लघुकथा - मन की कठोरता

image

मन की कठोरता

अंजू ड़ागर

मैं और मेरी मित्र एक बार बाज़ार गये,बाजार में अत्यधिक भीड़ होने के कारण, मैं कुछ भी नहीं ले सकी. ऐसा नहीं था कि मैं भीड़ को धक्का मारकर अपना काम नहीं निकाल सकती थी, परंतु मुझे यह अच्छा नहीं लगता पर मेरी मित्र ऐसी चीज़ो में बिल्कुल मेरे विपरीत मनःस्थिति की है. उसे अगर कोई वस्तु चाहिए तो वह पूरी एडी- चोटी का ज़ोर लगा देती है. हम समान ले ही रहे थे कि तभी वहाँ एक छोटा ग़रीब बच्चा अपनी बहन को साथ लिए हमारे साथ में खड़ी एक महिला से हाथ फैलाकर कुछ माँगने लगा.

वह महिला बार-बार उन्हें दुतकारती पर वह बच्चा भी वही खड़ा रहा....उसकी ऐसी हालत देखकर मुझे उस पर दया आ गई और मैने अपने पर्स से एक दस का नोट निकालकर उसे दे दिया....उसने वह नोट लेकर खुशी से मुझे सलाम किया और फिर पहले की तरह ही उसी महिला से रूपये माँगने लगा.

"बड़ा ही ढीठ लड़का है....रुपये दे दिए फिर भी माँगे जा रहा है, तुम्हें कुछ देना ही नहीं चाहिए था."मेरी मित्र ने झुंझलाकर मुझसे कहा.

मैं मन-ही-मन सोचने लगी क्या कारण है कि वह बार-बार उसी महिला से रुपये माँगने की ज़िद कर रहा है. मुझे इतना जिग्यासु देखकर दुकान वाले लड़के ने बताया..

“इ तो यहाँ रोजाना कुछ ना कुछ लेने आती है...ओर जाते वक्त इतना समान ले जाती है कि हाथो में ओर समान लेने की जगह ही नहीं बचती....ये रोज़ाना इन्हे देखता था ..... इसलिए शायद आज कुछ माँग बैठा..."

मुझे उस महिला पर बड़ा गुस्सा आया……..कोई इतना कठोर कैसे हो सकता है? कुछ नहीं तो कम से कम बीस रुपये ही दे देती उस बच्चे को ,और वाकई में उसके हाथों में रंगीन थैलियों के बड़े बड़े बंडल थे. मुझे ऐसे लोगो की सोच पर बड़ा ताज्जुब होता है जो हज़ारों हज़ारों रुपये अपनी छोटी छोटी इच्छाओं को पूरा करने में खर्च कर देते हैं पर यदि किसी मजबूर की मदद करनी पड़े या देने पड़े तो वही एक एक रुपया भी उनके लिए महँगा हो जाता है. घर लौटकर भी वही चित्र मेरे सामने बार बार आ रहा था और मैं यही सोच रही थी की क्या वाकई आज लोगों की इंसानियत मर गई है? किसी के भले के लिए रुपये देना या खर्च करना हमे पैसो की बर्बादी लगती है ओर वही दूसरी ओर हमे खुद पर अँधाधुन्ध खर्च करना भी सामान्य बात लगती है...यदि ऐसा ही होता रहा तो आगे के समय में तो शायद हमें इंसानियत शब्द का मतलब भी पता नहीं होगा.

अंजू ड़ागर

टी-१५/१,उरी एनकलेव,बरार स्क्वेयर,दिल्ली कैंट- १०

anjudagar937@gmail.com

0 टिप्पणी "लघुकथा - मन की कठोरता"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.