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अशोक गुजराती की 2 लघुकथाएँ

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।।लघुकथा।


मौत संवेदना की


अशोक गुजराती


'सर, पिछले दिनों बहुत अस्तव्यस्त रहा..'
'क्यों, ऐसा क्या हो गया था ?'
'ये समझिए कि अपने पैरों ख़ुद कुल्हाड़ी मार ली थी.'
'फिर भी, विस्तार से बताओ क्या हुआ था.'
'मैं कार से जा रहा था. यहीं, विशाल मॉल के सामने से. अचानक मेरे आगे जा रही कार ने एक बुजुर्ग को टक्कर मार दी. हालांकि वे बेचारे सड़क के एक किनारे से चल रहे थे. वे बुरी तरह चिंध गये. कार यह जा कि वह जा. मैं नंबर भी नहीं देख पाया. मैंने कार रोकी. उनको लोगों की मदद से पिछली सीट पर लिटाया. अस्पताल ले गया. पुलिस को फ़ोन भी किया.'


'अच्छा! तब क्या पुलिस पहुंची... और उनका क्या..'
'डाक्टरों ने देखकर तुरंत बता दिया कि वे नहीं रहे. मैंने उनकी जेब से मिले फ़ोन नंबर पर संपर्क किया. थोड़ी देर में उनके परिजन भी आ गये. पुलिस ने सबको जीप में बैठाया और चौकी पर ले गयी. वहां उनके तरह-तरह के सवालों के मैंने जवाब देकर उनको सच में हुई घटना का सिलसिलेवार ब्योरा दिया. उन्होंने मुझ पर ही आरोप लगा दिया कि मेरी कार से ही यह दुर्घटना हुई है...'
'अरे! तुम पर ही इल्ज़ाम लगा दिया...'


'हां सर जी, ऊपर से उन दिवंगत बुजुर्गवार के परिवार के लोगों को भी बहका दिया. दोनों तरफ़ से पैसों की मांग होने लगी. केस कोर्ट में गया. छह महीनों में मेरे लगभग पचास हज़ार ख़र्च हो गये. आज नतीज़ा आया है...'
'क्या निर्णय हुआ कोर्ट में ?'
'मैं छूट गया, मैं जीत गया...'
'बधाई! लेकिन उन लोगों के दबाव में तो...'


'सही कह रहे हैं. असल में विशाल मॉल के बाहर लगे सीसीटीवी फ़ुटेज ने मुझे बचा लिया. उसमें साफ़ दीख रहा था कि नीले रंग की एक कार उस वृद्ध को रौंदते हुए तेज़ी से निकल भागी. बाद में मेरी कार रुकी और उनको साथ लेकर फिर बढ़ी...'
'यह तो वाक़ई इनसाफ़ का काम हो गया. निर्दोष को बचाने वाले आ ही जाते हैं.'
'लेकिन सर, अब जब भी कोई ऐसा हादसा होते देखता हूं ,मेरे पैर ब्रेक को दबाने में नाक़ामयाब हो जाते हैं...'
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।।लघुकथा।।


परिणति

 

   रात को ग्यारह छप्पन पर एसएमएस आया- आलोक जी नहीं रहे. सुभाष का था. अश्विसनीय लगा. मुझसे पांच साल छोटा था वह. युवावस्था में क़रीबी दोस्त रहा था. नहीं रहा!....
   मैंने सुभाष को फ़ोन लगाया. ख़बर सही थी. मैं अजीब-सी मनस्थिति में मुंबई-पुणे के दोस्तों को फ़ोन लगाता रहा. पुष्टि हुई. अवसाद ही अवसाद.
   एसएमएस आने से पहले मैं खाना खा चुका था. पलकों में भरी-भरी नींद उड़ चुकी थी. मैंने पत्नी से यह दुखद समाचार बताया- लगभग टूटे हुए स्वर में और बेड-रूम में चला गया.  
   थोड़ी देर बाद पत्नी पास में आकर लेट गयी. मैं करवटें बदल रहा था. उसने मेरी बेचैनी को भांप लिया. मेरे क़रीब आकर उसने मेरे बालों में उंगलियां फिरायीं. मैं उसके और नज़दीक सरक गया. वह मुझे सहला रही थी. मैंने उसकी छातियों के मध्य अपना सर छिपा लिया.
   अपने अज़ीज़ को खोने का ग़म पिघल रहा था. पत्नी ने हौले-से मुझे बांहों की गिरफ़्त में ले लिया. मेरी पनीली आंखों का चुम्बन लिया. मुझे सांत्वना मिली. मैं उससे  गुंथ गया....
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प्रा. डा. अशोक गुजराती, बी-40, एफ़-1, दिलशाद कालोनी, दिल्ली- 110 095.

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