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भारत में महिलाओं की वर्तमान स्थिति की सामाजिक विवेचना

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नीलम यादवमनोवैज्ञानिक,इतिहास,संस्कृति एवं सामाजिक सरोकारों की प्रगतिवादी लेखिका नीलम यादव ने अपने लेखन के द्वारा हाशिए पर पड़े समाज को केन्द्र में रखकर अपना सृजन किया है। लेखन के क्षेत्र में भी नीलम यादव राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाती रही हैं। आपके लेखन में समाज के दबे,कुचले एवं पीड़ित आम जन के साथ ही साथ मानव मूल्य तथा मनुष्यता की बात देखने को मिलती है। वर्तमान में आप एक अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिका का सम्पादन सफलतापूर्वक कर रही हैं।भारत में महिलाओं की स्थिति सदैव एक समान नही रही है। इसमें युगानुरूप परिवर्तन होते रहे हैं। उनकी स्थिति में वैदिक युग से लेकर आधुनिक काल तक अनेक उतार-चढ़ाव आते रहे हैं तथा उनके अधिकारों में तदनरूप बदलाव भी होते रहे हैं। वैदिक युग में स्त्रियों की स्थिति सुदृढ़ थी, परिवार तथा समाज में उन्हे सम्मान प्राप्त था। उनको शिक्षा का अधिकार प्राप्त था। सम्पत्ति में उनको बराबरी का हक था। सभा व समितियों में से स्वतंत्रतापूर्वक भाग लेती थी तथापि ऋगवेद में कुछ ऐसी उक्तियां भी हैं जो महिलाओं के विरोध में दिखाई पड़ती हैं। मैत्रयीसंहि…

संस्कृत में हास्य व्यंग्य - हिंदी भाषा टीका सहित

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एकविंशी शताब्दी समागताइयम् एकविंशतिः शताब्दी पश्य सखे! आगता भारते।। श्वानो गच्छति कारयानके मार्जारः पर्यङ्के शेते, किन्तु निर्धनों मानवबालः बुभुक्षितो रोदनं विधत्ते। अचेतनाः पाषाणमूर्तयः वखसज्जिताः सराजन्ते, किन्तु दरिद्रो वृद्धोऽशक्तः शीते वस्रं विना कम्पते।। इयम् एकविंशतिः शताब्दी पश्य सखे! आगता भारते।। विद्यालयेषु भवनाऽभावात् ग्रामे तरुच्छायासु बवालकाः, प्रकृतिनिर्मिते वातावरणे किं पठन्ति जानन्तु भवन्तः। परस्परं ते कलहायन्ते मुहुर्मुहुर् अपशब्दायन्ते, किन्तु शिक्षकाश्चिन्तारहिता: तरोरधस्तात् सुख शेरते।। इयम् एकविंशतिः शताब्दी पश्य सखे! आगता भारते।। अतिवृष्टिभिः पीड़िता ग्रामाः यदा जलौधे भृशं निमग्नाः, जलप्रवाहे वहन्ति पशवः अन्नाऽभावे रुदन्ति शिशवःएतमेव जलप्रलयं ब्रहम दुर्लभमिदं दृश्यमवगन्तुम्, वायुयानमारुह्य प्रहृष्टः नेता सपरिवारन् उड्डयते।। इयम् एकविंशतिः शताब्दी पश्य सखे! आगता भारते।। क्वचिद् बाबरीमस्जिद काण्डम् क्वचिद् अयोध्यामार्च - कीर्तनम् सतीप्रथामण्डने भाषणमू अस्मृश्यता - समर्थन - वचनम्। समानताया अधिकारस्य संविधान - भावना - नाशनम् मन्दिरेषु हरिजनव्यक्तीनाम् नैवाऽ…

मांझी द माउंटेन मैन - सार्थक सिनेमा की बढ़ती जरूरत

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सार्थक सिनेमा की बढ़ती जरूरत
प्रमोद भार्गव

