शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

भगवान नाराज रहता है माँगने वालों से

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डॉ. दीपक आचार्य

मनुष्य ईश्वर का अंश है और उस पर ईश्वर को भी गर्व है। लेकिन यही मनुष्य अपनी हरकतों से ऎसा कुछ कर डालता है कि ईश्वर को उस पर गुस्सा आना शुरू हो जाता है। 

कोई भी सर्वशक्तिमान और सर्वसमर्थ यह पसंद नहीं करता कि उसका कोई सा अंश दीन-दुःखी और दरिद्री अनुभव करता हुए भिखारियों की तरह जिन्दगी जीता रहे और जहाँ मौका मिले, वहाँ माँगता फिरे। किसी राजा को कभी यह रास नहीं आ सकता कि उसका राजकुमार मांगता फिरे।

हममें से अधिकांश लोग भगवान के दरबार में इसलिए जाते हैं ताकि अपनी मांगें पूरी होती रहें और पूरी की पूरी जिन्दगी भगवान की कृपा से सुख-समृद्धि के साथ पूरी हो जाए।

कुछेक आत्मज्ञानी और सर्वदा संतुष्ट रहने वाले, भगवान के प्रति अनन्य श्रद्धा भाव रखने वाले लोग होंगे जो भगवान से कभी कुछ नहीं मांगते। ईश्वर के हर विधान को सहजता के साथ सहर्ष स्वीकार कर लिया करते हैं और हमेशा संतोषी भाव में ही रमण करते रहते हैं।

अन्यथा बहुसंख्य लोग रोज मन्दिर भी जाएंगे तो दिन भर का पूरा का पूरा एजेण्डा साथ लेकर। और भगवान के सामने हाथ जोड़कर पूरी सूची का स्मरण करते हुए बता ही देंगे कि उनके दिन भर के लिए कौन-कौन से काम हैं जो भगवान को करने हैं।

इन लोगों का कोई सा दिन ऎसा कभी नहीं जाता तब भगवान के सिर्फ दर्शन और स्मरण करने को आए हों। सांसारिक तृष्णाओं के महासागर में रोजाना नहा-नहा कर मन्दिर आने वाले लोग हर दिन कुछ न कुछ नया मांगते रहते हैं।

इन सभी को लगता है कि मन्दिर आने और मूर्तियों के सम्मुख हाथ जोड़ने का मतलब ही यही है कि कुछ न कुछ मांग सामने रख ही देना।  यह तो गनीमत है कि अगाध श्रद्धा और आस्था भाव बना हुआ है कि भगवान उनके काम करने में मदद देंगे ही, और भगवान उनके काम कर भी दिया करते हैं।

वरना ऎसा न हो तो मतलबी लोग भगवान के द्वार फटके तक नहीं। सभी को लगता है कि जैसे भगवान के पास और कोई काम है ही नहीं, सिवाय हमारी ऎषणाएं पूरी करने और भूख-प्यास मिटाने का इंतजाम करने के।

सारी गलती हमारी ही है। हमने अपनी सारी शक्तियां भुला दी हैं और हाड़-माँस का पुतला मानकर बैठे हुए हैं जबकि ईश्वर ने असीम शक्तियों के साथ हमें धरा पर भेजा है। खुद के भीतर समाहित ताकत का हमें अंदाजा नहीं है और यही कारण है कि हम भिखारियों की तरह मांगते फिरते हैं।

ईश्वरीय विधान से जो कुछ प्राप्त होना है, वह हमारा ही है, वो प्राप्त होकर रहेगा, उसे मांगने की आवश्यकता कभी नहीं होनी चाहिए। बावजूद इसके हम अपनी बुरी आदतों से लाचार हैं।

ईश्वर को हमारे भूत, भविष्य और वर्तमान के बारे में सब कुछ अच्छी तरह पता है। उसे अपनी मांगों और इच्छाओं के बारे में बताने की कोई आवश्यकता नहीं होती। वह अन्तर्यामी है और ऎसे में उसके सामने खड़े होकर मांगना और उसे याद दिलाना स्वयं ईश्वर का अपमान है।

किस समय किसे क्या और कितना देना है तथा किस समय किससे क्या और कितना छीन लेना है, उस बारे में उसे कुछ कहने की जरूरत नहीं है। सारे काम नियत घड़ी पर अपने आप हो ही जाने वाले हैं।

वस्तुतः भगवान से मांगना एक तरह से श्रद्धा और विश्वास के अभाव को ही व्यक्त करता है। इससे साफ पता चलता है कि हमारी भक्ति में कहीं न कहीं आडम्बर या छद्म भाव बने हुए हैं अन्यथा हम बातें तो सर्वस्व समर्पण की करते हैं,   ‘‘ त्वमेव माता च पिता त्वमेव .....’’ का राग अलापते हैं और जहाँ विश्वास की बात आती है वहाँ शंकाओं में जीने लगते हैं।

भगवान को अनन्य भाव से भजना ही अपने आप में समर्पण का प्रतीक है। और ऎसा नहीं है तो यह मानकर चलना होगा कि हमारी भक्ति पाखण्ड से भरी हुई है और जो कुछ कर रहे हैं वह सिर्फ और सिर्फ दिखावा ही है, इससे अधिक कुछ नहीं।

श्रद्धावान लोग हमेशा परम संतुष्ट रहते हैं और भगवान के बनाए विधान को पूरी सहजता के साथ स्वीकार करते हुए आगे बढ़ते रहते हैं। इन लोगों का दृढ़ विश्वास होता है कि भगवान जो कुछ करेंगे वह उनके लिए अच्छा ही होगा। 

कई बार भगवान हम पर बहुत कुछ लुटाना चाहता है मगर हम बहुत थोड़ा मांगने लग जाते हैं। इसका नुकसान यह होता है कि भगवान हमारी इच्छा का सम्मान और भक्त की भावना का आदर करते हुए उतना ही देता है जितनी हमारी मांग होती है। इस स्थिति में चाहते हुए भी वह हमारी झोली पूरी नहीं भर पाता।

दृढ़ श्रद्धा-भक्ति और विश्वास रखें, उससे कभी न कहें कि यह दे, वो दे। भगवान से यह भी कभी न कहें कि हम जो कहें वह हो ही जाए अथवा हमारी बात पूरी हो। उससे यही विनती करें कि अपनी मरजी की कर।

ऎसे में ईश्वर जो कुछ करेगा वह हमारे लिए हितकर ही होगा। लेकिन इसके साथ ही माँगने का स्वभाव छोड़ना होगा। भगवान भिखारियों से सख्त नाराज रहता है। और उन भिखारियों से तो और भी अधिक रुष्ट रहता है जो पेट भरने और जिन्दा रहने की बजाय घर भरने के लिए भगवान की मूर्तियों से लेकर इंसानों तक में घूमते रहकर माँगने के आदी हो गए हैं।

इस कालजयी सत्य को भी जान लेना चाहिए कि हर मांगने वाला अन्त तक भिखारी ही बना रहता है। और भिखारी स्वभाव वाले लोग आने वाले सौ जन्मों में भी राज वैभव प्राप्त नहीं कर पाते हैं।

 

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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