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यात्रा संस्मरण - चीन में सात दिन - 3

- दिनेश कुमार माली

चीन में सात दिन

पिछले अध्याय से जारी...

दूसरा अध्याय: दूसरा दिन (21.08.14)

आज का दिन अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण था। सम्मानित होने वाले साहित्यकारों के लिए तो ऐतिहासिक समय था। कल की थकान भरी यात्रा की वजह से सभी लोग देर सुबह तक सोए हुए थे। ऐसे सोते-सोते एक या दो बज गया था, इसलिए सुबह आठ बजे तक तो किसी की भी नींद नहीं खुली थी। शायद मैं और डॉ॰ चौरसिया ही सबसे पहले तैयार होकर नीचे होटल के बरामदे में टहल रहे थे। कान की दिक्कत के कारण मन अवसादग्रस्त व बहुत भारी लग रहा था। जिस होटल में हम लोग रुके हुए थे, उसके नियमानुसार कंप्लीमेंटरी नाश्ता साढ़े सात बजे तक समाप्त हो चुका था।

पत्रकारिता के क्षेत्र में "सृजनगाथा-सम्मान" से सम्मानित होने जा रहे "प्रवासी संसार" के संपादक राकेश पाण्डेय जी तमतमाए हुए होटल के बाहर इधर-उधर टहल रहे थे। हमें देखते ही कहने लगे," यह किस तरह का प्रोग्राम है? न कोई चाय की व्यवस्था है, न किसी अल्पाहार की। भई, हद हो गई। क्या मैं पहली बार चीन आया हूँ? चाय तक नसीब नहीं.... ?"

शायद वह इंगित करना चाहते थे कि कहीं टूर मैनेजर रिक्की मल्होत्रा पैसे बचाने के खातिर तो ऐसा नहीं कर रहे हैं। मगर हम लोगों ने कोई उत्तर नहीं दिया, शायद उन्हें हमसे प्रत्युत्तर की आशा थी। उनकी नाराजगी की बात एक कान से दूसरे कान, दूसरे से तीसरे कान में पहुँचते-पहुँचते मानस जी के कानों में पड़ी। उन्होंने धैर्यपूर्वक मेरी तरफ देखते हुए कहा,"यह देश समय का पाबंद है। अगर आप समय पर नहीं उठोगे तो किसका कसूर है? क्यों कोई आपका इंतजार करेगा? सबको अपना-अपना काम है। राकेश जी का चिल्लाना व्यर्थ है।"

 

चाय-पानी पीना इतनी बड़ी बात नहीं थी,जितनी बड़ी बाद समय के पाबंदी की थी। समय की कीमत का पहली बार मूल्यांकन हुआ यहाँ। हमारी तरह शायद ये लोग अकर्मण्य व आलसी नहीं है, तभी तो उनके विकास का पहिया तेज रफ्तार से चल रहा है। बिना कुछ नाश्ता पानी किए धीरे-धीरे साहित्यकार लोग कान्फ्रेंस हाल में एकत्रित होने लगे। महिलाएं भारतीय परिधान में खूबसूरत लग रही थीं। झिमली पटनायक ने जगन्नाथ संस्कृति को इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की एक अमिट यादगार बनाने के लिए ओड़िशी या भरतनाट्यम नृत्य में पहने जाने वाली विश्वविख्यात संबलपुरी पाट वाली साडी पहनकर पुरी से अपने साथ लाई हुई जगन्नाथ,बलभद्र और सुभद्रा की लकड़ी से बनी छोटी मूर्तियों को टेबल पर सजाकर मन ही मन जयदेव के गीत-गोविंद के श्लोकों का उच्चारण करती हुई सभी प्रतिभागियों को जगन्नाथजी का सूखा प्रसाद बांटने लगी।

कार्यक्रम कुछ ही क्षणों में प्रारम्भ होने जा रहा था। स्वयंसेवक अपने-अपने कामों में लगे हुए थे। सेवशंकर और मुमताज़ बैनर लगा रहे थे,डॉ सुधीर शर्मा माइक टेस्टिंग का काम देख रहे थे। प्रोग्राम के संचालन का सारा दायित्व उनके कंधों पर था। सभी टेबलों पर मिनरल वाटर की बोतल, खाली कॉपी और पेन रखी हुई थी। इस सभा के अध्यक्ष डॉ॰ गंगा प्रसाद शर्मा कान्फ्रेंस हाल में पधार चुके थे। मानस सर ने बहुत पहले ही उनके बारे में विस्तृत जानकारी दी थी। हिन्दी के बहुत बड़े विद्वान और 'साहित्य शिरोमणि सम्मान' और 'तुलसी सम्मान' से सम्मानित लेखक डॉ॰ गंगा प्रसाद शर्मा ने लखनऊ विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में ड़ाक्टरेट की उपाधि के साथ-साथ नेट प्रवीणता प्राप्त एवं यूजीसी फैलोशिपधारक हैं। बीस से ज्यादा कृतियों के रचियता भी हैं वह। ईरान में हिन्दी शिक्षण के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है संप्रति वह भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के अधीन संचालित हिन्दी चेयर के अंतर्गत गुयांगडोंग अंतर्राष्ट्रीय भाषा विश्वविद्यालय,गुयाङ्ग्जाऊ, चीन में हिन्दी के प्रोफेसर हैं। उनके साथ में थी चीन की एक संभ्रांत महिला पियोंग किपलिंग।वह बीजिंग यूनिवर्सिटी में हिन्दी की एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

बिना किसी खास औपचारिकता के भोपाल के युवाछात्र निमिष श्रीवास्तव की सांगीतिक प्रस्तुति के साथ यह उदघाटन सत्र प्रारम्भ हुआ। डॉ॰सुधीर शर्मा एक मंजे हुए मंच संचालक और मैं उनका सहायक। तालिका के अनुसार कार्यक्रम आगे बढ़ता जा रहा था। जैसे-जैसे नाम बुलाए जा रहे थे ,वैसे-वैसे साहित्यकार मंच की ओर आ रहे थे और वैसे-वैसे मैं सम्मान पत्र,शाल और श्रीफल उन्हें देते जा रहा था। कला, साहित्य, संस्कृति और भाषा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाली युवा विभूतियों को सम्मानित करने के तारतम्य में कथा लेखन के लिए भिलाई के ख्यात कथाकार लोकबाबू को 'लाईफ टाईम अचीवमेंट' सम्मान, भोपाल के युवा कथाकार राजेश श्रीवास्तव, साहित्यिक पत्रकारिता के लिए 'प्रवासी संसार' के संपादक दिल्ली के राकेश पांडेय, शोधपरक आदिवासी साहित्य सृजन के लिए डिडौंरी, मध्यप्रदेश के डॉ. विजय चौरसिया, अनुवाद के लिए तालचेर, ओड़िशा के दिनेश कुमार माली अर्थात मुझे व भुवनेश्वर की कनक मंजरी साहू तथा कविता लेखन के लिए दुर्गापुर की डॉ बीना क्षत्रिय को 11-11 हजार रुपए की नकद धनराशि, प्रशस्ति पत्र, शाल व श्रीफल प्रदान कर संस्था के सर्वोच्च सम्मान ‘सृजनगाथा सम्मान-2014’ से सम्मानित किया जा रहा था। सभी अपने आपको गौरवान्वित अनुभव कर रहे थे। मुझे मेरी कंपनी महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड का लोगो व कॉर्पोरेट गीत याद आ रहा था- " हम है कोल इंडिया, कोल इंडिया हम/ अंधेरे से खोज लाते हम,उजाले खुशियों के"। 'सृजनगाथा सम्मान' पाकर मुझे लगने लगा जैसे मैं भी एक बड़ा आदमी बन गया हूँ किसी सेलिब्रिटी की तरह और मुझे यह रिकोग्नीशन पाकर आत्म-संतोष होने लगा कि मेरा अनुवाद कार्य को हिन्दी साहित्यकारों ने स्वीकार किया है।

डॉ॰जयप्रकाश मानस को अनवरत नौ अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के सफल आयोजन, नवोदित रचनाकारों को लेखन कर्म आगे लाने के प्रोत्साहनस्वरूप किए जा रहे स्वैच्छिक सार्थक प्रयासों एवं हिन्दी साहित्य में अतुलनीय योगदान के लिए सभी प्रतिभागियों की ओर से झिमली पटनायक और सेवा शंकर अग्रवाल ने शाल व श्रीफल प्रदान कर सम्मानित किया।

 

सम्मेलन के उद्घाटन एवं रचनाकारों के अंलकरण के पश्चात विमोचन समारोह में डॉ जसवीर चावला की लघुकथा संग्रह ‘शरीफ़ जसवीर’, डॉ विजय कुमार चौरसिया की शोधपरक पुस्तक ‘प्रकृतिपुत्र : बैगा’, उद्भ्रांत का आलोचना संग्रह ‘मुठभेड़’, डॉ. राजेश श्रीवास्तव का कहानी संग्रह ‘इच्छाधारी लड़की’, डॉ जे. आर. सोनी की पुस्तक ‘दीवारें बोलती हैं’, गिरीश पंकज का उपन्यास ‘गाय की आत्मकथा’, दुर्गापुर की बीना क्षत्रिय का कविता संग्रह ‘एहसास भरा गुलाल’, डॉ जय प्रकाश मानस का कविता संग्रह ‘विहंग’, दिनेश कुमार माली की अनूदित पुस्तक ‘ओड़िया भाषा की प्रतिनिधि कहानियाँ’मथुरा कलौनी की नाट्य कृति 'कब तक रहे कुँवारे', श्रीमती नीरजा द्विवेदी का बाल कथा संग्रह ‘आलसी गीदड़’ का विमोचन किया गया। इसके अतिरिक्त, पत्रिकाओं में कृष्ण नागपाल द्वारा संपादित दैनिक ‘राष्ट्र (विशेषांक)’, डॉ॰सुधीर शर्मा द्वारा संपादित त्रैमासिक पत्रिका ‘छत्तीसगढ़ मित्र’, गिरीश पंकज की पत्रिका ‘सद्भावना दर्पण’,राजेश मिश्रा की पुस्तिका ‘चुनौती: क्राइम रिपोर्टिंग की’, धनराज माली द्वारा संपादित सामाजिक पत्रिका ‘माली दर्शन’ के विमोचन के साथ-साथ डॉ. राजेश श्रीवास्तव/डॉ.सुधीर शर्मा द्वारा संपादित सम्मेलन स्मारिका ‘चीन में हिन्दी’ का भी लोकार्पण हुआ।

 

अब बारी थी सभा के मुख्य आकर्षण ,डॉ॰ गंगा प्रसाद शर्मा के सम्बोधन की। उन्होंने कहा, " मुझे चीन में आए हुए लगभग एक साल हो गया है। आप लोग जो साहित्य में निवेश कर रहे है,वह कभी व्यर्थ नहीं जाएगा। ऐसे लोग बिरले ही होते हैं,जो साहित्य में निवेश करते है। वरना लोग अपनी प्रॉपर्टी बनाते है,घर खरीदते हैं,कार खरीदते हैं या किसी कंपनी में पूंजी निवेश करते हैं। आप लोगों की साहित्यिक अभिरुचि,ऊर्जा ,उमंग व प्रेम देखकर मुझे अत्यंत ही खुशी हुई है। आपका यह प्रयास दो देशों की संस्कृति व साहित्य के बीच सेतुबंध का कार्य करेगा। मैने चीन से तीन चीजें सीखी है ,बस इतना ही अंतर है चीन और भारत में। पहला, भारत में स्त्रियों का सम्मान नहीं है, जबकि चीन में उनका सम्मान किया जाता है। आपने देखा कि गाइड से लेकर होटल में बैरे तक सारे कार्य स्त्रियाँ करती हैं और अपने को सुरक्षित अनुभव करती हैं,जबकि भारत में ऐसा नहीं है। दूसरा, भारत में जाति-प्रथा चरम पर है। प्रेम-विवाह के माध्यम से हम सामाजिक विकारों को दूर कर सकते है। तीसरा, समय की पाबंदी में चीन का पूरा-पूरा ध्यान रखता है।" उनका सम्बोधन जारी था।

 

समय के ध्यान की बात तो सुबह-सुबह नाश्ता नहीं मिलने के कारण पता चल चुकी थी,जबकि कुछ साहित्यकार मन ही मन भुनभुना रहें थे,कि चीन वालों को कम से कम हमारे आतिथ्य के बारे सोचना चाहिए था ,अगर हमें थोड़ा विलंब हो गया तो कौनसा पहाड़ टूट गया? अगर ये लोग भारत आते तो हम मेहमान नवाजी में पीछे नहीं हटते। किसी साहित्यकार की भावनाओं की बात थी। मगर विकास के पथ पर भावनाओं का स्थान कहाँ? अगर आपने गलती की हैं, तो आपको भुगतना पड़ेगा डॉ॰ शर्मा के अनुभव मुझे सटीक और सही लग रहें थे।

"भारतीय-संस्कृति की बड़ी-बड़ी बात कर लो, मगर यथार्थ यही है कि नारियाँ यहाँ असुरक्षित अनुभव करती हैं। भारत में जहाँ महिला आई॰ ए॰ एस अधिकारी अपने आपको सुरक्षित अनुभव नहीं कर सकती है तो वह पब्लिक में गाइड व होटल रिसेप्शनिस्ट के कार्य सुरक्षा की भावना के साथ कैसे कर सकती है? मीडिया के द्वारा इतना हाइलाइट करने के बाद भी क्या रेप में किसी तरह कि कमी आ सकी? शायद नहीं? कारण क्या है? मानसिकता का अभाव है और मानसिकता का सीधा संबंध संस्कृति से है अर्थात सांस्कृतिक सुधार ही मानसिकता में परिवर्तन ला सकते है। इसके अतिरिक्त, भारत में बहुत बड़ा महिला श्रम ऐसे ही व्यर्थ पड़ा रहता है। देश के विकास में वह हिस्सेदार नहीं बन पाता है। जी॰ डी॰ पी के उत्थान में महिला श्रमिकों का समुचित व सुरक्षित उपयोग जरूरी है। देश को विकसित करने का सीधा सरल फार्मूला तो यही है, एक देश,एक जाति,एक धर्म। जाति हो भारतीय,धर्म हो राष्ट्रधर्म। भारत के शास्त्र तो 'वसुधैव कुटुंबकम' की बात करते है,फिर छोटे-छोटे खेमों, संप्रदायों, सीमाओं, प्रांतीयता तथा भाषावाद में बाँट कर क्या इस उक्ति को यथार्थ कर सकते है? अगर हमें वैश्विक विकास चाहिए तो धर्म, जाति-पांति के बंधनों से ऊपर उठ कर सोचना होगा। सोते शेर के मुंह में कभी शिकार आया है?" सभी ने डॉ॰ शर्मा के सम्बोधन का जोरदार तालियों से स्वागत किया।

 

मगर मंच पर बैठे गिरीश पंकज व उद्भ्रांत जी आपस में कुछ बात कर रहे थे। शायद उन्हें अध्यक्ष महोदय का भाषण पसंद नहीं आया। कुछ बात तो अवश्य थी,जो उनके दिल को लगी। उद्भ्रांत जी अपने उद्बोधन में अपने आपको रोक नहीं सके और कहने लगे,"मुझे अध्यक्ष महोदय के भाषण से बहुत दुख पहुंचा है। भले ही,चीन ने आर्थिक विकास किया हो,मगर हम भी कुछ ज्यादा पीछे नहीं है। आज भी हमारी संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों का लोहा सारी दुनिया मानती है। दुनिया में ऐसा कौनसा देश है,जहां क्राइम नहीं होता? मनुष्य तो क्राइम की कठपुतली है। क्या चीन में क्राइम नहीं होता? क्या चीन में रेप नहीं होते? रास्ते में गाइड नीना खुद बता रही थी कि आप अपने सामानों की हिफाजत खुद करेंगे। अपने पासपोर्ट व लगेज का अच्छी तरह ध्यान रखिएगा,नहीं तो,अवसर पाकर कोई उठाईगिरा उसे गायब कर सकता है?'बी अवेयर फ्रॉम पिकपोकेटर्स',जीरो क्राइम वाली कोई कंट्री है इस वर्ल्ड में?चीन में भी क्राइम है।" कहते-कहते शायद वह कुछ ज्यादा भावुक हो गए। भाषा तो सधे हुए आलोचक की थी। उनके मुंह से कुछ कटु भाषा निकाल पड़ी," देश आपको अपनी गलती के लिए कभी माफ नहीं करेगा। चीन की प्रतिनिधि पियोंग किपलिंग हमारे देश के बारे में क्या सोचेगी?"

