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यात्रा संस्मरण - चीन में सात दिन - 4

- दिनेश कुमार माली

चीन में सात दिन

पिछले अध्याय से जारी...

तीसरा अध्याय: तीसरा दिन (22.08.14)

आज का हमारा प्रोग्राम था चीन की दीवार देखना और लौटते वक्त 'बर्ड नेस्ट' यानि ओलंपिक नेशनल स्टेडियम देखना था और शाम को काव्य-रचना पाठ टानसुन बिजनेस होटल के सभागार में। रात को लेट सोने की वजह से सुबह हमारी नींद नहीं खुली। जब नींद खुली तब तक तो हमारा दल टूरिस्ट बस में बैठ कर चीन की दीवार देखने जा चुका था। यहाँ भी वही सबक ,समय का ध्यान रखना चाहिए था। गलती हमारी थी,इतने थक चुके थे कि दो तीन बार अलार्म बजने के बाद भी सही समय पर उठ न सके।

डॉ चौरसिया ने कहा,"छोड़ देते हैं,चीन की दीवार नहीं देखते हैं।" मैंने कहा,"जब घर से इतना दूर आए है तो चीन की दीवार नहीं देखने का अर्थ है हमारा यहाँ आना व्यर्थ है।" मैने होटल के रिसेप्स्निस्ट से वहाँ जाने के बारे में अँग्रेजी में पूछा ,"वी वांट टू गो फॉर चाइना वॉल। "

उसे कुछ भी समझ में नहीं आया। उसने मेरे सामने अपना मोबाइल रखकर कहा,"राइट हियर।"

 

मैंने अपनी बात लिख दी। उसने उसे चाइनीज भाषा में बदल कर पढ़ा और फिर अपना रिप्लाई लिखकर उसे अँग्रेजी में बदल कर मेरे सामने कर दिया -- "गो आउट साइड, यू विल गेट ए टैक्सी फॉर चाइना वॉल। इट विल कॉस्ट अराउंड 600 टू 800 युआन। जर्नी ऑफ वन एंड हाफ अवर।"

 

लगभग आइडिया हो गया। 6000 से 8000 रु, डेढ़ घंटे की यात्रा। डेढ़ सौ से दो सौ किमी की यात्रा? बहुत महंगा हैं बीजिंग! आम आदमी तो सरवाइव नहीं कर पाएगा यहाँ। मगर हमें तो जाना ही था, अपने दल से मिलने। बाहर सड़क पर जितने भी इशारे करने के बाद भी कोई भी टैक्सी रोक नहीं रहा था और रोक भी रहा था तो वही संवादहीनता की स्थिति। कोई समझ नहीं पा रहा था हमारी बात। खैर, इस बार जब टैक्सी रुकी तो डॉ चौरसिया ने अँग्रेजी जानने वाली हमारी गाइड नीता को फोन लगा कर ड्राइवर को पकड़ा दिया और उसने अपनी भाषा में बात कर समझा दिया कि हमें चीन की दीवार देखने जाना है। वहाँ पर वह हमारा इंतजार करेगी। डेढ़ घंटे के भीतर टैक्सी वाले ने हमें अपने गंतव्य स्थान पर पहुंचा दिया। पहाड़ों पर दो हजार साल से ज्यादा पुरानी चीन की दीवार अपने भीतर कितने-कितने इतिहास छुपा खड़ी हैं! चार्ल्स डार्विन के सिद्धान्त की तरह किस-किस मनुष्य जाति के विकास को देखा होगा। कितने बर्बर रहे होंगे मंगोल जो चीन पर आक्रमण करते होंगे और कितने मेहनती रहे होंगे चीन के लोग जो अपनी रक्षा के लिए, अपने देश की रक्षा के लिए दुनिया के सात अचरजों में गिनी जाने वाली विराट चीन की दीवार का निर्माण करते होंगे! कुछ जगह तो सीढ़ियाँ एकदम स्टीप बनी हुई थी। कुछ लोग ऊपर चढ़ तो जरूर जाते थे, मगर उतरते समय बहुत परेशानी का अनुभव करते थे। सृजनगाथा डॉट कॉम की टीम कहीं पहाड़ों, कहीं दीवारों तो कहीं पास से गुजर रही सर्पिल सड़कों को अपनी पृष्ठभूमि बनाकर फोटो खींचवा रहे थे। नीना ने हमें बताया कि हम एक ग्रुप फोटो वाला लोकेशन मिस कर गए हैं। समय पर नहीं उठना ही इसकी मुख्य वजह थी। मगर यह याद कैसे छोड़ देते? हमने भी अकेले ही सही चीन की दीवार पर बनी एक बुकलेट में उन यादों को प्रोफेशनल फोटोग्राफर से कैद करवा दिया। मगर सबसे बड़ी क्षति अपने इस परिवार से बिछुडकर अलग-थलग फोटो खिंचवाना। रिचर्ड॰एम॰ निक्सन ने कहीं लिखा था," यह एक महान दीवार है। केवल महान लोग अपने बीते महान गौरव की याद में ही यह महान दीवार बना सकते हैं। ऐसी महान दीवार वाले महान लोगों का भविष्य निश्चित ही महान होगा।" निक्सन की भविष्यवाणी आज सत्य में बदलती नजर आ रही है। चीन एक विश्व शक्ति के रूप में उभर रहा है ,एक महान भविष्य के साथ।

