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गीत गंगा का नया भागीरथ- मधुकर गौड़

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मधुकर गौड़

 

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-देवी नागरानी

गीत और गीतकारों का जहां कहीं भी प्रसंग छिड़ता है वहाँ श्री मधुकर गौड़ का संदर्भ और उल्लेख एक अनिवार्यता बन जाती है। समकालीन गीत रचना के यशस्वी गीतकार-मधुकर गौड़ सम्पूर्ण रूप से गीत को समर्पित शख्सियत हैं। वे गीत के भाव जगत में कुछ इस तरह रच-बस गए हैं जैसे गीतलता का अमृत कुंड उनकी नाभि में बसा हुआ है। इसी कारण उनका सारा लेखन, संपादन, पत्राचार, संवाद और यहाँ तक कि निजी दिनचर्या भी गीतमयी हो जाती है। व्यक्ति के निर्माण में समाज का, उसके परिवेश व परिवार का महत्वपूर्ण योगदान होता है। कोई भी व्यक्ति सामाजिक परिस्थितियों के प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता, और न ही अपनी प्रकृति से, जो उसके व्यक्तित्व को प्रभावित करती है। अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व के साथ जब व्यक्ति जीवन-संघर्ष में शामिल होता है तब उसे अपने व्यक्तित्व की सार्थकता महसूस होती है। जी हाँ मैं मुंबई से गत 28 वर्षों से छंद को समर्पित चर्चित पत्रिका “सार्थक” के सम्पादक एवं “मरुधारा’ राजस्थानी भाषा में नवांतर साहित्य की अनूठी छहमाही पत्रिका –जिसका 2010 से श्री मधुकर गौड़ जी सम्पादन करते आ रहे हैं उनका ज़िक्र कर रही हूँ।

 

साहित्य सफर में अपने स्वतंत्र लेखन की डगर पर अथक सफर के पथिक श्री मधुकर गौड़ जी ने विविध विधाओं में सृजन किया है और एक जागरूक कलमकार के रूप में पहचान बनाई है। उनके गीतों की विविधता, वैभव, भाषा शिल्प का सौन्दर्य बोध छिपाए नहीं छुपता। सूरज के सामने उंगली रखने से भला प्रकाश कहाँ रुक पता है। समस्त जीवन उनके जिये हुए तजुर्बों और अनुभवों को उनके गीतों में विद्यमान है। सरलता भरा उनका व्यक्तित्व कई बार उनके घर पर मिलने पर सामने आता है कि किस तरह वे जवान पीढ़ी के लेखकों को नवगीत की राह पर मार्गदर्शित करते हैं और प्रोत्साहित भी करते हैं। अगर उन्हें कोई रचना गीत के गुणों से परे लगती है, या भाव बिन या लयात्मकता की कमी के कारण गीत सी न लगे, या वह गीत शब्दों से लदा हुआ हो, जिसमें आत्मा न हो--तो वे बड़ी साफ़गोई से कह देते हैं, यह कैसा गीत है? गीत को गीत जैसा लगना होना चाहिए, नदी, हवा की तरह लयमय, दिल की धड़कन की तरह लयमय। गीत का मतलब है लय...!

 

राजस्थान के मरुस्थल से निकलकर मुंबई महानगर में कश्मकश के हर दुर्गम पड़ाव को पार करते हुए हिन्दी काव्य जगत में अपनी एक सर्वोतम पहचान बनाकर बस जाने वाले गीत-यात्री मधुकर गौड़ के लिए हिसार के प्रो॰ उदयभानु ‘हंस’ का कहना है - “मधुकर गौड़ एक व्यक्ति का नाम नहीं बल्कि एक सजीव आंदोलन, एक शिवसंकल्प से प्रेरित अभियान, एक मिशन का नाम है। वह साहित्य जगत का एक भगीरथ है।“ सच भी है। जीवन की पुस्तक का हर रोज़ एक नया बाब पलटने वाले, पलटकर पढ़ने वाले कर्मयोगी श्री मधुकर गौड़ जी, गीतों को जैसे सोच के संग से तराशकर सजीव कर देते है, कुछ यूं कि लय में धड़कते हुए दिल की मानिंद गीतों के शब्द भी सहृदय से निकलकर साँस साँस धड़कते हुए से लगते हैं। सांस सांस गीत में मधुकर जी खुद भी इस बात की पुष्टि करते हुए लिखते हैं-

