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कहानी - इंतजार

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रवि श्रीवास्तव   हर पल हर दिन उसका ख्याल मेरे दिमाग में रहता है। एक दिन बात न हो तो ऐसा लगता है कि सालों बीत गए हैं। उसे देखे बिना तो लगत...

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रवि श्रीवास्तव

 

हर पल हर दिन उसका ख्याल मेरे दिमाग में रहता है। एक दिन बात न हो तो ऐसा लगता है कि सालों बीत गए हैं। उसे देखे बिना तो लगता है कि जिंदगी का सारा टेंशन आज ही है। एक परेशान आत्मा की तरह कब से भटक रहा हूं। लेकिन वो है कि बाहर ही नहीं निकल रही है। आंखें तलाश रही थी कि एक बार दीदार हो जाए। आज शायद खुदा को ये मंजूर नहीं है।

हर रोज की मेरी आदत बन गई है। सुबह 11 बजे से गेट पर खड़े होकर उसका दीदार करना। बिना उसके दीदार के पूरा दिन ठीक से नहीं गुजरता था। घर के बाहर और अंदर लगाए रहता। फिर उसका इशारा मिलता कि धूप है घर के अंदर जाओ फोन पर बात करना। मैं खुशी से अंदर चला आता था। आज फिर मैं उसी के इंतजार में दीदार के लिए अपने गेट पर खड़ा हूं।

तेज धूप से जमीन तप रही थी। मैं भी जिद पर अड़ा था। उसे देखकर ही दम लूंगा। धूप कह रही थी कि अंदर चला जा वरना जल जाएगा। वो बेरहम बाहर निकलने का नाम नहीं ले रही थी। जैसे उसे कुछ पता ही न हो। कोई उसका बाहर इंतजार कर रहा है।

सामने घर होने की वजह से इंतजार करने में मजा और गुस्सा दोनों आ रहा था। धूप में बैठा था। तभी एक हल्की सी झलक पैर की मिली। मुझे लगा शायद वो होगी। आंखे एकदम से उसी जगह रूकी थी। पहचानने की कोशिश कर रही थी। वो है या कोई और । आजकल उसके घर रिश्तेदार आते जाते रहते थे। बुआ की लड़की भी आई हुई हैं।

तेज धूप की वजह से प्यास भी लग रही थी। सोच रहा था अंदर गया तो कही आकर चली न जाए। मैं उसे देख न पाऊं। बड़ा दर्द था इस इंतजार में। वो आज तो नहीं दिखने वाली। घर पर बहुत काम होगा। पैर की जो झलक मिली भी थी वो भी कुछ ही सेकेंड में गायब हो गई थी। दिल सोच रहा था कि वह होगी या कोई और। बगल में हैंडपम्प लगा था। कुछ औरतें पानी भरने आ रही थी।

इस भीषण धूप में बैठा देख आश्चर्य चकित हो रही थी। लोगों को गर्मी की धूप बर्दाश्त नहीं और ये लड़का धूप में बैठा पसीने से तरबदर हो गया है। उठकर जाने का नाम नहीं ले रहा है। मैं भी नीचे सर किए बैठा था। घर पर कोई नहीं था। पापा, मम्मी आफिस गए हुए थे। इक पल को मुझे लगा चक्कर आ जाएगा। प्यास और भूख ने भी अपना कब्जा मुझ पर कर लिया था।

मैं कह रहा था भगवान ये कैसी सज़ा दे रहा है। मेरी जान ले ले पर ऐसी सज़ा मत दे।

तभी एक आवाज़ कानों में गूंजती है। जिसे सुनकर मैं दंग रह जाता हूं। उस आवाज़ का जवाब नहीं था मेरे पास। काफी देर से धूप में बैठा देख बगल की एक औरत पानी भरने आई थी। ये आवाज़ उसकी थी।

