सोमवार, 10 अगस्त 2015

हड़ताल

हड़ताल

डॉ0 श्रीमती तारा सिंह

हड़ताल यानि सब काम-काज बंद, स्कूल बंद, कॉलेज बंद, फ़ैक्ट्री बंद अर्थात शहर को पेरोलाइज्द होने के लिए मजबूर करना। आज के आधुनिकता-वादी समाज के लिए ,यह कोई नया या अपरिचित शब्द नहीं रह गया है, बल्कि यह शब्द, हर एक के लिए परिचित शब्द बन चुका है। क्या पढ़े-लिखे, और क्या अनपढ़ , हड़ताल का अर्थ भलीभाँति समझते हैं, क्योंकि आये दिन कहीं न कहीं लोगों को भोगना पड़ता है। हड़ताल के विभिन्न रूप देखने मिलते हैं : प्रदर्शन , जुलूस, बाजार बंद, नगर बंद, प्रदेश बंद, रेल बंद, आगजनी आदि। हड़ताल अब एक सामान्य बात हो गई है, जब कि लोकतंत्र में लिखने-बोलने, सरकारी नीति की भर्त्सना करने की पूर्ण स्वतंत्रता है, तब भी जब तक हड़ताली, उपद्रवी बनकर देश की सम्पत्ति को बर्बाद नहीं कर देते, जन-जीवन को पूरी तरह ठप नहीं कर देते, तब तक उनको लगता है, हड़ताल असफ़ल रहा। कभी-कभी तो इस हड़ताल में आपसी या विरोधी दलों के मतों के विरोधाभाष होने पर बड़े तादाद में लोग भी मारे जाते हैं। कहीं पुलिस की गोली से, तो कहीं पुलिस मारी जाती है , उपद्रवियों की गोली से। हड़तालियों के कारण आज की तंग जिंदगी को जी रहे इन्सान की आत्मा और स्वरूप दोनों विकृत हो चुके हैं।

सर्वप्रथम 1966 में मुम्बई ( महाराष्ट्र ) और उत्तर-प्रदेश में बंद अर्थात अराजकता की अपील की गई थी। ट्रेनें बंद रहीं, बाजार बंद रहा, स्कूल-कॉलेज फ़ैक्ट्री , दूकान-पाट सब बंद रहे। दवा ,दूध आदि कुछ दुकानों को छोड़कर ; कुछ तो हुड़दंगियों के डर से स्वयं, तो कुछ हड़ताली आयोजकों के द्वारा जबरन बंद कराये जाने से। मुम्बई के कपड़ा मीलों का हाल तो मत पूछिये : जब तब मीलकर्मी हड़ताल पर चले जाते हैं, जिसके कारण लम्बी अवधि तक फ़ैक्टिरियाँ बंद रहती हैं.  फ़लस्वरूप फ़ैक्ट्री- मालिक को ही नहीं, देश को भी अरबों रुपये का नुकसान सहना

पड़ता है। कई मीलें तो इन हड़तालियों के चलते इतने बीमार हो गये कि उन्हें पुनर्जीवित करना मुश्किल हो गया। बैंकों का लोन (ऋण ) चुकाने के लिए लाचार होकर मील-मालिकों को फ़ै्क्टिरियों की जमीन तक बेच देनी पड़ी। इस बात में कोई संशय नहीं ,कि आज हड़ताल कुछ लोगों की जीविका का साधन बन गई है। समाज विरोधी ,ऐसे अवसरों की प्रतीक्षा में रहते हैं, कि कब हड़ताल की बात कही जाय। इतना ही नहीं, आजकल तो ऐसे भी दल होते है, जो पैसे लेकर हड़ताल को हिट कराते हैं। किसी हड़ताल को हिट तभी माना जाता है, जब इन हुड़दंगियों द्वारा जमकर लूट-पाट, आगजनी और खून-खराबा किया जाता है। ऐसा ये लोग इसलिए करते हैं, कि दूसरे दिन देश के समाचार –पत्रों में फ़्रोंट पेज पर इनकी तस्वीरें छपे, जिससे इनकी हड़ताली बाजार में माँग बढ़ती रहे। हड़ताल के सूत्रधार भी उसके पीछे वही कहीं छिपकर इनके परफ़ोर्मेंन्स का हिसाब करते हैं। अगर उनके मन के साँचे पर ये खड़े उतर गये, तो फ़िर क्या ; दूसरे हड़ताल के लिए इन्हीं दलों को बुक कर लिया जाता है।

