आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

अपनी ही धुन में हैं सारे

  image

डॉ0 दीपक आचार्य

 

कहा तो जाता है कि सभी को धुन का पक्का होना चाहिए।

पता नहीं वे लोग कहाँ चले गए जो धुन के पक्के हुआ करते थे और वाणी के भी।

उस जमाने का भी अंत हो ही गया है जब लोग मन-वचन और कर्म के पक्के थे।

इनमें से कोई भी कानों का कच्चा नहीं होता था।

सब के सब पक्के और जगर्दस्त पक्के हुआ करते थे।

अब पक्के नहीं रहे, सब जब कच्चे ही कच्चे दिखने लगे हैं।

कोई कानों का कच्चा है, कोई लंगोट से लेकर कच्छे तक का कच्चा। 

हृदय की दीवारों से लेकर मस्तिष्क के तंतुओं तक, और नख से लेकर शिख तक कहीं न कहीं तानों-बानों में किसी खामी या विकृति के चलते कोई मानसिक कच्चा है, कोई शारीरिक कच्चेपन से ग्रस्त।

आजकल सारे के सारे कच्चों ने सच्चों को हाशिये पर ला खड़ा कर दिया है।

कुछ न कुछ पाने और पाते हुए जमा कर देने की दौड़-भाग में सारे भाग रहे हैं, कुछ को पता है कि कहां जा रहे हैं, कुछ को भनक तक नहीं कि कहां जा रहे हैं, किधर ले जाया जा रहा है और कौन है जो हाँकता हुआ कहीं न कहीं से ले जा रहा है।

बहुत सारे हैं जो भेड़ों की रेवड़ों को चिढ़ाते हुए किसी न किसी के पीछे अनुचरी परंपरा को धन्य करते हुए चलते ही चले जा रहे हैं।

कोई पंक्तियों में चल रहा है, कोई पंक्ति तोड़ कर उन्मुक्त विचरण करता हुआ भागा जा रहा है। खूब हैं जो अपनी ओर देख भी रहे दिखाई देते हैं, अपनी ओर आते भी दिखाई दे रहे हैं लेकिन पता नहीं उन्हें या तो हम दिख नहीं रहे या कोई दृष्टि विकार आ गया है।

गाँव-कस्बों और शहरों से लेकर महानगरों तक सभी जगह रेले के रेले दौड़ रहे हैं, पूछो तब भी न बताएं कि कहां जा रहे हैं, पूछने पर भी कुछ तो बताते हैं, कुछ को पता ही नहीं।

सब पर कोई न कोई धुन सवार है जो उन्हें अपने आप से भी दूर किए हुए है और जमाने भर से भी। बहुतेरे हैं जिनकी तरफ देखो, कुछ भी कहो, कुछ पता ही नहीं चलता कि हम क्या कह रहे हैं, वे सुन या देख भी रहें हैं या नहीं।

आजकल आदमी की स्थिति विचित्र हो गई है। वह न अपने आप में रहा है न अपने आपे में।

हर तरफ धुन सवार है और इसी धुन को सुनने में मस्त होकर धुनी आदमी अपने-अपने हिसाब से जाने कहाँ-कहाँ भाग रहे हैं।

आत्मा की धुन को सुनें, परंपराओं की धुनों पर थिरकें तभी आगे से आगे बढ़ते हुए तरक्की के सोपान पाए जा सकते हैं।

---000---

- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

टिप्पणियाँ

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.