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हास्य व्यंग्य : शिष्टाचार के बहाने...

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शिष्टाचार के बहाने .....

सुशील यादव .....

 

पुलिस मुहकमे में फरमान जरी हुआ कि वे शिष्ठाचार सप्ताह मनाएंगे |

आम जनता का दहशत में आना लाजिमी सा हो गया |

वे किसी भी पुलिसिया हरकत को सहज में लेते नहीं दीखते |

डंडे का खौफ इस कदर हावी है, कि सिवाय इसके, वर्दी के पीछे सभ्य सा कुछ दिखाई नहीं देता | पुलिस के हत्थे आप चढ़ गए ,तो पुरखों तक के रिकार्ड और फाइल वे मिनटों में डाउनलोड करवा लेते हैं |आप छोटे मोटे चोर हैं,तो लानत भेजेंगे की आपने कहीं बड़ी डकैती क्यों नहीं डाली |क्यों कि डकैती किये होते, तो आपका रुतबा-आतंक रहता वे आपको पीटते कम सहलाते ज्यादा..... |यहाँ तो हर आने वाला अर्दली सिपाही से लेकर थानेदार लात धुन के चल देता है |यहाँ की भाषा ,व्याकरण माँ ,बहनों के कसीदे पढने से नीचे की., कभी रहती ही नहीं |

एक ‘ठुल्ले’ शब्द के विश्लेषण के लिए ,वे लोग इन-दिनों यूँ भटक रहे हैं,मानो चालीस पार करता हुआ बेरोजगार अपनी शादी की चिंता में गड़े ताबीज के लिए भटक रहा हो ,हर पंडित को इस निगाह से देखता है जैसे वही उसकी डूबती नैय्या का आखिरी खेवन हार हो |

वे कवियों के पास पहुचे ,एक-एक कवि ने उनके जिरह को गौर से सुनकर कहा, भाई साब ,पिछले सौ दो सौ सालों के इतिहास में ये शब्द किसी शालीन कवि ने कभी श्रृंगार ,वीर रस टपकाते हुए इन शब्दों का प्रयोग कदापि नहीं किया है, ये हम दावे के साथ कह सकते हैं....... |

हाँ....... इधर कुछ लंम्पटिये हास्य रस वाले दो गली बाद आपको मिल जायेंगे |वे कलम घसीटू लोग आजादी के बाद पैदा हुए हैं शायद उनका ठुल्ला प्रेम कभी जागा हो ... और प्रशश्ति में कुछ आय-बाय कह दिए हों ,वे सोई जनता से ताली पिटवाने में माहिर लोग हैं उन्ही से पूछ देखिये .....? हास्य वालों ने घास नहीं डाला ,उनका सोचना था आये दिन इनके नाम से हम भजन संध्या करते हैं कभी ज्यादा बोल गए तो इन्ही माई-बापों के शरण में मुक्ति मिल सकेगी इस सोच में वे कहानीकारों की तरफ इशारा कर बैठे |

वे कहानीकार के पास गए ,का भइये ,’इ ठुल्ला-वुल्ला की सुने हो का’ .....?वर्दी की बिरादरी को कौन न्योतने की सोचे सो कहानीकार भी नको कर गए |उनने बाकायदा आलोचक की तारीफ की उनकी पकड के विस्तार के बारे में बताया उनके घर ,गली मोहल्ले का तफसील से पता देकर उन्हें यूँ बिदा किया कि. वे दुबारा न आ सके|

आलोचक, वर्दी को घर के सामने पाकर गदगद हुआ |ये आलोचकों की परंपरा है की वे सब तरफ के लतियाए हुओं का खूब सम्मान करते हैं |बड़े से बड़ा ग्रन्थ देख लें ,उफ नहीं करते |समीक्षा लिख मारते हैं |एक लेखक,जो रात-रात कलम घिस के जो निचोड़ ले के आता है, उसे वे गली के खजैले कुत्तो की तरह,बिरादरी में घुसने के पहले गुर्रा के, भौंक के भगा देते हैं |क्या बकवास लिखता है,,,,,,? ऐसा भी कहीं लिखा जाता है भला ......?भाषा नहीं, शैली नहीं, शिल्प नहीं.कथ्य नहीं और तो और शऊर नही लिखने का और लेखक कहाने के लिए निकल पडे हैं जनाब .....?