    अब फिल्म देखने की इच्छा दिमाग में नहीं जागती। यही वजह रही कि पिछले ड़ेढ़ दशक से छविगृह में जाकर कोर्ई फिल्म नहीं देखी। इधर 'मांझी द माउंटेन मैन' आई तो इसे देखने की इच्छा प्रबल हुई। दरअसल दशरथ मांझी 1990 के ईद-गिद जब अपने संकल्प के पथ निर्माण का सपना बाईस किलोमीटर पहाड़ का सीना तोड़कर पूरा कर चुके थे,तब इसकी सचित्र कहानी 'धर्मयुग' में छपी थी। तभी से इस दलित नायक की शौर्यगाथा ने मेरे अवचेतन में कहीं पैठ बना ली थी। सत्तर-अस्सी के दशक में समाज का कटू यर्थाथ और सामाजिक प्रतिबद्धता दर्शाने वाली फिल्में आती रहती थीं आर्थिक रूप से समर्थ व्यक्ति भी इन फिल्मों को देखकर गरीब और वंचित के प्रति एक उदार भाव लेकर सिनेमा हॉल से निकलता था,लेकिन 1990 के बाद आए आर्थिक उदारवाद ने समुदाय के सामूहिक अवचेतन पर प्रभाव डालने वाले इस उदात्त भाव को प्रगट करने वाली फिल्मों को भी निगल लिया। युवाओं में संकल्प की दृढ़ता आज भी है। लेकिन प्रतिस्पर्धा की इस जबरदस्त होड़ में असफलता तमाम युवाओं को स्वयं में अयोग्य होने की ऐसी गुंजलक में जकड़ लेती है कि वह आत्मघाती कद…

कहानी - इंतजार

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रवि श्रीवास्तवहर पल हर दिन उसका ख्याल मेरे दिमाग में रहता है। एक दिन बात न हो तो ऐसा लगता है कि सालों बीत गए हैं। उसे देखे बिना तो लगता है कि जिंदगी का सारा टेंशन आज ही है। एक परेशान आत्मा की तरह कब से भटक रहा हूं। लेकिन वो है कि बाहर ही नहीं निकल रही है। आंखें तलाश रही थी कि एक बार दीदार हो जाए। आज शायद खुदा को ये मंजूर नहीं है।हर रोज की मेरी आदत बन गई है। सुबह 11 बजे से गेट पर खड़े होकर उसका दीदार करना। बिना उसके दीदार के पूरा दिन ठीक से नहीं गुजरता था। घर के बाहर और अंदर लगाए रहता। फिर उसका इशारा मिलता कि धूप है घर के अंदर जाओ फोन पर बात करना। मैं खुशी से अंदर चला आता था। आज फिर मैं उसी के इंतजार में दीदार के लिए अपने गेट पर खड़ा हूं। तेज धूप से जमीन तप रही थी। मैं भी जिद पर अड़ा था। उसे देखकर ही दम लूंगा। धूप कह रही थी कि अंदर चला जा वरना जल जाएगा। वो बेरहम बाहर निकलने का नाम नहीं ले रही थी। जैसे उसे कुछ पता ही न हो। कोई उसका बाहर इंतजार कर रहा है। सामने घर होने की वजह से इंतजार करने में मजा और गुस्सा दोनों आ रहा था। धूप में बैठा था। तभी एक हल्की सी झलक पैर की मिली। मुझे लगा शायद …

अपनी ही धुन में हैं सारे

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डॉ0 दीपक आचार्यकहा तो जाता है कि सभी को धुन का पक्का होना चाहिए। पता नहीं वे लोग कहाँ चले गए जो धुन के पक्के हुआ करते थे और वाणी के भी। उस जमाने का भी अंत हो ही गया है जब लोग मन-वचन और कर्म के पक्के थे। इनमें से कोई भी कानों का कच्चा नहीं होता था। सब के सब पक्के और जगर्दस्त पक्के हुआ करते थे। अब पक्के नहीं रहे, सब जब कच्चे ही कच्चे दिखने लगे हैं। कोई कानों का कच्चा है, कोई लंगोट से लेकर कच्छे तक का कच्चा।  हृदय की दीवारों से लेकर मस्तिष्क के तंतुओं तक, और नख से लेकर शिख तक कहीं न कहीं तानों-बानों में किसी खामी या विकृति के चलते कोई मानसिक कच्चा है, कोई शारीरिक कच्चेपन से ग्रस्त। आजकल सारे के सारे कच्चों ने सच्चों को हाशिये पर ला खड़ा कर दिया है। कुछ न कुछ पाने और पाते हुए जमा कर देने की दौड़-भाग में सारे भाग रहे हैं, कुछ को पता है कि कहां जा रहे हैं, कुछ को भनक तक नहीं कि कहां जा रहे हैं, किधर ले जाया जा रहा है और कौन है जो हाँकता हुआ कहीं न कहीं से ले जा रहा है। बहुत सारे हैं जो भेड़ों की रेवड़ों को चिढ़ाते हुए किसी न किसी के पीछे अनुचरी परंपरा को धन्य करते हुए चलते ही चले जा रहे…

