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कहानी : जय माँ दुर्गे

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आश्विन महीना शुरू हो गया था पंद्रह दिन और शेष थे दुर्गापूजा में। दुर्गापुर के  बच्चे ,बूढ़े और औरतें सभी बहुत खुश थे । ख़ुशी भी क्यों न हो? क्योंकि इसबार यहाँ  भी दुर्गापूजा लगने वाला था ।
जित्तन पंडित की अगवानी में एक समिति का गठन हुआ था ।जिसके अध्यक्ष जित्तन पंडित थे  ,उपाध्यक्ष समझू साहू और कोषाध्यक्ष थे जल्लू चमार। ठल्लू कहार ,और जमालू माली आदि लोग सदस्य के रूप में नामित हुए थे । इस गांव में लगभग सभी बिरादरी के लोग थे। इसलिए प्रयास यही था कि समिति में सभी बिरादरी के लोगों का प्रतिनिधित्व हो ।

इसके पहले दुर्गापुर से सटे गांव भैरोपुर में दुर्गापूजा लगता था । दोनों गांवों के लोग मिलकर दुर्गापूजा मनाते थे। नौ दिन तक खूब चहल-पहल होता था । झालरों से पंडाल को खूब सजाया जाता था ।नौ दिन तक  माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों  को देखने के लिए दूर-दराज  के गांव वाले भी यहाँ आया करते थे। भैरोपुर का दुर्गापूजा  बहुत प्रसिद्ध था ।भले ही यह गांव का दुर्गापूजा था ।किन्तु इसकी ख्याति जिले के बाहर भी थी। माँ दुर्गा को कीमती गहनों से लाद  दिया जाता था । खूब चढ़ावा और  पैसे इकट्ठे हो जाते थे तो वहीं दूसरी तरफ माँ के दरबार में हर रोज भंडारे का भी आयोजन होता था कम से कम नौ दिन तक तो कोई गरीब भूखे पेट नहीं सोता था ,वहीँ कामचोरों को भी नौ दिन तक काम करने की जरूरत नहीं होती थी। भैरोपुर में ब्राह्मणों की संख्या अधिक थी। ज्यादातर लोगों का पंडिताई का काम था । लगभग सभी ब्राह्मण सम्पन्न ही थे। दुर्गापूजा की सारी व्यवस्था दुर्गापुर वाले ही करते थे । जबकि इसका श्रेय तो भैरोपुर वालों को ही मिलता था फिर भी दुर्गापुर वालों को इसका रत्ती भर मलाल नहीं था ।    

      
दुर्गापूजा का ही समय था । जल्लू की बिटिया दुर्गा अपने सहेलियों के साथ दुर्गापूजा देखने आई थी । माँ दुर्गा की आरती के बाद  पंडित गंगाधर का लड़का गनेश, प्रसाद बाँट रहा था ।
कि  अचानक जनरेटर बंद हो गया जिससे बिजली  गुल हो गई । इधर बिजली गुल तो उधर गनेश, दुर्गा को लेके फुर्र हो गया । ये भागा , ओ भागा  कौन भागा , क्यों भागा, कहाँ भागा ।जबतक जनरेटर स्टार्ट होता कि  तब तक वे लैला-मजनू कहीं दूर जा चुके थे। यह इंतजाम तो पहले ही हो गया था। जनरेटर वाला बीस रुपये घुस लिया था गनेश से जनरेटर बंद करने खातिर । तो बब्बन पहलवान भी सौ रूपया  लिया था शहर पहुँचाने के लिए । यह पोल तो बाद में खुला ।


इसके पहले तो गनेश और दुर्गा की अम्मा में झोटी-झोटा हो गया ।
ई कुकुरिया हौ एकर औलाद भी कुक्कुर हौ। नीच जाती क हौ। तबय एकर करतब भी नीच हौ -पंडिताइन को जो जी में आ रहा था, सब कहे जा रही थी।


त तोर लरिकवा कउन उच काम करे स ढेर जवानी मसके रहा छिनार कहीं क -दुर्गा की अम्मा भी विष उड़ेलने लगी ।
यह झगड़ा यहीं न थमा । पंडित गंगाधर और जल्लू में भी लाठी-डंडे की नौबत आ गई
भला हुआ कि जित्तन पंडित मौके पर थे, नहीं तो जल्लू  की लाश ही उनके घर आती । खैर जित्तन पंडित  के इशारे पर जल्लू  ने भाग कर जान बचाई । तभी से भैरोपुर और दुर्गापुर में दुश्मनी चली आ रही थी ।
किसी भी प्रकार का सम्बन्ध दोनों गांवों के बीच नहीं रह गया था ।
दुर्गापुर के मुखिया दुक्खी निषाद ने तभी कसम खा ली थी कि अगली बार से दुर्गापूजा अपने ही गांव में लगेगी। वइसे हम ही लोग ही भैरोपुर में दुर्गापूजा क कुल  व्यवस्था देखित ह  अउर श्रेय मिलत ह भैरोपुर वालन को-दुक्खी निषाद ने कहा ।
बेचारे दुक्खी निषाद तो तीन महीने बाद ही परलोक सिधार गए ।


