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कहाँ है सावन ?

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डॉ. दीपक आचार्य

 

सावन ...

यह ऎसा शब्द जिसका नाम लेते ही कली-कली खिल जाती है, पहाड़-पहाड़ हरे दिख जाते हैं, नदियाँ-नदियाँ अपना अलग ही संगीत सुनाती आगे बढ़ती चली जाती हैं, हर नाला कल-कल करता हुआ पीछे मुड़ कर कभी न देखने का पैगाम देता चलता ही चला जाता है, हवाओं का संगीत सबके तन-मन को प्रफुल्लित करने लगता है और पंचतत्वों का पुनर्भरण इतना अधिक होने लगता है कि हर किसी प्राणी में इन तत्वों की सुगंध भर उठती है, चादर चलने लगती है।

जीवन और जगत का मेल अपनी सनातन और शाश्वत परंपराओं का उद्घोष करने लगते हैं। सारे अभावों, विषादों, शोक, दुःख और समस्याओं के प्रदूषण को भुला कर मन मयूर नाच उठता है। प्रकृति अपने चरम यौवन को छलकाती हुई वन देवी की आराधना में नाचने-झूमने लगती है।

लगता है कि जैसे जड़ में भी किसी ने प्राण फूँक दिए हों और जीवन्त को इतना अधिक जीवन्त कर दिया है कि उसका कोई पार नहीं है।

यह वही सावन है जिसमें प्रकृति अपने सहस्रों श्रृंगारिक स्वरूपों के साथ दिखती है और उसका हर क्षण आनंद और उल्लास का सागर उमड़ाता प्रतीत होता है।

सावन का महीना वह दुर्लभ योग होता है जिसमें हर साँस सघन प्राण ऊर्जा की सुगंध का अनुभव कराती है और हर भ्रमण वन भ्रमण ही होता है। प्रकृति के उन्मुक्त आँगन में पेड़ों की डालियाँ अपने आप झूला बनकर नैसर्गिक क्रीड़ाओं और झूलों का आनंद देती रही हैं।

सावन के नाम पर इतना सब कुछ कि पता ही नहीं चलता कि हम यकायक स्वर्ग में कैसे आ गए जहाँ वन, उपवन, वाटिकाएं और वह सब कुछ हमारी आँखों के सामने रहता था जिसकी कल्पना हम शेष पूरे साल करते रहते हैं।

सावन की प्रतीक्षा हर कोई करता है क्योंकि यही वह माह है जिसमें प्रकृति और जीव के बीच एकतानता स्थापित होती है, परस्पर कर्षण शक्ति से सब खींचे चले आते हैं और जीवन को प्रकृति से वह सब कुछ प्राप्त हो जाता है जो अपेक्षित होता है।

प्रकृति भी हमसे यही अपेक्षा करती है कि हम भी उसे वह दें जो उसके प्रति हमारे दायित्वों की श्रेणी में आता है। पेड़-पौधे चलकर कहीं नहीं जाते उन्हें पैदा किया जाता है, उनके विस्तार और पल्लवन का काम हमारे जिम्मे है।

सावन को लेकर हर किसी के तन-मन में जितनी जबर्दस्त तड़प होती है उसका कोई पार नहीं है। जनजीवन और लोक गीतों से लेकर फिल्मों तक में सावन का जिक्र इतना अधिक होता रहा है कि  इनकी पंक्तियाँ हर आयु वर्ग के लोगों को सुकून देने के लिए काफी होती थीं।

अब सब कुछ हवा हो गया है। सावन सिर्फ नाम का रह गया है।  ईंट-सीमेंट और कंक्रीटों से भरी बस्तियों में दूर-दूर तक सावन गायब है।  मन्दिरों, राजप्रासादों और घरों तक सावन का नामोनिशान नहीं है।

सावन के नाम पर तेज रोशनी की रंगीन चकाचौंध के बीच धातुओं के झूलों में बैठे भगवान भी प्रकृति के संगीत, सुगंध और सुकून से महरूम हैं। निस्सीम प्रकृति, पानी, पहाड़ों और हरियाली भरे सघन कैलाश नुमा वनों में रहने वाले भोलेनाथ चंद फीट के कमरों वाले गर्भ गृहों में कैद होकर रह गए हैं।

यह तो भला हो बिल्व पत्रों का कि जिनकी खातिर भगवान को हरियाली देखने को मिल रही है और लगता है अभी प्रकृति सावन के रंग में रंगी हुई है।

जो सावन आदमी के मन और मस्तिष्क में सदैव बना रहना चाहिए वह भीतर से भी गायब है, बाहर से आदमी ने ऎसा कुछ रहने ही नहीं दिया है कि सावन हमारे करीब भी आ पाए। न पेड़ रहे, न पौधे। नदी-नाले और तालाब बौने हो गए हैं, कूओं और बावड़ियों को नल लाईनों ने अस्तित्वहीन कर दिया है।

प्रकृति को अपने करीब बनाए रखने के तमाम रास्ते हमने बन्द कर डाले हैं और खुद को छोटे-छोटे कमरों में नज़रबंद कर दिया है जहाँ हमें हवा, पानी, प्रकाश, खुला भाग और सूरज का तेज कुछ नहीं चाहिए। जो कुछ मिल रहा है वह मशीनों के भरोसे ही है। हमारी पूरी जिन्दगी मशीनी होकर रह गई है जहाँ बिजली के बगैर हम जीने की कल्पना भी नहीं कर सकते।

सब तरफ सिर्फ सावन की बातें ही हो रही हैं, सावन गायब है, जब वन ही नहीं रहे तब सा-वन कैसा? सावन की सिर्फ बातें नहीं रहें, सावन को पाना चाहें तो वह सब कुछ करें जिनसे वास्तव में सावन आता है। सिर्फ पानी का बरसना ही सावन नहीं है। हर तरह के सुकून ही बरसात होना सावन है।

सावन के नाम पर औपचारिकताएं निभाना, मेले-पर्व और तीज-त्योहार मनाना और सावन ही सावन की रट लगाना, सब कुछ बेमानी है यदि हम सावन नहीं ला पाएं। आने वाली पीढ़ी को सावन से रूबरू कराने के लिए ऎसा कुछ करें कि प्रकृति का परंपरागत सुनहरा वैभव बना रहे हैं और हम सब सावन का असली आनंद पा सकें। सावन के बिना यह जीवन बेकार है, पर सावन सिर्फ नाम का नहीं होना चाहिए।  सब कुछ छोड़ कर सावन को लाएँ।

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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