पाषाणों के सीने से भी /जल निकलता रहता है

सच्चे मन से बात करो तो /हल निकलता रहता है

 

डॉ. किशोर काबरा ने (अहमदाबाद) मधुकर जी के गीतों के प्रति अपनी आस्था स्पष्ट शब्दों में ज़ाहिर करते हुए लिखा है --”ईमानदार शब्दों में, ईमानदार मन की, ईमानदार अभिव्यक्ति’ इस पंक्ति में उनके गीतों की व्याख्या है. मधुकर जी नख से शिख तक गीत ही गीत है, शायद इसीलिए उनकी भावनाएँ भी शब्दों में सांस लेते हुए कहती हैं --

गाते गाते गीत मरूँ मैं / मरते मरते गाऊँ

तन को छोड़ूँ भले धरा पर /गीत साथ ले जाऊँ

अद्भुत सत्यम, अद्भुत शिवम, अद्भुत सुंदरम!

 

गीतों को समर्पित इस साधक की वाणी में ओज तथा निर्भीकता स्पष्ट झलकती है! अभिभूत करती वाणी!

  • आपकी की बतियाती भाषा में मार्मिक बिंबों की भरमार---‘ईमानदार शब्दों में, ईमानदार मन की, ईमानदार अभिव्यक्ति के स्वरूप देखें —

ग्रंथ अनेकों लिखे गए जीवन में

लेकिन अब भी भेद बहुत से कहने हैं

 

  • यथार्थ आँकती, और झूठ के विरुद्ध शंखनाद करती है उनकी वाणी मशाल जलाए रखने वाले साहित्य के अजय-योद्धा के प्रतीक स्वर सी उनकी बानगी देखें --

भाग्य भरोसे कैसे छोड़ूँ / गति का कायल हुआ हमेशा

अक्षर को स्वर तक पहुंचाने /सरगम घायल हुआ हमेशा

  • भाषा में मार्मिक बिम्बों की भरमार देखें इस बानगी में --

संस्कार की नथ के मोती बिखरे हैं / टिकुली की बातों ने

संयम तोड़ दिये, /अब कंगन पर दोष लगाना ठीक नहीं,

अब घूँघट ने सारे /नियम तोड़ दिये ! (साँस साँस गीत )

 

वे आज के समय की विषमताओं को शब्द देते हैं-

कौन चवन्नी की सुनता है /रोज रुपया रौब जमाता,

किस्मत का बेचारा / नए नए ताबीज बनाता.....

 

इसी तरह वे प्यार के प्रति भी खूब संवेदनशील हैं –

जी करता है हरियाली संग / चौपड़, ताश बैठ कर खेलूं

और मोहिनी के अन्तस की /पीर बाँध कर कांधे ले लूं.

 

शब्दों में सौन्दर्य छलकाता एक और बिम्ब जीवन की धड़कन की मानिंद गुनगुनाता सा —

मैंने गीतों के शब्दों का / बिजली से व्याह रचाया है

बदली के हाथ किये पीले /रिमझिम की सेज सुलाया है..

 

बिम्ब में आश्चर्य रूप से जो प्रयोग है वे विस्मित किए बिना नहीं रहते-

कोई नींद पहन लेता है /मेरी आँखों से लेकर,

कोई पास बुला लेता है /यादों को कंगन देकर।

 

  • गीतकार मधुकर जी का अक्खड़पन दीवानगी की हदों को छूता हुआ अपनी बानगी में कह रहा है —

दिवाने आखिर दिवाने /तहज़ीब भला वो क्या जाने

वो शहर का ठेका क्या लेंगे /जो खुद को भी ना पहचाने ...