इन हड़तालियों की वजह से दूसरे प्रान्तों से आ रही रोजमर्रा की चीजें जहाँ-तहाँ अटक जाती हैं , जिसके कारण उनके दाम आसमान छूने लगते हैं। 20 रुपये का दूध 30 रुपये में, 30 रुपये की सब्जियाँ 50 रुपये की दर से बिकने लगती हैं ; चोर-बाजारी बढ़ जाती है। जमाखोरों की चाँदी हो

जाती है ; जिसका प्रभाव केवल गरीबों पर नहीं पड़ता, बल्कि अरबपतियों को छोड़कर दिहाड़ी करके रोटी कमाने वालों की तो मौत ही आ जाती है। एक तो काम बंद; उस पर पेट की आग, जो हड़ताल से कोई मतलब नहीं रखती। वह जिंदा है, उसे खाना चाहिये। हड़ताल की आड़ में कहीं छात्रों का उपद्रव, कहीं मजदूरों द्वारा कानून भंग, कहीं गुडों द्वारा दुकानों में लूट-पाट की खबरें ; एक साथ देखें तो पता चलता है। इस अनुशासनहीनता के कारण , भले ही अलग-अलग हों, उनके कार्यकर्ता भी

अलग-अलग हों, किन्तु विषय उन सब में वही है, जो रानीतिक नेताओं ने फ़ैलाया है। मैं मानती हूँ, जनतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों की पूर्ण आजादी सबों को है , लेकिन इस स्वतंत्रता का उपयोग जब तक एक निश्चित सीमा के दायरे में नहीं होगा, तब तक यह कल्याणकारी नहीं हो सकता। जब लोग सीमा को पार कर जाते हैं, तो यह स्वतंत्रता आत्मघाती सिद्ध होती है, जो राष्ट्र के लिए विषाक्त है।

मुझे याद है , अलीगढ़ और बनारस विश्वविद्यालयों में, जब 1965 में अनिश्चित कालीन हड़ताल की घोषणा की गई थी; उस समय हड़ताली छात्र अनुशासन की सीमा पार कर हिंसा पर उतारू हो गये थे। आज भी स्थिति पूर्ववत है, इसमें कोई बदलाव नहीं आया। ये हुड़दंगी हड़ताली तब और अधिक उद्दंड और आक्रोशित हो जाते हैं, जब कोई राजनेता ,उन्हें विस्फ़ोटक मुद्दा, अपने लाभ के लिए थमा देते हैं। इस तरह की बातें प्राय: चुनावों के दिनों में देखने मिलता है। जनता के तनिक –सा असंतोष को भड़काकर आगजनी में बदल देते हैं। देश में कुछ दिनों से सरकारी कर्मचारियों की हड़ताल का नया चेहरा देखने मिल रहा है। इसमें ये लोग सामूहिक रूप से हड़ताल पर चले जाते हैं; जो कि बिल्कुल ही असंवैधानिक है। मेरा कहना यह कदापि नहीं है, कि ये कर्मचारी अपनी माँग क्यों रखते हैं ? बिल्कुल रखें, लेकिन इसके रखने के तरीके लोकतंत्रीय सीमाओं के अंतर्गत होना चाहिये, जिससे कि जान-माल की क्षति होने की आशंका नहीं रहे ; तभी हमारा देश आर्थिक प्रगति कर सकेगा। हड़ताल न हो , इसके लिए सरकार तथा उद्योगपतियों को भी चाहिये, अपने तथा कर्मचारियों के बीच तनाव उत्पन्न नहीं होने देना। उनकी शिकायतों पर अविलंब ध्यान देकर उसे दूर करने की कोशिश करना, क्योंकि नकार किसी भी समस्या का हल नहीं हो सकता।

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