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हास्य-व्यंग्य : हाय मैंने उपवास रखा

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सुदर्शन कुमार सोनी
पत्नी को कई सालों से उपवास करते देख रहा हूं , सही कहा जाये तो भारतीय नारी बेचारी पति की सही सलामती के लिये न जाने कितनी सदियों से उपवास रख रही है। पति देश में वास कर रहा हो या भले ही विदेश में पति महाशय हरी भरी वादियों में किसी और की बांहों में वास कर रहे हो वह उपवास नहीं तोड़ती है! पत्नी भांति भांति के उपवास करती है कभी संतान के लिये , तो कभी पति की दीर्घ आयु के लिये , तो कभी किसी और मनोकामना के लिये पत्नी को जब मैं 'करवा चौथ' का निर्जला उपवास करते देखता हूं तो दिल दहल जाता है कि ये कैसे होता है ? पूछता हूं तो वो कहती है कि बस हो जाता है । और हम पति कहां जहां एक घंटे भी बिना कुछ खाये पिये नहीं रह सकते है और ये पत्नी रूपी नारियां चौबीस घंटे बेचारिया निर्जला रहती है। इस समय भी वे पति व बच्चों का पूरा ध्यान रखती है पति व बच्चे एैसे दिनों में भी कोई नरमताई नहीं बरतते है , बल्कि एैसे समय तो इनकी जीभ और ज्यादा चलती है । पत्नी भले ही इनकी यह ज्यादती देखकर मन ही मन जलती हो , कुढ़ती हो परंतु वाह भारतीय नारी वह उफ नहीं करती है वैसे व्रत करके वह और निखरती है !

हमने कई अन्य महिलाओं को भी एैसे ही कई दशकों से उपवास करते देखा है कि उनके पति असमय टें न बोल जाये सही सलामत रहे !
महिला सशक्तिकरण का प्रभाव कहे या हमारे अंदर की एक प्रतिशत भलाई कहे कि हमने विनिश्चय किया कि हम भी उपवास रहेंगे। अब प्रश्न उठा कि कौनसा उपवास रहे ? इस संबंध में हमने पत्नी की भी सलाह लेनी चाही उनके बोलने के पहले ही हम बोल उठे कि हम तो 'करवा चौथ' की टक्कर का कोई उपवास रहेंगे तुमसे इस मामले में हम कमतर नहीं रहेंगे ? हमारा इतना कहना था कि पत्नी बहुत देर तक हंसती रही शायद यह सोचकर कि कोई स्कूल स्तर का खिलाड़ी जैसे सीधे ही ओलंपिक में भाग लेने की ख्वाहिश प्रकट कर रहा हो ! पत्नी ने खिल्ली उडा़ते हुये हमारे उपवास रूपी ख्याली विकेट की एकबारगी तो गिल्ली उडा़ दी और कहा कि तुम्हारे वश का यह सब नहीं है मैंने सोचा कि मेरे वश में तो तुम भी नहीं हो ? उसने आगे कहा कि अच्छे से सोच लो तुम उपवास रहो तो मेरे लिये काम न बढ़े वैसे मै फिर सलाह देती हूं कि तुम व्रत मत रहो तुम्हारे काम की यह चीज नहीं है ? मैंने कहा कि तुम्हीं ने तो एक बार चैलेंज किया था कि हम महिलाओ की तरह उपवास रहना पड़े तो तुम्हारे जैसे पुरूषों की अक्ल ठिकाने पर आ जायेगी ? वैसे यह कहते हुये मैंने सोचा कि ठिकाने पर ही तो वह हमेशा से रही है , तभी तो तुम्हारा पल्लू यह लल्लू छोड़ नहीं पाता है।