 

डॉ॰शर्मा, भले ही, मंच पर हल्की-हल्की तालियों के माध्यम से मानो उनकी बात का समर्थन कर रहे हो, मगर उनके दिल को बहुत कष्ट हुआ,अपने अनुभव को सहज भाव से सबके समक्ष रखने के लिए । मैं जानता हूँ कि वह एकदम निर्दोष थे। मुझे तो उनमें ज्यादा देश-प्रेम नजर आया,क्योंकि उनका लक्ष्य भी देश का उत्थान था। वह किसी के दिल को चोट पहुंचाना नहीं चाहते थे। उनके कहने का उद्देश्य केवल हमारे देश की ज्वलंत समस्याओं को उस मंच के माध्यम से उजागर कर एक आव्हान करना था उनके समाधान के लिए। मेरे विचारों से डॉ॰खगेन्द्र भी सहमत थे ,जब मैंने आयोजन समाप्त होने के बात उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही।

डॉ॰ सुधीर शर्मा ने मंच संचालन के दौरान इस बात को अच्छी तरह संभाल लिया था कि डॉ॰ गंगा प्रसाद शर्मा हमारे आदरणीय अतिथि है।उन्हें अपने विचार रखने की स्वतन्त्रता है, भले ही, आप उससे सहमत हो या नहीं हो। अगर आप अपनी असहमति जताना चाहते भी हैं तो मीटिंग खत्म होने के बाद अपनी बात रख सकते है।ऐसा कहते हुए उन्होंने अगले वक्ता के रूप में आदरणीया डॉ॰ रंजना अरगड़े जी को आमंत्रित किया। गुजरात विश्वविद्यालय की हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ॰ अरगड़े ने डॉ॰ गंगा प्रसाद शर्मा की बातों से अपनी सहमति जताई।

 

" हमारे देश की महिलाएं आज भी असुरक्षित अनुभव करती है। जबकि,कल ही रात को बीजिंग में मैंने होटल से खाना खाकर लौटते समय लगभग साढ़े ग्यारह के आस-पास अपने छोटे बच्चों के साथ यहाँ की महिलाओं को जाते देखा तो मुझे लगा कि यहाँ की महिलाओं को कोई खतरा नहीं है, और न हीं कोई डर। क्या हमारे हिंदुस्तान में ऐसा संभव है?"

फिर से अपनी बातों को घुमाते हुए संभल कर उद्भ्रांत जी को ओर देखते हुए चीन की विदेश-नीति की ओर इंगित करते हुए वह कहने लगी,"मगर एक बात अवश्य है कि जितना समय हमें दिल्ली से बीजिंग आने में लगा, उससे भी कम समय ड्रेगन को अरुणाचल प्रदेश की सीमा तक पहुँचने में लगता है।" कहकर उन्होंने एक दीर्घश्वास ली।

 

और अगले वक्ता थे सुविख्यात वरिष्ठ आलोचक डॉ॰ खगेन्द्र ठाकुर। उन्होंने एक अत्यंत सुलझे हुए वक्ता की तरह किसी भी विवादास्पद कथन को स्पर्श किए बगैर अपना भाषण "हिन्दी का बाजार : बाजार की हिन्दी" विषय तक ही सीमित रखा। उन्होंने हिन्दी पत्रिकाओं व पुस्तकों के प्रकाशन में आने वाली अड़चनों का ब्यौरा देते हुए कहा, "सही मायने में, हमारे यहाँ पाठकों का अभाव है। बहुत ही कम लोगों की अभिरुचि है पुस्तकें पढ़ने में। प्रकाशक हिन्दी लेखकों से पैसे लेकर पुस्तकें प्रकाशित करते हैं। हिन्दी साहित्य को जो बाजार मिलना चाहिए था,वह अभी तक मिल नहीं सका। हिन्दी साहित्य को एक विपुल बाजार चाहिए, मगर साहित्य की भाषा बाजारू नहीं होनी चाहिए।" कहते हुए अपने चश्मे की फ्रेम में से झाँककर श्रोताओं की ओर देखने लगे,"मुझे याद आई रूस के ताशकंद दौरे की बात। वहाँ रूस के राष्ट्रपति गर्बाचोव के किसी प्रोग्राम में मुझे कम्यूनिस्ट पार्टी की ओर से जाने का मौका मिला था। मैंने वहाँ देखा कि एक दुकान पर बहुत लंबी भीड़ लगी हुई थी। पूछने पर पता चला कि उस भीड़ का कारण किसी लेखक की नई पुस्तक का रिलीज होना था और फिर मालूम चला कि देखते-देखते एक ही दिन में दो चार लाख प्रतियाँ बिक चुकी थीं और हमारे देश में ऐसा संभव? प्रकाशक कितनी प्रतियाँ निकालेगा,उसका भी पता नहीं चलता है लेखक को। प्रिंटिंग की कैसेट तो प्रकाशकों के पास रहती है और आजकल तो ई-बुक का जमाना आ गया है। पुस्तकों का प्रकाशन कम होने लगा है। कुछ पुस्तकें निकलती भी हैं तो उनके दाम इतने ऊँचे कि कोई पाठक इच्छा होने पर भी खरीदना नहीं चाहता।" डॉ॰ खगेन्द्र ठाकुर की सारी बातें यथार्थ धरातल का प्रतिपादन कर रही थी।

 

अंतिम वक्ता के रूप में पियोंग किपलिंग को आमंत्रित किया गया। उसने अपना वक्तव्य प्रारम्भ किया।

"मुझे आप सभी से मिलकर अत्यंत हर्ष हुआ। मैंने हिन्दी सीखने के लिए भारत सरकार से संचालित केंद्रीय हिन्दी निदेशालय,आगरा में एक साल का कोर्स किया और फिलहाल बीजिंग विश्वविद्यालय में हिन्दी अध्यापन का कार्य कर रही हूँ। आप सभी लोगों को मैंने सुना ,मुझे बहुत अच्छा लगा। और ज्यादा अच्छा होता,अगर आप लोग चीनी भाषा सीखते और हम चीनी लोग हिन्दी। तो वह दिन दूर नहीं जब दोनों देश अपने विपुल साहित्य संसार व संस्कृतियों के सूक्ष्म पहलुओं को आसानी से समझकर उन्हें विस्तार देने के साथ-साथ अक्षुण्ण रख पाते। मैं मेरे देश की दूसरी राष्ट्रभाषा हिन्दी समझती हूँ।......... मुझे सुनने के लिए आप सभी का धन्यवाद। "

 

बहुत ही शुद्ध हिन्दी बोल रही थी वह प्रोफेसर। हिन्दी को चीन की दूसरी भाषा सुनकर सारे साहित्यकारों के चेहरे पर रौनक आ गई थी। सभी ने उसके संभाषण का ज़ोरदार तालियों से स्वागत किया था। एक विदेशी महिला का एक साल में हिन्दी भाषा सीखकर धारा-प्रवाह बोलना किसी अचरज से कम नहीं था। काश, हम भी चीन के केंद्रीय निदेशालय में जाकर उनकी भाषा सीख पाते! चीन की संस्कृति तो हमारे देश की संस्कृति है। गौतम बुद्ध को आज भी चीन उतना ही मानता है, जितना शायद कभी भारत ने माना होगा। हमारे देश के साथ चीन के आर्थिक ,राजनैतिक,सामाजिक,सांस्कृतिक संबंध तो पुरातन काल से है। इस प्रकार के आयोजनों से इन संबंधों को और ज्यादा पुष्ट किया जा सकता है। डॉ जे॰ आर॰ सोनी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ यह प्रथम सत्र व दूसरा सत्र समाप्त हुआ। सभी कान्फ्रेंस हाल से जैसे बाहर निकले तो ऐसा लग रहा था मानो ऑक्सफोर्ड या हावार्ड जैसे विश्वविद्यालय में किसी महान प्रोफेसर का विश्वबंधुत्व पर लेक्चर सुनकर बाहर निकले हो। सभी के चेहरे पर एक अलग गाम्भीर्य और मानवता की मुस्कान स्पष्ट दिखाई दे रही थी। खाने का समय भी हो चुका था। सुबह से तो सभी भूखे थे। दोपहर का भोजन उसी 'गंगा' होटल में लेने के बाद शुरू होती है बीजिंग -दर्शन की कहानी। डॉ गंगा प्रसाद शर्मा हमारे साथ थे ,मगर कार्यवश पियोंग किपलिंग हमसे विदा ले चुकी थी।

 

पहला दर्शनीय स्थान था हमारे लिए टियन'अनमेन स्केवयर। चालीस हेक्टेयर में फैला हुआ दुनिया का सबसे बड़ा स्केवयर। चीन की हृदयस्थली। शुरु से पीपल्स रिपब्लिक का इतिहास देखा है इसने। चेयरमेन माओ का मार्बल से बना मेमोरियल हाल यही है। पश्चिम में पीपल्स ग्रेट हाल, पूर्व में चीनी इतिहास का संग्रहालय और उत्तर में चीन के राजाओं का महल " फॉरबिडन सिटी'। सन 1926 में चीन के महान लेखक लू-शून ने लिखा था इस टियन'अनमेन स्केवयर पर हुए नृशंस हत्याकांड के बारे में , "खून का कर्ज जितना देरी से अदा होगा, उसका ब्याज उतना ही ज्यादा होगा।"

एक गाइड से जब हमने इसके इतिहास के बारे में जानना चाहा तो उसने हमें बताया," .... वरसेली संधि की जापान को दी जाने वाली रियायतों जैसी खतरनाक शर्तों के खिलाफ जब दिनांक 4 मार्च 1919 को इस स्केवयर में तीन हजार विद्यार्थियों ने विरोध किया था।....... ब्रिटिश और फ्रेंच की सेनाओं में पाइप लाइन का काम करने के लिए भेजे गए हजारो-सैकड़ों चीनी मजदूरों ने विद्रोह कर दिया । सरकारी दफ्तरों में घुस गए सारे विद्रोही, जिन्हें सेना ने भून डाला। ....... 1976 में झाऊ एनियाल की मृत्यु पर रोने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी थी इस स्केवयर में।...... लोकतन्त्र की नई विचारधाराओं का जन्म हुआ, 'फॉरबिडन सिटी' के किनारे। और तो और, सन 1989 में चीनी सरकार में सुधार की धीमी प्रक्रिया, स्वतन्त्रता के अभाव और व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ लाखों लोगों ने आवाज उठाई तो सरकार ने मार्शल लॉं लागू कर दिया। टेंटों पर टेंक चले,मशीनगनें चलीं। हजारों लोग मौत के घाट उतार दिए गए। सही संख्या तो शायद ही किसी को पता हो। स्केवयर के उत्तर में हर सुबह मिलटरी के नियमानुसार झण्डा फहराया जाता है और शाम होते ही उतार लिया जाता है।"

 

इतना कहने के बाद शायद गाइड भावुक होकर रूआँसा हो गई। कितना खूनी इतिहास था इस स्केवयर का! जब मैने उससे विस्तार से बताने का आग्रह किया तो वह कहने लगी," आप सभी नजदीक आइए। आज पहले दिन हमारी बीजिंग-यात्रा की शुरुआत 'टियन'अनमेन चौक' से होती है, जिसने चीन की राजनीति को एक नया मोड प्रदान किया। बीजिंग यूनिवर्सिटी के हजारों विद्यार्थियों और युवकों के विद्रोह का केंद्रबिन्दु बनकर 3-4 जून 1989 को टियन'अनमेन चौक अचानक ही दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गया था। ये वे दिन थे जब सारी दुनिया में राजनैतिक परिवर्तन हो रहे थे,कम्यूनिस्ट कट्टरवाद तथा लोकराज की मांग के रूप में। रूम में 'ग्लास्नोस्त तथा प्रेस्तोइका' ने कम्यूनिस्ट कट्टरवाद का चेहरा बदल दिया था। चीन में इस वर्ष उनके प्रसिद्ध वैज्ञानिक 'फंग-ली-सी' ने चीन के हाकिमों को एक पत्र भेजा था, जिसमे उसने वी-सिंग-सेंग को रिहा करने के लिए कहा था और इस पत्र पर बाहर बस रहे 51 चीनी विद्वानों ने अपने हस्ताक्षर किए थे परंतु चीनी हाकिमों ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया था और लोकतन्त्र की यह मांग बीजिंग यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों और युवकों तक पहुँच गई थी।