 

"पीले समुद्र के शन्हैगुयन से गोबी के रेगिस्तान के जियायुगुयन दर्रे तक फैली हुई है चीन की दीवार । ईस्वी पूर्व पाँचवी सदी से काम प्रारम्भ हुआ और चलता रहा सोलहवीं सदी के अंत तक।" मैंने चीन की दीवार पर बनी बुकलेट को पढ़ते हुए कहा और पढ्ना जारी रखा,

"दस हजार ली की लंबी दीवार है यह। और एक ली का अर्थ लगभग 500 मीटर। मतलब यह हुआ 5000 किलोमीटर। आप कह सकते हो अहमदाबाद से हावड़ा और फिर हावड़ा से अहमदाबाद तक की दूरी। रियली ग्रेट! पहाड़ों पर इतनी लंबी दीवार सात मीटर चौड़ी और सात मीटर ऊंची ।पच्चीस हजार छावनियाँ भी बनी हुई हैं सैनिकों के रुकने के लिए।"

 

एक डेढ़ घंटे चीन की दीवार की महानता को अनुभव करने के बाद सदियों पुराने आयुध ,तलवार ,ढाल, विभिन्न राजसी वेशभूषाओं में अलग-अलग योद्धाओं के पोज में डॉ॰ सुधीर शर्मा, डॉ जे॰ आर॰ सोनी,डॉ मीनाक्षी जोशी, झिमली मैडम फोटो खींचवा रहे थे और हम बीच-बीच में उन भारतीय योद्धाओं में चीन के उन महान सैनिकों की आत्माओं का अनुसंधान कर रहे थे, जो कभी मींग साम्राज्य में मंगोलों के खिलाफ लड़ी होगी।

 

चीन की यात्रा के दौरान, जो यात्री इस महान दीवार पर नहीं चढ़ा, उसकी यात्रा अधूरी मानी जाती है। चीन की यह लंबी दीवार जितनी बड़ी है, उतनी ही पुरानी इसकी कहानी भी है। इस दीवार का मूल नाम है‘वान ली छांग छंग‘ जिसका शाब्दिक अर्थहै-चीन की महान दीवार। विश्व प्रसिद्ध इस चीनी दीवार का इतिहास ईसा से तकरीबन 300 वर्ष पूर्व शुरू होता है। उन दिनों उत्तरी क्षेत्र के खानाबदोश हूण कबीले चीन पर लगातार आक्रमण करते रहते थे। तत्कालीन सम्राट चीन शिहाड़ती ने उनसे देश की रक्षा के लिए उत्तरी भू-भाग पर विशाल दीवार बनाने का आदेश दिया। छह हजार किलोमीटर लंबी दीवार का निर्माण अनवरत डेढ़ हजार वर्षोतक चलता रहा। दीवार में कई जगह पर बुर्ज बनाए गए हैं। इस दीवार की चौड़ाई इतनी है कि इस पर पांच घोड़े एक साथ दौड़ सकते हैं। दीवार पर अनेक स्थानों पर संस्कृत भाषा में मंत्र खुदे हैं। पीकिंग से 80 किमी दूर चु-चुंग क्वान नामक स्थान पर दीवार के प्रवेश द्वार पर लोकपालों की जो चार मूर्तियां बनाई गई हैं उनमें भारतीय मूर्तिकला की झलक मिलती है। समझा जाता है कि इस दीवार के निर्माण में कुछ भारतीय मूर्तिकारों को भी शामिल किया गया था। इस दीवार का निर्माण विदेशी हमले से बचाव के लिए किया गया था लेकिन इसका इस्तेमाल सदियों तक परिवहन, माल व लंबी यात्राओं में होता रहा। हालांकि यह दीवार पूरी तरह सुरक्षित और अजेय नहीं रही। अनेक आक्रमणकारियों ने इसको ध्वस्त किया। सन् 1211 में चंगेज खां ने इस दीवार को तोड़कर चीन पर हमला किया। हाल ही में मंगोलिया ने इस दीवार को लगभग तीस किलोमीटर तक क्षतिग्रस्त किया। वैसे 1984 से एक गैर सरकारी फाउंडेशन इस दीवार के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग अर्जित कर रही है।