मुंबई से नवनीत के संपादक श्री विश्वनाथ सचदेव जी का उनके व्यक्तित्व पर यह कथन -- “मधुकर गौड़ खुरदरी सी खुद्दारी वाला व्यक्तित्व है। वे स्पष्टवक्ता हैं, जो मन में आता है, कह देते हैं, मन में कुछ छिपाकर नहीं रखते। जो सही लगता है उसके लिए अड़ जाते हैं, लड़ पड़ते हैं, इसलिए कुछ लोग उन्हें अक्खड़ मानते हैं। मुझे उनका यह अक्खड़पन पसंद है।“ ऐसे लगनशील और जिद्दी गीतकार की शब्दावली में वही शोख मिजाज़, वही अक्खड़पन के तेवर इस बिम्ब में भी ज़ाहिर हैं—

मैंने कहाँ हार मानी है / जनम जनम का हूँ मतवाला

अँधियारे ने डर कर शायद / मेरी आँखों को मथ डाला।

 

एक लेखक का दायित्व किसी एक व्यक्ति समूह, समुदाय तक ही सीमित नहीं होता बल्कि पूरे समाज के प्रति होता है.....!

मधुकर जी ने भी खुद एक जगह लिखा है...

साफ़ लफ़्ज़ों में सदा कहने की आदत है मुझे

आग हूँ मैं धूप को सहने की आदत है मुझे....

वाह ! शिद्दत हो तो ऐसी !

बेधड़क, दबंग तेवर उनके व्यक्तित्व में शामिल हैं।

 

10 अक्टूबर 1942, चुरू (राजस्थान) में जन्मे पं. मधुकर गौड़ के रचना संसार के विस्तार के लिए यही कहना ठीक होगा- ‘sky is the limit.’ उनके अब तक के प्रकाशित संग्रह हैं-33 ग्रन्थों से सम्बद्ध, 16 संकलन स्वयं के, एवं 17 ग्रन्थों का सम्पादन। वे राजस्थानी में भी लिखते हैं और राजस्थानी के आठ संकलनों से सम्बद्ध हैं.

उनके कई संकलन जो मेरी लाइब्ररी की शोभा बढ़ा रहे हैं, वे हैं: अंतस की यादें, गुलाब (मुक्तक, रुबाई, शेर), देश की पुकार(राष्ट्रीय गीत), श्री रामरस (दोहे), सांस-सांस गीत (गीत, दोहे, शेर, मुक्तक), गीत गंगा का नया भगीरथ (सम्पादन: डॉ. रामजी तिवारी), आखर आखर मोल –(सम्पादन: हृदयेश मयंक)।

उनके पास जीवन के विविध प्रकार के अनुभवों का विशाल भंडार है। उनके दोहों की लाक्षणिक और प्रतीकात्मक शैली में वर्तमान जीवन की कुछ कड़ी सचाइयों की झलक दिखाई देती है...

ग्रंथ-गहन कितने पढ़े, दो शब्दों को छोड़

राम ग्रंथ के पृष्ट पर, अपने मन को मोड़

मन सरवर में राम है, मन धारा में राम

जब चाहे तब बोलिए, सुबह रहे या शाम...(रामरस)

*

मुक्तकों में कहीं कहीं सूक्तियों के संकेत मिलता है-

मेरा कफ़न मुझे ही सीना आता है / हर पीड़ा को हंस कर पीना आता है

चाहे कितनी हो मँझधारों में लहरें / तूफानों में मुझको जीना आता है

मधुकर जी राष्ट्रीय स्तर के गीतकारों से जुड़े रहे हैं, उनकी शब्दावली एक मानव की नहीं समस्त राष्ट्रीयता का प्रतिनिधित्व करते हुए संकेतों के तीखे स्वरों में कहती है -