30 मई 1989 को 'केन्द्रीय कला संस्था' के विद्यार्थियों ने लोकतन्त्र की देवी का 30 फुट ऊंचा बूत बनाया, जो अमेरिका के 'स्टेचू ऑफ लिबर्टी ' के साथ मिलता था और इस चौक में विद्यार्थियों ने लगातार मुजाहरे शुरू किए थे। पहले-पहल पार्टी में इस सब कुछ के बारे बड़ा गहरा वाद-विवाद पैदा हुआ, परंतु फिर मार्शल लॉं लगा दिया गया और 4 जून को इन विद्यार्थियों के ऊपर हमला बोल दिया गया। शहर में या कहीं और इसकी कोई प्रतिक्रिया न हो, इसके लिए तीन लाख फौज तैयार की गयी और उन्हें हुक्म दिया गया कि किसी प्रकार की विद्यार्थियों की विरोधी क्रांति की इजाजत या अनुमति न दी जाए। 'टियन'अनमेन चौक' में 35 ट्रकों व बुलडोजर ने इस कारवाई में भाग लिया। पलों में लाशों के ढेर लग गए। पहले-पहल पश्चिमी समाचारो पत्रों ने बताया कि तीन हजार विद्यार्थी इस कारवाई में मरे व जख्मी हुए। बाद में चीनी सरकार ने केवल 23 विद्यार्थियों की मौत की बात स्वीकार की और यह भी कहा की पाँच हजार सिपाही जख्मी हुए थे और 150 की मृत्यु भी हुई, जिससे यह सिद्ध किया गया कि विद्यार्थियों ने व युवकों ने भी सिपाहियों पर हमले किए थे। इस घटना के कुछ दिन पश्चात ही 21 विद्यार्थी नेताओं को गिरफ्तार किया गया और कुछ को मार भी दिया गया था।"

पहली बार मुझे एहसास हुआ, विद्यार्थी-विद्रोह की ताकत का। भारत में मण्डल आयोग की आरक्षण संबन्धित नीतियों के खिलाफ उस समय अर्थात 1988-89 में ( जब मैं जोधपुर एमबीएम कॉलेज के दूसरे वर्ष का छात्र था) आंदोलन चल रहा था। विद्यार्थी अपने शरीर पर केरोसिन डालकर आत्म-दाह कर रहे थे,मगर सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंग रही थी। कॉलेज बंद कर दी गई थी। प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के पुतले जलाए जा रहे थे। जैसा दमन चीन में हुआ,वैसा ही दमन भारत में भी। क्या विद्यार्थी-शक्ति राजनैतिक चेतना को नए मुखौटे नहीं पहन सकती ? बहुत सारे सवाल जेहन में चल रहे थे। तभी मुझे ओड़िशा की रक्तरंजित दयानदी याद आने लगी कलिंग युद्ध के समय की। याद आने लगा पश्चाताप में डूबा सम्राट अशोक और धौलगिरि में लाशों के ढेर। कितनी समानता थी भारत और चीन के राजतंत्र में! शायद बीजिंग के राजा को कोई शोक नहीं हुआ,तभी तो, वहाँ के एक विद्यार्थी ने 1989 की घटना के बारे में लिखा था," चीन के इतिहास में एक नया पन्ना खुलने वाला है। टियन'अनमेन स्केवयर हमारा है। और हम कसाइयों का यहाँ रहने नहीं देंगे।"

'टियन'अनमेन स्केवयर' की घटनाओं के बारे में जानने के लिए मैंने जब पुराने कुछ भारतीय लेखकों के संस्मरण भी पढ़े,जिसमें लेखिका डॉ वनिता की "मेरी चीन यात्रा" में संग्रहीत इस बर्बर घटना पर गिरधर राठी द्वारा अनूदित 'पेई-ताओ' की कविता "ऐलान" मेरे ध्यान का केंद्र बनी।जो आपके समक्ष है:-

 

शायद आ चुकी है आखिरी घड़ी

मैंने नहीं छोड़ी कोई वसीयत-

सिवाय एक कलम के-

जो मेरी माँ के लिए है।

 

मैं कोई नायक नहीं

नायक विहीन इस युग में

मैं होना चाहता हूँ सिर्फ एक आदमी

निस्पंद क्षितिज

बाँट रहा है दो पांतों में

जीवितों-मृतकों को

मगर मैं चुनूँगा केवल आकाश

मैं नहीं टेकूंगा घुटने जमीन पर

क्योंकि तब हत्यारे दिखते हैं कद्दावर

छेंकते मुक्ति की हवा के झोंके

नक्षत्रों जैसे गोली के छिद्रों से

फूट पड़ेगी एक

रक्तात भोर''   

 

यही ही नहीं, इस पुस्तक में एक और कविता थी,जो चीन के तत्कालीन समाज में हो रहे उथल-पुथल की तरफ ध्यान आकृष्ट कर रही थी, जिसमें उसने एक पीढ़ी की आवाज बुलंद की है। गिरधर राठी द्वारा अनूदित चीन के बौद्ध कवि "शु-चिड़" ने माओ की सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान हुई धर-पकड़ में जेल भेजे गए उसके रिश्तेदारों में माओ के माँ की मृत्यु से मर्माहत कविता 'टियन'अनमेन स्केवयर' की स्मृति को फिर से जागृत कर रही थी:-

 

''मैं नहीं करूंगा शिकायत

की क्या-क्या बीती मुझ पर।

बर्बाद हो चुकी जवानी,

बदरंग हो चुका विवेक,

बे नींद अनगिनत रातों की

दर्द भरी यादें।

 

एक पर एक अनेक मतवाद

ढका चुका मैं।

एक पर एक अनेक जंजीरें

तोड़ चुका मैं,

बचा है जो अब मेरे दिल में

वह रेगिस्तान है अनंत........

लेकिन मैं खड़ा हुआ हूँ सीना ताने,

खड़ा हूँ अमित क्षितिज के विस्तार में,

कोई भी किसी भी तरीके से

दबा नहीं पाएगा मुझे फिर दुबारा।

 

अगर वह मैं होता, 'शहीदी' मजार के भीतर लेटा हुआ,

मेरे संगे-कब्र की लिखावट पर काई,

अगर वह मैं होता लोहे के सरियों में बंद,

करता हुआ जिरह हथकड़ियों से बेड़ी से,

अगर वह मैं होता, बदहवास बेनूर,

करता हुआ प्रायश्चित अपने गुनाहों का,

अगर वह मैं होता,अगर वह केवल

होती मेरी निजी यातना-अभागापन-

शायद मैं कर चुका होता मुआफ़,

मेरे आँसू और मेरा आक्रोश

हो सकते थे कभी शान्त।

 

मगर उन बच्चों के बापों के वास्ते,

ताकि हम आइंदा कांपे नहीं

उन चुप उलाहनो के सामने

जो उठते आते हैं

तमाम यादगारों से,

ताकि हम आँख न चुराएँ

सड़क के आवारा गृहविहीन लोगों से,

ताकि वे मासूम औलादें

सौ बरस बाद इस कयास में न डोलें

की क्या था उसका अर्थ-उस इतिहास का

जो हम छोड़ गए थे उनके लिए,

अपनी मातृभूमि के इस कलंक की खातिर,

आसमान की पाक हस्ती की खातिर,

अपनी इस राह के ईमान की खातिर

मांगता हूँ

सच्चाई।''        

 

गाइड नीना पूरे ग्रुप को अपने साथ ले जा रही थी। पूर्व पुलिस महानिदेशक महेश द्विवेदी अपनी धर्मपत्नी के साथ फोटो खिंचवा रहे थे। बीच-बीच में डॉ॰ चौरसिया और मैं फोटो खिंचवाने के लिए टपक पड़ते थे, कभी चीनी लोगों के साथ तो कभी हमारे ग्रुपवालों के साथ। धोती-कुर्ते में डॉ॰ खगेन्द्र ठाकुर तिरछी टोपी पहिने व्हील चेयर पर बैठे किसी मारवाडी सेठ या किसी दिग्गज भारतीय नेता से कम नहीं लग रहे थे। कभी सरदार जसवीर चावला जी, तो कभी राकेश पांडे जी, तो कहीं डॉ सुधीर शर्मा, तो कहीं कनक मंजरी साहू चीन के लोगों के साथ फोटो खिंचवाने में लगे हुए थे, मानो चीन और हिन्द एक की परिवार की दो शाखाएँ हों। हमने भी फोटो खींचवाने में कोई कमी नहीं रखी। वहाँ डॉ॰ गंगा प्रसाद शर्मा साहब से भी बात करने का मौका मिल गया। कुछ इधर -उधर तो ,कुछ व्यक्तिगत बातें। बहुत ही सुलझे विचारों के थे वह। उनके मन में देश के विकास की एक तड़प थी। चीन से दो साल पहले आजाद होने वाला हमारा देश उससे बीस साल पीछे क्यों ? मुझे तो बीस साल से ज्यादा पचास-साठ आगे लगा चीन। यह मनोवैज्ञानिक सत्य है,जब आप विदेश में होते हैं तो आपको अपना देश बहुत याद आने लगता है। जब मैंने पूछा," यहाँ तो आपका बहुत ज्यादा वर्कलोड होगा?"

 

उन्होंने मुस्कराते हुए कहा," कोई खास वर्कलोड नहीं।केवल हफ्ते में दो तीन क्लासेज लेनी पडती है।"

" और आपकी सेलेरी ?" मैंने बात आगे बढ़ाई।

वह कहने लगे," पर्याप्त वेतन मिलता है।सरकार से कोई शिकायत नहीं। उलटा सोचना पड़ता है, पैसे कैसे खर्च किए जाए ? कहाँ खर्च किए जाए ?"

मैंने बहुत ही कम ऐसे आत्म-संतोषी आदमियों को अपने जीवन में देखा।बात-बात में वह कहने लगे, " मुझे इस बात का दुख है कि आज उद्भ्रांत ने मुझे गलत समझा। मैंने ऐसी क्या देश-विरोधी बात कह दी कि देश मुझे माफ नहीं करेगा।अब तुम्हीं बताओ, क्या प्रेम-विवाह हमारी सामाजिक कुरीतियों को खत्म नहीं कर सकता? अगर यह बात मैं किसी पुराने जमाने के आदमी से कहूँगा तो लाठी लेकर मुझे मारने आ जाएंगे।"

 

यह बात पूर्णतया सत्य थी,कि जब कोई व्यक्ति दो विभिन्न संस्कृतियों में रहता है तो उसकी मेधा अवश्य उन दोनों संस्कृतियों का तुलनात्मक अध्ययन करती है और जो गुणदोष एक दूसरे में दिखने लगता है, वह प्रकट करने लगता है। मैं डॉ॰ शर्मा की बातों से पूरी तरह सहमत था। यह तो सीधा-सा अंकगणित है, अगर घर में दो कमानेवाले हैं तो घर की विकास दर तुलनात्मक ज्यादा होगी।

" आपने कोई ऐसी देश-विरोधी बात नहीं की। उद्भ्रांत जी दिल के अच्छे इंसान है, मगर कभी-कभी आलोचना के चक्कर में जहां आलोचना नहीं करनी होती है,वहाँ पर भी कर बैठते हैं। एक सशक्त आलोचक जो हैं। यह सत्य है कि प्रेम-विवाह थोड़े ज्यादा अस्थाई होते जरूर है, मगर समाज के विलयीकरण का काम करते हैं। होमोजीनियस सोसाइटी का निर्माण होता है प्रेम-विवाह से।" मैंने अपना पक्ष रखा।

इसी सवाल को दूसरे रूप में बदलकर क्राइम रिपोर्टर राजेश मिश्रा की वह राय लेना चाहते थे," राजेश जी,अगर आपको किसी रेप की सत्य-घटना का आँखों देखा हाल प्रस्तुत करना हो तो आप कैसे रिपोर्टिंग करोगे? क्या आपकी संस्कृति रेप की घटना के लिए आवरण का काम करेगी? या फिर आप तथ्यों को ट्विस्ट कर रिपोर्ट पेश करोगे?"

 

इस तरह के सवाल ने कुछ समय के लिए राजेश को पेशोपेश में डाल दिया। फिर काफी सलीके से उसने उत्तर दिया मानो वह कोई आंखो देखी रेप की घटना का जिक्र करने जा रहा हो," मैं तो ठहरा क्राइम रिपोर्टर। कोई लच्छेदार भाषा नहीं, कोई साहित्यिक भाषा नहीं। सीधे-साधे शब्दों में तथ्यों को सामने रखते हुए अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करूंगा। उसमें कोई संस्कृति काम नहीं आएगी।"

अभी भी हम सभी टियन'अनमेन स्केवयर के इर्द-गिर्द घूम रहे थे। डॉ ॰ शर्मा का चेहरा देखने से अभी भी लग रहा था कि उनका मन अशांत है। डॉ॰चौरसिया की तरफ देखते हुए कहने लगे," चौरसिया साहब,एक बात बताइए,क्या छोटे कपड़े पहनने से रेप बढ़ते हैं ?"

 

डॉ चौरसिया निस्तब्ध। क्या उत्तर देते?कुछ समय के लिए ऐसा लगा मानो उन्हें कोई साँप सूंघ गया हो। फिर प्रकृत अवस्था में आकर वह कहने लगे,"मेरे ख्याल से रेप का संबंध छोटे कपड़ों से नहीं है। सवाल मानसिकता का है। अगर हमारे घर की बेटी ऐसे कपड़े पहनती है तो कुछ नहीं, मगर दूसरे घर की लड़की या कोई महिला अगर ऐसे कपड़े पहनती है या कुछ फैशन कर लेती है तो हमारी दृष्टि तिर्यक होने लगती है। यह संकीर्णता नहीं तो और क्या है ?"