अंततः बीच का रास्ता चुना गया कि मैं कोई छोटा मोटा व्रत रहू , जिसमें एक टाईम कम से कम पूरी खुराक मिल जाये और एक समय फलाहारी रहे मुझे लगा कि यह तो बहुत आसान होगा । मैंने साप्ताहिक रूप से उपवास रहना शुरू कर दिया ! पहले हफ्ते ही हमें समझ में आ गया कि एक समय उपवास रहना भी इतना आसान नहीं है जितना हम सोचते थे । सुबह का नाश्ता जब मारा गया , तो मुझे लगा कि मेरी जान मारी जा रही है , इस समय ही मुझे पता चला कि मेरे लिये मेरी जान खाना है और कुछ नहीं! सुबह कहां जहां जो मर्जी वह मैं डकारता था अब निरीह होकर पत्नी को पुकारता था कि यह क्या केवल दूध व फल में रहना पड़ रहा है । ये लेने से तो भूख और तेजी से बढ़ जाती है और इसके अलावा दफ्तर में देर हो जाती है तो भूख क्या होती है , यह समझ में आता है । 'भूख' नाम की पिक्चर के दृश्य भी याद आने लगते है और पत्नी के साथ ही नानी याद आ जाती है । शाम को भी कुछ नहीं ले पाते थे वही दूध या फल इत्यादि से काम चलाना पड़ता था । इससे तो भरे पेट हल चलाना ज्यादा बेहतर होता होगा एैसा लगने लगता था


जैसे तैसे हमने चार हफ्ते में चार बार उपवास के वार झेले । हां ये अब वार ही लगते थे , लेकिन चूंकि बात प्रण की थी तो 'पा्रण जाये पर उपवास न छोडा़ जाये' के सिद्धांत पर हम अड़े रहे भले ही इसमें हम भूख से परेशान होकर कई बार यों ही एक जगह खड़े रहे । वैसे पत्नी ने इतने बरस बाद भी तरस खाकर कई बार कहा कि मान जाओ ये जिद छोड़ दो राजनीति की ममता बनर्जी मत बनो कि जिद की तो फिर पूरी करके ही मानेंगे । पत्नी जब जब यह कहती तो हमारा स्वाभिमान और जाग जाता कि चाहे कुछ हो जाये उपवास तो हम नहीं छोड़ने वाले । एक बार तो भूख बर्दाश्त न होने से ग्लूकोस चढा़ने की नौबत आ गयी , लेकिन हमने डाक्टर को कुछ और ही कारण बताया और अपनी भद होने से अपने आपको बचाया ।
खैर जिद में ही सही हम उपवास आज भी जारी रखे हुये है , लेकिन हर सप्ताह एक दिन पहले से हालत खराब होने लगती है यह सोच कर कि एक समय ही खाकर रहना पड़ेगा । यह सबसे ज्यादा तब अखरता है जब सारी महत्वपूर्ण मीटिंग , कार्यशाला , सेमीनार , कान्फ्रेंस इसी उपवास के दिन पड़ती है जब कोई यहां पूछता है कि आप क्यों नहीं कुछ ले रहे हैं ? तो हम बड़े गर्व से कहते है कि आज उपवास है लेकिन साथ ही मीनू देखकर लगता है कि ये कितने भाग्यशाली है, और मै इतने पकवान रखे रहने के बावजूद भुकवा बनने को मजबूर हूं । 'अभिशप्त' शब्द उपयोग नहीं कर रहा हूं क्योंकि यह निर्णय आखिर था तो मेरा ही ।


गंगू तो यही कहेगा कि यदि आप उपवास पर रहना चाहते है तो बेशक रहे। लेकिन पत्नी की इस संबंध में सलाह को शक की नजरों से न देखे उसने न इसीलिये कहा होगा कि आपको दिन में ही रात के नजारे उपवास रहने से नजर न आने लगे । गंगू तो इस अनुभव के बाद एक सोलह आने सच वली सलाह देता है कि पुरूष व स़्त्री भगवान के बनाये दो कोहिनूर है ! दोनों एक दूसरे से कम नहीं है। दोनों की कुछ कमजोरियां व कुछ ताकते है इसे उन्हें स्वीकार करना चाहिये और बेकार के काम्पटीशन में नहीं पड़ना चाहिये । आज के युग की सारी झंझटें इस बेकार के काम्पीटीशन के कारण ही सामने आ रही है ?

सुदर्शन कुमार सोनी
डी-37 , चार ईमली
भोपाल, 462016

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