आलोचक की नजर वर्दी पर पड़ी, तो उन्हें लगा उनको शाययद किसी राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया हो, जिसकी सूचना देने अर्दली आया हो| ऐसा उनका उनका तजुर्बा बोलता है कि कलेक्टर लोग ऐसे कामो के लिए इन लोगो का इस्तेमाल कर लेते हैं |

अर्दली अपना स्वागत, अपनी औकात से बाहर होते देख, भौचक होते रहा |उसे समझते देर नहीं लगी कि आलोचक महोदय कनफ्यूजड हैं|उनने आने का सीधा मकसद ब्यान कर डाला |

थानेदार साहब आपके पास भेजे हैं ,वे ‘ठुल्ला’ शब्द का साहित्य-बिरादरी में प्रचलित मतलब जानना चाहते हैं |

आलोचक को पहले तो गर्व महसूस हुआ की वे पूछे गए .....मगर सन्दर्भ जानकार , अपने तजुर्बे में शायद पहली बार आघात लगता दिखा | ठुल्ला.......ठुल्ला ...दो तीन बार बुदबुदाए .......वे कान खुजाने लगे ,,,,,टालने की गरज से वर्दी से कहा मै शाम को उधर थाने में आके मिलता हूँ..... कहना .....|

शायद बहुत दिनों से, कोतवाल साहब से रूबरू नहीं हुए तो लगता है ,मिलने का संदेशा भेजा है |अर्दली को अपने कोतवाल और आलोचक के बीच इस अंतरंगता का भेद नहीं मालुम था...... वो फटाक से सेल्यूट की मुद्रा में तन गया |जो आज्ञा जनाब ....कह के लौट गया |

आलोचक ने, शब्द से ही अनुमान लगाया कि ये पद्य में प्रयुक्त होने वाला ये शब्द दीखता नहीं और अच्छे लेखको द्वारा गद्य लेखों में यह लिखा गया हो ऐसा पढने में आज तक आया ही नहीं भला इसके मिलाने की संभावना है कहाँ ......?कोतवाल साहब ने हिन्दी शब्दकोश को तलाश ही लिया होगा अत; उधर देखना बेकार है |उनको चालू भाषा की मीनिग से मतलब है |चलिए देखते हैं .....?

आलोचक इन दिनों, नेट चलाना भी सीख गया था,लिहाजा उधर झांकने की कोशिश करने पर पाया कि,आक्सफोर्ड डिक्शनरी वाले जब इस शब्द को अपनायेगे तो यूँ लिखेगे ; ठुल्ला ,”यह भारत में पाया जाने वाला एक ऐसा जीव है जो खाकी रंग के कपड़े पहनता है,जिसका पेट बाहर निकला होता है |जिसे सामने वाला अपनी जेब कितनी ढीली कर सकता है ,इसका सटीक अंदाजा रहता है |” अरे बाप रे ......आलोचक ने इस मीनिंग को मन में ही दफन करने की सोच लिया| उधर के वास्ते कोई सस्ता ,सुन्दर टिकाऊ ही चल सकेगा ,नहीं तो रोज रोज की थाना कछेरी ,कौन झेले .....?.