अनगिन शहर बसे हैं मुझमें/ अनगिन चेहरों के उसूल है/

कुछ उनमें खिलते गुलाब से/ कुछ तबीयत से ही बबूल है।

 

श्रद्धेय डॉ. रामजी तिवारी जी की एक समीक्ष्य-कृति: ‘गीत वंश’ का एक अंश है- “वर्तमान परिवेश में व्याप्त भ्रष्ट व्यवस्था और नैतिक मूल्यों का छिछोरापन कवि को पीड़ा प्रदान करता है। कवि को लगता है वर्तमान जनतंत्रीय व्यवस्था में साँपों की सत्ता के नीचे जो दुकानदारियां चल पड़ी हैं, उनमें ईमानदारी की रोशनी का खुलेआम अपहरण हो रहा है और सत्य की निर्मम हत्या हो रही है.”-. जिनके संदर्भ में गौड़ जी लिखते हैं-

जिनसे उम्मीद बांधे हुई थी सदी / वे ही धोखों का लेकर जुलूस आ गए

कुर्सियों की न क़ीमत हुई कम कभी / उनपे उनसे भी बढ़कर मनहूस आ गए।

 

गीतों में प्रतिबद्धता के लिए उनका अथक सफ़र आगे और आगे जिस तरह क्षितिज की ओर बढ़ता चला जा रहा है, मैं यही कह सकती हूँ कि रब करे उनकी क़लम ज़ोर और पुरज़ोर अभिवयक्ति का मधायम बने। कुंते जी के शब्द गूज़ बनकर यादों में प्रतिध्वनित होकर जैसे कह रहे हों...

मैं तो दरिया हूँ मुझे अपना हुनर मालूम है

मैं जिधर भी जाऊंगा, रास्ता बन जाएगा !

सरल शब्दों में गूढ से गूढ़तम भावानुभूतियों को सहजता से काव्य-भाषा में प्रस्तुत करना मधुकर जी की विशिष्टता है। उनके गीतों के विस्तार से उनकी प्रतिबद्धता न केवल गीतों में परिलक्षित होती है, अपितु उनके स्वभाव का अभिन्न अंग बनी दिखाई देती है। एक तरह से वे गीतमय हो चुके हैं, गीत गाते हैं, गीत ओढ़ते हैं, गीत बिछाते हैं। गीतों की शब्दावली उनके जिये हुए पलों का यथार्थ है।—

शब्दों को गली गली बेचा / गीतों का मान बदल डाला

झुक झुक कर गरिमाएँ बेचीं/ सारा सम्मान बदल डाला।

 

गीत के लिए राग और अनुराग का काव्यात्मक एवं कलात्मक सहयोग परम आवश्यक है, जो उनके गीतों की लय ताल में पाया जाता है। मधुकर जी से जुड़ना मतलब है समस्त गीत परंपरा से जुड़ना। वे स्तरीय साहित्य-चेतना की मशाल जलाए रखने वाले साहित्य के अजय-योद्धा हैं जो केवल गीत ही नहीं समूची कविता के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनके स्वर आज राष्ट्रीय स्तर पर गूंज रहे हैं।

‘गीत गंगा’ के संदर्भ में अहमदाबाद के श्री भगवत प्रसाद मिश्र नियाज़ जी ने समीक्षा लिखते हुए कहा है-‘ऐसे समर्थ गीतकार की कृति की समीक्षा लिखना तलवार की धार पर चलने के समान है। ‘गीत गंगा एक भगीरथ’ एक संदर्भ ग्रंथ है जो हर घर में गीता की तरह अपने शब्दों की झनकार और सुरमई संगीतमय धारा बनकर कल कल बह रहा है।

उनके बेबाकी की बेमिसाली का एक मिसाल इन शब्दों में करवटें ले रहा है.....ज़रा देखें, सुनें, महसूस करें.....

