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हिंदी साहित्य और उसकी विधाएँ

डॉ. श्रीमती तारा सिंह

विधा का अर्थ है ,किस्म, वर्ग या श्रेणी, अर्थात विविध प्रकार की रचनाओं को उनके गुण, धर्मों के आधार पर अलग करना । साहित्य में विधा शब्द का प्रयोग, एक वर्गकारक के रूप में किया जाता है । विधाएँ अस्पष्ट श्रेणियाँ हैं, इनकी कोई निश्चित सीमा रेखा नहीं होती ; इनकी पहचान समय के साथ कुछ मान्यताओं के आधार पर निर्मित की जाती है । विधाएँ कई तरह के हैं ; उदाहरण के लिए ------- साहित्य की विधाएँ -

कविता की विधाएँ

हाइकु --- निबंध

ललित कला--- नाटक

चलचित्र --- आत्मकथा

पत्रकारिता—---व्यंग्य

संस्मरण --- कहानी, आदि

शामिल हैं । संस्मरण को हम पूर्ण स्मृति भी कह सकते हैं ; स्मृति का एक सिरा वर्तमान से जुड़ा होता है, तो दूसरा अतीत से । संस्मरण अतीत और वर्तमान का वह सेतु है, जो दोनों किनारे में संवाद स्थापित करता है । हमारी जिंदगी में कई ऐसे पल होते हैं, जिसे समय की धूल ढ़ँक नहीं सकती है । वह वर्तमान में भी पूर्व की तरह तस्वीर बनकर आँखों के आगे झूलता रहता है , जिसे अंतिम साँस तक हम भूल नहीं पाते हैं । उससे एक संबंध –सा बन जाता है । संबंध की यही आत्मीयता और स्मृति की परस्परता ही संस्मरण की रचना-प्रक्रिया का मूल आधार है । यही कारण है कि रचना में महज सूचना नहीं होती, बल्कि एक जीवंत अस्तित्व होता है । यही वजह है कि संस्मरण , कल्पना कर नहीं लिखा जा सकता ,क्योंकि संस्मरण आत्मीयता, प्रत्यक्षता, घटना के आधार पर तैयार होता है । इसके साथ व्यक्ति का संबंध होता है, जो भराव या खालीपन पैदा करता है , हालांकि संस्मरण एक मिश्रित विधा है, जिसमें निबंध , कहानी, जीवनी, आत्मकथा आदि कई विशेषताएँ संश्लिष्ट हैं । कभी-कभी तो अच्छे ढ़ंग से लिखी कहानियाँ और संस्मरण में अंतर करना मुश्किल हो जाता है, जब कि दोनों अलग विधाएँ हैं ।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को हिंदी साहित्य के आधुनिक युग का कवि माना जाता है । उन्होंने ’कवि वचन सुधा’ तथा ’हरिश्चन्द्र मैगजीन’ नाम से पत्रिका भी निकाली थी । इसके अलावा नाटकों की भी रचना की । प्रसिद्ध नाटक ’चन्द्रावली’ को ---

’ अंधेर नगरी, चौपट राजा

टके सेर भाजी, टके सेर खाजा ’

कहावत काफ़ी प्रसिद्धि पाई । आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर , इस युग को द्विवेदी युग के नाम से भी जाना जाता था । 1903 में उन्होंने ’सरस्वती’ नामक पत्रिका का भार संभाला, जिसके माध्यम से रचनाकारों को खड़ी बोली में लिखने के लिए प्रेरित किया । द्विवेदी जी के समकालीन रामचन्द्र शुक्ल के निबंध , हिन्दी साहित्य के इतिहास और समालोचना, के क्षेत्र में गंभीर लेखन किया । इसलिए गद्य के विकास में रामचन्द्र शुक्ल जी का विशेष महत्व है ।

