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ई-बुक : प्राची, जुलाई 2015 - काव्य संसार

 

वो अच्छे दिन

राजेश माहेश्वरी

राष्ट्र है एक

विचारधाराएं हैं अनेक

अनेकता में एकता का

अद्भुत उदाहरण हैं हम

गंगा, यमुना, सरस्वती का मिलन

बनता है मोक्ष दायक संगम

अनेकों विचारधाराओें के मिलन से

क्यों नहीं है भारत अखंड

प्रभु ने बनाया मानव को

दिया उसे जीवन

इस आशा में कि

वो करेगा सकारात्मक सृजन

पर मानव भ्रमित हो गया

स्वयं को सर्वश्रेष्ठ बताने में

सत्ता की लोलुपता एवं

अपने प्रभुत्व को बढ़ाने में

उसने बांटा अपने को

देश, धर्म और जाति

के विवादों में.

आपसी सद्भाव, साहचर्य, प्रेम

जाने कहां खो गए

विश्वास का खंजर भोंककर

नैतिकता को भूलकर

कुरीतियों को साथ लेकर

अनजानी राहों में भटक गए

चिंतन, मनन की अपनी

अद्भुत क्षमता छोड़कर

हम आपस में ही लड़ गए.

अभी भी वक्त है, हम जागें

मेहनत और ईमानदारी की नींव पर

करें विकास की इमारत बुलंद

आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक

परिस्थितियों का हो सकारात्मक विवेचन

तब नहीं होगा दूर वह दिन

जब हम सब कहंगे

आ गये हमारे अच्छे दिन!

संपर्कः 106, नयागांव,

रामपुर, जबलपुर (म.प्र.)

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दो गजलें : गुलाम जीलानी असगर


मौजे-ए-सरसर1 की तरह दिल से गुजर जाओगे
किसको मालूम था, तुम दिल में उतर जाओगे

आईनाखाने2 से दामन को बचाकर गुजरो
आईना टूटा तो रेजो3 में बिखर जाओगे

इक जरा और करीब-ए-रग-ए-जां4 जाओ तो
मेरे खूंनाब5 में तुम ढलके संवर जाओगे

देखो वो चांद सिसकता है उफक6 की हद पर
तुम भी उस चांद की मानिन्द गुजर जाओगे.

इस भरी बज्म से हंस-बोल के रुखसत हो लो
कल जो उट्ठोगे तो बा-दीदा-ए-तर7 जाओगे

1. तेज हवा के झोंके की तरंग 2. वह मकान, जिसमें चारों तरफ दर्पण लगे हों 3. कणों 4. प्राण धमनी के समीप 5. खून के आंसू 6. क्षितिज 7. भीगी हुई आंखों से

रास्तों पर कब तलक रंगों के पैकर देखते
रू-ब-रू होकर कभी अपना भी मंजर देखते

तुमने देखा है फकत बाहर से दीवारों का रंग
दिल पे क्या गुजरी पस-ए-दीवार1 आकर देखते

खींच लीं खुद ही लकीरें हमने अपने हाथ पर
किस को फुर्सत थी कि हाथों का मुकद्दर देखते

आंख की शबनम तो मेरे बादलों की ओस है
कितना गहरा है दिल-ओ-जां का समन्दर देखते

जर्द पत्तों की तरह कब से हवा की जद2 पे हैं
इक जरा आंधी जो थमती तुझ को मुड़कर देखते

1.    दीवार के पीछे 2. निशाना

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आचार्य भगवत दुबे
हुक्मरानों के आगे निडर है गजल.
ले के विद्रोही तेवर मुखर है गजल.

घुंघरू परतंत्रता के न पांवों में अब,
आशिकी का न केवल हुनर है गजल.

महफिलों का न केवल ये श्रृंगार है,
जिन्दगी का समूचा सफर है गजल.

ऐश-ओ-आराम का मखमली पथ नहीं,
कंटकों पत्थरों की डगर है गजल.

खेत, खलिहान, जंगल, नदी, ताल, जल,
मोट, हल, बैलगाड़ी, बखर है गजल.