धीरे-धीरे दार्शनिक बातें गंभीर सामाजिक मुद्दों में बदलती जा रही थीं और वे भी हमारे देश की ज्वलंत समस्याओं के बारे में। साथ चलने वाले सभी चुपचाप। किसी के पास कोई उत्तर नहीं। हमारे पास तो क्या ,भारत की सवा खरब जनसंख्या के पास में भी नहीं। जितनी रेप की घटनाओं का प्रचार होता गया ,उतनी ही वे घटनाएँ बढ़ गईं। उससे भी बढ़कर, रेप के बाद लड़की को मारकर पेड़ से लटकाने की घटनाएँ भी सामने आने लगी। जितनी ज्यादा धर्म-भीरुता , उतनी ज्यादा अश्लील घटनाएँ। निर्भया हत्याकांड के बाद तो पता नहीं, अब तक कितने रेप हो चुके होंगे? क्या रेप की बढ़ती घटनाओं पर काबू पाया जा सकता है? डॉ॰ शर्मा की बहस ने हजारों सवाल मन में पैदा कर दिए। बातों का सिलसिला धीरे-धीरे थमता जा रहा था।

 

सामने की सड़क पार कर जाने पर दिखाई दे रहा था राजमहल,गुगोंग, जिसे प्रचलित भाषा में ' फॉरबिडन सिटी' के नाम से पुकारा जाता है। बहुत ही महत्त्वपूर्ण जगह है चीन की। यहाँ से मींग और किंग साम्राज्य के चौबीस शासकों ने लगभग पाँच सौ साल तक चीन पर शासन किया। डॉ॰ चौरसिया यह जानने को उत्सुक थे कि इस राजमहल को 'फॉरबिडन सिटी' क्यों कहा जाता है? सवाल एकदम सही था। जवाब नीना को छोडकर और किसके पास था? उसके अनुसार, इस राजमहल की दीवारों को वहाँ की सामान्य जनता स्पर्श तक नहीं कर सकती थी, इसलिए इन महलों की नगरी को 'फॉरबिडन सिटी' कहा जाता है यह प्राचीन राजाओं के महलों और सभा-भवनों का समूह है। यह आयताकार दीवारों से घिरा है। इसमें 9995 कमरे हैं और यह विश्व का सबसे बड़ा शाही महल है। इस महल की खूबसूरती देखते ही बनती है। अब इस प्राचीन महल को राजशाही वस्तुएँ सम्हालने के लिए एक अजायबघर का रूप दे दिया गया है, इसीलिए सैलानी इसके शाहाना दृश्यों को देखने दूर-दूर से आते हैं। इस वर्जित नगर की ऊंची दीवारें तथा दरवाजे पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। इस महल के सात दरवाजे हैं, जिनमें से एक तबाह हो चुका है तथा अन्य कई कहानियाँ व मिथक अपने से संभाले बैठे हैं, इस महल की छतें अभी भी पीले रंग जैसी हैं जिन पर बनाए ड्रैगन, कुकनुस तथा अन्य विशाल आकार के पक्षी बने नजर आते हैं। ऊंची मीनारों पर बड़े-बड़े सर्प, कमल के फूल, ड्रेगन इत्यादि प्रतीकात्मक रूप में खुदे हुए नजर आते हैं।

कभी बीजिंग में यह महल सबसे ऊंची इमारत होता था, जहां राजा ऊंचाई पर बैठता था और उसे कोई वहाँ बैठे देखने में असमर्थ होता था। जब भी कोई राजा इस महल को संभालता रहा, वह अपने शौक के मुताबिक उसकी सजावट करता रहा। इस नगर को सुंदर गलीचों व क्लासिकल चीनी कला से अलंकृत किया जाता है। इसके अंदर भी राजा का दरबार लगता था। इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया को भी यहाँ की कला बहुत पसंद थी। अभी भी इसमें बहुत-सा राजशाही प्राचीन क्लासिकल सामान,मुख्य पॉटरी,पोरसेलीन,पेंटिंग,ज्वेलरी और दीवार व हाथ घड़ियाँ,बुत्त,पुरानी घड़ियाँ, खिलौने, यंत्र, कला के नमूने, बड़ी- बड़ी डेगचियाँ व बर्तन पड़े हुए हैं, जिन्हें राजा की अमीरी का प्रतीक समझा जाता था। इस महल में मिंग और क्वींग राजतंत्रों के 24 सम्राटों ने 500 वर्षो तक निवास किया। महल के उत्तरी तियनानमेन गेट से कुछ दूरी पर वूमेन गेट स्थित है, जो फारबिडेन सिटी का मुख्य द्वार है।बीजिंग में ही चीन वास्तुशिल्प के अद्भुत नमूने के रूप में टेम्पल ऑफ हैवेन स्थित है, जो 500 वर्ष पुराना है। शासक 'स्वर्ग-पुत्र' माने जाते थे, जिन्हें असंख्य अधिकार प्राप्त थे। शासकीय सत्ता के प्रतीक ड्रेगन और फोनिक्स का अर्थ राजा और रानी से था। सारस और कछुआ साम्राज्य की दीर्घायु के सिंबल थे।

 

हमारी घड़ी में चार बज रहा था। इस प्रदर्शनी के टिकट बंद हो चुके थे। इस राजमहल को हम देख न सके, इस बात का मन में मलाल गहराता रहा। मैंने डॉ॰ शर्मा से पूछा,"उस जमाने के राजा-महाराजाओं की जीवन शैली कैसी रही होगी?"

वह कहने लगे," मेरी जानकारी के अनुसार 'किंग' साम्राज्य का राजा के एक वक्त के खाने में हजारों व्यंजन और रानी डौयागर कीकसी एक बार में 108 प्रकार की सब्जियाँ बनाने का आदेश देती थी। सेक्स के बारे में सुनकर तो आप चौंक जाओगे। मींग के काल में दस हजार से ज्यादा वैश्याएँ थी। राजा रात में सिल्वर ट्रे में रखे ढेर में से एक टेबलेट चुनता था अपने हरेम में रखी वैश्याओं के नाम में से। जिसका नाम आता था ,उसे नंगे बदन पर पीला कपड़ा लपेटकर राजा के शयनकक्ष में भेज दिया जाता था। उसे नौकर की पीठ पर बांधकर लाया जाता था,क्योंकि उनके पाँव बंधे हुए होते थे। केवल हिंजड़ों को छोडकर कोई राजमहल में नहीं रह सकता था।भारत की तरह यहाँ भी औरतों पर घोर-अत्याचार व शोषण होता था। सारे एशियाई देश ऐसे ही थे। जब चीन ने औरतों के प्रति सम्मान की दृष्टि अपनाई तो देश विकास के पथ पर अग्रगामी होने लगा। अब आप ही सोचो, कहाँ चीन हमारी तरह विकासशील देश था और कहाँ वह विश्व की एक आर्थिक शक्ति बनने जा रहा है। मूलभूत तो यहीं परिवर्तन है दोनों सभ्यताओं में। "

 

वहाँ से हटने के बाद नीना हमें ले जाती है एक शानदार एक्रोबेटिक शो में।इतना बढ़िया शो तो मैंने जीवन में पहली बार देखा। बैकग्राउंड में फिल्म और साउंड इफेक्ट में एक्रोबेटिक कलाकारों द्वारा किया जाने वाला प्रदर्शन,उनकी एकाग्रता और दक्ष अभ्यास बरबस हमें मंत्र-मुग्ध किए जा रहा था। शो जैसे ही खत्म हुआ,हम लौट आए गंगा होटल में। पेटभर खाना खाने के बाद भी मेरा मन भूखा था, अतृप्त था। मन ही मन वैचारिक उथल-पुथल चल रही थी चीन के विकास के रहस्यों की खोज में। अवसर पाकर डॉ॰ खगेन्द्र ठाकुर के साथ गप्पें मारने लगा। वह मेरे प्रिय लेखक भी थे। जिज्ञासावश मेरे मन से निकल पड़ा,"सर,आप तो कामरेड रह चुके हैं। कम्युनिस्ट विचारधारा से ओत-प्रोत। आपके हिसाब से चीन के विकास के क्या कारण हो सकते हैं?"

 

डॉ॰ खगेन्द्र ठाकुर मेरी तरफ देखकर मुस्कराए। उन्हें बोलने मेँ शायद कुछ परेशानी हो रही थी। गला खंखारते हुए कहने लगे,"देखो,चीन में एक ही सरकार है। यहाँ वोटिंग नहीं होती है। कुछ ही लोग जो महासचिव के पद पर होते हैं,वे ही अपना वोट डाल कर प्रेसिडेंट का चयन करते हैं। यह भी विकास का एक मॉडल है। माओत्से तुंग कभी पढा है आपने? शायद नहीं। यहाँ सारी संपति सरकार की है। यहाँ जनता का कुछ नहीं है। जनता केवल श्रम करती है,पैसा कमाती है, मजदूर की तरह जीवन गुजारती है। बीजिंग या शंघाई में भारतीय मुद्रा में 5-6 करोड़ में एक फ्लेट मिलेगा वह भी केवल 70 साल के लिए। यहाँ की कंपनियाँ भी पट्टे पर चलती है चालीस साल के। और, बाहर की कंपनियों को ये लोग घुसने नहीं देते हैं और अगर देते भी हैं तो केवल दस-पंद्रह साल के लिए। तब सोचिए, देश में विपक्ष नहीं,नागरिकों को अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं तब विकास होगा ही होगा,जाएगा कहाँ ?"

 

डॉ खगेन्द्र जी की कई बातें सिर के ऊपर से गुज़र रही थी,फिर भी मैं हाँ में हाँ मिलाए जा रहा था। न तो मैंने माओत्से तुंग की लाल किताब पढ़ी थी और ना ही माओवाद की विचार धारा के बारे में ज़्यादा कुछ जानता था। इतना जरूर जानता था कि माओवादी ह्त्या करते हैं,तोड़-फोड़ करते हैं, रेलवे ट्रेक हटा देते हैं और पत्ता नहीं क्या-क्या करते हैं।उनका मानना है कि क्रांति बंदूक की गोली से जन्म लेती है। शायद इसलिए माओत्से की किताब को लाल किताब कहा जाता होगा। बंदूक की नोक पर सत्ता-परिवर्तन। मगर हमारे देश में तो माओवादी को भी नकसलवाद की तरह आतंकवादी करार दिया जाता है। विचारों में कितनी ताकत होती है,वे किताबों से निकलकर बंदूकों तक पहुँच कर रक्त-रंजित कारनामों को जन्म देते हैं। मेरा मन फिर भी अशांत था। चीन वाले जब भारत आते है तो भारत को गरीबों का देश कहते है।

अंग्रेज़ लोग तो इससे भी ज़्यादा,भारत को कभी सपेरों और हाथियों का देश कहते थे। क्या हमारे पूर्वज कभी तरक्की पसंद लोग नहीं थे? चीन की जनरेशन और भारत की जनरेशन मेँ इतना अंतर क्यों? ऐसा ही एक सवाल, मैंने बस में होटल की ओर जाते समय मानस सर से पूछा था। उन्होंने क्या कहा,जानते हो," दिनेश भाई,विकास के अपने अपने मॉडल है। हमारे यहाँ से जितने लोग कम्युनिस्ट विचारधारा को सीखने के लिए विदेश गए थे,एकाध को छोड़ कर सारे के सारे या तो अपना घर भरने लगे या फिर अपना सामान्य जीवन जीने लगे। किसी के भी ख़ून में वह जज़्बा नहीं था कि सत्ता पलट कर क्रांति का बिगुल फूँक सके। जब मजदूर थे तो मार्क्सवाद सूझता था। मगर जब जेब में पैसे आ गए तो मार्क्सवाद की सिट्टी-पिट्टी गुम। मैं भी एक अच्छा संगठनकर्ता था, मुझे भी किसी जमाने में कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव बनाया जा रहा था लेकिन ....." मुमताज़ की ओर इशारा करते हुए कहने लगे",मुमताज़ से पूछ लो,वह तो बहुत पहले से हमारे साथ है।"

 

धीरे-धीरे बहुत कुछ समझ में आने लगा था। नए-नए विचारों की उलझनों से बाहर निकलने का प्रयास कर रहा था। तभी डॉ चौरसिया ने आवाज़ लगाई,"अरे भाई! बहुत समय हो गया है। कब तक बात करते रहोगे?"

मगर मेरा मन कहाँ मानने वाला था, मैने संकल्प किया कि जब भी मैं चीन के बारे में अगर संस्मरण लिखूंगा तो माओत्से तुंग को अवश्य पढ़ूँगा और माओवाद को जानने का भरसक प्रयास करूंगा।

 

माओत्से तुंग का काव्य-संसार

जब मैंने थियानमेन चौक पर माओत्से तुंग की बहुत बड़ी तस्वीर देखी, उसी समय मेरा ध्यान भारत के ओड़िशा,बिहार,बंगाल और आन्ध्रप्रदेश के कोयलांचल में व्याप्त माओवाद की ओर जाने लगा। वह माओवाद जिसका सत्ता-परिवर्तन का सिद्धान्त बंदूक की नोक से प्रारम्भ होता है, वह माओवाद जो रेल की पटरिया उखाड़कर देश में अराजकता फैलाता है, वह माओवाद जो किसी कंपनी के डायरेक्टर के जीप की आगे की सिर में बांधकर केरोसिन छिड़क कर जला देता है, वह माओवाद जो किसी लाल रंग वाले कागज को किसी चौराहे पर चिपकाकर किसी भी औद्योगिक संस्था को बंद करने के लिए मजबूर कर देता है। तरह-तरह की बातें मेरे जेहन में घूम रही थी, अपने उत्तरों की तलाश में। मगर मेरे पास किसी भी प्रश्न का उत्तर नजर नहीं आ रहा था। बिना माओवाद को समझे मेरा चीन का संस्मरण अधूरा रह जाता। यह तो अच्छा हुआ कि चीन यात्रा के दौरान सहयात्री रहे हिन्दी के विशिष्ट व वरिष्ठ कवि उद्भ्रांतजी ने  मेरे संस्मरण "चीन में सात दिन" की प्रथम पाण्डुलिपि को पढ़कर उसकी कमियों की तरफ ध्यान आकर्षित करते हुए मुझे चीन की संस्कृति, साहित्य और कला के उन अनछुए पहलुओं को उजागर करने के लिए माओत्से तुंग, कन्फ्यूशियस, ह्वेनसांग तथा लू-शून जैसे महान व्यक्तित्वों की जीवनी के बारे में जानने के लिए विशेष प्रेरित किया ताकि इस संस्मरण में चीन की यात्रा के साथ-साथ उसकी ऐतिहासिक व सांस्कृतिक फ़लक से भी पाठकों को अवगत कराया जा सके। तभी बहुत पहले पढ़ी हुई वरिष्ठ कवि अरुण कमल के "पुतली में संसार" कविता-संग्रह की एक कविता "माओ विश्राम" मुझे याद आने लगी।

 

सो रहे हैं कामरेड माओत्से तुंग

सो रहे हैं माओत्से तुंग थांगची

सो रहा है वो काला मस्सा ठुड्डी के पास

सो रहे हैं वे पाँव चलते-चलते

इतनी जगी इतनी जगमग यह भूमि

इतने धूप-धुले बच्चे हरियाली ये तितलियाँ

मानो स्वप्न हों कामरेड माओ की नींद में –

बांस की पत्तियाँ छू रही हैं नोक से नदी का जल

पीपा बज रहा है धान के खेतों के पार

ये फूल तुम्हारे लिए कामरेड माओ

ये सैंकड़ों फूल –

साल के सबसे ठंडें दिन भी खिले हैं खिले हैं फूल सैंकड़ों !

सलाम माओ थांगची लाल सलाम!