कथा-साहित्य के क्षेत्र में मुंशी प्रेमचंद का एक अलग ही विशेष स्थान रहा । उनका कथा-साहित्य केवल मनोरंजन, कौतुहल और नीति का विषय ही नहीं रहा था, बल्कि सीधे जीवन समस्याओं से जुड़ा था । उनकी रचनाओं में ,निर्मला, रंगभूमि, गवन, गोदान की ख्याति, आज भी बरकरार है । कहानियों में पूस की रात, कफ़न, शतरंज का खिलाड़ी, पंच-परमेश्वर, नमक का दारोगा आदि बेजोड़ कहानियाँ हैं । इनकी कथावस्तु किसी भी युग में मलिन नहीं होगी ।

हिंदी कविता को नया रूप देने में स्वच्छंदवादी कवि श्रीधर पाठक का महत्वपूर्ण योगदान रहा । 1936 के आस-पास कविता के क्षेत्र में बहुत बड़ा परिवर्तन होता दिखाई पड़ा । युग की माँग के अनुसार सुमित्रा नंदन पंत और सूर्यकांत निराला, सभी ने इस प्रगतिवाद का साथ दिया । दिनकर ने भी अनेकों प्रगतिवादी रचनाएँ की । प्रगतिवाद के प्रति समर्पित कवियों में केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शमशेर बहादुर आदि नाम उल्लेखनीय हैं । इस धारा के अंतर्गत, समाज के शोषित वर्ग, किसान और मजदूरों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की गई ।

1953 में ’नई कविता’ पत्रिका का प्रकाशन हुआ । इस पत्रिका में नयी कविता को प्रयोगवाद से भिन्न रूप में प्रतिष्ठित की गई । यही कारण है कि प्रयोगवाद को नई कविता का भिन्न रूप माना जाता है, इसमें दो धाराएँ परिलक्षित होती हैं ----- (1) व्यक्तिता को सुरक्षित करने वाली धारा; इसमें अग्येय, धर्मवीर भारती, श्रीकांत, केदारनाथ, रघुवीर सहाय आदि उल्लेखनीय हैं । (2) लोक द्वारा रचित लोक साहित्य उतना ही प्राचीन है, जितना मानव, इसलिए उसमें जन-जीवन की प्रत्येक अवस्था , प्रत्येक वर्ग, प्रत्येक समय और प्रकृति ,सभी कुछ समाहित है । डॉ० सत्येन्द्र के अनुसार , लोकगीत अहंकार शून्य होता है, जो परम्परा के प्रवाह में जीवित रहता है । लोक-साहित्य का आदर्श विशिष्ट साहित्य से भिन्न होता है , लोक-साहित्य किसी भी देश अथवा क्षेत्र का आदिकाल से लेकर अब तक की ( जनस्वभाव के अन्तर्गत सभी ) प्रवृतियों का द्योतक होता है , क्योंकि लोक-साहित्य में लोक-मानव का हृदय बोलता है । आदिकाल से श्रुति एवं स्मृति के सहारे रहने वाले , इस लोक साहित्य के कुछ विशेष सिद्धांत हैं । इस साहित्य में मुख्य रूप से वे रचनाएँ ही स्वीकार की जाती हैं, अथवा जीवन पाती हैं; जो अनेक कंठों से, अनेक रूपों में बिगड़कर एक सर्वमान्य रूप धारण कर लेती है । ऐसी बहुत सी साहित्यिक सामग्रियाँ आज भी प्रचलित हैं, जो एकरूपता ग्रहण नहीं कर पाई हैं । परम्परागत यह साहित्य किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं है; एक ही गीत, कथा, कहावत , एक स्थल पर जिस रूप में होती है, दूसरे स्थल तक पहुँचते-पहुँचते उसका रूप बदल जाता है । कभी-कभी केवल पंक्तियाँ ही नहीं ,कथाओं में घटनाएँ भी बदल जाती हैं । उदाहरण के लिए राम-कथा को ही लीजिये----- लोग गीतों में राम सम्बंधी जितनी विविधताएँ प्रचलित हैं, यदि उन सब को एकत्र किया जाये, तो यह एक अन्य तरह का लोक रामायण तैयार होगा । यहाँ भले ही मत अलग हों, लेकिन दशरथ-पुत्र राम, सब के तारणहार थे, इसमें दो मत नहीं है । यहाँ पर कथा, अन्य रामायणों से मिल जाती है । इस तरह अनेक मतों में होते हुए भी लोक-साहित्य एकता की भावना से युक्त है, यही विशेषता है लोक साहित्य की, भाषा के कलेवर में बदलने के बावजूद भावपक्ष एक रहता है ।

