न यह है, क्या ऐसे मनुष्य को जीवन का अन्तिम पुरुषार्थ, मोक्ष प्राप्त होगा? यदि जीवन का अन्तिम साध्य प्राप्त नहीं होगा तो मृत्यु के बाद पुनः जन्म लेना होगा?

''पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम्''

जीवन-मृत्यु, पुनःजीवन-मृत्यु और जन्म के आगमन से मुक्ति पाने के लिये क्या किया जाए?

स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा, मन क्रम बचन रामपद नेहा।। सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा। जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा।।

रा.च.मा. ७/९६क/१-२

जीव के लिये सच्चा स्वार्थ यही है कि मन, वचन और कर्म से श्रीराम के चरणों में प्रेम हो। वही शरीर पवित्र और सुन्दर है जिस शरीर को पाकर श्रीरघुवीर का भजन किया जाए।

सबसे सरल उपाय एक ही है, सांसारिक जीवन में अन्य कार्यों को जितना महत्त्व दिया जाता है उतना ही महत्त्व प्रारम्भ से ही परब्रह्म को भी दिया जाए, परब्रह्म की ओर ध्यान लगाया जाए, श्रीरघुवीर का भजन किया जाए।

रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जान लेउ जो जाननि हारा।।

रा.च.मा. २/१३७/१ कितना आसान है श्रीरघुवीर का भजन, श्रीराम को तो कवे ल प्रेम प्यारा है। जो जानने वाला हो (जानना चाहता हो) वह जान ले। मन, वचन और कर्म से श्रीराम के चरणों में प्रेम हो। संसार में बहुत सुख भोगे लेकिन यह संसार दुःखरुपी समुद्र भी है। इस बात का अनुभव यदि बुढ़ापा आने से बहुत पहले से ही हो जाए तो शुद्ध मन से भगवान का भजन कर श्रेय का मार्ग अपनाना श्रेयकर होगा। क्योंकि,

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा।।

रा.च.मा. ७/६२/१ बिना प्रेम के, केवल योग, तप, ज्ञान और वैराग्यादि के करने से श्रीरघुनाथ नहीं मिलते।

कितना आसान है प्रभु का भजन! कोई कठिन रास्ता अपनाने की आवश्यकता नहीं, सिर्फ शुद्ध अन्तःकरण से प्रभु के चरणों में प्रेम हो। क्योंकि प्रभु को तो केवल प्रेम प्यारा है। जब हमारे जीवन की अंतिम श्वास निकले तो हमें जीवन के अन्तिम साध्य मोक्ष की प्राप्ति हो।

इसलिये हमें प्रारम्भ से ही भगवान से प्रार्थना करनी चाहिये कि

मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।

अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर।।

रा.च.मा. ७/१३०क हे श्रीरघुवीर! मेरे समान कोई दीन नहीं है और आपके समान कोई दीनों का हित करने वाला नहीं है। ऐसा विचार करके हे रघुवंश मणि! मेरे जन्म-मरण के भयानक दुःख का हरण कर लीजिये।

श्रीराम के समान भक्तों का निष्काम, निःस्वार्थ हित करने वाला और मोक्ष प्रदान करने वाला और कोई नहीं है। जीवन में श्रेय का मार्ग अपनाने से ही कल्याण होगा, अन्तिम पुरुषार्थ परमपद (मोक्ष) की प्राप्ति होगी। यह स्थूल शरीर, धन दौलत, ऐश्वर्य, यश एवं जुटाये गये सभी सुख साधन यहीं रह जायंगे। लेकिन जीवन में अर्जित काम, क्रोध, राग-द्वेष तो साथ ही जाने वाले हैं। इनका सम्बन्ध तो आपके सूक्ष्म शरीर से है। मृत्यु तो स्थूल शरीर की होती है। इसीलिये राग-द्वेष, काम, क्रोध से दूर रहने की सलाह प्रत्येक धर्मग्रंथ देता है। यदि प्रारम्भ से ही इन ग्रंथों का अध्ययन किया जाए तो हमारा जीवन सुधर सकता है

मृत्यु अवश्यंभावी है। मृत्यु अभिशाप नहीं आशीर्वाद है। जहाँ अपना कोई नहीं होगा, वहाँ परमात्मा का साथ मिलेगा। मृत्यु के माध्यम से जीवात्मा स्थूल शरीर के बंधन से मुक्त होकर पुनः परमात्मा से मिल जाता है। जन्म के समय बच्चा (जीवात्मा) रोता है, लेकिन उसके घर के लोग, इष्टमित्र हँसते हैं, उत्सव मनाते हैं। मृत्यु (निर्वाण) के समय जीवात्मा हँसता है, लेकिन उसके घर के लोग, सगे-सम्बन्धी, इष्ट-मित्र रोते हैं। जीवन और मृत्यु, आदान-प्रदान है। मृत्यु (निर्वाण) आत्मा-परमात्मा का महामिलन है, एक असाधारण महोत्सव है। मृत्यु मंगलमय कैसे हो, मृत्यु और जन्म के आवागमन से मुक्ति कैसे मिले? इसके लिये शुद्ध अन्तःकरण से प्रभु का स्मरण, ध्यान, चिन्तन करना ही सबसे सरल व श्रेष्ठतम उपाय है।

रामचरित मानस में बाली प्रभु श्रीराम से कहते हैं,

जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अन्त राम कहि आवत नाहीं।। रा.च.मा. ४/१०/३

'मुनिगण प्रत्येक जन्म में अनेकों प्रकार का साधन करते हैं। फिर भी अन्तकाल में उनके मुख से राम-राम नहीं निकलता।'

मम लोचन गोचर सोइ आवा। बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा।।

रा.च.मा. ४/१०/५ वह श्रीरामचन्द्रजी स्वयं मेरे नेत्रों के सामने आ गये हैं। हे प्रभो! ऐसा संयोग क्या फिर कभी बन पड़ेगा? प्रत्येक मनुष्य इस जीवन में इतना साधन अवश्य करे कि इस शरीर को छोड़ते समय मुख से राम-राम निकले, नेत्रों के सामने प्रभु श्रीराम की साकार छवि दिखायी दे। यदि ऐसा होता है तो समझ लीजिये, मोक्ष निश्चित है। ऐसा भी देखागया है कि अन्तिम समय आने पर व्यक्ति के मुख से राम-राम नहीं निकलता। तब घर के लोग कहते हैं, मुखसे राम-राम कहिये, तो उत्तर मिलता है कैसे कहूँ, मुख से निकलता ही नहीं। भगवान से यही प्रार्थना करते रहिये कि अन्तिम समय में मेरे साथ ऐसा न हो, मुख से राम-राम अवश्य निकले। तुलसीदासजी ने राम से अधिक उनके नाम को महत्त्व दिया है। क्योंकि राम नाम में इतनी शक्ति है कि वह न केवल मन की अभिलाषा की पूर्ति करता है वरन् मन की अभिलाषा की पूर्ति करने वालों के भी मनोरथों की पूर्ति करता है, अर्थात् राम-नाम कल्पतरु का भी कल्पतरु है। इस संसार में सर्वोपरि कल्पतरु, रामनाम ही है।

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