अरे भैया एतनी तेज धूप है, बाहर बैठे हो बहुत देर से, बीमार पड़ जाओगे। का घर से भगा दिहिन है का। मैं उसको देखता रह गया। कुछ जवाब नहीं दे पाया। मन में सोचा कभी तूने प्यार किया है जो आज बता रही है। धूप इतनी तेज है। बीमार हो जाओगे। बीमार मैं हूंगा। और दर्द इनको हो रहा है। जिसे देखो वही ज्ञान देने लगता है। गुस्सा तो इतना आया था कि पूछो मत। फिर मन में सोचा इतनी गाली तो दे दी है। ये बात भी सही कह रही थी। चलो कुछ देर अंदर चले जाए। फिर बाहर आकर देखेंगे।

फिर दिमाग ने कहा कि यही खड़ा रह बीमार हो जाएगा तो देखने के लिए आएगी वो। दिल ने कहा जो बाहर नहीं आई वो कहां से बीमार होने पर आएगी? अब तो पूरा मोहल्ला शांत होने लगा था। लूक चलने लगी थी। मेरे दिल में जो तूफान मचल रहा था ये इस लूक से कही ज्यादा था। दोपहर के खाने का वक्त हो गया था।

लेकिन यहां तो भूख प्यास मर गई थी। आंखें छत और गेट की तरफ देखें। शायद छत पर कपड़ा फैलाने के लिए आ जाए। या फिर गेट पर इक झलक दिखला जाए।

दिल को मनाकर कहा चलो, कुछ खा पी लेते हैं। यार नहीं तो, इंतजार काफी महंगा पड़ने वाला है। वो तो खा पीकर मस्त गर्मी में कूलर के सामने ठण्डी हवा का लुफ्त उठा रही होंगीं।

मैंने ठान ली । अब अंदर जा रहा हूं। कुछ भी हो जाए वो आए य न आए। इंतजार क्या करना जब उसे मेरी कोई कदर नहीं है तो?

जैसे ही मैं पीछे मुड़ा जाने के लिए। एक मोटर साईकिल आकर उसके गेट के पास खड़ी हुई। मैं रूक गया। दिल में उमंग अब तो गेट खोलने बाहर आओगे। गेट पर खटखट की आवाज़ हुई। अंदर से कदमों की आहट सुनाई पड़ी। गेट को खोला गया। और सामने देखकर मैं बौखला उठा।

गुस्से में एक घूंसा दीवार पर मारा और हाथ की उंगली फट गई। खून निकल आया था। जिसे देखने वाला सिर्फ मैं ही था। खून बह रहा था। उंगली पर काफी चोट आई थी। लेकिन दिल पर जो चोट लगी थी वो इस चोट से ज्यादा थी। ये दर्द तो बर्दाश्त हो रहा था। दवा से ठीक हो जाएगा। दिल का ये दर्द तो अब उसके दीदार से ही सही होता।

मेरा दायाँ हाथ कांप रहा था। गुस्से में मैंने जो दीवार पर मारा था। वो सिर्फ इसलिए वो नहीं उसकी दादी ने गेट खोला था।

आज मैं काफी बेचैन था रीता को देखने के लिए। और आज वो कि निकल नहीं रही थी। यहां तक कि पानी भरने भी नहीं आई थी। मोटर साईकिल से उतरे दोनों लोग अंदर गए। गेट फिर से बंद। मुझे लगा सो रही होगी। अब घर में मेहमान आए हैं तो उठेगी। चाय नाश्ता तो देगी।

अब तो दर्शन कर लूंगा। उसके बाद घर में जाकर खाना पीना खां लूंगा। मुझसे रहा नहीं गया। सड़क पर जाकर खड़ा हो गया। उसके गेट के करीब ताकि उसे देख सकूं। आए मेहमानों ने पानी पिया। एक टिफन बाक्स उठाया। और चलते बने। गेट उसकी दादी ने बंद कर लिया।