शाम थाना पहुचते ही , आलोचक ने कोतवाल साहब को कंसोल किया ,साहिब ये अपने दिल्ली का लोकल ओरिजिनेटेड ‘वर्ड’ है| मुंबई में तो ‘मामा’ जैसे सम्मानीय शब्द इसके लिए ,कहे जाते हैं |लोग कहते हैं ये लोकल पैदा हुए शब्द ‘कठबोली’ कहलाते हैं , जिसके मायने कम ही निकलते हैं |

समझो , आम तौर पे जो काम से जी चुराने वाले होते हैं,सुस्त काम करने वाले होते हैं , उनके लिए वापरते हैं |और साहब जी, हिन्दी वाले विचार, तत्सम ,तद्भव के चक्कर में जानना चाहें तो माफी मांगते हुए, अपने रिसर्च का ज्ञान थोड़ा आपसे, आपसी समझ होने के नाते , बघार लेता हूँ .......?आलोचक ने कोतवाल से प्रश्नवाचक मुद्रा में देखते हुए चुप्पी साध ली....... | आलोचक जी,.... ब्यान जारी रहे......यूँ भी हम आज फुर्सत में हैं......|..बड़े साहब की अर्धागानी एक हप्ते को मायके गई हैं ,स्टेशन में गाडी पकडवा आये हैं ,मसलन,आगे वहां अटेंडेंस वगैरा का चक्कर नहीं है ......,हाँ तो क्या बताने जा रहे थे आप ......?

कोतवाल साहेब ,आप लोगों में ‘घ्राण’ शक्ति बड़ी तेज होती है ,कहे हैं लोग .....|

आलोचक जी शुद्द्थ हिन्दी मत झाडो भाई..... अगर घ्राण जानते तो ठुल्ला भी हमको पता ही होता |

बताओ ‘घ्राण’ क्या होता है ?

साहेब इसे ‘सूघने’ की ताकत कहते हैं |इस शक्ति या ताकत के बूते आप लोग जान लेते हैं कि किस अपराधी में कितना दम है ,कितना दे जाएगा...?

इसी शक्ति का दूसरा पहलू ये है कि,पैसों से बौने अपराधी देख के,आमतौर पर वर्दी वालों में तकरार चालु हो जाता है |

जहाँ देखे नहीं कि, आसामी तगडा नहीं है ,भाग गया है ,पेशी की तारीख में हाजिर करना जरुरी है, तो वे एक दूसरे पर जिम्मेदारी ठेलने लग जाते हैं, जा....ला ..... ढूढ के ....परजाई के खसम को .......? .’तू ला , नही तू ला’......|

ये तू ला ...तू ला ... की चिकचिक जब पब्लिक तक पहुचती है तो अपभ्रंश होते होते .....’ठुल्ला’ का पैजामा पहन लेती है |

साहेब क्लीयर है ......?ये सब आफ दी रिकार्ड है साहेब ....आफिसीयल कुछ भी नहीं .......| आलोचक ने गर्व से उठते हुए कहा .....कोई सेवा का मौक़ा आगे भी दीजिएगा ...चलता हूँ ...|

आलोचक....! तुम यकीन से कह रहे हो न, हमे ‘आई जी’ तक बात पहुचानी है ,अभी भी सोच लो ,इस शब्द का,कोई अपभ्रंश , माफिया, सरगना ,या किसी बहाने माताओं बहनों के चरण रज तक तो नहीं जाता ना ......?

सर,भरोसा रखिये , आप डंके की चोट पर बता आइये .....|ठुल्ला ,कोई बहुत ज्यादा ठेस पहुचाने वाला ‘शब्द’ नहीं है |’आराम तलबी; से संबंध रखने वाला साधारण सा शब्द, कोई गाली भला कैसे हो सकता है...... हाँय .... ?

कोतवाल साहब को, लगभग करीब के मीनिंग जानने के बाद, कम्पेयर करने पर ,अपने थाने में प्रयोग आने वाले शब्दों से ज्यादा, अफेनसिव नहीं जान पडा| वे दबी जुबान से मुस्कुरा बैठे ......|

“बेचारे आम आदमी ,इनकी औकात इससे ज्यादा की हो ही नहीं सकती .....?क्या खा के हम पर हमलात्मक (तमक के हमला करने वाले )बनेगे ?”

गलत मीनिंग वाला जूमला, हम लोगो के खिलाफ ‘फिट’ करके तो देखें .....!.एक एक स्सालों के ‘मल गमन मार्ग’ तक को सुजाने में, अपने जवान ‘कमी’ नहीं करेंगे |

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

susyadav7@gmail.com

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५/८/१५

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