उनके बाद दुर्गापुर के मुखिया बने जित्तन पंडित जो दुक्खी निषाद के वचन को पूरा करने की ठानी थी । दुर्गापुर निर्धन गांव था । यहाँ संशाधनों की कमी थी । किन्तु इस गांव के लोग मेहनती और ईमानदार थे भले ही इस गांव में शिक्षा का अभाव था ।
कुछ दिन बीते। कुछ महीने बीते । तब तक लोग गनेश और दुर्गा को भूल चुके थे । वे भी शहर से लौट कर गांव आ चुके थे । किन्तु पंडित गंगाधर ने उन्हें अपने घर में घुसने नहीं दिया ।
छोटका तूने बड़ी नादानी की है ,इस नीच जाति की लड़की से बियाह कइके । हमें छोड़ या इस चुड़ैल को जो  तोहइ  अपने प्रेमजाल में फँसाये बा  -पंडित गंगाधर ने बेटे गनेश से कहा ।


बाबूजी ई चुड़ैल नाहीं तोहार छोटकी बहू हौ आप पंडिताई करत ह ,का अपने बहू के कोई चुड़ैल कहत ह ?  हम दुनौ माँ दुर्गा के सामने बियाह के पवित्र बंधन में बंधा हई ।  अउर ई दुर्गा हमरे नाम क मंगल सूत्र पहिने बा , मांग में सेन्हूर भरत ह । बाबूजी हम दुर्गा के छोड़ नाहीं सकत हई अउर तू  हमै  अपनाय नहीं सकत ह । त  ठीक बा  बाबूजी हम आपन सारा  जीवन खलिहान वाले झोपड़ी में ही बिताय देब।
-यह कहते हुए गनेश ,दुर्गा के साथ सदा के लिए खलिहान वाली झोपड़ी में रहने के लिए  चला गया ।
जल्लू को, दुर्गापूजा के लिए,  चन्दा देने में किसी ने भी आनाकानी नहीं की । जो जितना दे सकता था उससे  अधिक ही चन्दा दिया  क्योंकि यह दुर्गापुर गांव के मर्यादा का सवाल था । वैसे भी भैरोपुर वाले , दुर्गापुर  वालों का अक्सर मजाक उड़ाते थे विशेष रूप से पंडित गंगाधर  कि चले हैं दुर्गापूजा मनाने , घर में खाने को दाने नहीं है । क्या फाँके मार के दुर्गापूजा मनायेंगे ।


दुर्गापुर वालों को हर चीज की व्यवस्था किराये पर ही करनी थी। जबकि भैरोपुर वालों के पास खुद की व्यवस्था होती थी । भैरोपुर वालों ने श्री दुर्गा पूजा समिति के नाम से पर्ची छपाई थी । उन्हें दूर-दराज के गांवों से भी चंदा मिलता था । जबकि दुर्गापुर वालों ने नव दुर्गा पूजा समिति के नाम से पर्ची छपाई थी । इन लोगों को तो दूसरे गांवों के लोग डांट कर भगा देते थे कहते थे यह तो फर्जी समिति है बस पैसा कमाने का धंधा है । बेचारा जल्लू   अपने गांव से मात्र पंद्रह हजार रुपया इकठ्ठा कर पाया था  । इतने रकम में सिर्फ माँ दुर्गा की मूर्ति ही आ सकती थी बाकी जनरेटर ,लाइट आदि की व्यवस्था नामुमकिन था । बस एक-दो दिन शेष रह गया था दुर्गापूजा में । जित्तन पण्डित, जल्लू , समझू  और जमालू समिति के अन्य सदस्यों के साथ मूर्ति लाने की योजना बनाने लगे ।


इधर दुर्गा प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी । दाई ने कह दिया था । हमें जो करना था कर दिया । अब प्रसव कराना मेरे बस में नहीं है। माँ दुर्गे पर भरोसा रखो ,और शहर जाने का बंदोबस्त करो । नहीं तो दुर्गा के साथ-साथ बच्चे से भी हाथ धोना पड़ेगा ।
बेचारा गनेश का रो -रोकर बुरा हाल था ।उसके पास एक पाई भी नहीं थी इलाज के लिए । वह किसी भी कीमत पर दुर्गा को खोना नहीं चाहता था । वह दौड़कर बाबूजी के पास गया । सारी स्थिति से अवगत कराया किन्तु पत्थर दिल पंडित गंगाधर सहायता को तैयार न हुए बोले-मर जाये द ई चमाइन के तोर दूसर बियाह कइ देब । काहे परेशान हौ ।


