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कहानी - व्यञ्जन सन्धि

hindi kahani vyanjan sandhi by asit kumar mishra

-असित कुमार मिश्र

व्यञ्जन सन्धि....

बलिया जिले में आपका दूसरा कदम चाहे जहाँ भी पड़े, पहला कदम तो भृगु बाबा के मन्दिर में ही पड़ना है। मुण्डन से लेकर विवाह,नामकरण से लेकर हस्तरेखाओं में उलझी हुई जिन्दगी सबका निदान होता है यहाँ। यहाँ तक कि विवाह का प्रथम निमंत्रण भृगु बाबा के नाम से ही आना है। इसी मंदिर के पुजारी हैं पंडित गजानन मिसिर। सुबह छह बजे से लेकर दोपहर के बारह बजे तक तो सुर्ती खाने की भी फुरसत नहीं मिलती पंडीजी को।

सत्यनारायण कथा का अन्तिम अध्याय जैसे ही पूर्ण हुआ, मन्दिर के गेट पर रहमान मियां टेम्पू का हार्न बजाने लगे। पंडीजी समझ गए कि आज कोई नया गाड़ी खरीदा है, नारियल चढ़ाना होगा। दौड़ कर गेट पर गए। रहमान मियां ने नारियल, रक्षासूत्र, रोली और लड्डू देते हुए कहा-पंडीजी! आज ही नया टेम्पू खरीदे हैं, आसीरबाद दीजिये। पंडीजी ने देखा कि हरे रंग वाली टेम्पू लाल पीले झालरों में नई दुलहिन की तरह सजी सँवरी खड़ी है। आगे शीशे पर 786 और पीछे 'भृगु बाबा की कृपा' लिखा है। मंदिर में प्रसाद चढ़ाने के बाद उन्होंने रहमान को देते हुए कहा-का रे रहमनवां! शादाब बिटिया कैसी है अब?रहमान ने बताया कि-पहले से तबीयत में काफी सुधार हुआ है। और कुर्ते के जेब से पांच रुपए का मुड़ा तुड़ा नोट निकाल कर दक्षिणा स्वरुप पंडीजी के हाथ पर धर दिया।

दिन का दस बज गया है। गजानन मिसिर किसी जजमान का हाथ देखते हुए बता रहे हैं कि-शनिचर आजकल थोड़ा टाईट हो गया है। काली गाय को जौ खिलाइए। और शनिवार के दिन पीपल के पेड़ को जल चढ़ाइए।तभी जगेसर मिसिर उनके कान के पास आकर कहते हैं-ए बाबूजी! खाना बना के रख दिए हैं,टाईम पर खा लीजिएगा।हम जा रहे हैं पढ़ने। पंडीजी ने बिना ध्यान हटाये कहा-ठीक है जाओ। जबसे पंडिताइन मरीं हैं रोज का क्रम यही है। जगेसर ही दोनों टाईम का खाना बनाते हैं। आचार्य अंतिम वर्ष में पढ़ते हैं। पंडित गजानन मिसिर के कुल दीपक यही हैं। पर जजमानी वृत्ति में इनका मन नहीं लगता है। कहते हैं कि एस डी एम बनेंगे। कासिम बाज़ार होते हुए ओवरब्रिज पार कर के जगेसर टी०डी० कालेज के मेन गेट पर जैसे ही पहुँचे, पीछे से परमिला की आवाज़ सुनाई दी-मिसिरजी, रोज दस मिनट लेट कर देते हैं आप! जगेसर ने खुशी छिपाते हुए कहा-तो आप यहाँ क्या कर रही हैं? आप को तो क्लास में होना चाहिए था न! परमिला कुछ कहती नहीं हैं। बस दुपट्टे के छोर को उँगलियों में लपेटती हैं। जगेसर जानते हैं-जब परमिला के शब्द जवाब देने लगते हैं तो वो अनकही बात उनकी उँगलियाँ,दुपट्टे से कहने लगती हैं। गलियारा पार करते हुए जगेसर ने कहा था-परमिला जी!थोड़ा टाईम निकाल कर व्यञ्जन सन्धि समझा दीजियेगा मुझे। बड़ा कठिन है। कई किताबों में पढ़ा पर समझ में नहीं आया अब तक।