 

पता नहीं,अरुण कमल ने माओ की नींद में मानवता के ऐसे क्या सपने देखे कि उन्हें सैकड़ों फूल भी अर्पित किए और अपना लाल सलाम भी भेजा। इस कविता ने माओ के बारे में जानने की मेरी जिज्ञासा को और बढ़ा दिया। एक और कविता जो मेरा ध्यान बार-बार आकर्षित कर रही थी,वह थी डॉ. के. सच्चिदानंद की कविता 'माओ और ताओ' जिसमें उन्होने 'चांग काउत्से' की एक कथा को पुनर्कथन में डाला था, मैं उनकी तहें टटोलने लगा :-

 

किसी जमाने में ई नदी के किनारे

एक घोंघा था जिसका नाम ताओ था।

और एक सारस था जिसका नाम माओ था।

ताओ निकला था धूप सेंकने

और माओ वही पास से गुजर रहा था।

ताओ ने अपनी अभेद्यता का खोल

कस लिया ज़ोरों से

जब उसे चुभी अपने मांस में

माओ की चोंच की नोक।

 

''आज या कल तक अगर पानी नहीं गिरा तो

तो तुम्हें मिलेगा यहाँ मरा एक घोंघा।''

माओ ने ताओ से कहा।

पलट कर जबाब दिया अदृश्य ताओ ने

''अगर तुम नहीं खिसके यहाँ से

आज, या कल तक

तो यहाँ पाओगे एक मरा सारस"

एक युद्ध टालने के लिए जिस चांग काउत्से ने

सुनाई थी यह कथा

वह कभी का मर चुका

लेकिन अभी तक अकाल है,

ताओ छिपा ही है खोल में अभी तक,

माओ भी हटा नहीं रहा अपनी चोंच।

 

डॉ. के. सच्चिदानंद की कविता का अर्थ तो मुझे समझ में नहीं आ रहा था, मगर माओवाद की धारणा तो मेरे दिमाग में उस समय से बनने लगी थी, जब मैंने जगदीश मोहंती की ओडिया कहानी 'रायगढ़ा-रायगढ़ा'   पढ़कर नक्सलवाद व माओवाद को जन्म देने वाली कारक परिस्थितियों का अत्यंत ही नजदीकी से सामना किया। इस कहानी में एक 'लाल किताब' का जिक्र भी हुआ था, जिस लाल किताब के अँग्रेजी वर्सन को मैंने चीन में एक किताब की दुकान से खरीदा। गुटका आकार यह किताब दिखने में ऐसे ही दिख रही थी, जैसे गीता-प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित 'गीता' की पाकेट बुक। क्या चीनी लोग चेयरमैन माओत्से तुंग के कोटेशनों को लेकर लिखी गई पुस्तक को उतना ही मान-सम्मान देते है, जितना हम गीता को। जिस ग्रंथ को हम ईश्वरीय मानकर सम्मान देते हैं, यहाँ तक कि कोर्ट में गवाही देने के समय यह भी कहते हैं, ''मैं गीता पर हाथ रख कर कसम खाता हूँ कि मैं जो भी कहूँगा, झूठ नहीं कहूँगा, सब सच-सच कहूँगा''। शायद सही हो, तब माओवाद से हम क्यों डरते हैं ? इसी सवाल ने मुझे माओ की जिंदगी के भीतर झाँकने पर विवश कर दिया और मैंने अपनी जिज्ञासा और उत्सुकता के शमन के लिए 'अमेज़न डॉट इन' द्वारा अमेरिका से केलिफोर्निया विश्वविद्यालय के विलिस बेनीटर द्वारा संपादित "द पोएम्स ऑफ माओ जेडोंग" पुस्तक मंगवाईं, जिसके गहन अध्ययन की जानकारी आप सभी के सम्मुख हैं।

 

माओ का जन्म 1893 में हूनान प्रांत के शाओशन गाँव में हुआ। उनके पिताजी एक गरीब किसान थे। उन पर बहुत ज्यादा ऋण हो होने के कारण उन्होंने विवश होकर सेना ज्वाइन कर ली। कई सालों तक वह सैनिक रहे। जब माओ का जन्म हुआ, तब वह घर लौटे और छोटा-मोटा व्यवसाय करने लगे। माओ ने अपनी आत्म-कथा में एक जगह लिखा,

''आठ साल की उम्र में मैंने एक स्थानीय प्राइमरी स्कूल में पढ़ना शुरू किया और तेरह साल की उम्र तक वहाँ रहा। सुबह-शाम मैं खेतों में काम करता था और दिन में मैं 'कन्फ़्यूशियस एनालेक्ट' तथा 'द फॉर क्लासिक्स' पढ़ा करता था। मेरे पिताजी मुझे खाली बैठे देखना कतई पसंद नहीं करते थे। अगर मेरे पास पढ़ने के लिए किताबें नहीं होती थी तो वह मुझे खेती के दूसरे कामों में लगा देते थे। वह बहुत गुस्से वाले थे, मुझे और मेरे भाइयों को बहुत पीटते थे। कभी भी उन्होंने हमें पैसे नहीं दिये, यहाँ तक कि खाने के लिए कभी अच्छा खाना भी नहीं। जबकि हर महीने की पंद्रह तारीख को वह अपने श्रमिकों को कुछ रियायत देते थे और चावल के साथ खाने के लिए अंडे, मगर मांस कभी नहीं। जबकि मेरी माँ काफी उदार दिल तथा संवेदनशील महिला थी। उसके पास जो कुछ भी होता था, वह सभी को बाँट देती थी।"

 

यह था माओ का बचपन। जल्दी ही माओ ने अपने पिता के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका और एक बार पिता को धमकी भी दे डाली कि अगर वह अकारण मारना बंद नहीं करेंगे तो वह तालाब में कूदकर अपनी जान दे देगा। माओ आगे बताते है:-

"मेरे पिताजी केवल दो साल स्कूल गए थे और पढ़ना लिखना जानते थे। मेरी माँ पूरी तरह अशिक्षित थी। दोनों किसान परिवार से थे। मैं अपने परिवार में स्कॉलर था। मुझे क्लासिक्स की जानकारी अवश्य थी, मगर मैं उसे पसंद नहीं करता था। मुझे प्राचीन चीन के रोमांस बहुत पसंद होते थे और खासकर विद्रोह की कहानियां भी।''

दस साल की उम्र से लेकर आजीवन चीन के महान उपन्यासों को वह पढ़ते रहे, जिनमें ''द ड्रीम ऑफ रेड चेम्बर', ''जर्नी टू द वेस्ट'' (आर्थर वेले ने जिसका 'मंकी' नाम से अनुवाद किया है), "द थ्री किंगडम","वाटर मार्जिन"(पर्ल बर्थ द्वारा अनूदित - "आल मेन आर ब्रदर्स") आदि प्रमुख है।

हूनान गाँव के किसान परिवार में जन्म लेने वाले माओ की जड़ें गाँव की जमीन से जुड़ी हुई थी। उन्हें लोगों के जीवन और उनकी समस्याओं के बारे में जानकारी थी। उन्होंने इस बारे में कहा, ''जो किसानों को जीत लेगा,वह चीन को जीत लेगा और जो जमीनी सवालों का समाधान करेगा, वह किसानों को जीत लेगा।''

 

जमीन से जुड़ी अंतरंगता की झलक उनकी कविताओं में आसनी से देखी जा सकती है, शाओशन को छोड़े अर्द्ध-शतक बीत जाने के बाद माओ ने हूनान में अपने बचपन के दिनों के चावल के खेतों, सैनिकों, उड़ानों आदि के साथ-साथ प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन अपनी कविता 'रिटर्न टू शाओशन' तथा 'वेग ड्रीम' में किया है।

शाओशन वापसी

मुझे अफसोस है गुजरते मरते धुंधले सपनों पर

बत्तीस वर्ष पहले मेरे जीवन का वह मूल उद्यान

वे लाल झंडे जिन्होंने गुलामों को जगाकर  

तीन नुकीले भाले पकड़वाए

जब जमींदारों ने अपने काले हाथों में चाबुक उठाया

हम बहादुर थे और त्याग केवल हमारा हथियार था

हमने सूरज-चंद्रमा से कहा

आकाश बदलने के लिए

अभी मैं धान के खेत और फलियों

की हजारों तरंगें देखता हूँ

और खुश हूँ

शाम की धुंध में अभिनेता को अपने घर लौटते देख (जून 25,1959)

 

सोलह साल की उम्र में माओ पास के शहर जियांग-जियांग की दूसरी स्कूल में पढ़ने गए।  सन 1911 में चांगसा की राजधानी में रहने चले गए, जहां वह सन 1918 तक रहे। जब तक कि वह हूनान की पहली निर्मित स्कूल से स्नातक न हो गए। यह समय उनके लिए  तरह-तरह की किताबें पढ़ने का समय था। सुबह से लगातार शाम तक 'हूनान प्रोविंसियल लाइब्रेरी' में वह लगातार किताबें पढ़ते रहते।

"मैंने बहुत सारी किताबें पढ़ी,विश्व इतिहास और भूगोल की। यह मेरा पहला अवसर था जब मैंने दुनिया का नक्शा पहली बार देखा और उसका अध्ययन किया। मैंने एडम स्मिथ की 'द वेल्थ ऑफ नेशन्स', डार्विन की 'ओरिजिन ऑफ स्पिशिज' तथा जॉन स्टुआर्ट मिल की एथिक्स पर लिखी पुस्तकों का गहन अध्ययन किया। मैंने रूसो,स्पेन्सर के लॉजिक,मोंटेस्कू की कानून पर लिखी पुस्तकें भी पढ़ी। मैंने कविता के साथ रोमांस, प्राचीन ग्रीस की कहानियों के साथ इतिहास का अध्ययन एवं रूस,अमेरिका,इंग्लैंड,फ्रांस तथा दूसरे देशों के भूगोल विशेष जानकारी अर्जित की।''

 

वह दर्शन-शास्त्र के अध्येता थे और इसके लिए उन्होंने प्राचीन ग्रीक-वासियों में स्पिनोजा,कैंट और गोथे का भी गहराई से अध्ययन किया। वह फ्रीडरिच पालसन की पुस्तक 'ए सिस्टम ऑफ एथिक्स' से भी विशेष प्रभावित हुए। बाद में हेगेल और मार्क्स का भी अध्ययन किया।

राजनैतिक जागरण के दौरान उनकी उम्र का तकाजा उनकी कविता 'चांगशा' में आसानी से देखा जा सकता है।चांगशा हूनान की राजधानी थी और माओ का मूल-स्थान। यह शहर जियांग नदी के पूर्वी तट पर था और नारंगी प्रायद्वीप में वह अपने दोस्तों के साथ अक्सर तैरने जाया करते थे। सन 1911 में चीन में बहुत उथल-पुथल हो रहा था। उस समय माओ ने कुछ विद्यार्थियों के ग्रुप का नेतृत्व किया और अप्रैल 1918 में 'न्यू सिटीजन सोसायटी' की स्थापना की। सन 1918 में चांगशा की नॉर्मल स्कूल में स्नातक की डिग्री प्राप्त कर वह बीजिंग में फारबिडन सिटी चले गए। यहाँ बैठकर वह बीजिंग नेशनल यूनिवर्सिटी के पुस्तकालयों में खो जाना चाहते थे, जहां से देश की राजनीति में हलचल पैदा करने के लिए 'विद्यार्थी आंदोलन' की शुरूआत होने जा रही थी। उनकी कविता "चांगशा" में यह प्रतिध्वनि साफ सुनाई देती है:-  

 

चांगशा

शरद पतझड़ में अकेले खड़े

जियांग नदी के उत्तर में

नारंगी प्रायद्वीप के अंतरीप के चारों ओर

जब मैं देखता हूँ हजारों पहाड़ों की लाली

धब्बेदार जंगलों की कतारें

इस महान नदी के पारदर्शी हरिताश्म में

सौ-सौ नावें

बादलों में मँडराते बाज

स्वच्छ तल पर तैरती मछलियाँ

सर्द हवा में ठिठुरते संघर्षरत लाखों प्राणी

मुक्ति के लिए

इस विराट में

मैं विशाल हरी नीली धरती से पूछता,

इस प्रकृति का मालिक कौन है?

मैं यहाँ बहुत दोस्तों के साथ आया

और अभी तक पढ़ी हुई वे कहानियां भूल

नहीं पाया

हम युवा थे,

फूलों की हवा की तरह तेज,परिपक्व

स्कॉलर की तेज धार की तरह पवित्र

और निडर

हमने चीन की ओर उंगली उठाई

और कागजों में लिख कर प्रशंसा या

भर्त्सना की

कि अतीत के योद्धा गोबर थे

क्या तुम्हें याद है ?

नदी के बीचो-बीच

हमने पानी उछाला, छप-छप किया

और किस तरह हमारी तरंगों ने

तेज नौकाओं को धीमा कर दिया। (1925)

 

पॉलिटिकल इकोनोमी के प्रोफ़ेसर ली डानहाओ की मदद से उन्हें यूनीवर्सिटी लाइब्रेरी के न्यूज-पेपर रूम में छोटी-मोटी नौकरी मिल गई। इस नौकरी के बारे में माओ ने लिखा:-

      ''मेरी पोजिशन इतनी नीचे थी की लोग मुझे अवॉइड करते थे। मुझे मालूम था कि जरूर मेरी कुछ गलती रही होगी। हजारों सालों के स्कॉलर आम जनता से दूर होते जा रहे थे और मैं उस समय का सपना देख रहा था कि स्कॉलर कुलियों को पढ़ाएंगे और निश्चिंतता से कुलियों को भी इतनी ही शिक्षा की आवश्यकता है, जितनी दूसरों को।''

 

बीजिंग में कविता पढ़ने में वह लीन हो गए, खासकर टंग साम्राज्य(722-726) के महान कवि  जेन जान को, जिन्होंने उन हूणों के खिलाफ लिखा, जो डेगर नदी और स्वर्ण पहाड़ियों के मध्य घुड़-सवारी करते हुए इधर-उधर घूमते थे। माओ ने रशियन लेखकों को भी पढ़ा जिसमे टालस्टाय,अराजकतावादी क्रोपटकिन और बाकूनिन मुख्य थे। छ महीनों के अंतराल में उसने अपने मित्रो के बीच घोषणा कर दी कि वह अराजकतावादी हैं। माओ को अपने दर्शन-शास्त्र के प्रोफेसर की पुत्री यंग कइहुई से भी प्यार हुआ, तीन साल के बाद उसने उससे शादी कर ली। लिउ ज़्हिक्षुन प्रोविन्सियल पीजेंट एसोसिएशन के महासचिव थे और माओ के दोस्त भी। जिनकी मृत्यु सितंबर 1933 में हूबे के होंघुइ युद्ध में हुई थी। उनकी पत्नी ली-शुई चांगशा के माध्यमिक विद्यालय की अध्यापिका थी। अपनी पत्नी यंग कई हुई की मृत्यु पर उसकी कविता 'द गोड्स' में उनका अतिसंवेदन हृदय आसानी से देखा जा सकता है। माओ ने विधवा ली के लिए इस कविता "द गोड्स" के साथ एक नोट लिखा था,

 

"मैं तुम्हें काल्पनिक स्वर्ग की यात्रा एक कविता भेज रहा हूँ। यह कविता ली और यंग काइहुई को समर्पित है।"

यंग काइहुई के साथ माओ की सन 1921 में शादी हुई थी। सन 1930 में गुओमिंदंग जनरल ही जिआन ने यंग काइहुई और माओ की बहिन माओ जेहोङ्ग को गिरफ्तार कर लिया था। जनरल ही जिआन ने यंग काइहुई पर माओ से शादी तोड़ने का दबाव डाला, मगर जब उयसने मना कर दिया तो उसका गला काट दिया और माओ जेहोङ्ग को भी खत्म कर दिया।

 

द गोड्स

मैंने अपना खास फूलों से लदा वृक्ष खो दिया

और तुमने तुम्हारा बेंत जैसा लचीला पेड़

मानो दोनों विटप सीधे आगे बढ़ रहे हो

नवें स्वर्ग की ओर

चाँद के किसी कैदी से पूछते हुए

वू गांग, वहाँ क्या है?