जहाँ सादगी वहीं संतोष

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- डॉ. दीपक आचार्यजीवनचर्या को आनंद से संचालित करना भी कला है। जो लोग इसे सीख जाते हैं वे निहाल हो जाते हैं। जबकि इसके प्रति नासमझी और उपेक्षा दर्शाने वाले लोग जीवन में चाहे कितनी तरक्की पा लें, हमेशा दुःखी, अभिशप्त और आप्त ही रहते हैं। संसार बहुत बड़ा है और यह अपार संसाधनों से भरा हुआ भी है। लेकिन इसमें से किसकी हमें कितने अनुपात में आवश्यकता है, इसका निर्णय हमें अपने ज्ञान और विवेक से ही करना है। यह निश्चय किसी और के भरोसे कभी नहीं हो सकता। पुराने जमाने में आज की तरह संसाधन और सुख-सुविधाएं, सेवाएं नहीं हुआ करती थी। बावजूद इसके लोग खुश थे और जो प्राप्त होता था उसमें परम संतुष्ट रहते थे। किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं थी। संसाधनों और सुविधाओं के मामले में आज ही तरह जमीन-आसमान का अंतर नहीं था। सबके पास वे ही सब वस्तुएं होती थीं जो समान रूप से सभी के लिए होती थीं। थोड़ा-बहुत ही अंतर था। लेकिन यह अंतर इतना अधिक नहीं था कि किसी एक के वैभव और संसाधनों को देखकर दूसरों में किसी भी प्रकार से ईर्ष्या का भाव जगे। फिर इन संसाधनों के उपयोग और स्वामित्व के मामले में वह जमाना अत्यन्त उदार था इसलिए…

नोबल पुरस्कार विजेता - विलियम फॉकनर की कहानी - एमेली के लिए एक गुलाब

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अनुवाद - अनुराधा महेन्द्रमिस एमेली का जब निधन हुआ तो समूचा शहर उसके जनाजे में शामिल हुआ। एक जोर जहाँ पुरुषों में इसके पीछे एक ' स्तंभ ' के ढह जाने पर सम्मान- भरे स्नेह की भावना थी, वहीं स्त्रियों में उसके घर को भीतर से देखने कीं जिज्ञासा थी। क्योंकि पिछले तकरीबन दस बरसों से एक बूढ़े नौकर के सिवाय उसके घर के भीतर कोई आया-गया नहीं था। यह नौकर ही उसका माली और रसोईया भी था। विशाल चौकोर फ्रेमवाला उसका मकान, अठारहवीं सदी की अतिशय खूबसूरत शैली में ऊंचा गुंबदाकार तथा कुंडलीनुमा बाल्कनियों से सजा मकान था। यह किसी जमाने में सफेद. रहा होगा, जो उस जमाने के सबसे विशिष्ट इलाके में स्थित था, पर गराजों और रुई ओटने की मशीनों ने वहाँ अनधिकार प्रवेश कर इस इलाके और आसपास की भव्यता व खूबसूरती को नष्ट कर दिया था, बस मिस एमेली का मकान ही बचा था- माल डिब्बों और गैसोलिन पंपों के बीच इस हठीली और नखरेबाज सँड़ाँध के ऊपर- जो सबकी आँखों में कटि की तरह चुभता था और अब मिस एमेली भी नहीं रही। वह भी अपने उन्हीं नामी-गिरामी प्रतिनिधियों में शामिल हो चुकी थी, जो जेफरसन के युद्ध में शहीद सैनिकों व समाज के खास और अज्…

सीताराम पटेल की रचनाएँ - दुनिया की प्रथम प्रेम कहानी

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दुनिया की प्रथम प्रेम कहानी
1 :-
कितने पाकिस्तान में समय ही नायक, महानायक और है खलनायक
अदीब और विद्या के परस्पर आकर्षण से आरंभ होती है कहानी
खामोशी की गहराई ही शायद था लगाव का पैमाना
मिलन, प्रतीक्षा और साथ साथ सफर चलता रहा यह दो साल
फिर विद्या से अलगाव, विद्या द्वारा बिना नाम पता के खत लिखना
अगर भेजा जाए मन से खत, तो कई जन्मों के बाद भी
पहुँच ही जाता है पहुँचने वाले तक
2 :-
किसी कारण ब्राह्मण पुत्र की मृत्यु
उसे जोड़कर देखा गया, शुद्र शंबुक की तपस्या से
राजाराम द्वारा हत्या है एक जघन्य अपराध
जिसे किया है राजा राम ने
3 :-
वैदिक युग आसक्ति और व्यभिचार बलात्कार की है दास्तान
ऋषि गौतम की पत्नी अहिल्या है अपूर्व सुन्दरी
परियाँ भी उसके सामने पानी भरी
इन्द्र हो गया उस पर आसक्त
धारण कर लिया ऋषि गौतम का भेष
चैकसी के लिए उसने साथ लिया चंद्रमा
उसे नियुक्ति किया आश्रम के द्वार पर
और और ऋषि पत्नी अहिल्या के साथ तब
इन्द्र ने किया संभोग
ऋषि गौतम ने सुनाए तीनों को सजाएँ
इन्द्र को उन्होंने दिया शाप
ओ दुराचारी इन्द्र तेरा होगा पराभव
जिस आसक्ति के कारण तूने
मेरी पत्नी के साथ किया है दुराचार
ऐसे सहस्रों पाप प्रकट होंगे तेरे शरीर …