अब जाकर मंदिर में भीड़ खतम हुई है। गजानन मिसिर मंदिर में बने अपने कमरे में पहुँचते हैं। थाली में सब्जी रोटी और कटोरी में दाल लेकर बैठते हैं।भोजन मंत्र पढ़ने के बाद जैसे ही पहला कौर मुँह में डालते हैं, मुँह से गाली निकली-ई ससुरा जगेसरा का दिमाग आजकल न जाने कहाँ रहता है? कभी सब्जी में नमक के जगह पर चीनी डालता है तो कभी नमक-चीनी कुछ भी नहीं डालता। गुस्से में थाली सरका दी। कटोरी की दाल पी गए,और लेटे लेटे ही सोचने लगे कि कोई अच्छी संस्कारित ब्राह्मण कन्या मिले तो जगेसर का विवाह कर दें। रोज रोज ये पथ्य-कुपथ्य खाने से तो मुक्ति मिलेगी।

कालेज के पुस्तकालय में जगेसर और परमिला बैठे हुए हैं। परमिला के सामने'मृच्छकटिकम्' खुली हुई है। जगेसर कहते हैं-तो व्यञ्जन सन्धि का मतलब स्वर से व्यञ्जन का मिलन,या व्यञ्जन का व्यञ्जन से मिलन! यही न?

परमिला कहती हैं-हाँ यही। पर अभी और भी उपनियम हैं इसमें। पर मुख्यतः यही है।

जगेसर ने कहा-तो क्या इस नियम पर हमारा मिलन संभव नहीं?

परमिला गंभीर हो गई-पंडीजी! किताबों के बाहर की दुनिया के नियम दूसरे हैं। हमारा और आपका गोत्र एक ही है। विवाह नहीं हो सकता। सगोत्रीय विवाह की मान्यता धर्मशास्त्र नहीं देते। जगेसर बिना कुछ कहे उठ कर चले आए।

सावन का महीना वैसे तो शंकर पूजन के लिये जाना जाता है। पर भृगु मंदिर में भी भीड़ बढ़ जाती है। केवल इसी एक महीने की आमदनी से पंडित गजानन मिसिर के तीन महीने का काम चल जाता है। संध्या वंदन समाप्त कर वो कमरे में पहुँचे तो देखा कि जगेसर आज पढ़ नहीं रहे। उन्होंने पूछा-जगेसर! क्या बात है? तबीयत ठीक है न?

जगेसर ने हिम्मत करके कहा-बाबूजी! शिवाकांत मिसिर को जानते हैं न?उनकी लड़की परमिला हमारे ही साथ पढ़ती हैं। हम उन्हीं से विवाह करना चाहते हैं।

पंडित गजानन जी चौंक गए। बोले-एकदम से बुद्धि भ्रष्ट हो गई है क्या? सगोत्रीय शादी कहीं सुफल हुई है ? मंदिर की महन्ती भी छिनवाओगे क्या? फिर कभी कहना भी मत ऐसी बात।

शायद परमिला के घर भी ऐसी ही प्रतिक्रिया हुई थी। तभी तो अब बहुत दूर दूर रहती हैं परमिला जगेसर मिसिर से। परीक्षा का समय चल रहा है। बस आखरी पेपर हो जाए तो जगेसर एक बार फिर हिम्मत करके बात करेंगे इस विषय पर। कहेंगे कि दुनिया चाँद पर चली गई और आप अभी गोत्र और नाड़ी में ही उलझे हैं। और हाँ, अन्त में वो वाला डायलॉग भी मार देंगे कि 'जब मियां बीबी राजी तो क्या करेगा काजी'।

आज सुबह से ही बारिश हो रही है। रिजल्ट भी आज ही आएगा। जगेसर ने देखा कि कोई शादी का कार्ड भृगु बाबा के स्थान से नीचे गिरकर जमीन पर पड़ा है। जगेसर ने सोचा कि कार्ड उठाकर यथास्थान रख दें। नाहक पैर से लगेगा। उन्होंने कार्ड उठाया। कार्ड पर निवेदक का नाम शिवाकांत मिश्र देखकर चौंके। काँपते हाथों से कार्ड खोला- आयु० परमिला मिश्रा के साथ चिरं० बलराम पाण्डेय का नाम देखकर मूर्छित होकर गिर पड़े।

'व्यञ्जन सन्धि'कितनी कठिन है। शायद उन्हें आभास हो गया था 


असित कुमार मिश्र
असित कुमार मिश्र 
सिकन्दरपुर
बलिया
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