मन नहीं हो रहा था कि चीन की दीवार को छोडकर जाएँ। मगर गाइड जाने का इशारा करने लगी। फ़्रांज काफ्का ने अपनी पुस्तक '' ग्रेट वाल ऑफ चाइना'' में यह सिद्ध किया है कि दीवार इतनी विशाल थी कि बीजिंग में शासक के महल से कोई भी आदमी उसके समूचे साम्राज्य का अनुमान नहीं लगा सकता था। दीवार हजारों साल तक रहेगी, तब तक इन शासकों, साम्राज्य तथा वर्तमान समय का विस्तार बना रहेगा। चीन की दीवार पर एक कवि की कविता आपको आकर्षित किए बिना नहीं रहेगी:-

 

चीन की दीवार

देखने के बाद भी लगता है देखा नहीं

लगता है देखना रह गया

और मैं एक बार फिर उधर मूडता हूँ

हर अजूबा चीज पहले निराश करती है

एक दीवार जो चलती जाती है घूमती

रास्ते की तरह

एक दीवार जी रास्ता है

एक दीवार जो कुछ बांधती नहीं

जो बस एक नक्शा है दीवार का

एक घर की तलाश

संसार के सात अजूबों में एक

कितना कम अजूबा है आज

जब इतनी अदृश्य दीवारें हैं चारों ओर हवा की दीवारें –

कितनी प्यारी है यह चीन की दीवार हाथी सी !

 

सही तो कहा गया है, यह चीन की महान दीवार चीन का सारा इतिहास समेटे बैठी है। इतनी महान और लंबी दीवार सारी दुनिया में नहीं है। यह दीवार पूरब से पश्चिम तक लगभग 2400 किलोमीटर है। इसे चीन का महान किला भी कहा जाता है, क्योंकि यह बाहर से आनेवाले हमलावरों को रोकने के लिए बनाई गयी थी। चीन में पूर्व ईस्वी वर्षों में पहले-पहल बहुत गड़बड़ रहती थी। चीन की रियासतें अलग से एक दूसरे से लडती-भिड़ती रहती थीं। 221 पूर्व ई. में चीन ने राज्य संभाला और तमाम रियासतों को इकट्ठा किया। उसने अपने आप को ''छिन-शी-हुआंग'' कहा, जिसका भाव था 'चीन का पहला बादशाह'। उसके नाम पर ही इस देश का नाम चीन पड़ा। यह बादशाह मौत से बहुत डरता था और इसलिए उसने हमलावरों से सुरक्षा के लिए बहुत बड़ी सेना तैयार की और साथ ही चीन की यह महान दीवार बनवानी शुरु की, क्योंकि हमलावर इस ओर से ही आते थे और लूट-मार करके लोगों को खाक कर जाते थे। किसी लेखक ने प्रश्न किया, ''क्या यह दीवार उसी के राज्य के समय में मुकम्मल हो गई थी?'' ''नहीं, इस दीवार का पहला ढांचा बन गया और बाद में पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह मुकम्मल होती रही। आरंभ से ही इस दीवार पर हजारों मनुष्य ने काम किया, क्योंकि इस दीवार की ऊंचाई तक पत्थर ले जाना बड़ा कठिन था,लेकिन इस दीवार की योजना शुरु में ही आयोजित कर ली गयी थी। दीवार के प्रत्येक 200 मीटर पर मीनार बनाए गए, जहां इसकी सुरक्षा के लिए सैनिक तैनात किए जाते और वहीं पर वे रहते। 'छिन-शी-हुआंग' की तो 210 ई. पूर्व में मृत्यु हो गई थी और उससे अगले राजाओं ने इस महान दीवार को बनाना जारी रखा। जो दीवार हम अब देखते हैं, वह इस रूप में चौदहवीं से सोलहवीं शताब्दी तक बन गयी थी। तब मींग राजाओं का समय था और यह दीवार 6000 किलोमीटर तक लंबी हो गई। यह दीवार 10 मीटर ऊंची है और इतनी चौड़ी है कि दस आदमी एक साथ इकट्ठे इसके ऊपर मार्च कर सकते हैं।''