कहानी - तारकोल का चोर

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अजय ठाकुर“कहीं धरती हमेशा उबलती है, कहीं आसमां हमेशा झुकता है। कहीं भूख हमेशा सोती है, कहीं रोटी हमेशा लड़ती है”। यह सच है, भूख जब चरम पर पहुँच जाती है तो हर प्राणी अपनी भूख के लिए लड़ता है, अपनी रोटी के लिए लड़ता है। कई बार ये लड़ाई मानवीय और अमानवीय दोनों तरह की हो जाती है। मधेपुरा, बिहार का एक ऐसा जिला, जो जिला तो है मगर उसको पूरी तरह से जिला बनने में अभी बहुत वक़्त लगने वाला था। रेलवे स्टेशन से शुरू होता शहर कॉलेज चौक पर आकर ख़त्म, दो किलोमीटर में पूरा शहर। तमाम स्कूल कॉलेज, सरकारी दफ्तर, बाजार इन्हीं दो किलोमीटर के दायरे में थे। सन १९९० की बात है, मई दोपहर की उफनती गर्मी में शहर के बीचोबीच पीडब्लूडी ऑफिस के मेन गेट पर बड़ी तादाद में लोग इकट्ठे हुए और जम कर नारेबाजी करने लगे। “मौज्मा गाँव को शहर से जोड़ो, शहर से जोड़ो, शहर से जोड़ो” “पक्की सड़क बनवाओ, सड़क बनवाओ, सड़क बनवाओ। उस वक़्त पीडब्लूडी चीफ़ इंजिनियर ने उस भीड़ को यकीन दिलाते हुए कहा “जल्द से जल्द सड़क बनवा दी जाएगी, हमें सरकार के भी आदेश मिल चुके है। देरी हो रही है तो सिर्फ तारकोल की वजह से, जैसे ही हमें तारकोल मिल जायेंगे, मौज्मा गाँव को…

साफ कहें, सुखी रहें, नुगरों से बेपरवाह रहें

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डॉ0 दीपक आचार्यकलिकाल के दुष्प्रभाव से घिरे वर्तमान समय में जात-जात के असुरों का बोलबाला है।  पिछले सारे युगों के तमाम किस्मों के असुरों के आधुनिकतम और हाईटेक संस्करण सर्वत्र दिखने में आ रहे हैं। कई बार तो लगता है कि जैसे यह पूरा युग धर्म, सत्य, ईमान, शालीनता और मानवीय संवेदनाओं से जुड़े लोगों के लिए है ही नहीं, जो सज्जन लोग इसमें पैदा हो गए हैं वे किसी न किसी गलती से जन्म ले चुके हैं अथवा नरक में जगह कम पड़ जाने की वजह से भगवान से किश्तों-किश्तों में मानसिक और शारीरिक पीड़ाएं भुगतने, विभिन्न प्रकार के संत्रासों के जरिये अपनी सजा भुगतने के लिए ही भेज दिए हैं। सारे के सारे लोग मूल्यहीनता में जी रहे हैं, भय, हिंसा, पाखण्ड, आडम्बर और लूट-खसोट का माहौल लगातार पाँव पसारता ही जा रहा है। हरामखोरी, नालायकियां, छीना-झपटी और आसुरी प्रवृत्तियों से कोई क्षेत्र अछूता नहीं है। वैश्विक स्तर पर हर तरफ स्थितियाँ खराब हैं। जो देश स्वतंत्र हैं उनमें से कितने ही ऎसे हैं जहाँ के लोग अपनी स्वतंत्रता पर न गर्व कर सकते हैं, न इन लोगों को स्वतंत्रता का कोई मीठा अनुभव हो पाया है। उलटे ये लोग स्वीकारते हैं कि तथा…

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रचनाकार

रवि रतलामी

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