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यह भेद क्यों ?

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डॉ0 दीपक आचार्य

 

हम जो कुछ करते हैं उसमें अपना पूरा दिमाग लगाकर यह सोचते हैं कि कौन सा अपना काम है, अपने लिए है और कौनसा दूसरों के लिए और परायों का काम। इसी के आधार पर हम कार्य या वस्तु की गुणवत्ता का निर्धारण करते हैं और उसी के अनुरूप समस्त प्रकार के व्यवहार करते हैंं।

आम तौर पर लोक जीवन से लेकर सामाजिक रीति-रिवाजों तक सभी में हमारे काम-काज और व्यवहार तथा लेन-देन के लिए मूल्यांकन का यही आधार होता है। इक्कीसवीं सदी में आने के बावजूद हम सारे लोग लोकाचार, फिजूलखर्ची और बोझिल एवं अनौचित्यपूर्ण हो चुकी प्रथाओं को बेवजह ढो रहे हैं।

जो अनपढ़ और नासमझ हैं उनको छोड़ भी दिया जाए तो सभ्य, बुद्धिजीवी और अभिजात्य कहे जाने वाले लोग भी आँखें मूँद कर नाकारा रीति-रिवाजों को ढोये जा रहे हैं। इन सभ्य और समझदार लोगों से समाजसुधार और कुरीतियों के निवारण की ढेरों बातें करवा लो, बिना थके सब कुछ करते रहेंगे, लेकिन जहाँ अपने सिद्धान्त पर अड़े रहने की बात आती है वहाँ चुपचाप वह सब कुछ करते चले जाते हैं जो नहीं करना चाहिए।

यही लोग हैं जो औरों को उपदेश देते हैं लेकिन जहाँ इन उपदेशों पर अमल करने का अवसर आता है वहाँ अपने आपको स्वार्थ और लुभावनी परंपराओं के हवाले कर दिया करते हैं और सरे आम या गुपचुप सब कुछ लेन-देन कर लिया करते हैं।

कई क्षेत्रों में ऎसे लोगों की भरमार है जो समाजसुधार के लिए डींगे हाँकते रहते हैं लेकिन अपने घर-परिवार में जब कोई प्राप्ति का सुलभ सुअवसर उपस्थित होता है तब चुपचाप स्वीकार कर लिया करते हैं और इस बात की कोशिश में जुट जाते हैं कि उनकी लेनी ही लेनी और मांग के बारे में लोगों को कुछ भी भनक न पड़ने पाए।

इनमें काफी सारे लोग इतने निर्लज्ज होते हैं कि भिखारियों से गए बीते व्यवहार करते हुए अपने और रिश्तेदारों के लिए इतनी अधिक मांग पूरी करवा लेते हैं जितनी कि सामने वाले की हैसियत तक नहीं होती और बेचारे दूसरे पक्ष को मन मसोस कर कर्ज लेकर सारी रिश्तेदारी निभाते हुए मांग पूरी करने को विवश होना पड़ता है।

कोई सा सामाजिक, मांगलिक या अमांगलिक अवसर हो, हर बार कुछ न कुछ लेन-देन का जोर बना रहता है। इनमें कपड़े-लत्ते से लेकर रुपए-पैसे, बरतन, आभूषण आदि का लेन-देन आम बात है। 

लोग भी बेशर्म होकर मांगते हैं और इन्हीं की तरह लेने वाले बेशर्मों की भी कोई कमी नहीं रहती। तब लगता है कि भिखारियों की जमात केवल फुटपाथों या सड़कों पर ही नहीं होती बल्कि सभ्य बस्तियों में ऎसे भिखारियों और निर्लज्जों की कोई कमी नहीं है।

विभिन्न सामाजिक अवसरों पर व्यवहार के नाम पर उपहार देने और पाने की परंपरा भी जानें कब से चली आ रही है। इन सभी मामलों में व्यवहार को लेकर बड़ा ही मजेदार पक्ष यह है कि जो वस्त्रादि दिए जाते हैं उनमें दो प्रकार के लिए जाते हैं।

एक वे हैं जो उपयोग में आने लायक होते हैं और इनके लिए किसी भी प्रकार की गुणवत्ता का कोई ध्यान नहीं रखा जाता। ये केवल एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे आदि में स्थानान्तरित होते रहते हैं। न सिलवाने लायक होते हैं न पहनने लायक।

इनका उपयोग सिर्फ व्यवहार निभाने भर के लिए किया जाता है और यह व्यवहार के सिवा किसी काम के नहीं होते। एक अवसर पूरा होने के बाद ये वस्त्रादि घर की तिजोरियाें और पेटियों में पड़े-पड़े दूसरे अवसर की तलाश करते रहते हैं और कई बार तो कई वर्षों तक संग्रहित पड़े रहते हैं।