एक अगन ले घूम रहा हूँ / एक तपन मेरी साथी

स्वयं पीर से व्याह रचाया / बिना तेल जलती बाती

 

जन को जन के साथ, दम को दम के साथ जोड़ने का यह सार्थक प्रयास संजीवनी से कम नहीं। डॉ. राधेश्याम शुक्ल की ये पंक्तियाँ विचारों के मंथनोपरांत गीत के प्रति अपनी मान्यता को सामने रखते हुए कह रहे हैं--

अनसुनी रह गई राग की बांसुरी /अनछुई रह गई फूल की पांखुरी

बेतुके शोर के लोग आदी हुए/ हो विरस खो गई गीत की माधुरी

 

यह है गीत के प्रति उनकी निष्ठावान सोच, जो गीत के जटिल से जटिल कथ्य को सहज संवेद्ध बना देती है। यही गीत की परम्परा है, यही उसकी व्यापकता है !

संपादक के रूप में गीत की प्रस्तुति में मधुकर जी अपनी एक अलग पहचान रखते हैं। ये कहने में अतिशयोक्ति न होगी कि वे सम्पादन की कुशलता में रचनाओं का चयन भी उल्लेखनीय है। पत्रिका के माध्यम से आप एक सारस्वत यज्ञ करते चले आए हैं। छंद को समर्पित हिन्दी जगत की चर्चित साहित्यिक पत्रिका ‘सार्थक’ में मधुकर गौड़ के प्रकाशित कुछ विशिष्ट संपादकीय हमें उनकी विचार धारा से परिचित कराते हैं-जहां देखने में आता है कि वे बिना भेद भाव के स्तरीय रचनाओं को प्रस्तुत करते आए हैं। नाम से अधिक उन्होने रचनाओं को ही अधिक महत्व दिया है। मधुकर गौड़ को प्राप्त सम्मान एवं उपाधियों की सूची में कुछ खास खास उपलब्धियों का ज़िक्र यहाँ करूंगी जो उन्हें हासिल हुई हैं- श्रीमति प्रतिभा सिंह पाटिल राज्यमंत्री महाराष्ट्र राज्य द्वारा “ श्रेष्ठ साहित्यकार सम्मान”, काव्य पर सर्वोच पुरुसकार-‘संतनाम देव’, श्रेष्ठ साहित्य सेवा सम्मान (हिसार), “गीत श्री” सम्मान(म. प्र.), “श्रेष्ठ साहित्यकार सम्मान” (राजस्थान), “साहित्य श्री” (राजस्थान), सृजन सम्मान” (रायपुर), “साहित्य-सरस्वत सम्मान” प्रयाग, “निराला सम्मान ” (हैदराबाद),”विशिष्ट साहित्य सम्मान” उदयपुर, सर्वोच्च गीति सम्मान” मुरादाबाद, “गौरी शंकर कमलेश स्मृति सृजन सम्मान” (कोटा)। आपके साहित्य पर अब तक चार शोध हुए हैं।

 

उनके साहित्य के सफ़र में हमसफ़र, कुछ देर ही क्यों न सही, कुछ पल ही क्यों न हों, गीत-गंगोत्री में डुबकी लगाने के इस प्रयास में मुझे श्री भगवत प्रसाद मिश्र नियाज़ जी के शब्द याद आ रहे हैं- ‘ऐसे समर्थ गीतकार की कृति की समीक्षा लिखना तलवार की धार पर चलने के समान है।“ मुझे भी यही कहना है ---

पढ़कर गीतों को लगा, जैसे गीता सार मधुकर जी को वंदना ‘देवी’ की हर बार.

जय हिन्द !

--

 

देवी नागरानी, पता: ९-डी॰ कॉर्नर व्यू सोसाइटी, १५/ ३३ रोड, बांद्रा , मुंबई ४०००५०

--

 

मधुकर गौड़ , पता: 302-ए, ब्लू ओशन-1, महावीर नगर, कांदिवली, मुंबई-67.

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