वो चलते बने लेकिन मेरे लिए सवाल छोड़ गए। आखिर रीता कहा है। वो बाहर क्यों नहीं आ रही है। हाथों में लगी चोट को उसके गेट की तरफ करके बैठ गया अपने गेट के पास सीढियों पर। और उस तेज धूप में सपने की दुनिया में खो गया। यही कि अब दरवाजा खुलेगा। वो मुझे देखेगी। मेरे हाथों में लगी चोट को देखकर परेशान हो जाएगी। कहेगी कि ये क्या हो गया ? जल्दी से घर से पानी लाकर घाव को साफ करेगी। पट्टी बांधेगी। और कहेगी आखिर ये सब क्यों करते हो। मैं थोड़े से काम में व्यस्त थी। बाहर नहीं आ पाई और आप ने इतनी बढ़ी सज़ा दे दी अपने को।

मैं उसे फोन भी कर रहा था। फोन की पूरी घण्टी भी जाती लेकिन उठता नहीं। गर्मी के साथ मेरा पारा भी बढ़ रहा था। बस एक बार फोन उठ जाए तो उसे काफी फटकार लगाऊंगा। एक, दो बार नहीं शायद सैकड़ों बार फोन किया था। जवाब एक ही था नॉट एंसरिंग।

मेरे किसी बात से नाराज तो नहीं हो गई है। दो दिन पहले मैंने कहा था कि हम घूमने चलेंगे। वो इंतजार कर रही थी। मुझे कुछ काम से कानपुर जाना पड़ गया था। उसने फोन भी किया था। मैं उसको बता नहीं पाया था। लौटकर आया था तो काफी नाराज हुई थी। बात नहीं कर रही थी। किसी तरह से उसे मना तो लिया था।

फिर से हम बात कर रहे थे। रात में करीब 12 बजे तक हमने बात की थी। फिर हम सो गए थे। और आज सुबह से खड़ी दोपहर हो गई और वो नहीं दिखी।

मुझे तो लग रहा है। वो दो दिन पहले वाली बात का बदला ले रही है। बेरहम घर के सामने पागलों की तरह धूप में बाहर बैठा हूं। उसे बदला लेने की सूझी है।

अगर बदला लेना ही उसे था तो बता देती। कम से कम मुझे पता तो होता कि वो नाराज है इसलिए नहीं आई।

दोपहर के करीब दो बज चुके थे। या ज्यादा से ज्यादा ढ़ाई। हाथों से बहा हुआ खून सूख गया था। हाथ में सूजन आ गई थी। मेरे दरवाजे के पास गिरी खून की बूंदें जम चुकीं थी।

तेज लूक धूल को आंखों में झोंक रही थी। प्यास से गला सूख चुका था। मैं अकेला बैठा था। ईश्वर को मेरा अकेला बैठना गवारा नहीं गुजरा। शायद रहम कर लिया था।

मेरा साथी भेज दिया था। जो इस धूप में मेरे रह सके। सर नीचे किए बैठा था। तभी मेरे बालों को किसी के छूने जैसा महसूस हुआ। मुझे लगा चलो सब्र का फ़ल मीठा हुआ। मुझे धूप में बैठा देख सबसे छुपते छिपाते वो आ गई है।

इतने में हाथ मे लगी चोट को ऊपर बिना देखे आगे कर दिया। मुझे लगेगा इसे देखकर वो चौंक जाएगी। लेकिन कुछ ऐसा हुआ कि मैं चौंक गया। मेरे हाथ पर किसी की जुबान का स्पर्श हुआ। अब मुझे लग गया था कि वो नहीं कोई और है।

जब देखा तो ईश्वर ने जो साथी भेजा था। वो हर रोज सुबह-शाम हमारे दरवाजा पर धक्का मारती थी। और घर से कोई निकलकर उसे रोटी खाने को दे देता था। वो गाय हमारे हाथों को चाटने लगी थी। जिसमें चोट लगी थी।

