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कार्यस्थल को न मानें धर्मशाला या चरागाह

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डॉ. दीपक आचार्य

 

हम सभी कहीं न कहीं काम करते हैं। कोई खुद का प्रतिष्ठान चला रहा है, कोई किसी न किसी काम-धंधे या दुकान में व्यस्त रहा करता है। बहुत सारे लोग तरह-तरह की नौकरियों में लगे हुए हैं। यानि की सभी किस्मों के लोग किसी न किसी माध्यम से आजीविका का निर्वाह कर रहे हैं, अपना पेट पाल रहे हैं, घर-परिवार चला रहे हैं। छोटे-बड़े किसी न किसी काम-धंधे में हम सभी लोग जुड़े हुए हैं।

कोई जीवन निर्वाह  के साधन उपलब्ध करा रहा है और दूसरे इनके माध्यम से अपनी आजीविका चला रहे हैं। जीवन निर्वाह के मामले में एक तरफ बहुत बड़ा वर्ग है जो दिन-रात जी भर कर मानसिक और शारीरिक श्रम करता है फिर भी उसकी आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पाती ।

एक हम हैं जो सिर्फ दिमागी घोड़े दौड़ाते रहते हैं और इतना अधिक पा रहे हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता, फिर भी हमें संतोष नहीं है।  लोेग कमाने-खाने के लिए काम कर रहे हैं और हम लोग घर भरने और जमा करने के लिए हर तरफ मुँह मार रहे हैं। जो बँधा-बँधाया मिल रहा है उसमें हमें संतोष नहीं है और ऊपर से आवक चाहते हैं, और वह भी इतनी कि इसका प्रवाह न कभी रूके, न दूसरी तरफ सरक जाए। जो कुछ आए वह हमारी ही हमारी तरफ तेजी से आता रहे। और आए भी ऎसा कि दूसरों को इसकी भनक तक न लग पाए।

जो कार्यस्थल या संस्थान हमें आजीविका प्रदान कर हमारी पूरी जिन्दगी आसानी से चलाने की गारन्टी देते हैं वे हमारे लिए अन्नदाता भी हैं और जीवनदाता भी। कभी यह सोच कर देखें कि पाँच-छह महीने हमें नौकरियों से बाहर कर दे, तो घर चलाने के लाले पड़ जाएं।

कभी तुलना करें उन मेहनतकश लोगों से जो सर्दी, गर्मी और बरसात की परवाह किए बगैर एक-एक पैसे के लिए कितनी कुछ मेहनत करते हैं और उफ तक नहीं करते। जो काम मिल जाए, जहाँ और जिस तरह मिल जाए, पूरे मन से जी तोड़ परिश्रम करते हैं और अपना तथा परिवार को पेट पालते हैं। इतनी सारी मेहनत करने के बावजूद अभावों में जीने की उनकी विवशता पर हमने कभी गौर नहीं किया।

और एक हम हैं कि जो व्हील चेयर को विक्रमादित्य की कुर्सी समझ कर इतना रहे हैं, दिन भर गप्पे हाँक कर, चाय-काफी की चुस्कियाँ लेकर और कागजों से खेलते हुए टाईमपास करने के सारे करतब आजमाने लगे हैं। न हमें अपने काम से कभी संतोष होता है न संतोष पाने के लिए हम सेवा या परोपकार का कोई काम करते हैं।

हम सभी ने घण्टे गुजारने की कला सीख ली है और इसी के सहारे दिन-महीने और साल गुजार रहे हैं। कार्यस्थलों या हमारे काम-काज के क्षेत्रों की स्थिति यह है कि हम लोग इसे न घर मानते हैं, न मन्दिर। हमें अपनी बँधी-बँधायी मासिकी से मतलब रह गया है।

हमें इस बात से कोई सरोकार नहीं रहा कि हमारे कार्यस्थल कितने साफ-सुथरे हैं, कौन सी कमी है, कहाँ मरम्मत या रंग-रोगन की जरूरत है, कौन सा कबाड़ बरसों से जमा है, कौन से कमरों को सुव्यवस्थित करना है, अपने संस्थान को क्या आवश्यकताएं हैं, किस प्रकार संस्थान की खुबसूरती को बढ़ाया जा सकता है, किस तरह विकास और विस्तार करते हुए संस्थान को आकर्षक स्वरूप प्रदान किया जा सकता है, संस्थान परिसरों में हरियाली लाने के लिए कितना कुछ किया जा सकता है, संस्थान के लोगों को किस प्रकार की मदद की जरूरत है या संस्थान को कैसे आदर्श बनाया जा सकता है।

हमारी निष्ठुरता, खुदगर्जी और संवेदनशीलता की हद ही हो गई है आजकल। संस्थान से ज्यादा वैयक्तिक छवि और कार्यों को महत्त्व दिया जाने लगा है। एक आलपीन से लेकर कार्यस्थल की हर वस्तु, फोन -कम्प्यूटर से लेकर हर संसाधन को अपने काम में लाने की कला हमसे ज्यादा और कोई नहीं जान पाया है आज तक। 