साहित्य को क्षेत्र और देश की सीमा में बाँधकर रखा नहीं जा सकता । यह तो ज्यों फ़ूल की सुगंध हवा के संग उड़ती दूर-दूर चली जाती है, उसी तरह यह सम्भव है कि प्राचीन मानव अपने यात्राकाल में जब दूर गया होगा, तब अपना साहित्य भी साथ ले गया होगा । जैसा कि आज भी क्रम जारी है, जब कोई ग्रामीण दुल्हन एक गाँव से दूसरे गाँव ब्याह कर आती है, तब अपने साथ नैहर की लोक-कथाएँ भी लाती है , और जब उसके नैहर की भाषा ससुराल से अलग रहती है , तब वह वहाँ की लहजों में ढ़ाल लेती है । इस प्रकार बनाव-बिगाड़ चलता रहता है । लेकिन यह याद रखने वाली बात है कि ,लोक-साहित्य कभी भी किसी एक व्यक्ति की नहीं होती, बल्कि पूरे समाज का इसमें समावेश और योगदान रहता है यही कारण है ,कि लोक-साहित्य पर किसी एक व्यक्ति की छाप नहीं ,बल्कि व्यक्ति-लोक की छाप होती है ।

देवी-देवताओं एवं प्रकृति से जुड़े साहित्य में भक्ति एवं भय , दोनों प्रकार की भावनाएँ सन्निहित रहती हैं । इसके अंतर्गत टोना—टोटका एवं जादू आदि अंध-विश्वासों से सम्बंधित साहित्य आता है । धरती, आकाश, कुआँ, तालाब, मरी मसान, वृक्ष, फ़सल , पौधा, दैत्य , दानव, देवी-देवता, ब्रह्मतीर्थ , आदि पर मंत्र या गीत प्रचलित हैं । यहाँ तक कि ,जन्म से लेकर मरण तक के सभी संस्कार , या परमार्थ सम्बंधी जितने भी कार्य हैं, सभी इसके अंतर्गत आते हैं, लेकिन वैज्ञानिकता पर आधारित साहित्य, जैसे ऋतु विद्या, स्वास्थ्य विग्यान , कृषि विग्यान , जो सब कि प्राय: परीक्षा की कसौटी पर खड़ी उतरती हैं ; चूँकि ये अनुभव बहुत पक्के होते हैं, इसलिए इन्हें लोकगीतों की भाँति बनने-विगड़ने की संभावनाएँ कम होती हैं । बावजूद लोक-साहित्य चूँकि धरातल से उठती है, इसलिए इसे वैदिक साहित्य के समकक्ष आसन प्राप्त है । प्रमा्ण यह है कि मुंडन, कर्णभेद, विवाह, यज्ञोपवीत संस्कारों पर शुभारम्भ के समय, एक तरफ़ ब्राह्मण मंत्रोच्चारण करते हैं, तो दूसरी तरफ़ स्त्रियाँ ,साथ-साथ गीत गाती हैं । इस तरह एक भी ऐसी सांस्कारिक अथवा धार्मिक कार्य लोक जीवन में नहीं मिलता, जिसमें वैदिक साहित्य के साथ लोक-साहित्य को स्थान प्राप्त नहीं हो ।

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