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वही साधना सफल जो कुल परंपरा से हो

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डॉ. दीपक आचार्य

 

हर इंसान चाहता है उसका जीवन सुख-समृद्धि और सुकून से भरपूर रहे, जीवन निर्वाह में किसी भी प्रकार की बाधा न आए, समस्याओं, अभावों और विपदाओं का ज्यादा ठहराव न रहे। अनचाहा न हो, मनचाहा हमेशा होता रहे। इसके लिए इंसान पूरी जिन्दगी प्रयत्न करता रहता है।

आस्थावादी लोग अपने जीवन को समस्याओं से मुक्त और खुशहाली भरा बनाए रखने के लिए ईश्वर की प्रसन्नता पाना निहायत जरूरी मानते हैं और अपने  दैनंदिन कार्य में भगवान का न्यूनाधिक समय स्मरण करते ही हैं। सच्चे और अच्छे इंसान पूजा-पाठ आदि के साथ ईश्वरीय कर्म करते हैं, सदाचार और सद्व्यवहार, मानवीय संवेदनाओं, जीव दया, दीन-दुःखियों और जरूरतमन्दों की सेवा तथा परोपकार के कार्य भी करते हैं। जबकि दूसरे लोगों की श्रद्धा इन पुरातन संस्कारों में नहीं होती बल्कि ये ईश्वर का भजन, दर्शन और पूजा-पाठ अपने रोजमर्रा कार्यों के आसानी से होते रहने  और जीवन में औरों के मुकाबले अधिक से अधिक समृद्धि पाने के लिए करते हैं।

इन लोगों की आस्था अपने कामों तक सीमित रहती है और कामों के बनने-बिगड़ते रहने की स्थिति में श्रद्धा और विश्वास गड़बड़ाता रहता है। ये लोग जीवन में कई बार भगवान को भी भुला देते हैं और कई बार कहीं न कहीं से चपत पड़ने पर फिर पकड़ भी लेते हैं।

आस्था और ईश्वरीय श्रद्धा के मामले में इनकी पूरी जिन्दगी अनिश्चयात्मक ही होती है । इनके स्वार्थ और कामों के आधार पर भक्ति का दौर चलता रहता है। भक्ति, विश्वास और सद्भाव किसी के प्रति भी होना या न होना पूरी तरह वैयक्तिक विषय है लेकिन साधना के मामले में यह देखना जरूरी है कि कौनसी साधना हमारे अनुकूल है और किसका आश्रय प्राप्त करने से हमें जीवन का आनंद, हर प्रकार का लाभ और ईश्वरीय अनुग्रह सभी की जल्दी और आसानी से प्राप्ति होगी और जीवन भर सुकून का दरिया निरन्तर बहता ही रहेगा।

हर व्यक्ति के लिए सर्वाधिक कारगर और जल्दी सिद्ध होनी वाली साधना वही है जो कुल परंपरा से ग्राह्य है तथा कुल एवं गौत्र-प्रवरादि के देवता, देवी, भैरव, गणपति और तमाम परंपराओं से युक्त होकर चली आ रही हो। कुल परंपरा से साधना करने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि थोड़ी सी साधना से अपने पूर्वजों,  ऋषियों और कुलदेवता से सीधा संबंध उसी प्रकार जुड़ जाता है जैसे कि बिजली का फ्यूज वायर जोड़ते ही बिजली शुरू हो जाती है।

अपनी कुल परंपरा एक और जहाँ पूर्वजों द्वारा की गई साधना और ईश्वर तक अपनी सीधी पहुंच बनाने वाले साधना मार्गों से हमें जोड़ती है वहीं उनसे होकर भगवान और हमारे बीच सीधा तंतु जुड़ जाता है जो हमें कम समय में सिद्धि और आशातीत सफलता दिलाता है। आवश्यकता बस एक बार कुल परंपरा के ताने-बाने से जुड़े बेतार संबंधों को जोड़ने की है। एक बार संबंध जुड़ जाने के बाद हमारी हर राह आसान हो जाती है, फिर चाहे वह धर्म, अर्थ, कर्म से लेकर मोक्ष तक की यात्रा हो या फिर साधना में सिद्धि, बुद्धत्व प्राप्ति की हो या फिर किसी भी प्रकार की महान से महान उपलब्धि।

