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इंसान वही जो जो समझे प्रेम की भाषा

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डॉ. दीपक आचार्य

 

इंसान इंसान में बहुत फर्क आ गया है। एक प्रजाति के इंसानी जिस्म कहलाने मात्र के लिए इंसान हैं, दूसरे प्रकार में वे लोग आते हैं जो शरीर से भी इंसान हैं और इंसानियत के सारे गुणधर्म उनमें समाये हुए हैं।

जिन लोगों में इंसानियत है उनसे सभी लोग प्रसन्न रहते हैं क्योंकि ये लोग अपने हिताहितों को लेकर दूसरों को किंचित भी परेशान नहीं करते हैं बल्कि हमेशा यही प्रयास करते हैं कि सभी उनसे खुश रहें।  और इसी उद्देश्य को लेकर इनका पूरा जीवन औरोें को प्रसन्नता प्रदान करने के जतन में लगा रहता है।

पुराने जमाने की सारी बातें गौण हो गई हैं। आजकल इंसान के भीतर इंसानियत हो न हो, दूसरे सभी प्रकार के ऎब और दुर्गुण समाते जा रहे हैं। और इनके साथ ही तमाम प्रकार के जानवरों की वृत्तियाँ भी मन-मस्तिष्क में घर करती जा रही हैं।

कुछ लोग तो इन हिंसक मनोवृत्ति भरे स्वभाव से इतने भरे-पूरे हैं कि इनके चेहरे को पढ़ कर कोई भी इनकी मानसिकता के बारे में साफ और सटीक भविष्यवाणी कर सकता है कि इनमें किस जानवर के गुणों का बाहुल्य है अथवा किस किस्म के राक्षसी अवगुणों का भण्डार जमा हो रहा है।

इंसानों में जो असली हैं वे मानवता और प्रेम की भाषा समझते हैं और जगत में उसी के अनुरूप व्यवहार करते हैं जबकि मिलावटी और नकली इंसान अथवा सिर्फ मनुष्यदेहधारी लोग न प्रेम की भाषा समझते हैं न इनमें लेश मात्र भी मानवता का कोई अंश विद्यमान होता है।

प्रेम की भाषा समझकर उसके अनुरूप बर्ताव करने वाले लोग जहाँ रहते हैं, जिनसे मिलते हैं और जहाँ आते-जाते रहते हैं वहाँ उनकी उपस्थिति मात्र सभी के लिए आनंददायी होती है और ऎसे लोगों को सभी तरफ दिल से पसंद भी किया जाता है।

इंसानियत में अपने आप ऎसी विलक्षण सुगंध विद्यमान होती है कि जिसमें इंसानियत है उस तरफ दूसरे इंसान अपने आप खींचें चले आते हैं और एक अजीब से आकर्षण पाश के मारे बंधे होकर किसी न किसी बहाने एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। इंसानियत से भरे-पूरे लोगों को अपनी मानवीय वृत्ति का डिण्डोरा नहीं पीटना पड़ता, इनके स्वभाव, कार्य और व्यवहार ही अपने आप में इनका बखान करने के लिए काफी होते हैं।

इसी प्रकार दुष्ट लोग भी समान वृत्ति के होने के कारण एक-दूसरे के करीब आ ही  जाते हैं। लेकिन दोनों ही प्रकार के लोगों की संगत में जमीन-आसमान का अंतर होता है।  इंसानियत वाले लोग बिना किसी स्वार्थ के जुड़े होते हैं और इन सभी का उद्देश्य निष्काम लोक सेवा और सामुदायिक कल्याण होता है। इस प्रकार की दोस्ती पवित्र और प्रगाढ़ होती है और इसका कोई अंत नहीं हो सकता।

दूसरे प्रकार के लोगों का संबंध किसी न किसी स्वार्थ के कारण होता है इसलिए इसका कोई स्थायित्व नहीं होता। जब तक एक-दूसरे के काम होते रहें तब तक दोस्ताना रिश्ते चलते रहते हैं काम पूरा होने या कि बिगड़ जाने पर दिशाएं बदल जाती हैं और जिन्दगी भर यही सब चलता रहता है। नए-नए लोग आते हैं, संबंध बनाते हैं फिर संबंधों की असलियत समझ में आ जाने पर या कि इंसान की परख हो जाने के बाद अपने आप दूर हो जाते हैं।  असल में ऎसे लोगों के लिए इंसान को समझने की बजाय अपने कामों को पूरा करने-करवाने का भूत सवार होता है इसलिए रिश्तों की प्रगाढ़ता या मैत्री भाव कोई मायने नहीं रखता।