वह उसे अमलतास से सोमरस देता

चाँद पर इकलौती महिला, चांग ई

अपनी लंबी बांहें  फैलाकर

अंतहीन आकाश की अच्छी आत्माओं के लिए

नृत्य करती

नीचे पृथ्वी पर शेर की पराजय का औचक प्रतिवेदन

वर्षा के उलटे कटोरे से लुढ़कते गिरते आँसू

                ( मई 11, 1957)

 

माओ अपने प्रेम के समय के बारे में लिखते हैं;- ''बीजिंग में मेरे रहने की अवस्था बड़ी दयनीय थी। मैं सन यांगिंग  नामक स्थान पर ठहरा, एक छोटे से कक्ष में, जहां अन्य सात आदमी भी थे। जब मैं करवट बदलना चाहता था, तो मैं अपने दोनों तरफ के आदमियों को सचेत करता था। मगर मैंने पुराने महल के बगीचों में पहले के उत्तरी झरनों को देखा। सफ़ेद गूदेदार खिले हुए फूलों को बर्फ से ढका देखकर कवि जेन जॉन द्वारा रचित बेहाई की सर्दियों में जेवर पहने हजारों क्रमबद्ध खिले पेड़ों को देखकर मुझे आश्चर्य होने लगता था। "

 

मार्च 1919 में जब माओ चांगशा लौटे तो राजनीति में सीधे भाग लेना शुरू किया। 'जियांग रिवर रिव्यू' के संपादक के तौर पर सामूहिक वार्ताओं हेतु आलेख लिखना प्रारम्भ किया। इसके अलावा जिउहे प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने लगे। इसी दौरान बीजिंग में चार मई की घटना ने सारे राष्ट्र को हिला दिया। उसने मार्क्स को पढ़ा और अपने आपको मार्क्सवादी करार दिया। वह फिर से बीजिंग चले गए और न्यू सिटीजन सोसायटी  का प्रतिनिधित्व करने लगे तथा हून राज्यपाल चांग चिंग माओ की राष्ट्रीय पत्रिकाओं के प्रकाशन को बंद करने के खिलाफ आंदोलन करने लगे। अप्रैल 1920 में वह शंघाई चले गए। किराये के लिए उन्होंने अपना कोट बेच दिया और प्राइमरी स्कूल के हैडमास्टर को लिखा,

 

''मैं एक लाउंड्रीमेन की तरह कार्य कर रहा हूँ। मेरे धंधे का सबसे कठिन कार्य कपड़े धोना नहीं वरन उनकी डिलीवरी करना है। मेरी धुलाई की अधिकतम कमाई ट्राम टिकटों में खर्च हो जाती हैं, जो कि बहुत महंगे हैं।''

 

शहर के किसी श्रमिक के तौर पर उसका यह पहला अनुभव था। माओ ने पढ़ना बदस्तूर जारी रखा और देश के कोने-कोने में घूम-घूमकर दल का निर्माण करने लगे। सन 1921 जून के अंत से जुलाई के प्रारम्भ में शंघाई मे आयोजित चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी के प्रथम कांग्रेस अधिवेशन के बारह सदस्यों में वह भी एक थे। शुरूआती दौर में मार्क्सवादी विचारधारा के कारण पार्टी की नीतियाँ अस्पष्ट थी। इस तरह चीन में पहली बार प्रभावी तौर पर कम्यूनिज़्म की सांगठनिक शुरूआत हुई।

 

यद्यपि उस समय चीन में मुख्य क्रांतिकारी दल चाइनीज कम्यूनिस्ट पार्टी(सीसीपी) नहीं थी,बल्कि डॉ॰ यनयात सेन के नेतृत्व वाली कौमिंटिंग अर्थात केएमटी थी। यह वह पार्टी थी जो मंचूस के खिलाफ लड़ी और रिपब्लिक की स्थापना की। माओ ने इस पार्टी को ज्वाइन  किया और 1924 को प्रथम कॉंग्रेस अधिवेशन में हिस्सा लिया। वह इस पार्टी की केन्द्रीय कार्यकारिणी समिति का वैकल्पिक सदस्य भी चुना गया और गुओमिंदंग प्रोपोगंडा ब्यूरो का प्रमुख बना और उसके प्रकाशन 'पॉलिटिकल वीकली' का संपादक भी। दोनों गुओमिंदंग और कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य होने पर उसे लेकर किसी प्रकार का विवाद नहीं था, इसके विपरीत गुओमिंदंग के आधिकारिक पद की वजह से राष्ट्रीय स्तर पर राजनैतिक अनुभव के साथ साथ एक अलग पहचान बन गई।

उसी दौरान माओ की मुलाक़ात जियांग जैशी से हुई, रूस के औद्योगीकरण को देख कर लौटे थे। गुओमिंदंग के इस युवा अधिकारी को 1923 में मास्को भेजा गया, वहाँ की मिलिटरी और राजनीतिक स्थिति का जायजा लेने के लिए। मगर वहाँ वह रूस की जासूसी करने के आरोप में सन 1934 में गिरफ्तार कर लिया गया।

 

शंघाई, गुयांग्ज़्हौ और हूनान में माओ ने दोनों दलों के लिए काम किया। उसने खदान श्रमिकों को संगठित किया और किसान संगठनों को सक्रिय करने के लिए भी कार्य किया, जिससे चीन में क्रांतिकारी परिवर्तन की उम्मीद जगी। सन 1926 में अपने आलेख ''हूनान में किसान आंदोलन की जांच' के लिए वह बहुत विख्यात हुए, जिसमें मार्क्स थ्योरी को पूरी तरह नकार दिया गया। इस दौरान गुओमिंदंग में वामपंथी व दक्षिणपंथियों के विरोधी खेमे पनपने लगे थे, सन 1925 सनयान सेन की कैंसर में मृत्यु हो गई। एक काल बाद जियांग जैशी ने कूप डिटेट (coup detate) बनाने का प्रयास किया, मगर वह विफल रहे।

 

अप्रैल 12, 1927 को माओ ने शंघाई,में दूसरे कूप की स्थापना की, जिसमें उसे सफलता मिली और गुओमिंदंग पर पूरी तरह आधिपत्य जमा लिया। उसने शहर के सारे समाजवादियों तथा कम्यूनिस्टों को जड़ से उखाड़ने का आदेश दिया। जिसमें लाखों श्रमिकों तथा सीसीपी सदस्यों का नरसंहार हुआ, उसके बाद हूनान में मई नरसंहार की घटना घटित हुई। जुलाई में गुओमिंदंग ने माओ को गिरफ्तार करने के आदेश दिये, जो किसान संगठनों को मिलिटरी इकाइयों में बदल रहा था। माओ को "रेड बेंडिट" के रूप में जाना जाने लगा। बहुत ही जल्दी से उसने किसान संघों तथा हयांग खदान श्रमिकों को लेकर प्रथम ''वर्कर्स एंड पीजेंट रिवोल्यूशनरी आर्मी'' का निर्माण किया। कुछ छोटी जगहों से,भले ही,उसे संबल मिला, मगर चांगशा की ओर से कुछ भी मदद नहीं मिली। माओ विफल हो गया और श्रमिक व किसान संघों की यात्रा के दौरान उसे गिरफ्तार कर लिया गया। इस पर उसने लिखा था,

 

''मुझे गुओमिंदंग के कुछ आतंकवादी कार्यकर्ताओं के द्वारा पकड़ लिया गया। उस समय गुओमिंदंग का आतंक पूरी तरह व्याप्त था और संदेह के घेरे में अनेक 'रेड' को गोलियों से भुना जा रहा था। मुझे आतंकवादी मुख्यालय की ओर ले जाया जा रहा था, जहां मुझे हमेशा- हमेशा के लिए खत्म किया जाना था। एक कामरेड से हजारों डॉलर उधार लेकर मुझे छोड़ने के लिए रिश्वत देने का प्रयास किया। सामान्य सैनिकों में मुझे मारे जाने को लेकर कोई खास दिलचस्पी नहीं थी, और इसलिए वे मुझे मुक्त करने के लिए राजी हो गए, मगर प्रभारी ने इसके लिए अनुमति प्रदान नहीं की। इसीलिए आतंकवादी मुख्यालय के 200 गज की दूरी पर किसी भी हालत में मैंने खुद भागने का निर्णय लिया। मैं खेतों में भाग गया और एक तालाब के किसी ऊंचे स्थान पर सूर्यास्त तक लंबी-लंबी घास के भीतर छुपा रहा। सैनिकों ने मेरा पीछा किया और कुछ किसानों से मेरी खोज करने में भी मदद मांगी। कई बार वे लोग मेरे काफी नजदीक आए, यहाँ तक कि मैं उन्हें छू भी सकता था, मगर किसी तरह मैं अपने आपको बचाने में सफल रहा, यद्यपि कई बार तो मैंने आशा भी छोड़ दी थी, यह सोचकर कि दुबारा अवश्य पकड़ा जाऊंगा।आखिरकर साँझ ढल चुकी थी, वे लोग चले गए। सारी रात मैं पहाड़ों की यात्रा करता रहा। मेरे पाँव में जूते नहीं थे। मेरे पांव बुरी तरह से छिल गए थे। रास्ते में मुझे एक किसान मिला, जिसने मुझे शरण दी और दूसरे डिस्ट्रिक्ट की ओर ले गया। मेरे पास मात्र सात डॉलर बचे थे जिससे मैंने अपने जूते, छाता और भोजन खरीदा। जब तक मैं आखिरकार अपने गंतव्य स्थल तक नहीं पहुंचा, उस किसान ने मुझे सुरक्षा प्रदान की। मेरी जेब में केवल 'दो कापर'  बचे थे।"

उसके बाद माओ ने चारों बची खुची रेजीमेंटों को एक साथ इकट्ठा किया और लगभग एक हजार आदमियों को लेकर ऊंचे पहाड़ी इलाके(जिसे जींगगांगशन कहते हैं) में पहले कम्यूनिस्ट बेस की नींव रखी। उनकी कविता जींगगन माउंटेन में देख सकते है :-

 

पर्वत पर हमारे झुके झंडे और बैनर

शिखर-तुंग पर बिगुल व ड्रम की प्रतिध्वनि

चारों तरफ दुश्मन की सेना के हजारों वलय

फिर भी हम चौकस थे

कोई भी हमारे भित्ति-जंगल को तोड़ नहीं सकता

हमारी इच्छाशक्ति के दुर्ग ने हमें जोड़ रखा था

हुयांगयांग के अग्रपंक्ति की बड़ी बंदूक की दहाड़ से

दुश्मन की सेना रातों-रात पलायन कर गई। (1928)

 

यहाँ भविष्य की 'लालसेना' का निर्माण हुआ और माओ ने अपने तीन नियम तथा आठ व्यादेश लिखे, जिसके आधार पर गुरिल्ला युद्ध लड़ा जाना था।ये नियम व व्यादेश इस प्रकार थे:-

 

तीन नियम;-

1-आदेश का हर समय पालन हो।

2- लोगों से एक सुई या धागा तक न लें।

3-सारी जब्त संपदा मुख्यालय भेजी जाए।

 

आठ व्यादेश;-

1-जब आप घर छोड़ कर जाये तो सारे दरवाजे बदल दे और चटाई लौटा दें।

2-लोगों के प्रति उदार रहें और हो सके तो उनकी मदद करें।

3- सभी उधार लिए हुए सामान लौटा दें और समस्त खराब सामानों को बदल दें।

4-किसानों के साथ सारे लेन-देन में ईमानदार बने रहे।

5- साफ सुथरे रहे, घर से सुरक्षित दूरी पर लेट्रिन बनाए तथा वहाँ से जाने से पहले मिट्टी से भर दें।

6- फसल नष्ट नहीं करें।

7-औरतों से छेड़खानी न करें।

8- युद्ध के कैदियों से कभी दुर्व्यवहार न करें।

 

पाइन और बम्बू से भरे इस महान पर्वत पर 'लाल सेना' का निर्माण हुआ। सन 1928 तक ग्यारह हजार से ज्यादा सैनिक जुड़ गए, यहाँ पर रेड आर्मी के मुख्य मिलिटरी नेता व माओ के सबसे ज़्यादा विश्वसनीय साथी से मुलाक़ात हुई। यद्यपि उनके पास बहुत कम हथियार थे, रेडियो तक नहीं था और सीमित खाद्य सामग्री थी, फिर भी जियाङ्ग्क्षि हिल पर छुटपुट घटनाओं को अंजाम देना शुरू कर दिया था। जल्दी ही उनकी संख्या बढ़कर पचास हजार हो गयी।गुओमिंदंग ने उसे समाप्त करने के लिए पाँच बार कोशिश की, मगर वे सफल नहीं हो सके। इसका उल्लेख आप इन दो कविताओं में देख सकते हैं:-

 

पहली धरप

तुषार आकाश में लाल दहकते जंगल

हमारे अच्छे सैनिकों का अभ्रांकष क्रोध

ड्रेगन की धाराओं पर धुंधलका और

हजारो पहाड़ अंधकारमय

हम सभी चिल्लाए

जनरल ज़्हंग हुईजन को आगे ले जाया गया।

जियाङ्ग्क्षि में हमारी विशाल सेना उमड़ पड़ी

हवा और धुआँ आधी दुनिया पर मंडराने लगे

लाखों श्रमिकों और किसानों को जगाया

हमारे दिल में

बुज़हौ के पर्वतों के नीचे लाल झंडों की अराजकता  (जनवरी १९३१)

 

दूसरी धरपकड़

सफ़ेद बादलों के पर्वत पर बादल रुके

जिसके नीचे एक पागल चिल्ला रहा था

यहाँ तक कि

खोखले पेड़ और सुखी टहनियाँ षड्यंत्र कर रही थी ,

राइफलों का हमारा अरण्य आगे भेदता जा रहा था

पुरातन उडने वाले जनरल की तरह

जो स्वर्ग से उड़कर तुर्की के आदिवासियों का पीछा करने लगे

मंगोलिया से दूर

पंद्रह दिनों के भीतर दो सौ मील सैनिकों की कदमताल

ग्रे गन नदी और मिन पर्वत के भीतर से

हमने उनके सारे ट्रूप धो डाले

एक चद्दर के बिछाने की तरह

कोई चिल्ला रहा है

अफसोस

धीरे-धीरे उन्होने अपनी लाठिया पकड़कर आगे बढ़ना शुरू किया।(ग्रीष्म १९३१)