 

मैंने नीना से पूछा। ''सुना है इस दीवार के साथ कई कहानियाँ और मिथक भी जुड़े हुए हैं ?''

उसने बताया, ''हाँ,समय-समय पर इस दीवार के साथ कई कहानियाँ जुड़ती रही हैं। राजा 'छिन-शी-हुआंग' ने इस दीवार के खर्च के लिए लोगों पर भारी कर लगाए थे। जो कर नहीं देता था उसको यहाँ बेगार के लिए भेजा जाता था। एक कहानी है कि 'एक बार इस राजा ने एक नई जीती रियासत के राजकुमार को इस दीवार पर काम करने के लिए भेजा। उसकी यहाँ मौत हो गई। उसकी राजकुमारी पत्नी को एक रूह 'आत्मा' ने कहा कि तू अपनी उंगली काट ले और वह कटी अंगुली हाथ में पकड़ ले, जहां जहां खून की बूंदें गिरें, तुमम उधर-उधर चलती जाना, इस प्रकार तुम अपने पति के पास पहुंच जाओगी। उसने ऐसा ही किया और अपने पति के पास पहुँच गई।'ऐसी बहुत-सी कहानियाँ और मिथक प्रसिद्ध हैं, जो इस दीवार के साथ जुडे हुए हैं।"

मिस्टर निओ और जो ने हमे बताया की 'बीजिंग ओपेरा के कलाकारों को बहुत भारी मात्रा में तनख़ाह दी जाती है, जैसे की जितनी किसी अफसर को मिलती है, उससे पाँच गुणा ज्यादा इन कलाकारों को मिलती है तथा युबक कलाकारों को बिशेस तोर पर ओपेरा में काम करने के लिए शामिल किया जाता है। समय के साथ ओपेरे बहुत स्वाभाबिक हो गए हैं, परंतु पहले लड़के-लड़कों के साथ ही नृत्य करते थे तथा लड़कियां लड़कियों के साथ भी। यदि व किसी अपेरे में इकट्ठे होते भी तो उनको एक दूसरे की शरीर से उचित दूरी पर रहना पड़ता था, लेकिन अब ऐसी कोई रुकावट नहीं है। इसीलिए बीजिंग ओपरा बहुत स्वभाबिक और व्बिकसित हो गया है। उन्होने यह भी बताया की, ''अब जो ओपरे खोले जाते हैं, उनके लिए कई स्क्रिप्ट भी सामने आई है, चाहे चीन के दर्शक अभी भी पारंपरिक प्राचीन ऑपरों को ही ज़्यादा पसंद करते है, परंतु उनमे भी अब नई पीढ़ी के प्रवेश करने से बहुत कुछ बदल गया है, जिस पर नए मीडिया का प्रभाव है।'' उन्होने यह भी बताया की, चीनी लोग सिनेमा तथा आँय नाटकों की बजाए ओपरा देखना अधिक पसंद करते हैं। इसलिए आप यहाँ इतनी भीड़ देख रहे हैं।''

 

लौटते समय रास्ते में लांजी जेड शॉप पड़ी, जेड पत्थर पर की गई पेंटिंग और सूक्ष्म नक्काशी अपने आप में अद्भुत थी। देखने में मन कम था, कारण पेट में चूहे भी कूदने लगे थे। दूकानों के शानदार काम्प्लेक्स को पार करते हुए सामने आया एक बहुत बड़ा रेस्टोरेन्ट। जहां खाने में मिलती थी केवल उबली सब्जियाँ ,सलाद और थोड़े-से फ्राइड राइस। राउंड टेबल पर चकरीनुमा प्लेट पर सब खाना एक साथ सजा दिया जाता था,जिसे घुमा-घुमाकर अपनी इच्छानुसार खाने के लिए आप अपने बर्तनों में खाना ले सकते थे। भोजन बहुत ही स्वादिष्ट व लुभावना था।