खासकर शादी-ब्याहों और दूसरे मांगलिक अवसरों पर हर तरफ कपड़ों की दुकानों में जमा रहने वाली भारी भीड़ इन दो तरह के कपड़ों की खरीदारी करती हैं। एक तो उपयोग में आने लायक वस्त्र जिन्हें उपहार में दिया जा सके, और दूसरे ऎसे वस्त्र जिनका आदान-प्रदान सामाजिक परंपरा का हिस्सा होने के कारण एक से दूसरे हाथों में पहुंचते रहते हैं और इनका उपयोग सिर्फ व्यवहार निभाने भर के लिए ही किया जाता है।

बात वस्त्रों तक ही सीमित नहीं है बल्कि उस हर संसाधन या वस्तु के लिए है जो उपहार में दी जाती रही है। इनकी गुणवत्ता और उपयोगिता ही तय करती है कि कौन सा किस उपयोग में लाना है। मनुष्य की यह भेद दृष्टि सिर्फ इंसानों तक ही सीमित नहीं है बल्कि इस मामले में हम भगवान तक को गुमराह करने में पीछे नहीं हैं।

बात सिर्फ पूजा-पाठ  या खाद्यान्न सामग्री, प्रसाद आदि तक ही सीमित नहीं है बल्कि जो कुछ अपने उपयोग का है उसमें हम गुणवत्ता का भी ध्यान रखते हैं और महंगी वस्तुएं ही लेते हैं। जबकि भगवान या पूजा-पाठ के नाम पर हम जो भी सामग्री लेते हैं उसमें केवल सामग्री का होना ही पर्याप्त मानते हैं, गुणवत्ता का नहीं। संख्या और गुणवत्ता दोनों के साथ हम समझौता कर लेते हैं।

सामग्री सस्ती भी खरीदते हैं और घटिया भी। अपने लिए अच्छी से अच्छी, स्वादिष्ट और उपयोगी सामग्री लेंगे और भगवान के लिए घटिया से घटिया, नाकारा। दुकानदार से सामग्री खरीदते वक्त ही हम साफ-साफ कह दिया करते हैं कि भगवान को चढ़ाने के लिए चाहिए। इसका सीधा सा मतलब दुकानदार अच्छी तरह समझ जाता है और टूटे अक्षत, सूखा व खराब नारियल, सड़े-गले फल, सस्ते वस्त्र, नाम मात्र के मेवे और दूसरी सभी पूजन सामग्री भी घटिया किस्म की और सस्ती दे दी जाती है।

मतलब हमारे अपने लिए माल-माल, और भगवान के लिए नाम मात्र की, और वह भी घटिया सामग्री। हम पूजा-पाठ के नाम पर भगवान को ठगने तक से नहीं बख्शते। फिर इंसानों की तो बात ही क्या है। सब तरफ यही सब चल रहा है।

पूजा-पाठ के नाम पर बहुत सारी सामग्री ऎसी होती है जो बार-बार विभिन्न प्रकार की पूजाओं में भी प्रयुक्त होती रहती है और उत्तरक्रियाओं तक में। असल में हमारे मन में न किसी को कुछ देने की भावना है, न भगवान या इंसान को प्रसन्न करने या रखने का हममें कोई माद्दा बचा है।

हम सब प्रकारान्तर से एक-दूसरे को उल्लू बनाने, सामाजिक दिखावे के नाम पर ढोंग करने और भगवान तक को ठग लेने में माहिर हो गए हैं। इस प्रकार की मनोवृत्ति के रहते न समाज तरक्की कर सकता है न कोई सा सामाजिक प्राणी।

जैसा हम दूसरों या भगवान को देते हैं वैसी हमें प्राप्ति होती है। सिर्फ देने और व्यवहार करने के लिए कुछ न दें, बल्कि प्रसन्नता के लिए दें। भगवान को श्रेष्ठ से श्रेष्ठ सामग्री प्रदान करें चाहे वह प्रसाद, नैवेद्य हो या पूजा-पाठ की कोई सी सामग्री। जब तक हमारी भेद दृष्टि समाप्त नहीं होगी तब तक परमात्मा हमारे कल्याण से पीछे हटा रहेगा, क्योंकि उसे हमारी नीयत और नियति दोनों का पता है। जो कुछ करें आत्मवत सर्वभूतेषु की भावना सामने रख कर करें तभी अपना, समाज और देश का कल्याण संभव है।

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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