दर्द से मैं कराहने लगा था। जैसे वो चोट को चाटते हुए कह रही हो कि ये तुमने क्या किया? इन हाथों से मुझे रोटी खिलाते थे। इसमें चोट कैसे लग गई। दर्द होने की वजह से अपना हाथ खींच लिया था मैंने।

वो गाय भी उसी धूप में मेरे साथ बैठ गई थी। जिसे मैंने पाल नहीं रखी थी। बस सुबह-शाम का दोस्ताना था।

वो इस इंतजार में बैठ गई कि उसे खाने को कुछ मिलेगा। पर भूख की आग से ज्यादा तो दीदारे हुस्न की आग लगी थी।

मैं उस गाय से कह रहा था। उस लड़की से सही तो तुम ही हो। मेरे पास धूप में बैठ गए। उसे तो मेरे करीब आने का समय नहीं है। और न ही दरवाजे पर। कि मैं उसे देख सकूं।

वो गाय अपने सिर को ऐसे हिला रही है, जैसे वो मेरी पूरी बात समझ गई हो। मैं भी बेवकूफों की तरह उसे बता रहा था। कह रहा था किसी को इतना नहीं चाहना चाहिए? उसे कदर नहीं है मेरे प्यार की न मेरी। कब से यहां इंतजार कर रहा हूं। क्या वो अपने घर के बाहर भी नहीं निकल सकती? इतनी तो पाबंदी नहीं होगी उसे। मेरे सामने बैठी गाय अपनी सींगों से मुझे धक्का दे रही थी। जैसे कह रही हो अंदर जाओ वो नहीं आएगी। धूप में मत बैठो। या फिर वो गाय कह रही है कि कुछ खाने को दो। भूख लगी है। भूख से याद आया मैं भी सुबह नाश्ता कर अपनी ड्यूटी निभाने बैठ गए थे।

काम इतना था कि उठ नहीं पाए। ये हमारी ड्यूटी ही तो थी। बाहर बैठकर किसी के दरवाजे को ताकना। समय बीत रहा था। सब्र टूट रहा था। ये क्या ये रात क्यों होने लगी है। अभी तो तेज धूप थी। और अब रात हो गई।

हाथ में दर्द बढ़ गया था। ऐसा लग रहा था कि कोई हड्डी टूट गई होगी। उंगलियां चल नहीं रही थी। ऐसा लग रहा था। जान निकल जाएगी। अंधेरा बढ़ता जा रहा था। आंखें बंद हो रही थी। सुबह-शाम का मेरी दोस्त गाय ने भी साथ छोड़ने का फैसला कर दिया। बंद हो रही आंखों से इतना तो दिख ही गया था। वो गाय वहां से उठी और आगे चलती बनी।

फिर मुझे पता भी नहीं चला कि आगे क्या हुआ। शाम को जब आंखें खुली तो मैं अस्पताल में भर्ती था। ग्लूकोस की बोतल चढ़ रही थी। हाथ में पट्टी बंधी थी। सामने मेरी मां, पापा और भाई खड़े थे। सब को देखकर बस आंख में आंसू आ गए थे।

तब तक बगल के यादव अंकल ने पूछा बेटा अब तबीयत कैसी है। मैंने कहा ठीक है। सबने पूछा हाथ में कैसे चोट लग गई। मेरे पास कोई जवाब नहीं था। डॉक्टर ने एक्सरे के लिए लिख दिया था। यादव अंकल पापा से बता रहे थे। मैं वहां से गुजर रहा था तो देखा कि आप का लड़का बेहोश पड़ा था। हाथ से खून बहा हुआ था। तो मैं वहां से इसे लेकर जिला अस्पताल आया। इमरजेंसी में दिखाने के बाद आप सबको फोन पर सूचना दी। हाथ में लगी चोट से लगता है कही मारपीट तो नहीं की है।

अब क्या था जिसे देखो बस यही बात जानने में लगा है कि आखिर क्या हुआ है? चोट कैसे लगी?