लंच लेने के बाद बस में बाहर की तरफ से ओलंपिक नेशनल स्टेडियम दिखाया गया, जिसे आजकल कामर्शियल साइट में बदल दिया गया है। उसकी स्थापत्य कला व डिजाइन तो इतनी मनमोहक थी कि दूर से एक गूँथे हुए घोंसले की तरह नजर आ रहा था वह स्टेडियम। इसलिए तो उसे "बर्ड नेस्ट" के नाम से जाना जाता है। कुछ लोग बस से उतरकर स्टेडियम के अंदर चले गए , तो कुछ लोग बस के भीतर बैठे रहे। उद्भ्रांतजी,डॉ खगेन्द्र ठाकुर,डॉ जयप्रकाश मानस, असंगघोष और मैं बस के अंदर साहित्यिक गपशप करने लगे। बात शुरू हुई थी,"अभी तक हिन्दी का 'की-बोर्ड' क्यों नहीं है ?" असंगघोष के सवाल से।

 

" अभी भी हमें अँग्रेजी 'की-बोर्ड' का सहारा लेना पड़ता है कंप्यूटर पर टाइप करने में।" अपने सवाल को दूसरे ढंग से प्रस्तुत किया असंगघोष ने इस बार।

किसी ने कुछ उत्तर नहीं दिया। शायद हमारी सरकारी नीतियाँ ही कुछ ऐसी है। मेरा भ्रम भी टूट गया था चीन को देखकर, किसी भी देश का विकास का आधार अँग्रेजी नहीं हो सकती। जबकि हमारे यहाँ सारे मेडिकल, इंजीनीयरिंग या दूसरे सारे प्रोफेशनल कोर्स ही क्यों न हो, सभी का आधार अँग्रेजी भाषा है। कौनसी तकनीकी नहीं सीखी चीन ने अपनी मेंडरिन भाषा के बलबूते पर दुनिया की? देश तो दौड़ रहा है विश्व के नक्शे पर। कहीं तो कोई भाषा की वैशाखी नहीं है। मगर विपर्यय है हमारा देश, भाषा के मामले में। कभी मुझे मेरी कंपनी महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड में राजभाषा विभाग का अतिरिक्त दायित्व मिला था, इसलिए मुझे राजभाषा अधिनियम 1963 की कुछ धाराओं की जानकारी थी। जिसके मुताबिक किसी भी पब्लिक सेक्टर, सरकारी विभाग या कंपनी में त्रिभाषा फॉर्मूला के अनुरूप सबसे पहले स्थानीय भाषा,फिर राजभाषा (हिन्दी) और उसके बाद अँग्रेजी लिखने का प्रावधान है। चीन में तो मैंने देखा सबसे पहले मेंडरिन भाषा और उसके नीचे अगर जरूरत पड़ी,तो अँग्रेजी या अन्य भाषाओं का प्रयोग होता है। मगर दिल्ली में जहां अधिनियम जन्म लेते है, उसी के इन्दिरा गांधी अंतर-राष्ट्रीय हवाई अड्डे के भीतर प्रवेश कर इधर-उधर नामपट्टों को अगर देखेंगे तो आपको मिलेगी पहले अँग्रेजी,फिर हिन्दी। उदाहरण के तौर पर नामपट्ट पर पहले "smoking chamber" और उसके नीचे "धूम्रकक्ष"। अब आप ही कह सकते है कि भारत सरकार का उपक्रम -एयर पोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया- स्वयं न्यायपालिका दिल्ली में अपने बने हुए नियमों -अधिनियमों का सरासर उल्लंघन कर रहा है। क्या वहाँ राजभाषा अधिकारी काम नहीं करते? क्या भारत सरकार के गृह मंत्रालय का राजभाषा विभाग दिल्ली में नहीं है? क्या उनके अधिकारी या राजनेता इस हवाई अड्डे का इस्तेमाल नहीं करते ? क्या आज तक भारत के किसी जागरूक नागरिक या हिन्दी का उन्नयन करने वाली संस्थाओं ने अपने लेटर-पेड़ का प्रयोग करते हुए सरकार के ध्यान में यह बात लाने का प्रयास किया? अनेकानेक सवाल मेरे जेहन में उठ रहे थे।