गांव, तहसील, थाना, कचहरी, जिला,
राष्ट्र क्या विश्व से बाखबर है गजल.

प्रांत, भाषा, न मजहब की सीमा यहां,
आप जाएं जिधर ये उधर है गजल.

मुक्तिका, गीतिका, तेवरी कुछ कहो,
आज हिन्दी में भी शीर्ष पर है गजल.


सम्पर्कः पिसनहारी की मढ़िया के पास, जबलपुर-482003
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गजल

किशन स्वरूप
जिनसे दिल मिलना मुश्किल है उनसे हाथ मिलाना क्या
जिसने ज़ख्म दिए शिद्दत से उसको जख्म दिखाना क्या

जाने क्या-क्या बातें करता रहता है तन्हाई में
जो खुद में ही सिमट गया हो उसका शोर मचाना क्या

जब तक अम्मा रही गांव में तब तक रस्ता याद रहा
उसके बाद शहर ने इतना बांधा, आना-जाना क्या

कितनी उठा-पटक जारी है राजनीति के दंगल में
सच कहने में पर्दे-दारी लेकिन झूठ छिपाना क्या

राही से रस्ता पूछेंगे, मंजिल भी, चौराहे भी
ऐसे रहबर आप बने हैं, समझें क्या, समझाना क्या

ऐ ‘‘स्वरूप’’ किरदार निभाए बिना खिलाड़ी चले गए
रंग-मंच पर बूढ़े बंदर से उम्मींद लगाना क्या

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कविताएं - केशरी प्रसाद पाण्डेय
ए-चैत हरे

बहुत दिनों के बाद पुनः मैं आज गया था गांव.
आया नीम, महुआ, इमली की छांव तले की ठांव
संध्या का था समय सुशोभित जल निधि में थी नाव
चैतहरों का बसा कबीला वहीं रुके थे मेरे पांव

सर पर भरकम बोझ लिए थे, जैसे दुनिया जीत लिए हो.
श्रम सीकर देकर के अपना प्रकृति नदी से सीख लिए हों.
नर-नारी का भेद मिटाकर आपस में थे चहक रहे.
वस्त्रहीन थे खुले बदन पर कचहारी से महक रहे.

भेद नहीं लघुता प्रभुत्त का, भेद न था मुस्कानों में.
न था कोई अतिथि वहां पर, ना कोई था महियानों में.
कल की चिन्ता नहीं उन्हें कुछ आज की खुशी मनाने में.
जी भर जीते देख उन्हें हम, क्षण भर रुके ठिकानों में.

हमने देखा लकर-धकर में, लग गए अग्नि जलाने में
आसमान के नीचे कुछ तो जुट गये भात पकाने में.
कुछ ने आटा गूंथा और गक्कड़ लगे बनाने में
दिखा न हमको भेदभाव कुछ खाने और खिलाने में

चुनिया से चक्कर चाचा तक बैठे एक ठिकाने में,
नही आचरज में कुछ भी था नील गगन सिरहाने में.
धरा-धाम में मस्ती करते तारा गज के आने में
श्री बच्चन जी की मधुशाला, आ जाती उनके पैमाने में.

श्रम-संयम को मिश्रण इनके जीवन का उच्चारण है,
कठिन परिश्रम खुला आसमां व्यावहारिक विस्तारण है.
वर्तमान को जीते हैं ये छोड़ सभी भविष्य की चिंता,
एचैतहरे मानव जीवन के एक उत्कृष्ट उदाहरण है.

हो गया रोशन हमारा गांव भी

अब धरा पर नहीं धरता पांव रमुआ
    रह नहीं पाया अछूता कांव भी,
उड़ रहा है तेज विकसित हवा में
    चल नहीं पाता कोई अब दांव भी.

कूप सूखे नदी सूखी नहर सूखी दाव में
    चल रहा जो चाल दमुआ ठांव में,
हवा का रुख देख सूखी रेत भी
    आ धंसी है रखी जर्जर नाव में.