अस्पताल के बेड पर ग्लूकोस चढ़ रहा था। मेरा ध्यान फिर घर की सीढियों पर था। उसे पता चल जाएगा तो देखने जरूर आएगी।

कोई तो इसकी सूचना उसे दे दे। एक्सरे की रिपोर्ट में हाथ की दो उंगलियां टूटी हुई थी। जिन पर अब प्लास्टर चढ़ना था। बड़ा अजीब लग रहा था।

घर जाऊंगा तो वो देखकर बहुत गुस्सा होगी। कही गुस्से में अपना कुछ न कर बैठे। एक बार ऐसे ही मैंने उससे लड़ाई कर ली थी। तो उसने अपना हाथ ब्लेड से काट लिया था।

अब मैं इस हालात में घर जाऊंगा वो मुझे देखने जरूर आएगी। तो उससे क्या कहूंगा? आज तुम घर से बाहर नहीं निकले इस वजह से मैंने अपना ये हाल बना लिया। कहीं वो कह दे कि बहुत ज्यादा काम था। इसलिए बाहर नहीं आ पाए।

ग्लूकोस चढ़ जाने के बाद मुझे डिस्चार्ज कर दिया जाएगा। इतने में यादव अंकल और पापा के बीच कुछ बात हो रही थी। बातों से लग रहा था कि मेरे सामने वाले घर की बात है। मुझे लगा अब तो पकड़ा गया।

सब लोग क्या कहेंगे? यादव अंकल कुछ और कह रहे थे। उसके बाद दोनों लोग बाहर चले गए। कुछ देर बाद पापा आए। तब तक ग्लूकोस चढ़ चुका था। मुझे डिस्चार्ज कर दिया गया था।

पापा, मम्मी ने भाई को मुझे घर ले जाने को कहा। वो लोग कुछ देर रूककर आएंगे। मैं गाड़ी में बैठा सोच रहा हूं कि घर पर जैसे उतरूगां वो देखेगी तो भागते हुए आएगी।

मुझे देखकर रोने लगेगी। अब मैं फिर से उसी मोहल्ले में अपने घर के सामने था। आस-पास के लोग तो आए थे। लेकिन उनके घर से कोई नहीं आया। आता भी कैसे घर में ताला बंद था। सब लोग कही गए होंगे।

मुझे लगा कि अगर मैं अस्पताल न जाता तो उसे घर के बाहर निकलते देख लेता। हाय रे मेरी किस्मत।

अब क्या करूं। तभी एक एम्बुलेंस की आवाज़ आती सुनाई पड़ी। धीरे-धीरे आवाज तेज़ होती गई। अब तो आवाज़ कानों तेजी से भेद रही थी। गाड़ी घर के सामने आकर खड़ी हो गई। गाड़ी खड़ी होते ही रोने की आवाज़ आने लगी। लोगों की भीड़ ने पूरे सड़क को घेर रखा था। मेरे घर से भाई भी देखने के लिए बाहर निकले।

रोने की आवाज़ काफी तेज हो गई थी। मैं भी आखिर क्या हो गया देखने के लिए बाहर आया? जब मैं उस गाड़ी के पास पहुंचा तो एक बॉड़ी उतारी जा रही थी।

समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो गया? हल्की सी हवा चलने के बाद बॉडी के चेहरे से कपड़ा उड़ गया था।

अपने टूटे हाथ को लेकर मैं वहां गया था। देखकर उस चेहरे को मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई थी। मैं फिर से बेहोश हो गया था। जमीन पर गिर गया था। मैं जिसका इंतजार बड़ी बेसब्री से कर रहा था वो मेरे पास आ तो गई थी। लेकिन अब हमेशा के लिए दूर जा चुकी थी।

रोने की आवाज़ और पानी की कुछ बूंदों ने मुझे होश में लाकर खड़ा कर दिया। सब रो रहे थे मैं खामोश खड़ा था। मेरा पूरा शरीर एक बुत की तरह हो गया था।