 

मगर अगली बार गुओमिंदंग सेना के लाखों सैनिकों ने टैंक तथा चार सौ विमानों की सहायता से भारी नुकसान पहुंचाया। जिस पर माओ ने लिखा था:- ''नांजिंग के बेहतर सैनिकों से मुकाबला करना बहुत बड़ी भूल थी, जिस पर रेड आर्मी न तो तकनीकी तौर पर तैयार थी और न ही आध्यात्मिक स्तर पर। हम बहुत डर गए थे और बहुत ही मूर्खतापूर्ण लड़ाई हमने लड़ी।''

 

जब अक्तूबर 1934 को फिर से गुओमिंदंग आक्रमण करने की तैयारी कर रहा था, माओ लगभग 85 हजार आदमियों को लेकर दक्षिण जियाङ्ग्क्षि के यातु स्थल से ऐतिहासिक लाँग मार्च के लिए रवाना हो गए। मार्च जेल जाने से बचने का एक उपाय था। जिसका मुख्य उद्देश्य उत्तर पश्चिमी चीन के शांक्षी मे जाकर सोवियत रूस से मिलना था ताकि गुओमिंदंग के आक्रमण से बचा जा सके और जापान से लडने के लिए एक आधार की तैयार किया जा सके। यह सेना चीन के अधिकतर भागो से होते हुये तिब्बत के दक्षिण पश्चिमी भाग में पहुँच गई, रेगिस्तान, टार्टर स्टेपीज़, बर्फीले पहाड़ और खतरनाक घास के मैदानों को चीरते हुए। शुरू-शुरू में बुरे मौसम में वे रात को पैदल चलते थे ताकि गुओमिंदंग के विमानों से रक्षा की जा सके। पहले महीने में सेना ने नौ लड़ाइयाँ लडी, जिसमें उसके एक तिहाई लोग मारे गए। शुरूआती महीनों में माओ को खुद बुखार था, फिर भी वह अधिकतर समय पैदल चलता था। वह अपनी पीठ पर अपना प्रसिद्ध नेपसेक लेकर चलता था, जिसमें नौ खाने थे जिससे वह रेड चाइना को निर्देश देता था। नक्शे, किताबें, पेपर, डाक्यूमेंट और बहुत कुछ हेलमेट, टूटा छाता, दो यूनिफ़ार्म, एक कॉटनशीट, दो कंबल, एक लालटेन, वाटर जग, चावल रखने के विशेष बर्तन और रजत धूसर ऊनी स्वेटर। जब-जब आर्मी कैंप करती, वह देर रात तक नक्शों को देखता और अपने साथ लाए उपन्यासों को बार-बार पढ़ता, कविताएं लिखता। बहुत ज्यादा शारीरिक यातनाओं को साहस से झेलने का साल था वह। संत एक्षुपेय ने लिखा शायद प्रकृति उसकी परीक्षा ले रही थी। इसको लेकर उसकी कविताओं में किसी प्रकार की शिकायत नहीं थी, वरन प्रकृति के साथ अंतरंगता, उसके सौंदर्य की झलकें थी।

 

मार्च का सबसे प्रसिद्ध एपिसोड दादू नदी पर पुल बनाकर पार करना था। पुराने लोहे के पुल में लगी लकड़ियों को गुओमिंदंग के सैनिकों ने हटा लिया था। कुछ चेन पर एक  लिंक से दूसरे लिंक को झूलते हुए पुल पार कर रहे थे। एक-एक उन्हें उठाकर तीन सौ मीटर नीचे गरजते दर्रे में फेंक दिया गया, फिर भी कुछ लोग आग लगाने के बावजूद भी आखिर प्लेंक तक पहुँच ही गए। दादू के बाद आर्मी ने उत्तर में प्रवेश किया। बर्फीले पहाड़ों में माओ ने तुलनात्मक ज्यादा सुरक्षा अनुभव की, यद्यपि पहाड़ की ऊंचाइयों ने सेना को कमजोर कर दिया था। तिब्बत के नजदीक उनके आदमियों पर मांझी आदिवासियों ने आक्रमण कर दिया। खाने के लिए खाद्य सामग्री नहीं बची थी उनके पास। रॉबर्ट पायने लिखते हैं:-

"उन्होंने शलजम दिखने जैसी कुछ चीजें खोदी, मगर वे विषैली थी। पानी ने उन्हें बीमार बना दिया था। हवा उन्हें रोक रही थी,ओलावृष्टि हो रही थी।रस्सियों की सहायता से दलदल की गहराई नापी जा रही थी, मगर रस्सियाँ चोर-बालू में लुप्त हो जाती थी। उनके बचे हुए पालतू जानवर भी नष्ट हो गए थे। आर्मी का मार्च खत्म होने जा रहा था। वे जन-आबादी से भरे लाखों लोगों के प्रान्तों से गुजर रहे थे। केवल मास मीटिंग और टेम्पलेट बांटे  जा रही थे, थियेटर में प्रोग्रामों का आयोजन भी किया जा रहा था।"

 

मालरक्ष अंतिम दिनों के बारे में कहते हैं:-

         ''20 अक्टूबर 1935 को चीन की महान दीवार की तलहटी में माओ के घुड़सवारों ने पत्तियों के बने टोप पहन रखे थे और छोटे-छोटे खच्चरों पर बैठकर जा रहे थे जैसे प्रागैतिहासिक काल के कन्दरा मनुष्य के दिनों की याद दिला रहे हो। इस सेना ने शांक्षी में तीन कम्यूनिस्ट आर्मी से मुलाकात की, जिसकी बागडोर माओ ने संभाली। केवल बीस हजार आदमी बचे हुए थे। लगभग सारी औरतें मर चुकी थीं और बच्चों को रास्ते के दोनों किनारों पर छोड़ दिया गया था। माओ की कविता ''द लॉन्ग मार्च '' में इस दर्द को सहने की अदम्य शक्ति को आसानी से देखा जा सकता है।"

 

                            'लॉन्ग मार्च'

रेड आर्मी को मार्च के खतरों का डर नहीं

लॉन्ग मार्च

दस हजार सागर और हजार पहाड़ तो कुछ भी नहीं

पाँच पर्वतमालाएँ छोटी तरंगों की तरह सर्पिल-सी

वुमेंग की चोटियाँ मैदानों में मिलती

चिकनी मिट्टी की गेंदों की तरह

बादलों के नीचे ऊष्ण टीले

नीचे नदी द्वारा अपवाहित होती

स्वर्ण बालुका

लोहे की सांकल एकदम ठंडी

दादू नदी पर पहुँचते-पहुँचते

मिनशन के दूरस्थ बर्फ केवल मन बहलाता

और जब सेना आगे बढ़ती

हम सब हँसते जाते। (अक्टूबर 1935)

 

माओ-त्से-तुंग की ऐसी ही कुछ कविताएं उद्भ्रांतजी द्वारा संपादित पुस्तक "लघु पत्रिका आंदोलन और युवा की भूमिका" में श्री कृष्ण कुमार त्रिवेदी "कोमल" द्वारा अनूदित 'शैलमाल की तीन कविताएं' शीर्षक नाम से प्रकाशित हुई थी। इन कविताओं को माओ-त्से-तुंग ने 1935 में अपने विख्यात लाँग मार्च के दौरान लिखीं थीं। पहली कविता में ‘शैलमाल’ को संबोधित करते माओ के कवि ने एक अद्वितीय साहस की भावना को प्राकृतिक साँचे में ढाला है। दूसरी कविता में अश्वगति के साथ समरभूमि में जूझने का संकेत है और तीसरी में पर्वतों की गगनचुंबी स्थिति का चित्र प्रस्तुत किया गया है।

 

(1)

औ शैलमाल !

मैं द्रुतगामी तुरंग की काठी पार

अविचल बैठा,

चाबुक मारा

पर शीश उठा देखा –

तो मैं रह गया चकित

बस मात्र तीन फुट तीन

रहा है मेरे ऊपर गगन अमित।

 

(2)

ओ शैलमाल !

महती तरंग सम तुम –

मानो झंझावाती वारिधि में

ऐसे उमड़ रहे

जैसे तुरंग हों शत सहस्त्र

अपनी गति में आगे-आगे

जो आज महासमराग्नि मध्य

पूरी सरपट में दौड़ रहे।

 

(3)

अऔ शैलमाल !

कुछ पीछे मुड़े

आकुंठित तेरे शिखर कोण

ऐसे हैं

जैसे नील गगन को बेध रहे

ऐसा लगता जैसे मानो

गिर पड़े धरा पर गगन आज

यदि संबल मात्र तुम्हारा

उसको नहीं मिले ।

 

शांक्षी उत्तर चीन का रेगिस्तानी इलाका है, जहां लाल सेनाएं अपनी शक्ति बढ़ा सकती हैं। जब अकाल पड़ा, माओ ने अपनी सेना को किसानों के साथ मिलकर खेती-बाड़ी करने के लिए भेज दिया। माओ हमेशा साधारण कपड़े पहनता था। बाओ'ऑन में वह सिटी के बाहर गुफा में सोता था। लगातार कई रात बिना सोए यान'अन में उसने अपने पाँच आलेख लिखे:- 'ऑन ए प्रोलोंगड़ वार' 'द न्यू डेमोक्रेसी', 'द स्ट्रेटेजिक प्रोब्लम ऑफ चाइना',' द रिवोल्यूश्नरी वार' द चाइनीज रिवोल्यूशन एंड कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना' और 'कोलिशन गवरमेंट'।

 

सन 1936 में रेड तथा गुओमिंदंग की सेनाओं में आपसी समझौता हुआ और दोनों ने मिलकर जापानी सेना के खिलाफ लड़ने का निर्णय लिया। अगस्त 1945 में जापानियों के समर्पण के बाद युद्ध विराम की घोषणा हुई। शक्ति-निर्वात कई तरीकों से भरा जाने लगा। रूसी सेना मंचूरिया में थी और स्टालिन चीनी कामरेडों से सेना हटाने का आह्वान कर रहे थे और कोलिशन गवरमेंट के निर्माण की सिफ़ारिश भी। इसी दौरान अमेरिका ने अपने राजदूत पी॰जे॰ हुर्ले को यान'अन और चोंगकिंग भेजा, जिसने माओ को सारी दुश्मनी भुलाकर नए सिरे से देश के विकास में नियुक्त करने के लिए प्रेरित किया। उसी दौरान उन्होंने अपनी एक कविता 'स्नो अर्थात बर्फ' लिखी, जो उनकी सर्वश्रेष्ठ कविता थी।

 

बर्फ

उत्तर भूमि का एक दृश्य

हजारों किलोमीटर बर्फ से ढका

लाखों किलोमीटर बहता बर्फ

लंबी दीवार से मैंने अपने भीतर और परे झाँका

केवल विशाल टुंड्रा दिखाई दिया

पीली नदी के ऊपर-नीचे

कलरव करता पानी जमा हुआ

सफ़ेद साँपो की तरह नाचते पहाड़

मोम से बने चमकीले हाथियों की तरह सरपट दौड़ते पहाड़

आकाश में चढ़ते

सूर्य-रश्मियों के दिन

सफ़ेद वस्त्र परिधान पहने हमें चिढ़ाता कि

नदी और पर्वत सुंदर है

और हीरो को झुकाकर लड़की पकड़ने की प्रतिस्पर्था में

प्यारी धरती

अभी भी शासक शिहुयांग और वुड़ी तो

लिखना तक नहीं जानते

टंग और संग साम्राज्य के पहले शासक

निर्दयी थे

गेंगीज खान ,युगीन आदमी

स्वर्ग द्वारा अनुशंसित

केबल बड़े बाजों का शिकार करना जानता है

वे सब चले गए

अब केवल हम संवेदनशील इंसान बचे है। (फरवरी 1936)

 

इस कविता के बारे में माओ ने एक साल बाद रॉबर्ट पायने को बताया था।

 

"मैंने ये कविता हवाई जहाज में लिखी। पहली बार मैं हवाई जहाज में बैठा था। ऊपर से मैं अपने देश की सुंदरता को देख कर मंत्र-मुग्ध हो रहा था और कुछ अन्य बातें भी थी।"

''वे अन्य बातें क्या थीं?''

"बहुत सारी बातें। तुम्हें याद होगा वह कविता कब लिखी गई थी। जब मुझे ऊपर से हवा में बहुत सारी आशा दिखाई थी।''

एक ही पल बाद फिर उसने कहा- "मेरी कविताएँ पूरी तरह स्टूपिड है, इसे तुम गंभीरता से न लो।''

माओ वहाँ डेढ़ महीने रहा। राजनैतिक आदान-प्रदान,गुडविल के टेलीग्राम और यहां तक कि पार्टियां चलती रही।

      1 अक्टूबर  1949 माओ जेडोंग,ज्हू डे और झाऊ एनलाई के साथ ''गेटवे ऑफ हेवनली पीस'' की बालकोनी से लाखो लोगों की भीड़ के सामने नजर आए, उस महल में जहां से चीन के शासक राज किया करते थे। साधारण कपड़े पहने और टोपी पहन कर "पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना" की स्थापना की घोषणा की।

 

माओ की कविताओं पर मेरी नजर ;-

चीनी कविताओं में बिम्ब स्पष्ट होते हैं। जब माओ या कोई भी क्लासिकल कवि प्रकृति की ओर देखता है तो वह उसकी सुंदरता को अपने भीतर अनुभव करता है, न की कवि की छाया उसके मापदंड को घटा रही हो। उनकी कविताओं में जिस पात्र पर लिखा जाता है, उसकी लगभग सारी चीजों की प्रत्यक्ष छबि उभरकर सामने आती है, भले ही कवि के कविता का क्षेत्र इतिहास,मिथक, व्यक्तिगत स्मृतियाँ अथवा स्वर्गिक आवेग-उद्वेग क्यों न हो। स्पष्टता उनकी कविताओं का प्रमुख गुण है। रात की कविता अथवा निराशावादिता या कड़वाहट के मार्ग को पूरी तरह विचार, संवेदना अथवा ऑब्जेक्ट के रूप में प्रस्तुत करती हैं। शायद पश्चिम की तुलना में पूर्व में कविताएं लिखना ज्यादा स्वाभाविक तथा सामान्य काम हैं। पश्चिम में पोस्ट रोमांटिक कविताएं लिखने का विशेष प्रचलन है। जॉर्ज सेफेरिस, वैलेस स्टीवेन या विलियम कार्लोस विलियम डिप्लोमेट इन्श्योरेंस एक्सिक्यूटिव या डाक्टर सब हमें अचंभित करते हैं।