सामुदायिक भवन की टिमटिमाती रोशनी में
    विकास कायरें की समीक्षा हो रही है,
आपत्ति को लेकर खड़ा एक गड़रिया कह रहा,
    क्या कहूं कैसे कहूं पहिचान मेरी खो रही है.

साक्ष के खातिर बिके है कान बकरी के हमारे
    अब फिसलते जा रहे हैं हमारे पांव भी,
दर्द अन्तरस को विकल हो निकल आना चाहता है
    अब हो गया रोशन हमारा गांव भी.


सम्पर्कः सृजन कुटी, आर्य नगर
    न्यू जगदंबा कॉलोनी
    जबलपुर
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दो गीत
डॉ. कृपाशंकर शर्मा ‘अचूक’

एक
टूटेगा कब मौन नदी का, तट बतियाते हैं
कुछ लेने को आए यहां पर, खाली जाते हैं
    राग-रागिनी सर्द हवाएं
    थर-थर कांप रहीं
    मिले धूप का टुकड़ा कोई
    मन में भांप रहीं
जाने वाले किसे बताएं, कब-कब आते हैं
कुछ लेने को आए यहां पर, खाली जाते हैं
    एक-एक कर पीछे अब तो
    सारे छूट गए
    उद्बोधन सम्बोधन से
    तन-मन सब टूट गए
भीगीं पलकें अक्स धुंधलके, आंख दिखाते हैं
कुछ लेने को आए यहां पर, खाली जाते हैं
    बड़के छुटके मझले अपनी
    करनी पर उतरे
    खामोशी से परिचय करके
    सभी काम बिगरे
ऐसा ही होता आया सुन, मन बहलाते हैं
कुछ लेने को आए यहां पर, खाली जाते हैं
    भरी दुपहरी घना अंधेरा
    बीच बजरिया में
    खड़ा कबीरा साखी बांचे
    ओढ़ चदरिया में
खोले कौन ‘अचूक’ बन्द, यादों के खाते हैं
कुछ लेने को आए यहां पर, खाली जाते हैं.

 


दो
मेरे कब तक साथ चलोगे,
मुझको चलना अन्त अकेला.
जाते-जाते इतना जानो,
जीवन चलता फिरता मेला.
    हाथों की रेखाएं अब तो
    अर्थहीन सारी की सारी
    सपनों में नित मोती मिलते
    आंख खुले रोती बेचारी
तारकोल सी दिखे अवस्था, सदियों से ही इसको झेला
मेरे कब तक साथ चलोगे, मुझको चलना अन्त अकेला
    भूल गये अतीत भी सारा
    वर्तमान की बात कहें क्यों
    आगत पाती बांचे कोरी
    किस किस का आघात सहें क्यों
छेनी से संपर्क जब मिला, बदल गया प्रस्तर का डेला,
मेरे कब तक साथ चलोगे, मुझको चलना अन्त अकेला.
    बुझे दिए कह रहे सभी से
    मावस के घर जोति लुटाई
    जंग लगी भी कहती छेनी
    मन्दिर प्रतिमा काम न आई
कैसी चाल ‘अचूक’ चलाई, खेल आज यह कैसा खेला,
जाते-जाते इतना जानो, जीवन चलता फिरता मेला.
                
सम्पर्कः 38-ए, विजय नगर,
करतारपुरा, जयपुर-302006
मोबाइलः 09983811506

 

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दो कविताएं - देवेन्द्र कुमार मिश्रा