उसका शरीर जैसे मुझसे कह रहा हो। मेरा इंतजार कर रहे थे लो मैं आ गई हूं। सब लोग कह रहे थे कि रात में एक बजे अचानक तबीयत खराब हो गई। पता नहीं चल पाया क्या हुआ? डॉ. ने लखनऊ के लिए रेफर किया था। जैसे ही ले जाने लगे। पता चला रीता अब नहीं रही। ताज्जुब की बात ये थी कि जिला अस्पताल में जहां मैं था, उसी के बगल वाले रूम में रीता का इलाज हो रहा था।

यादव अंकल और पापा के बीच यही बात हुई थी। मेरे आंखों से आंसुओं की धार शुरू हो गई थी।

लेकिन जुबां खामोश थी। मैं सोच रहा था कि सबने मुझसे क्यों छिपाया। अगर ऐसा कुछ था तो अस्पताल में आखिरी बार उससे बात तो कर लेता।

ऊपर वाले से पूछ रहा था। कितनी बड़ी सज़ा दी है। जिसके दीदार का इंतजार मैं रोज करता था, उसका आखिरी दीदार भी नहीं कराया।

जब मैं उसका आखिरी दीदार करने को मिला तो वो कुछ बोल नहीं सकती थी। ये खुदा मुझे भी इसके साथ बुला ले। इतना सोचते ही मैं फिर से बेहोश हो गया। मेरी सारी दुनिया तो उजड़ चुकी थी।

अब किसके लिए जीता? उसके शरीर को देखकर सोच रहा था। अभी झट से उठकर कहेगी ये हाथ में चोट कैसे लग गई। और मुझे लापरवाह कहेगी।

जब मैं उसे हकीकत बताऊंगा तो गले से लगाकर कहेगी इतना प्यार करते हो मुझसे। एक दिन नहीं नज़र आई तो हाथ ही तोड़ लिया।

जिंदगी भर नहीं आऊंगी तो क्या कर बैठोगे पता नहीं? शायद वो सच कह रही थी। अब मुझे जीने का कोई मन नहीं था। दिल कर रहा था खुदकुशी कर लूं।

कर भी लेता, मेरी जान तो उसके साथ ही चली गई थी।

केवल ये नश्वर शरीर बचा था। उसके अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू हो गई थी। घर की महिलाएं उसे नहला रही थी। रो रो कर सबका बुरा हाल था।

उसे दुल्हन की तरह सजाया गया। और चार कंधों पर लेकर चल दिए। मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था। मेरी रीता को मत ले जाओ। मुझे भी इसके साथ जाना है। सबको तब आश्चर्य हुआ।

मुझे कुछ लोगों ने पकड़ लिया। मैं रो रहा था, तो जैसे उसने कहा कि मैं वापस आऊंगी। मेरा इंतजार करो। अब तो ये पूरा झूठ था। वो दूसरी दुनिया में थी जहां से कोई वापस नहीं आ सकता है। उसके घर वालों का हाल बुरा था। मां तो बेहोश हुई तो अस्पताल पहुंच गई। दिमागी संतुलन बिगड़ गया। हो भी क्यों न जवान लड़की चली गई थी।

सब लोग अंतिम संस्कार कर लौटे थे। रात में सब चुप थे। मुझे पता नहीं क्या हुआ मैं शमसान में जहां उसे जलाया गया था वहां पहुंचकर उसकी राख से बात कर रहा था।

देखो न मुझे चोट लगी है। दर्द हो रहा है। उठो कब तक सोओगे। राख को अपने शरीर पर लगाता। और रोता चिल्लाता उठो। लेकिन हमेशा के लिए सोने वाले कैसे उठ सकते हैं। वो भी जो राख हो गए हो। उस शमसान में मेरी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं था।

