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लघुकथा - शरीफ़ लोग

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- प्रमोद दुबे

आईफोन की ट्रिंग ने बताया कि छ: बज चुके हैं. अतुल यूँ तो कई बार ऑफिस का समय ख़त्म होने के बाद भी काम करता था लेकिन आज उसका मन समय से घर जाने को था. उसने वर्ड डॉक्यूमेंट का सेव बटन दबाया और स्टार्ट से शटडाउन तक का सफ़र पूरा किया. टिफ़िन बॉक्स लैपटॉप बैग के एक खाने में और दुसरे में लैपटॉप डाला, बैग कंधे पर और हाथों में कार की चाबी लिए वह ऑफिस से निकल पड़ा अभी वह कार पार्किंग की ओर बढ़ा ही था कि मनोज ने आवाज दी “मैं भी आज तेरे साथ चलूँगा”.

मनोज सिन्हा उसका सहकर्मी और पडोसी था. कार का दरवाजा खोल अतुल मनोज के बैठने का इन्तजार करने लगा. “चलो एक घंटे का रास्ता थोड़ी आसानी से कट जायेगा वरना ऑफिस से घर तक एफ एम रेडियो से ही काम चलाना पड़ता”, वैसे रेडियो उसे अच्छा ही लगता था पर आर जे की बकबक से उसे बड़ी कोफ़्त होती थी. मनोज मस्त मौला था. मुहल्ले, ऑफिस और दुनिया की मजेदार खबरें उसकी जुबान पर तैरती रहतीं थीं. व्हाट्स एप आने के बाद तो उसका स्टॉक काफी बढ़ गया था. कार और मनोज दोनों एक साथ ही स्टार्ट हुये. “अरे पता है, आज फिर वर्मा और उसके बेटे की लड़ाई हुई. मामला पुलिस तक पहुँच गया है” मनोज बोल उठा. बात यहाँ पर मुहल्ले के वर्मा जी की हो रही थी. उनका इकलौता बेटा कई वर्षों के बाद अमेरिका से लौटा था और पुश्तैनी घर को बेच कर माँ-बाप को फ्लैट में शिफ्ट करना चाह रहा था. सारी तकरार इसी बात को लेकर थी.

वर्मा की चर्चा पुरी होते-होते कार मेन रोड पर कई किलोमीटर आ गई थी. मनोज कोई नयी बात शुरू ही करने वाला था कि अचानक बायीं ओर से एक मोटरसाईकिल सवार तेजी से रास्ता काट कर आगे निकला. वो तो अच्छा हुआ कि अतुल ने कार झटके से दायीं ओर काट ली वरना एक जोरदार टक्कर होती. मोटरसाईकिल सवार १५-१६ साल का किशोर था, पिछली सीट पर उसकी ही उम्र का उसका दोस्त बैठा था. दोनों ने मुड़कर अतुल की हड़बड़ाहट का मखौल उड़ाते हुये एक भद्दा इशारा किया और एक्सलेटर को पुरी तरह उमेठते हुये तेजी से आगे निकल गए. लड़कों की इस हरकत ने मनोज का चेहरा क्रोध से लाल कर दिया. “आज कल के पेरेंट्स को बच्चों की कोई परवाह ही नहीं, इतनी कम उम्र के नासमझ को मोटरसाईकिल खरीद दी है” मनोज ने अपनी भड़ास निकाली. अतुल कुछ बोल ही न पाया वह अभी तक उस पल के सदमे में ही था. दोनों दोस्त चुप थे, मनोज नई बात कहने से पहले माहौल को थोड़ा सामान्य होने का इन्तजार करने लगा.

एम जी रोड पर मुड़ते ही ट्राफिक धीमा हो गया था. सड़क पर एक तरफ छोटी सी भीड़ जमा थी. सारे वाहन भीड़ की बगल से निकल रहे थे. कई चालक गर्दन निकाले भीड़ के अंदर झाँकने की कोशिश करते धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे. अतुल ने भी झाँका. “अरे मनोज! वही लड़के गिरे- पड़े हैं” अतुल की आवाज में आश्चर्यभरा कौतुहल था. “बहुत खून सड़क पर गिरा है, लगता है काफी गहरी चोट आई है” यह कहते हुए अतुल ने भीड़ से जरा आगे बढ़ कर सड़क के किनारे गाड़ी खड़ी कर दी. जब तक मनोज कुछ कह पाता, अतुल तमाशबीनों की भीड़ तक पहुँच चुका था.

मनोज भी उसके पीछे लपका. वहां का दृश्य बड़ा ही दर्दनाक था, जो लड़का बाइक चला रहा था वह चित पड़ा था. सर के नीचे से खून रिस रहा था, पिछला सवार औंधे मुंह गिरा था. दोनों ही बेहोश थे. भीड़ खड़ी तमाशा देख रही थी. कोई पुलिस को खबर करने के लिए कह रहा था तो कोई एम्बुलेंस के आने को इंतजार कर रहा था. अतुल के मन में क्या चल रहा था मनोज को यह भांपते जरा भी देर नहीं लगी. अतुल ने भीड़ चीर कर आगे एक कदम बढ़ाया ही था कि मनोज ने उसे पीछे खींच लिया. “क्या करते हो हम शरीफ लोग हैं, पुलिस के मामले में क्यों पड़ना” मनोज बोल उठा. अतुल ने एक बार अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश तो जरूर की लेकिन अगले पल उसने हाथ ढीला छोड़ दिया, शायद उन लड़कों की थोड़ी ही देर पहले की करतूत याद आ गई. “अच्छा हुआ इन जैसों को ऐसा ही सबक मिलना चाहिए, तब ही सुधरेगें” अतुल बड़बड़ाया. पर अगले ही क्षण उसे इस बात का एहसास हुआ कि घायल की मदद करना भी उसका कर्तव्य है.

अभी वह इन विचारों की उधेड़बुन में किंकर्तव्यविमूढ़ बना हुआ ही था कि बाइक सवार ने कराहते हुए खून की उल्टी की. इस दृश्य ने अतुल की दुविधा पल भर में दूर कर दी और अतुल अपने आप को वह आगे बढ़ा और उस किशोर को कंधे से पकड़ कर उठाने लगा. मनोज भी उसका साथ देने लगा, भीड़ में से भी कई आ गए थे. सबने मिल कर दोनों को अतुल की कार में डाला और सदर अस्पताल की ओर बढ़ चले. अतुल मनोज की ओर देख कर मुस्कुरा दिया, मानो वह मन ही मन कह रहा हो “शरीफ लोग मुसीबत में गैर की भी मदद करते हैं”.

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प्रमोद दुबे

जमशेदपुर

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