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एकविंशी शताब्दी समागता

 

इयम् एकविंशतिः शताब्दी

पश्य सखे! आगता भारते।।

 

श्वानो गच्छति कारयानके

मार्जारः पर्यङ्के शेते,

किन्तु निर्धनों मानवबालः

बुभुक्षितो रोदनं विधत्ते।

 

अचेतनाः पाषाणमूर्तयः

वखसज्जिताः सराजन्ते,

किन्तु दरिद्रो वृद्धोऽशक्तः

शीते वस्रं विना कम्पते।।

 

इयम् एकविंशतिः शताब्दी

पश्य सखे! आगता भारते।।

 

विद्यालयेषु भवनाऽभावात्

ग्रामे तरुच्छायासु बवालकाः,

प्रकृतिनिर्मिते वातावरणे

किं पठन्ति जानन्तु भवन्तः।

 

परस्परं ते कलहायन्ते

मुहुर्मुहुर् अपशब्दायन्ते,

किन्तु शिक्षकाश्चिन्तारहिता:

तरोरधस्तात् सुख शेरते।।

 

इयम् एकविंशतिः शताब्दी

पश्य सखे! आगता भारते।।

 

अतिवृष्टिभिः पीड़िता ग्रामाः

यदा जलौधे भृशं निमग्नाः,

जलप्रवाहे वहन्ति पशवः

अन्नाऽभावे रुदन्ति शिशवः

 

एतमेव जलप्रलयं ब्रहम

दुर्लभमिदं दृश्यमवगन्तुम्,

वायुयानमारुह्य प्रहृष्टः

नेता सपरिवारन् उड्डयते।।

 

इयम् एकविंशतिः शताब्दी

पश्य सखे! आगता भारते।।

 

क्वचिद् बाबरीमस्जिद काण्डम्

क्वचिद् अयोध्यामार्च - कीर्तनम्

सतीप्रथामण्डने भाषणमू

अस्मृश्यता - समर्थन - वचनम्।

 

समानताया अधिकारस्य

संविधान - भावना - नाशनम्

मन्दिरेषु हरिजनव्यक्तीनाम्

नैवाऽद्यापि प्रवेशस्तनुते।।

 

इयम् एकविंशतिः शताब्दी

पश्य सखे! आगता भारते।।

 

निर्वाचने न कोऽपि सज्जनः

प्रत्याशी भवितुमिह क्षमः,

चालयन्ति निर्वाचनकार्यम्

साहसिकास्तस्करा दस्यवः।

 

मतदाने केन्द्रेऽधिकारिणः

चाटुकारितामेव कुर्वते।

पराजितोऽपि येन प्रत्याशी

अन्तिमचरणे विजयं लभते।।

 

इयम् एकविंशतिः शताब्दी

पश्य सखे! आगता भारते।।

 

मुख्यमंत्रि - निर्वाचन - करणे

विधायकानां न त्वधिकारः

दिल्लीतः प्रेक्षका निशायाम्

आगच्छन्ति राजधानीषु।

 

प्रात: कश्चित् काष्ठोलूकः

त्वरितमेव शपथं गृहणीते,

लोकतन्त्रमेतत् सुनवीनम्

राजतन्त्रमुपहसति भारते।।

 

इयम् एकविंशतिः शताब्दी

पश्य सखे! आगता भारते।।

 

क्वचित् समक्षे बैंक - लुण्ठनम्

क्वचित् बलात् बालिकाऽपहरण्

क्वचिद् यौतकार्थ मध्याह्ने

गृहमध्ये नववधू- ज्वालनम्।

 

इतोऽधिकं का भवेद् विवक्षा?

दिनेऽप्यत्र नैवास्ति सुरक्षा,

नगरे नगरे मानव - हत्या

मत्कुण - वध - सादृश्यं भजते।।

 

इयम् एकविंशतिः शताब्दी

पश्य सखे! आगता भारते।।

 

क्य गन्तासि? कुत आयातः?

का ते जननी? कस्ते तातः?