 

तभी बस में आगे की सीट पर बैठे डॉ॰ खगेन्द्र ठाकुर के उठकर पीछे की ओर आने पर कदमों की आवाज सुनकर मेरा ध्यान भंग हुआ। शायद वह हमारी बातों को ध्यानपूर्वक सुन रहे थे। आकर कहने लगे , " देखिए, आप लोग अँग्रेजी के "की-बोर्ड" की बात कर रहे थे। मैं भी कभी संसदीय राजभाषा समिति का सदस्य रहा हूँ। मैंने भी कई दफ्तरों में राजभाषा के कार्यान्वयन की गतिविधियों का निरीक्षण किया है। हमारे जमाने में कंप्यूटर नहीं था। टाइपराइटर थे। उस जमाने में हिन्दी के टाइपराइटर नहीं थे। मुझे नाम याद नहीं आ रहा है, मेरे एक मित्र ने खुद टाइपराइटर बनाकर राजभाषा विभाग के डायरेक्टर को दिखा दिया। इस मॉडल को बाद में मान्यता मिल गई। कहने का अर्थ , 'जहां चाह ,वहाँ राह'। जब हमारे मन में कोई इच्छा ही नहीं है तब कौन क्या कर सकता है? जब अँग्रेजी में 'की-बोर्ड' बन सकता है, मेंडरिन में बन सकता है, दुनिया की अन्य भाषाओं में बन सकता है, तो फिर हिन्दी में क्यों नहीं ....?"

उन्होंने एक बहुत बड़ा सवाल हमारी तरफ उछाल दिया। "हिन्दी में क्यों नहीं ?"

 

सभी निरुत्तर थे। कुछ समय के लिए मानो 'पिनड्रॉप-साइलेंस" हो गया हो। तभी असंगघोष ने विषयांतर किया। वह कहने लगे,"मैं कृतिदेव फन्ट में टाइप करता हूँ। टाइपिंग के दौरान मुझे संयुक्ताक्षर लिखने में बहुत परेशानी होती है।"

मुझे याद हो आया कि इंडियन लेंगवेज़ डेवलपमेंट सेंटर ने आधुनिक कंप्यूटर टंकण में हिन्दी भाषा के मानकीकरण के साथ-साथ सरलीकरण के कई सार्थक प्रयास किए हैं। अभी तो हिन्दी में यूनिकोड या श्रुतिलेखन का प्रचलन भी हो आया है। मैं डॉ॰ जयप्रकाश मानस की तरफ देखने लगा, उनका उत्तर सुनने के लिए। वह छतीसगढ़ सरकार में कई सालों से शिक्षा विभाग से जुड़े हैं, वेब-पत्रिका सृजनगाथा के संपादक हैं और वेब-डिजाइनिंग में दक्ष हैं। मेरा उनकी तरफ देखना स्वाभाविक था। वह कहने लगे,"असंगघोष दादा, रेमिंग्टन में कुछ प्रोविज़न है,जिससे संयुक्ताक्षर आसानी से लिखे जा सकते हैं। हमारे जमाने में कक्षा एक से पाँचवीं तक की पढ़ाई हिन्दी में होती थी, मगर आजकल तो पहली कक्षा से अँग्रेजी चलती है। फिर भी प्रसन्नता की बात है कि छतीसगढ़ सरकार प्रयास कर रही है प्रोफेशनल कोर्सों को हिन्दी में करने का। आजकल तो कोर्ट-कचहरियों के फैसले भी हिन्दी में आना शुरू हो गए है। चाहने से, वह दिन दूर नहीं है, जब हिन्दी विश्व की सिरमौर भाषा बन सकती है।"

 

उद्भ्रांतजी कुछ भी टिप्पणी नहीं कर रहे थे।कंप्यूटर से अभी तक खास मित्रता नहीं हुई होगी शायद ।