यही कारण है कि पुरातन भारतीय साधना पद्धति और नित्यकर्म, नैमित्तिक कर्म और काम्य कर्म सभी में मंत्र द्रष्टा, ऋषि, छन्द, देवता और अपने कुल, गौत्र से संबंधित समस्त की श्रृंखला का स्मरण करने-कराने के लिए हर कर्म में विनियोग का प्रावधान है। यह अपने आप में तार जोड़ने की वह प्रक्रिया है जो साधना के बल का जबर्दस्त करंट प्रवाहित करती है और एक बार यदि हमारे शरीरस्थ चक्रों में यह दैवीय और दिव्य करंट आ जाए तो फिर जिन्दगी भर के लिए दैवीय कृपा की वृष्टि करता रहता है और यह दैवी सम्पदा की प्राप्ति तक कराता है जहाँ पहुंच कर साधक को कुछ नहीं करना होता है, उसकी समस्त आवश्यकताएं चरम वैभव और आनंद के साथ स्वतः पूर्ण होती रहती हैं।

कुल परंपरा से साधना होने पर साधना चक्र जीवात्मा के पूर्वजन्मों, पूर्वजों की साधना और कुल देवता-कुलदेवी आदि से जुड़ जाता है और ऎसी आशातीत सफलता दिलाता है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। पर आजकल ऎसे लोग बहुत कम हैं जो कुल परंपरा और साधना विज्ञान की जानकारी रखते हैं।

बड़े-बड़े पण्डित और साधकगण भी तथाकथित बाबाओं, साईंयों, योगियों, साधुओं, तांत्रिकों, मांत्रिकों, औघड़ों, अधकचरे साधनामार्गी पाखण्डियों, धूत्तोर्ं, कपटियों और सांसारिक ऎषणाओं में डूबकर भोग-विलास के संसाधन जमा करने वाले ठगों, गुरुघण्टालों और नालायकों के चक्कर में आकर अपनी किसी न किसी प्रकार की जायज-नाजायज इच्छाओं की पूर्ति, अपने अपराधों को ढंकने, बुरे कर्मों को छिपाने, दुनिया भर की जमीन-जायदाद पर कब्जा करने, लोगों को भ्रमित किए रखने और सभी प्रकार के कुकर्मों के माध्यम से संसार भर का वैभव पाने के फेर में धर्म के नाम पर उन मार्गों की ओर भटक जाते हैं जहाँ आगे चलकर कहीं कूआ और कहीं खाई की स्थिति होती है। ऎसे लोग जिन्दगी भर भटकते रहते हैं।

भारतीय परंपरा में संन्यासियों, योगियों, मठाधीशों और साधुओं की परंपरा रही है। असली साधु-संन्यासी वही है जो किसी न किसी पुरातन पंथ से जुड़ा हो, अन्यथा अपने-अपने हिसाब से भगवा पहन लेने वाले, डेरे चलाने वाले, आश्रम चला लेने वाले और खुद को महान सिद्ध घोषित कर देने वाले लोगों की तो इस कलियुग में भरमार है।

साधक हो या कोई सा बाबा, सभी के लिए प्राथमिक जरूरत यही है कि वह पुरातन सनातन परंपरा के किसी न किसी मार्ग या तार से बंधा हो, तभी उसे मान्यता दी जा सकती है अन्यथा भटकने वाले लोगों की तो हर तरफ भरमार ही है।

अपने आपको विद्वान और पण्डित मानने वाले लोग दान-दक्षिणा और लोकप्रियता के लिए संध्या-गायत्री और वैदिक संस्कृति को भुलाकर अपने-अपने हिसाब से गुरु बना रहे हैं, कुलाचारों से हीन होते जा रहे हैं और अपनी तुच्छ ऎषणाओं, जीवन के लोभ-लालचों को पाने के लिए ऎसे-ऎसे मार्गों को अपना रहे हैं जिनसे उनका पूर्वजों की साधना पद्धतियों, ऋषि, गौत्र आदि परंपराओं से नाता एकदम टूट चुका है।

ऎसे लोग थोड़े दिन एक साधना और गुरु को अपनाते हैं, फिर दूसरे की तलाश करने लग जाते हैं। जिंदगी भर भटकते ही रहते हैं। आज के इंसान के जीवन में बाधाओं, बार-बार विषादों, तनावों, दुर्घटनाओं, शोक और नैराश्य का मूल कारण यही है कि हम अपनी परंपरागत जड़ों से कट चुके हैं।

यह अपने आपमें आनुवंशिक संस्कारों का परित्याग है। ऎसे में हमारी आनुवंशिकता में मिलावट होकर साधना मार्ग में वर्णसंकरता जैसी स्थिति पैदा हो जाती है जो हमें न घर का रखती है, न घाट का। आने वाले कई जन्मों तक भटकाव जैसी ही बनी रहती है।

यह भटकाव हमारी संतति लेकर कई जन्मों के वंशजों तक को आनंद या सुख-चैन से नहीं रहने देता और एक समय ऎसा आता है जब हमारा वंश समाप्त हो जाता है।  इसलिए साधना मार्ग वही अपनाएं जो कुल परंपरा से जुड़ा हो, तभी लौकिक-अलौकिक एवं आध्यात्मिक लक्ष्यों में सफलता पायी जा सकती है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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