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गुनगुनाएँ स्वतंत्रता के गीत

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डॉ. दीपक आचार्य

 

हर कोई स्वतंत्र होना और रहना चाहता है।

कोई ऎसा नहीं जो गुलाम बने रहना चाहता हो।

अधीनता कोई नहीं चाहता। लेकिन यह भी सच है कि अधीनता से मुक्त रहने वाले लोगों में बहुत सारे हैं जो खुद तो स्वतंत्र रहना चाहते हैं लेकिन दूसरों को अपने अधीन रखने में उन्हें मजा आता है।

स्वतंत्रता सभी चाहते हैं लेकिन कोई नहीं चाहता कि यह स्वतंत्रता औरों को मिले।

यही स्थिति जिम्मेदारियों की है। हर कोई चाहता है कि दूसरे लोग अपने-अपने कामों और फर्जों के प्रति जिम्मेदार रहें लेकिन हम मुक्त रहें, हमें कोई काम नहीं करना पड़े और सारा का सारा श्रेय हमें ही प्राप्त हो जाए।

स्वतंत्रता का मूल अर्थ जियों और जीने दो की भावना का परिचायक है और इसका उद्देश्य यह है कि हम किसी भी प्रकार की कृत्रिम सीमाओं में न बँधे, अपने मानसिक संकल्पों को पूरी मर्यादाओं के साथ निर्वाह करते रहें।

यह दायित्व निर्वाह भी इस प्रकार का हो कि हम स्वयं भी आनंद के साथ कर्म करते रहें और हमारे कर्मों से दूसरों को भी आनंद का दिली अहसास हो।

स्वतंत्रता का असली अर्थ यही है कि हर कोई अपने-अपने हिसाब से बेहतर कर्मयोग, समन्वयपूर्ण व्यवहार और लोक में आलोक प्रसार के प्रति उदारता और समर्पण भावना से भागीदारी निभाने में आगे आए और उसकी उपयोगिता का साफ ग्राफ सभी को दिखे भी, और अनुभवित भी हो।

स्वतंत्र या स्वतंत्रता शब्द जितना कहने में सरल और सपाट है उतना सटीक भी हो, यह जरूरी नहीं।

दूसरों की अधीनता या परतंत्रता से मुक्ति पा लेना ही स्वतंत्रता नहीं है बल्कि असली अर्थों में स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि हमारे मन-मस्तिष्क से विजातीय विचारों, कुसंस्कारों और नकारात्मक भावनाओं से मुक्ति पाना।

अपने आपके ईश्वरीय प्रतिनिधि होने का बोध जब तक इंसान में रहता है तभी तक वह स्वतंत्र बना रहता है क्योंकि तब उसे लगता है कि संसार पूरा ईश्वर का है और वह भी ईश्वर का ही है इसलिए जो द्रव्य, संसाधन और व्यक्ति जहाँ हैं भले वहीं रहें मगर हैं तो आखिर संसार और सांसारिकों के लिए ही, चाहे जब इनका उपयोग संभव है। इस लिहाज से जो स्थान और वस्तु सार्वजनीन रहती है वह सभी के उपयोग में आती रहती है और उसकी संरक्षा तथा रखरखाव सभी लोग अपनी और समुदाय की मानकर करते हैं, इसमें किसी का व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं होता, सभी लोग प्रकृति के सारे संसाधनों को अपना मानकर चलते हैं और उनका मिल-जुल कर उपयोग करते हैं। इस सद्भाव का कोई मूल्य नहीं होता। प्राकृतिक और उपलब्ध संसाधनों का सभी लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर आनंद के साथ उपयोग करें, साथ-साथ रहें, सामूहिक सोच और विकास की भावना से काम करें।

किसी को किसी दूसरे से किसी प्रकार का भय न हो, सभी लोग निर्भयतापूर्वक अपने देश में चाहे जहाँ भ्रमण का आनंद पा सकें, चाहे जहाँ काम-धंधा, रोजगार और लौकिक व्यवहार रख सकें और किसी के मन में शंका, ईष्र्या और द्वेष न हो।

वास्तविक स्वतंत्रता भौगोलिक, राजनैतिक और परिवेशीय दायरों में बँधी हुई नहीं है, वह आम आदमी के रोजमर्रा के उन सरोकारों से जुड़ी हुई है जो जीवन को सुकून और शांति प्रदान करते हैं और जिनसे प्रत्येक आदमी को स्वतंत्र होने का पूरा-पूरा बोध होता है। आईये इस स्वतंत्रता दिवस की वेला में स्वाधीनता के गीत गुनगुनायें और हम सभी अपने आपको स्वतंत्र महसूस ही नहीं करें बल्कि स्वतंत्रता का माहौल सब तरफ बनाएं।

 

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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