सत्यं ब्रह्म जगन्मिथ्येति

वेदान्तम् अनुचिन्तय भ्रातः!।

 

वृथा रति नश्वरे शरीरे

भज गोविन्दम् इत्युपदिश्य,

रेलविभागो यत्र सहर्षम्

नित्यं मुक्तिपथं दर्शयते।।

 

इयम् एकविंशतिः शताब्दी

पश्य सखे! आगता भारते।।

 

आई इक्कीसवीं शताब्दी

 

भारत में आ रही साथियों

देखो इक्कीसवीं शताब्दी।।

 

कुत्ता चलता कार यान में

बिस्तर पर बिल्ली सोती है।

बेचारे गरीब की सन्तति

किन्तु भूख सहती रोती है।।

 

पत्थर की निर्जीव मूर्तियाँ

अच्छे- अच्छे वस्त्र पहनतीं।

किन्तु गरीबों की सन्ततियाँ

बिना वस्त्र के रहें काँपती।।

 

भारत में आ रही साथियों

देखो इक्कीसवीं शताब्दी।।

 

विद्यालय भी भवन-हीन हैं

चलते हैं वृक्षों के नीचे।

सभी जानते खुली जगह में

क्या पढ़ रहे हमारे बच्चे।।

 

बच्चों की टोलियाँ परस्पर

गाली देकर युद्ध ठानती।

किन्तु शिक्षकों की यह पीढ़ी

सोती है कुछ नहीं जानती।।

 

भारत में आ रही साथियों

देखो इक्कीसवीं शताब्दी।।

 

कभी बाढ़ से गाँव हमारे

सहसा जल निमग्न हो जाते।

बहते हैं पशु जल धारा में

बच्चे अन्न बिना चिल्लाते।।

 

यही बात तब किसी के लिये

सुन्दरता की छवि बन जाती।

बैठे वायुयान में उड़ते

नेता जी की दृष्टि लुभाती।।

 

भारत में आ रही साथियों

देखो इक्कीसवीं शताब्दी।।

 

कहीं बाबरी मस्जिद टूटी

कहीं अयोध्या-मार्च कीर्तन।

सती प्रथा मंडन में भाषण

छुआछूत का कहीं समर्थन।।

 

समता का अधिकार कहाँ है

संविधान भावना मिटा दी।

मन्दिर में हरिजन भक्तों पर

मनमानी से रोक लगा दी।।

 

भारत में आ रही साथियों

देखो इक्कीसवीं शताब्दी।।

 

निर्वाचन में कोई सज्जन

प्रत्याशी होता न यहाँ पर।

निर्वाचन का कार्य चलाते

चोर, लुटेरे, डाकू तस्कर।।

 

चाटुकारिता अधिकारी को

किंकर्तव्यविमूढ़ बनाती।

हुये पराजित प्रत्याशी को

अन्त समय में जीत दिलाती।।

 

भारत में आ रही साथियों

देखो इक्कीसवीं शताब्दी।।

 

मुख्य मंत्रियों के चुनाव भी

नहीं विधायक कर पाते हैं।

दिल्ली से जाते हैं प्रेक्षक

रातों रात बना जाते हैं।।

 

पता सबेरे चलता सबको

निर्वाचन की हुई मुनादी।

हंसता राजतंत्र कहता है

देखो लोकतंत्र आजादी।।

 

भारत में आ रही साथियों

देखो इक्कीसवीं शताब्दी।।

 

कहीं बैंक लुट रहा सामने

कहीं बालिका गयी भगाई।

कहीं दहेज नाम पर कोई

वधू नवेली गयी जलाई।।

 

क्या कहना है इसके आगे

कहीं सुरक्षा नजर न आती।

खटमल जैसी मानव हत्या

बुद्धि किसी की समझ न पाती।।  

 

भारत में आ रही साथियों

देखो इक्कीसवीं शताब्दी।।

 

जाना कहाँ-कहाँ से आये?

माता कौन पिता है कैसा?

ब्रह्म सत्य जग मिथ्या का

वेदान्त यही है सोचो ऐसा।।

 

वृथा प्रेम नश्वर शरीर से

भज गोविन्द कहो अब साथी।

रेल व्यवस्था इसीलिये ही

रोज मुक्ति का मार्ग दिखाती।।

 

भारत में आ रही साथियों

देखो इक्कीसवीं शताब्दी।।

 

(व्यंग्यार्थकौमुदी - डॉ. प्रशस्यमित्र शास्त्री  से साभार).

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