गनेश समझ गया था बाबूजी से गिड़गिड़ाने से कुछ फायदा नहीं है । फिर वह थक-हार जित्तन पंडित के पास गया बोला -भइया जी हमरी दुर्गा अउर हमरे होय वाले औलाद के बचाय ल  । घर मा एकौ पाई नाही बा । दाई शहर लई जाइ बिदा कहिन ह ।
जित्तन पंडित एक क्षण कुछ सोचे शायद आज उन्हें अपनी गौरी का ख्याल आ गया था जो अब इस दुनिया में नहीं है । गनेश जाओ दुर्गा के पास, हम्म अबही शहर बिदा गाड़ी क बंदोबस्त कइके आवत हई -जित्तन पंडित बोले ।
जित्तन पंडित ने यह बात अपनी समिति के समक्ष रखी । और चंदा के पैसे से मूर्ति न लाकर दुर्गा के जान बचाने पर सहमति बनी ।
का जल्लूआ ई बात माने उ ईमान क पक्का हौ । भले ओकरै बिटिया हौ दुर्गा, मर जाय भले पर चंदा क पैसा, दुर्गा माँ पर ही खतम करे-समझू ने कहा ।


खैर सबलोग झट से जल्लू के यहाँ पहुँचे सारी बात बताई यह सुनकर दुर्गा की अम्मा जोर-जोर से रोने लगी ।
जल्लू चंदा क पैसा देने को तैयार नहीं था ।भले ही बिटिया का हाल सुनकर उसका शरीर हिलने लगा था । जमालू ने समझाया कि देख जल्लूआ चाहे तै पैसा दुर्गा माँ पर खर्च कर अउर चाहे त दुर्गा बेटी पर एकै मतलब भ दूनौ तरफ पैसा दुर्गा पर खर्च होइ । तोके कोई कुछ न कही की ई चंदा क पइसा डकार ग । उपर से तोर नामय होइ । गारी पाये गंगाधरवा जौने के पइसा क कमी नाइ बा ,जौने क पतोह हौ दुर्गा

जल्लू ने पंद्रह हजार रुपये जित्तन के हाथ पर रख दी और उनके गले लगकर रोने लगा बोला- पंडितजी मेरे दुर...गा क जान बचा ल। जित्तन ने जल्लू को से कहा -घबराओ नहीं जल्लू कुछ न होइ तोहरी बिटिया को बस माँ दुर्गा पर भरोसा रखा ।
तबतक ठल्लू वाहन लेकर आ जाता है। दुर्गा की अम्मा और दो-चार लोग दुर्गा को लिवाकर शहर पहुँचते हैं।
डॉक्टर तुरंत दुर्गा को इमरजेंसी वार्ड में ले जाते है थोड़ी देर बाद बच्चे की रोने की आवाज आती है। डॉक्टर ने कहा- बधाई हो गनेश तुम पापा बन गए हो और खास बात यह कि बच्ची के माथे पर त्रिशूल का निशान है। आज नवरात्रि का पहला दिन है, बोलो- एक साथ  जय माँ दुर्गे की ! अब तक सारा हॉस्पिटल जय माँ दुर्गे के उदघोष से गूँज उठा । जच्चा-बच्चा दोनों स्वस्थ थी । गनेश दौड़कर दुर्गा को गले लगा लिया । आज उसका प्यार जीत चुका था ।
सभी लोग साक्षात् दुर्गा माँ की दर्शन की


दुर्गापुर में भले ही दुर्गापूजा न लग पाया हो । किन्तु साक्षात् दुर्गा माँ प्रकट हो चुकी थी। जित्तन, जल्लू, समझू, जमालू और ठल्लू आदि लोगों के साथ-साथ  सारा गांव बहुत खुश था ।


भैरोपुर के पंडित गंगाधर गनेश  की  अम्मा के साथ दुर्गा के पैरों पर गिरकर माफी माँगते हैं । दुर्गा झट से उनका हाथ पकड़ लेती है और कात्यायनी को गोद में दे देती है ।पैसे  का घमंड काफूर हो चुका था जाति-पाति सब भूल चुके थे शायद माँ दुर्गा के नौ स्वरूपो का दर्शन कर रहे थे।

तू  शैलपुत्री ,   ब्रह्मचारिणी   ,चंद्रघंटा  हो ।
मैं  अभागा  तुच्छ   मानव  तू  कुष्मांडा हो ।।

तू  स्कंदमाता ,  कात्यायनी ,कालरात्रि हो ।
माफ करना हे महागौरी तू  सिद्धिदात्री  हो ।।

 


योगेन्द्र प्रताप मौर्य
बरसठी, जौनपुर

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