संस्थान की सामग्री को अपने लिए इस्तेमाल करने में हमें जरा भी शर्म नहीं आती, पूरी तरह बेशर्म होकर हम इनका प्रयोग करते हैं लेकिन इनकी सार-संभाल और सुव्यवस्थित वैज्ञानिक ढंग से संधारित करना हम अपना फर्ज नहीं मानते।

आम तौर पर शयन के घण्टों को छोड़ दिया जाए तो हममें से अधिकांश लोगों की अधिकतर जिन्दगी कार्यस्थलों की ही भेंट चढ़ जाती है। इसके बावजूद हम अपने कार्यस्थल के प्रति उपेक्षा, अनादर और संवेदनहीनता का बर्ताव करते हैं। काम-काज के खूब सारे स्थल और कक्ष तो इतने गंदे, अंधेरे और बदबूदार हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता। एलर्जी और दूसरी बीमारियां भी देते हैं ये।

इससे बड़ी इंसानियत और संवेदनशीलता की हत्या और क्या होगी। बहुत सारे लोगों की मानसिकता ही ऎसी हो गई है कि उन्हें सिर्फ अपने स्वार्थ पूरे करने से मतलब है, और वह भी वैयक्तिक। चाहे बात संस्थान के नाम का इस्तेमाल कर वैयक्तिक रिश्ते बनाने और काम निकलवाने की हो या और कुछ। कार्यस्थल के नाम को भुनाने में हम कभी पीछे नहीं रहते लेकिन कार्यस्थल के लिए कुछ करने में हमें मौत ही आती है।

असल में अब हमने सभी प्रकार के फर्ज को भुला दिया है। ऎसे में कार्यस्थल भी हमारी करतूतों से अछूता क्यों रहे। हम लोगों ने अपने-अपने कार्यस्थलों को सिर्फ पगार पाने तक सीमित कर रखा है, कार्यस्थल के प्रति अपने स्वैच्छिक दायित्वों से मुँह ही मोड़ लिया है।

वे लोग चले गए जो कार्यस्थल को मन्दिर मानकर काम करते थे और अपने स्वार्थ तथा वैयक्तिक छवि बनाने की बजाय संस्थान की छवि को लेकर समर्पित हुआ करते थे। इन लोगों के लिए संस्थान ही सर्वोपरि हुआ करता था और आम लोगों में यह सीधा और साफ संकेत जाता था कि संस्थानकर्मियों के समर्पण और कार्यस्थल के प्रति दिली लगाव के कारण ही संस्थान की चमक-दमक बरकरार है।

अब तो हम सभी ने अपने-अपने कार्यस्थलों को धर्मशाला ही बना कर रख दिया है। चाहे जब आना-जाना और मनमर्जी से रुकना, अपने फर्ज के प्रति बेपरवाह रहना और टाईमपास के सारे धंधे आजमाते हुए अपनी ही अपनी करते रहना कोई सीखे तो हमसे। कोई आ रहा है, कोई जा रहा है, कोई अन्दर ही पार्किंग कर रहा है, कोई कोनों में पीक से अभिषेक कर रहा है, कोई आँखें मूंदे रतजगे से बेदखल नींद का पुनर्भरण कर रहा है, आदि-आदि।

इतना सब कुछ करते हुए भी हम साल मेंं जाने कितनी ही बार कत्र्तव्यपरायणता, ईमानदारी, फर्ज अदायगी, हिंसा उन्मूलन और ऎसी ही ढेरों प्रकार की शपथ लेते हुए  पूरा जोर लगाकर ‘भारतमाता की जय’ बोलते हैं। जरा आत्मा को टटोलें और देखें कि मातृभूमि का ऋण चुकाने के लिए हम कितना कुछ त्याग कर पा रहे हैं।

अपने कार्यस्थलों की पवित्रता और गरिमा का थोड़ा ख्याल रखें और इन पर ध्यान दें। अपने कर्मस्थलों को ऎसा बनाएं कि इनका आभामण्डल तमाम कार्मिकों की जयगान करता हुआ नज़र आए तथा दूसरे लोग भी हमसे प्रेरणा पाएं।

जो लोग अपने कार्यस्थल के प्रति वफादार नहीं हैं वे किसी के प्रति वफादार नहीं हो सकते, यहाँ तक कि अपने घरवालों या सहकर्मियों के भी। इन लोगों का जिन्दगी भर का एकसूत्री एजेण्डा होता है पाना और पाते रहना। कचरे और गंदगी के ढेरों के बीच रहकर भी ये पैसे बनाने और स्वार्थ पूरे करने में ही रमे रहते हैं।

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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