टंकण संबन्धित समस्याओं के निराकरण के लिए हो रहे नई तकनीकी विकास के बारे में बात करते हुए मैंने कहा,"पुणे की संस्था सी-डेक ने एक ऐसा टूल बनाया है,जो बोलने पर टाइप करता है। उसका नाम है श्रुतिलेखन सॉफ्टवेयर। स्पीच टू टेक्स्ट। ज्यादा कीमत नहीं है। मैंने खरीदा दो साल पहले, छ हजार रुपए में। मैं तो अधिकतर टंकण कार्य इसी पर करता हूँ।"

बातों का रुख हिन्दी साहित्य से मुड़कर तकनीकी की ओर जा रहा था। कभी मैंने नाल्को के राजभाषा अधिकारी हरिराम पंसारी से श्रुतिलेखन सॉफ्टवेयर की थ्योरी के बारे में जानना चाहा था। उनके अनुसार सारी ध्वनियों को रिकॉर्ड कर फन्ट डिजाइन किए गए हैं। कई वैदिक ध्वनियाँ तो लुप्तप्राय हो गई हैं। प्रयोग में आने वाली ध्वनियों की एक निश्चित आवृति (फ्रेक्वेन्सी)होती है,उसी के आधार पर वॉइस रिकोग्नाइज़ करता है कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर की मदद से उसे बदल देते है टंकण में। भाषा-विज्ञान का बारीक पहलू था यह!

 

धीरे-धीरे हमारी टीम के सदस्य बस में चढ़ने लगे। जो स्टेडियम में ज्यादा सीढ़ियाँ चढ़े थे, उनकी साँसे फूल रही थीं।सभी के चढ़ते ही बस ने हॉर्न दिया और चल पड़ी होटल की ओर ,जहां अंतर-राष्ट्रीय रचना पाठ शुरू होने जा रहा था 

 

लगभग सात बज रहे थे। अंतर-राष्ट्रीय रचना पाठ के अंतर्गत कथा,लघुकथा,गीत, ग़ज़ल,कविता,सभी रखे गए थे। इसकी अध्यक्षता जबलपुर के वरिष्ठ कवि असंगघोष ने की, जिसमें मुख्य अतिथि श्री लोकबाबू तथा विशिष्ट अतिथि कृष्ण नागपाल व सुदर्शन पटनायक थे। कविता पाठ में जय प्रकाश मानस की मर्मस्पर्शी कविता ‘एक मदारी भूखा प्यासा नाचे बंदर ....’ तथा उनके ही मधुर स्वर में असंगघोष की कविता ‘अरे ओ कनखजूरे !.....’ ने सारे श्रोताओं की वाहवाही लूटी। अन्य कविताओं में सारांश शुक्ल की ‘हिन्दी है अभिमान हमारा’, राकेश पाण्डेय की ‘नोट से निकलो गांधी', डॉ सुधीर शर्मा की 'घड़ी', उद्भ्रांत की 'अधेड़ होती औरत', सीताकान्त महापात्र व रमाकान्त रथ की दिनेश कुमार माली द्वारा अनूदित कविता ‘ओड़िशा’, गिरीश पंकज की ‘माँ’, डॉ. खगेन्द्र ठाकुर की ‘काला हूँ मैं’, राजेश श्रीवास्तव की ‘चिड़िया’ रवीन्द्र उपाध्याय की ‘मन’’ के साथ-साथ डॉ रंजना अरगड़े, महेशचन्द्र द्विवेदी, सुदर्शन पटनायक धीरेन्द्र शुक्ल की कविताओं ने उपस्थित सभी साहित्य प्रेमियों को भावों के कई आयामों से जोड़ा । इसके अलावा झिमली पटनायक का ''जगन्नाथ संस्कृति का महत्त्व', डॉ चौरसिया का ‘लक्ष्मण द्वारा रावण की बेटी का हरण’, मथुरा कलौनी का नाटयांश ‘तू नहीं और सही’ तथा कहानी पाठ में डॉ. राजेश श्रीवास्तव की ‘इच्छाधारी लड़की’, लोकबाबू की कहानी ‘जश्न’और श्रीमती नीरजा द्विवेदी की अपनी कहानी का पाठ किया। सत्र का संचालन शायर मुमताज़ ने किया। अंत में हिंदी सम्मेलन को सफल बनाने के लिए सभी प्रतिभागियों को गुरु घासीदास साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, छत्तीसगढ़ की ओर से प्रशस्ति-पत्र व स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया गया ।

 

(क्रमशः अगले अंक में जारी...)

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