रात काफी हो चुकी थी। मैं उसकी राख पर लेट गया। कोई तो मुझे भी आग लगा दो। अब नहीं जीना है। कब सो गया पता नहीं चला। मैं ये सोच रहा था कि ये एक बुरा सपना होगा। कल सुबह रीता मेरे सामने होगी। सुबह उठा तो एक कुटिया के अंदर था। जब उठा तो डर गया। ये डर था अपने सामने औघड़ बाबा को देखा जो काफी डरावने थे।

उन्होंने ने मेरा पता पूछा और घर का नम्बर फोन कर घर वालों को बुलाया और सारी घटनाओं के बारे में बताया। सब रोने लगें थे।

कह रहे थे बेटा होनी को कोई नहीं टाल सकता है। चलो घर चलो। घर पहुंचकर मैं लेटा हुआ था। तभी रीता के पापा घर आए और मेरी तबीयत के बारे में पूछा।

कहा बेटा, तुम्हारे और रीता के बारे में सब जानता हूं। रीता ने आखिरी समय में तुमसे मिलने की इच्छा जताई थी। लेकिन तुम अस्पताल में बेहोश पड़े थे। उसने तुम्हारे और अपने बारे मे सब कुछ बता दिया था।

मैंने कहा ठीक हो जाओ तो दोनों की शादी की बात कर लूंगा। लेकिन जाने कैसे उसे पता था कि वो हमें छोड़कर जाने वाली है। उसने कहा, पापा मेरे दिवाकर को हमेशा खुश रखना। मेरे जाने के सदमे को वो बर्दाश्त नहीं कर पाएगा। वो कुछ कर बैठेगा। मैं अपनी आखिरी कुछ आवाज़ उसे सुनाना चाहती हूं।

मोबाइल में रिकॉर्ड कर लो। लो उसकी आखिरी ख्वाहिश थी तुम ही इसे सुनो। वो आवाज़

दिवाकर मुझे माफ कर देना। आज सुबह मैं बाहर नहीं आ पाई। मुझे पता है कि तुम मेरा इंतजार कर रहे होगे। धूप में बैठे होगे। मैं इस हालात में फोन भी नहीं कर पा रही हूं तुम्हें। तुम्हारी आवाज़ सुनने का बड़ा मन है। शायद हमारा इस जन्म का साथ यही तक है।

मुझसे प्यार करते हो तो एक काम करना। मेरे जाने के बाद कोई ऐसा कदम मत उठा लेना जिससे मम्मी पापा को परेशानी हो।

मुझे पता है कि तुम्हारे लिए मेरे बिना जीना मुश्किल है। मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगी। इतना ही कह पाई थी कि आंखे बंद हो गई थी। और डॉ. ने लखनऊ के लिए रेफर कर दिया था।

दिवाकर अब तुम बताओ अगर इस तरह का काम करोगे तो रीता की आत्मा को दुख होगा।

वहां बैठे हम सब के आंख में आंसू थे। हाथ में लगी चोट के बारे में भी सब जान चुके थे।

अगली सुबह मैं फिर से उठा और नाश्ते के बाद रीता के दीदार के लिए दरवाजे पर खड़ा हुआ। तभी मेरी आंखों में आंसू आ गए।

ऐसा लग रहा था अभी दरवाजा खुलेगा और कहेगी अंदर जाओ धूप से फोन पर बात करना। गेट पर खड़ा रो रहा था। और इसके आने का इंतजार कर रहा था। फर्क बस इतना था कि इस बार उसके छत और दरवाजे को नहीं उस रास्ते को देख रहा था ।

जिधर से वो सजधज कर चार कंधों पर गई थी। अब सारी उमर आंखें उस रास्ते का इंतजार करेंगी

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रवि श्रीवास्तव

लेखक, कवि, कहानीकार, व्यंग्यकार,

सम्पर्क सूत्र- ravi21dec1987@gmail.com

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भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,618,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,668,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,49,साहित्यिक गतिविधियाँ,179,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन 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रचनाकार: कहानी - इंतजार
कहानी - इंतजार
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