बरसिये जल
तन में उमस
कंठ में प्यास
कब की बीत गई ग्रीष्म
अब तो आषाढ़ भी चला
तुम न आये
बादल बनकर न छाये
पानी तुम कहां हो
नदी-नाले सूखे
पेड़-पौधे भी रूखे
धरती आकुल
मनुज व्याकुल
जल तुम कहां हो.
बरसो, तुम्हारी प्रतीक्षा है
न बरसने की इच्छा है
तो सुनो जीवन के अमृत
जो धन-दौलत के लिए
हैं उन्मत्त,
जिन्होंने पेड़ काटे, पहाड़ काटे
नदियों का रुख मोड़ा
उनकी करनी से हमारी मत करो दुर्गत
आपका गुस्सा है स्वाभाविक
किन्तु हम गरीब किसान
हम पानी के प्यासे इंसान
हम समझते हैं रुपया नहीं,
पानी है जीवन गति
किन्तु लोभियों की फिर गई मति
उनका क्या है
वे खरीद लेंगे बाहर से
या बस जायेंगे विदेश में,
किन्तु कृषि प्रधान देश में
इस प्रिय भारत में
हमें आपका ही सहारा है
आप नहीं तो मौत है
आप हैं तो बहार है.
रहम करो, तरस खाओ
साल भर का
पानी बरसाओ
मेघ बनकर छा जाओ
सावन की झड़ी लगाओ
मनुष्य है, लोभ का मारा
किन्तु आप न करे किनारा
करें अपने धर्म का पालन
बरसो कि हो जीवन-यापन
हमें बस आपका सहारा
करें तृप्त धरा को
ताकि उपजे अन्न
हो जायें हम धन्य
मनुष्य जाति की ओर से
करते हैं निवेदन
आइये बरसिये दन-दन.
   
बेशर्म
शक्ति प्रदर्शन
का अखाड़ा
बन गया है धर्म,
आस्था को
बना दिया गया है
सामूहिक दुष्कर्म
आज धर्म से
बड़ा नहीं कोई अधर्म.
कमाल ये है कि
हमें जरा भी नहीं
आती शर्म.
हृदय से निकलकर
श्रद्धा, चौराहों तिराहे
पर स्थापित कर
बना दिया गया
राजनैतिक कुकर्म.
उफ! हम कितने
हो गये हैं बेशर्म.

सम्पर्कः पाटनी कालोनी, भरत नगर,
चन्दनगांव, छिन्दवाड़ा
(म. प्र.)-480001
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कविता

आह! यह जिन्दगी
प्रियंका शर्मा

   
आह! यह जिन्दगी
किस ओर बढ़ती जा रही है,
देश की जनसंख्या
अपना विकराल रूप दिखा रही है,
गरीबी, अशिक्षा, अभावों को
रही है दिन रात उगल
यहां धन के लिए देता है व्यक्ति
एक दूसरे के मान, गुमान और
अभिमान को भी कुचल.

हाय! यह कैसा संसार है,
घुन की भांति पिसता व्यक्ति
पैसा बना यहां भगवान है.
अपनी इच्छाओें, मन की आशाओं
को दिल में समेट
करने लगता है व्यापार
दर-दर भटकता व्यक्ति
हाथ लगती उसके लाचारी
डिग्रियों का बोझ सिर पर लादे,
फिर भी बढ़ रही बेरोजगारी,
...अब तो भास्कर की किरणों की भांति,
जीवन की उम्मींदे भी ढलती जा रही हैं
आह! यह जिन्दगी
किस ओर बढ़ती जा रही है.


सम्पर्कः आर.जेड.बी.(124 ए),गली नं.-07
    गुरुद्वारा रोड, महावीर एन्कलेव,
    पालम-डाबरी रोड, नई दिल्ली-45
   

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प्रकृति पर दोहेः रजनी मोरवाल

फल पराग, पत्ते तना, शाख, छांव औ’ फूल.
अंग सभी अनमोल हैं, जीव-जगत के मूल.

जल-से बना शरीर है, फिर भी जल की प्यास.
काया रेगिस्तान-सी, हरदम जल का ह्रास.

नदियां रेतीली हुईं, सूख गए जल कूप.
पनघट बिन पनिहारिनें, सेकें खाली धूप.

घाटी के भारी हुए, इस सावन में पैर.
बादल धोखा दे गया, निकला करने सैर.

हरियाली को चाहिए, पानी का सहवास.
पानी की संगत करे, पोर-पोर मधुमास.

बासंती साड़ी पहन, धरती खूब प्रसन्न.
वह प्रसन्न तो जगत में, कोई नहीं विपन्न.
      

सम्पर्कः सी-204, संगाथ प्लेटीना,
    मोटेरा, अहमदाबाद-380005

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