अब न वे लोग रहे हैं, न वो जमाना कि जिसमें इंसान इंसान के लिए काम आता था और समुदाय में उन लोगों की कद्र हुआ करती थी जो इंसानियत के बूते समाज के लिए समर्पित सेवाएं दिया करते थे। आजकल तो एक ही परिसर में काम करने वाले, रोजाना घण्टों साथ रहने वाले लोग भी एक-दूसरे के काम करने और निकलवाने के लिए जाने कैसी-कैसी मांगें करने लगे हैं, बिना कुछ दान-दक्षिणा या प्रसाद के कुछ करने को उनका मन ही नहीं करता।

और तो और हमारी स्थिति यह हो गई है कि हमने मानवता को छोड़ कर नंगई को अपना लिया है जहाँ न सेवा का भाव है, न परोपकार का, न वाणी में पवित्रता है, न कर्म में, सबको लगता है कि हम सारे के सारे लोगों का दिन तब तक पूरा नहीं होगा जब तक अपनी झोली में कुछ डल न जाए।

पाने ही पाने और मरते दम तक पाते रहने की इस मानसिकता में हम लोग बहुत कुछ पाने लगे हैं, पाते जा रहे हैं लेकिन इसकी एवज में हमारी झोली से सारे के सारे मूल्य बाहर निकलते जा रहे हैं, नैतिकता और आदर्शों की पुरखों से चली आ रही सीख जाने कब झोली से उछल कर बाहर पलायन कर गई, हमें पता ही नहीं।

हमारे पास अपना कहने को कुछ बचा ही नहीं है, न मूल्य रहे न संस्कार।  जिनके भरोसे हमारी जिन्दगी की जड़ें गहरे तक पैठ बनाए हुई थी उस भरोसे ने दगा दे दिया है। लेने ही लेने और जमा करते रहने के फेर में हम इतना कुछ बाहर से ले रहे हैं कि बहुत कुछ जमा कर चुकने के बाद अब हमारा अपना कहने को हमारे पास कुछ नहीं रहा, जो कुछ था वह हम कभी के लुटा चुके, परायों से ले लेकर खुद पराये हो चुके हैं।

अब हम खुद भी अपने नहीं रहे, पराये हो गए हैं। विश्वास न हो तो कभी फुरसत निकाल कर अपनी आत्मा से पूछें, सारा सच अपनी आँखें खोल देने के लिए काफी है। एक बार पूरी निष्ठा और ईमानदारी से कोशिश तो करें।

इंसान में प्रेम नहीं रहा, वह केवल प्रेम का दिखावा ही करता है । हम सभी लोग प्रेम की बातें करते हैं, पे्रम के स्वाँग रचते हैं और प्रेम के नाम पर चिकनी-चुपड़ी मीठी बातें करते हुए भरमाने का प्रयास करते हैं, सभी को अपना मानने - मनवाने का शातिराना अभिनय करते हैं और प्रेम के नाम पर अपने स्वार्थ या पुरुषार्थहीन उद्देश्य को पाने के लिए लोगों को रिझाने की जी भर कोशिशें करते रहते हैं।

प्रेम के नाम पर निरन्तर स्वाँग रचते हुए भी हमारी ढीठ, कुत्सित मनोवृत्ति और स्वार्थ ऎसे हैं कि प्रेम हमें छू तक नहीं सकता, हमारी मोटी खाल और आँखों पर चढ़े खुदगर्जी के चश्मे हमारी संवेदनाओं की निर्मम हत्या पहले ही कर चुके हैं।

यही कारण है कि हममें से बहुत सारे लोग प्रेम की भाषा नहीं समझते। जो लोग प्रेम की भाषा नहीं समझते उनके लिए दो ही रास्ते बचते हैं। या तो उनकी सदा-सर्वदा के लिए उपेक्षा कर दें अथवा उनके भीतर की संवेदनहीनता और पशुता को नियंत्रित करने दण्ड के पाशों का उदारतापूर्वक प्रयोग करें ताकि हम अपने सम सामयिक दायित्वों और सामाजिक सरोकारों को बेहतर ढंग से पूर्ण कर सकें और अपनी प्रतिष्ठा पर किसी भी प्रकार की आँच न आने पाए।

जो प्रेम की भाषा न समझे उसके लिए हम किसी भी प्रकार की भाषा का इस्तेमाल करने को स्वतंत्र हैं। जिसको जो उचित लगे वो करे, सब जायज है क्योंकि प्रेमहीन लोग इंसान के नाम पर कलंक और धरती पर फालतू का भार है जिसे हटाना मातृभूमि की सेवा से कम नहीं है। आज हर तरफ बढ़ते जा रहे इस किस्म के भार से भारतमाता को मुक्त कराना हम सभी की जिम्मेदारी है।

 

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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