यह भी कहा जा सकता है, चीन के शासकों की तरह जापान का शासक भी कवि हो सकता है और टोजो को फांसी पर लटकाने में पूर्व जेल के प्रकोष्ठ में कविता लिखना स्वाभाविक हो सकता है। चीन में रिपब्लिक की स्थापना से पूर्व सभी सिविल सर्वेण्टों में शुरू कविता लिखने,पढ़ने और समझने का सामर्थ्य होना जरूरी था। माओ बहुत बड़ा मौलिक कवि था, जो अपने तरीके से लिखता था। वह जीवन भर लिखता रहा, मगर बहुत कम कविताएं प्रकाशन के लिए भेजी। माओ ने बहुत सारी कविताओं की रचना गुफा में रहकर भटकते समय की, दिन-रात बिना रुके। वह जानता था कि कुछ चीजें कविताओं से भी बढ़कर होती हैं और उनके इसी दृष्टिकोण में उनकी कविताओं की मौलिकता, विश्वसनीयता और ऊर्जा को बनाए रखा। उनका पहला कविता-संग्रह प्रकाशित होने के समय उनकी उम्र पैंसठ साल थी। भगवान अपने कवियों  की छबि बनाने में विशेष मददगार होते हैं। औपचारिक तौर पर माओ चीनी गानों में दो प्रकार के क्लासिकल पैटर्न प्रयोग करते हैं। उन्हें 'ट्रेडिशनल पोयट' माना जाता है। वह इस चीज को स्वीकार भी करते हैं कि वह पुरानी शैली  में अपना लेखन कार्य करते है। शुरूआती कविताओं में माओ किसान सेना के प्रथम युद्ध का जिक्र करते है। उनकी कविताएं किसी महाकाव्य के गीतिबद्ध अंश हैं। पहाड़ पर चढ़ने, बीमारी के देवता को परास्त करने तथा लॉन्ग मार्च में बच जाना उनके विजय को दर्शाता है।

 

बीमारी के देवता को अलविदा कहना

विशाल जल और हरे-भरे पहाड़ कुछ भी नहीं

जब महान प्राचीन डॉक्टर हुआटुआ

एक मामूली मच्छर को हरा न सका

हजारों गाँव चेपट में, खतपतवार में दबे

धनुष की तरह खोए हुए मनुष्य

कुछ निर्वासित घरों की दहलीज पर भूतों की महफिल

अभी एक दिन हमने पृथ्वी का चक्कर काटा

हजारों आकाश-गंगाओं की खोज की

सितारों पर वह गोपाल रहता

प्लेग के देवता से पूछता

उसे कहता खुशी या दुख से

ईश्वर चले गए

पानी में घुलकर

(जुलाई 1,1958)

 

प्रकृति जिनकी सुंदर है, उसकी कठोरता भी उतनी आकर्षक, जो कवि और उसके साथियों को प्रेरणा देती है। उनकी कविता 'लॉन्ग मार्च' में वही मधुरता है जो महाकाव्य "सिड" में है,जिसमें रोड्रिगो, एक गुमनाम नेता स्पेन की नदी और स्टेपीज को पार करते हुए सिविल वार और बाहरी आक्रमणों के भीतर देश की एकता की बात करते हैं। यद्यपि उनकी कविताओं में राष्ट्रीय घटनाओं की चेतना के स्वर मुखरित होते हैं, मगर लोक कविताओं की तरह कुछ भी कमजोरी नहीं है। 19 वीं सदी के मध्य से पूर्ववर्ती कवि पब्लिक और प्राइवेट दुनिया के बीच विभेद नहीं करते थे। आर्किलोकोस, डांटे, ब्लैक और शैले दोनों दुनिया में सक्षम थे। मगर 19 वीं सदी के अंत तक आर्थर सीमोन ने हमें चेताना शुरू कर दिया यह कह कर, ''कवि का समाज में और कोई काम नहीं बचा है सिवाय गृहस्थ जीवन के साधु-कामों के।'' यद्यपि अनेक साल बीत गए, अभी भी  हम सार्वजनिक गलियों तथा आत्माओं को मिलाने में असहज हैं। फिर हम अन्य कवियों जैसे यीट्स, राबर्ट लावेल,एंडरेई विजनेंसकी तथा क्ज़ेसलाव मिलोस्ज़ की बात करें तो सीधे राष्ट्र अपनी बात करते हैं, दो परिचयों के वियोजन के बजाय।

 

माओ की कविताओं में राजनैतिक अथवा ऐतिहासिक घटनाओं की अंतर्वस्तु मिलती है । राजनीति और साहित्य में जो संबंध देखने को मिलता है, वही संबंध धर्म और साहित्य में। किसी कवि की कलात्मकता को अगर राजनैतिक अथवा धार्मिक मान्यता मिल जाती है तो वह  कविता स्वतः विश्वसनीय हो जाती है। हम किसी भी कविता के 'मेटाफिजिक्स' को पूरी तरह नकार सकते हैं, पर अगर कोई कविता सफल हो तो शिखर पर पहुंचे उस कलाकार के काव्यमय अनुभव हमें क्षण भर के लिए ही सही माओवादी, कैथोलिकी, मिस्टिक, आदि अनुभूतियों की तरफ खींच ले जाता है। माओ अपनी खुशी का इजहार मिथकीय चरित्र ''तारे पर रहने वाले ग्वाले'' कविता के माध्यम से पाठकों के अवचेतन मन पर बीमारी के खत्म होने के उत्सव मनाने के लिए अपनी कविताओं में करते हैं।

स्पेनिश रहस्यवादी संत जान ऑफ क्रॉस (1542-1591) और गृहयुद्ध की अपनी कविताओं में एंटोनियो  मचाड़ो की तरह माओ कविता में उन कंक्रीट छबियों का प्रयोग करते हैं, जिसमें आधुनिक चीन की तस्वीर साफ झलकती है। 1949 के बाद उनकी कविताओं में ध्यान-धारणा की अंतर्वस्तु  मुख्य हो गई। लॉन्ग मार्च के मध्य में उनकी लिखी कविता 'कुनलुन माउंटेन' में माओ यूरोप, अमेरिका और चीन में शांति की कामना करते हैं और जब चीन में शांति आ गई तो वह अपने बचपन के दिनों तथा अपने स्वर्गीय दोस्तों को याद करने लगते हैं।

 

कुनलुन माउंटेन

धरती पर

नीले-हरे राक्षस कुनलुनों ने देखे

बसंत के सारे रंग और आदमी की उत्कंठा

सफ़ेद जेड पत्थर के तीस लाख ड्रेगन

सारा आकाश हिमाच्छादित

जब गर्मी में सूरज तपाता है पृथ्वी को

गर्मियों में बाढ़ आ जाती

मनुष्य मछ्ली और कछुए बन जाते

कौन आकलन कर सकता है

सफलता और विफलता के हजारों सालों को?

कुनलुन

तुम्हें उस ऊंचाई के बर्फ की जरूरत नहीं

अगर मैं स्वयं स्वर्ग पर झुक सका

तो अपनी तलवार से

तुम्हें तीन हिस्सों मे काट दूंगा

एक यूरोप भेजूँगा

एक अमेरिका को

और एक हिस्सा यहाँ

चीन में रखूँगा

ताकि दुनिया में शांति हो

और धरती पर सर्दी-गर्मी बराबर बनी रहे। (अक्टूबर 1935)

सन 1945 में अपनी कविता वरिष्ठ कवि लिउ याजी के सम्मानार्थ लिखी।

 

लिउ याजी के लिए कविता

कभी नहीं भूल सकता गौंग्ज्हौ में

कैसे हमने चाय पी

और चोंगकिंग में

कैसे कहानियाँ पढ़ी

जब पत्ते पीले पड़ रहे थे

उनतीस साल पहले और

अब फिर हम आए हैं

आखिरकर प्राचीन राजधानी बीजिंग में

पतझड़ की इस ऋतु में मैंने

तुम्हारे सुंदर कविताएँ पढ़ी

सावधान रहना भीतर से कहीं टूट न जाओ

अपनी आँखें खुली रखना दुनिया के सामने

कभी मत कहना कुंमिंग झील का

पानी बहुत छिछला है

जहां हम ज़्यादा अच्छी मछलियाँ देख सकते है

दक्षिण की फूंचुन नदी की तुलना में। (अप्रेल 1949)

 

बीजिंग में हण साम्राज्य के कवि यान कुयांग तथा कुछ साल बाद अपनी महिला मित्र ली शुई जिनका पति 1933 में गुओमिंदंग में लड़ाई के दौरान मारा गया था। उस कबिता में उनके पति की मृत्यु की तुलना,अपनी पत्नी यंग काइहुई जिसका जनरल जिआन ने 1930 में सिर काट दिया था,से की। ''द गोड्स'' की कविता में आश्चर्यजनक विनम्रता,स्वप्नदर्शिता और प्रसन्नता है। सीधे तौर पर यह भावुकता की अपील है, यद्यपि प्रत्येक खंड में प्राचीन मिथकों का वर्णन है।

       'मिथ एंड रियलिटी' आलेख में माओ मार्क्स का उदाहरण देते हुए लिखते हैं ''सारे मिथकीय चरित्र प्रकृति की शक्तियों को रूप प्रदान करते हैं और कल्पना में जल्दी ही विलुप्त हो जाते हैं, जैसे ही मनुष्य और प्राकृतिक शक्तियों पर विजय पा लेते हैं।''

 

यद्यपि माओ की ऐतिहासिक भूमिका कविताओं में मौलिक शक्ति और आंतरिक सौंदर्य को कम नहीं करती है। उनकी कविता की प्रत्येक पंक्ति में नैसर्गिक स्वाभाविकता है,हरे-भरे पहाड़ों तथा हिमाच्छादित स्थलों की उज्ज्वल छबि उकेरते हुए। उनकी कविताओं में दुख या निराशा नहीं है, मगर समय,मिथक और ऐतिहासिक दृष्टि-भ्रम की जटिलता अवश्य है। इस सदी के कुछ अच्छे कवियों की शृंखला में माओ का नाम सम्मान से लिया जाता है। उनकी कविताओं में रोबर्ट फ्रास्ट की तरह ही आभासी साधारणता झलकती है।

 

यान'अन में माओ ने कुछ दोस्तों के लिए सत्तर कविताओं का संग्रह 'विंड सेंड़ पोएम्स' शीर्षक के नाम से प्रकाशित किया, जिनमें घास के मैदानों के मार्चिंग के अनुभवों के आधार पर उनकी लंबी कविता 'द ग्रास' के बारे में लिखी ।

माओत्से तुंग की कविताएं लिट्रेरी रिव्यू (भाग.2) में सन 1958 में प्रकाशित हुआ, जिसमें पायने ने माओ की दो कविताओं का उदाहरण देते हुए लिखा था, "पार्टी की बोरिंग मीटिंग के दौरान वह हमेशा कविता लिखा करते थे और जब वह पूरी हो जाती थी तो उसे फर्श पर टॉस करके फेंक देते थे। अधिकतर उन्हें उठा लिया जाता था,मगर कविता की दृष्टि से कम सुरक्षित रखा जाता था। कुछ लेफ़्टिनेंटों में कैलिग्राफ की तुलना में कविता में बहुत कम रुचि होती थी। कोई भी उनकी कविता या कैलिग्राफी में सिल्क मुखौटे के पीछे छुपी डरावनी शक्ति का अहसास नहीं कर पाता था।"

 

इस सिल्क मुखौटे के पीछे छुपी डरावनी शक्ति का अहसास शायद हमारे प्रसिद्ध कवि डॉ॰ महेंद्रभटनागर को पहले ही हो चुका था, जब उसने "हिन्दी चीनी भाई-भाई" का नारा दिया था,मगर पीठ पीछे छुरा घोंपते एक पल भी नहीं लगा और उसके नेतृत्व में चीन ने भारत पर हमला किया था। क्या संवेदनशील कवि भी इतना क्रूर हो सकता है? या फिर एक क्रांतिकारी भी संवेदनशील कवि हो सकता है? कवि डॉ॰ महेंद्रभटनागर ने चीन की सरकार को इस हेतु एक पत्र भी लिखा था, जो 'संतरण' व 'जनयुग' में प्रकाशित हुआ था। इसी अंतर्वस्तु पर आधारित उन्होने एक कविता "माओ और चाऊ के नाम" के नाम लिखी थी, जो इस प्रकार से हैं :-

माओ और चाऊ के नाम

तुम्हारी मुक्ति पर

हमने मनाया था महोत्सव-

क्या इसलिए ?

तुम्हारे मत्त विजयोल्लास पर

बेरोक उमड़ा था

यहाँ भी हर्ष का सागर-

क्या इसलिए ?

नए इंसान के प्रतिरूप में हमने

तुम्हारा

बंधु-सम स्वागत किया था-

क्या इसलिए ?

 

कि तुम-

अचानक क्रूर बर्बर आक्रमण कर

हेय आदिम हिंस्र पशुता का प्रदर्शन कर,

हमारी भूमि पर

निर्लज्ज इरादों से

गलित साम्राज्यबादी भावना से

इस तरह अधिकार कर लोगे ?

युग-युग पुरानी मित्रता को भूल

कटु विश्वासघाती बन

मनुजता का हृदय से अंत कर दोगे ?

तुम

आंसुओं के शाह बन कर

मृत्यु के उपहार लाओगे ?

पूरब से उदित होकर

अंधेरे का, धुएँ का

भर सघन विस्तार लाओगे ?

साम्यवादी वेष धर

सम्पूर्ण दक्षिण एशिया पर स्वत्व चाहोगे ?

 

इतिहास को

तुमसे कभी ऐसी अपेक्षा थी नहीं

ऐसा करूँ साहाय्य

तुम दोगे उसे !

नव साम्यवादी लोक को-

तुमसे कभी ऐसी अपेक्षा थी नहीं

ऐसा दुखद अध्याय

तुम दोगे उसे!

बदलो,

अभी भी है समय ;

अपनी नीतियाँ बदलो !

अभी भी है समय

पारस्परिक व्यवहार की

अपनी घिनौनी रीतियाँ बदलो !

अन्यथा ;

संसार की जन-शक्ति

मिथ्या दर्प सारा तोड़ देगी !

आत्मघाती युद्ध के प्रेमी,

हठी ! बस लौट जाओ,

अन्यथा

मनु-सभ्यता

हिंसक तुम्हारा वार

तुम पर मोड देगी !

 

यह कविता पढ़कर आज भी मेरा मन असमंजस की स्थिति में है कि कोई विश्व-स्तरीय कवि क्या निर्मम व बर्बर प्रकृति का इंसान हो सकता है?और वह भी लाल सलाम वाला? इसका मतलब कवित्व का किसी इंसान की प्रकृति से कोई संबंध नहीं है? कवि डॉ॰ महेंद्रभटनागर ने अपने पत्र में उन्हें अपना आत्मवलोकन करने के लिए खूब ललकारा हैं। बड़े-बड़े आलोचक समय के सापेक्ष में इस प्रश्न की संदिग्धता अथवा सार्थकता पर कभी-न-कभी अवश्य विचार करेंगे।

(क्रमशः अगले अंक में जारी...)

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